रविवार, 22 जुलाई 2018

👉 जो चाहोगे सो पाओगे !

🔶 एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

🔷 एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”, और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया।  उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”

🔶 साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी। लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “

🔷 साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।

🔶 युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

🔷 युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।

🔶 मित्रों ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 22 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 22 July 2018


👉 Motivational Story 22 July 2018

🔶 We have to create strength where it does not exist; we have to change our natures, and become new men with new hearts, to be born again… We need a nucleus of men in whom the Shakti is developed to its uttermost extent, in whom it fills every corner of the personality and overflows to fertilize the earth. These, having the fire of Bhawani in their hearts and brains, will go forth and carry the flame to every nook and cranny of our land.

✍🏻 ~ Sri Aurobindo
📖 From Akhand Jyoti

👉 In the Shrine of the Heart

🔶 Whenever you feel woeful, distressed or helpless in tragic circumstances or adversities around, whenever you feel demoralized by failures, whenever you see despair and darkness all around and are anxious about your future, whenever you are trapped in a dilemma and unable to think discreetly – don’t astray anymore in negativity. Remember, when a fox is surrounded by wild dogs
and sees no rescue, it runs swiftly back in to its den and feels relaxed and safe.

🔷 You should also throw away all thoughts and worries of your mind instantly and take shelter in the depths of your heart (the inner core of emotions, the inner self). Take a deep breath and just forget about everything; think as though nothing, not even your existence is there. As you would leave out these things at its doorsteps and enter deeper into the ‘shrine’ or your heart, you would that all the burden, all the worries and sufferings that were troubling you have evaporated. You have become light and floating like a thin piece of cotton. The calmness of your heart will sooth you like a moonlight shadow or a snow chamber to someone dying of heat in the sun of summer.

🔶 The purity of inner self is an edifice of peace and spiritual light. It is the source of ultimate realization and is therefore likened with “Brahmloka”. God has graciously endowed us with this paradise to experience divine bliss. But we remain unaware of it and astray externally because of our ignorance.

📖 Akhand Jyoti, March. 1941

👉 सार्वभौम सर्वजनीन-माँ की उपासना

🔶 दुनिया में जितने धर्म, सम्प्रदाय, देवता और भगवानों के प्रकार हैं उन्हें कुछ दिन मौन हो जाना चाहिए और एक नई उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?

🔷 माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है, मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिरशान्ति, विश्व-मैत्री और ‘‘सर्वे भवंतु सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।

🔶 हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना न की होती तो छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति इसीलिए यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बन्द कर केवल “माँ” की “मातृ-भावना” की उपासना करनी चाहिए।

✍🏻 ~ स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति-मार्च 1981 पृष्ठ 3

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 9)

👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार

🔶 इन सबसे जूझने के लिए एक सुविस्तृत मोर्चेबंदी करनी होगी। सामान्यजन तो अपनी निजी आवश्यकताओं, उलझनों तक का समाधान नहीं कर पाते, फिर व्यापक बनी-हर क्षेत्र में समाई विपन्नताओं से जूझने के लिए उनसे क्या कुछ बन पड़ेगा? इस कठिन कार्य को संपन्न करने के लिए विशिष्टतायुक्त प्रतिभाएँ चाहिए। बड़े युद्धों को जीतना वरिष्ठ सेनानायकों द्वारा अपनाई गई रणनीति और सूझ-बूझ के सहारे ही संभव हो पाता है। यही बात बड़े सृजनों के संबंध में भी है। ताजमहल जैसी इमारत बनाने, चीन की दीवार खड़ी करने, हाबड़ा जैसे पुल खड़े करने जैसे महापुरुषार्थों के लिए वरिष्ठ लोगों की, वस्तुस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर चलने वाली नीति ही सफल होती है। उनके लिए आवश्यक साधन एवं सहयोग जुटाना भी हँसी-खेल नहीं होता। बड़ी प्रतिभाएँ ही बड़ी योजनाएँ बनाती हैं, वे ही उतने भारी-भरकम दायित्व उठाती हैं। छोटे तो समर्थन भर देते हैं। सफलता पर हर्ष और असफलता पर विषाद प्रकट करने भर की उनमें क्षमता होती है।
  
🔷 इन दिनों दो कार्य प्रमुख हैं- विपन्नता से जूझना और निरस्त करना, साथ ही नवसृजन की ऐसी आधारशिला रखना, जिससे अगले ही दिनों संपन्नता, बुद्धिमत्ता, कुशलता और समर्थता का सुहावना माहौल बन पड़े। इक्कीसवीं सदी को दूरदर्शी लोग सर्वतोमुखी प्रगति की संभावनाओं से भरी-पूरी मानते हैं। उस अवधि में सतयुग की वापसी पर विश्वास करते हैं। इस मान्यता के अनेकों कारण भी हैं। उनमें से एक यह है कि इन्हीं दिनों समर्थ प्रतिभाओं का सृजन, उन्नयन और प्रखरीकरण तेजी से हो रहा है। संभवतः अदृश्य शक्ति का ही इसमें हाथ हो?

🔶 ऐसी शक्ति का जो समय-समय पर आड़े समय में बिगड़ता संतुलन संभालने के लिए अपने वर्चस्व का प्रकटीकरण करती रही है। कहना न होगा कि तेजस्वी प्रतिभाएँ ही भौतिक समृद्धि बढ़ाने, प्रगति का वातावरण उत्पन्न करने और अंधकार भरे वर्तमान को उज्ज्वल भविष्य में परिणत करने का श्रेय संपादित करती रही हैं। उन्हें ही किसी देश, समाज एवं युग की वास्तविक शक्ति एवं संपदा माना जाता है। स्पष्ट है कि वे उदीयमान वातावरण में ही उगती और फलित होती हैं। वर्षा में हरीतिमा और वसंत में सुषमा का प्राकट्य होता है। प्रतिभाएँ अनायास ही नहीं बरस पड़ती, न वे उद्भिजों की तरह उग पड़ती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक खोजा, उभारा और खरादा जाता है। इसके लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वातावरण का सृजन किया जाता है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 11

👉 व्यक्ति-व्यक्ति जीवन सुँदर बनाने में सहायता करे

🔶 समाज भी एक परिवार है। वैयक्तिक परिवार छोटा और सामाजिक परिवार बड़ा है। जैसे जब किसी परिवार में कोई विवाह आदि उत्सव होता है, तब बाहर से नाते-रिश्तेदार आकर परिवार की परिधि को बढ़ा देते हैं। सारे परिवार के लोग उनको परिवार का एक विशेष अंग समझते हैं और आये हुए लोग भी परिवार को अपना ही परिवार मानते हैं। उसी प्रकार यदि जीवन के प्रत्येक क्षण को एक सुँदर अवसर समझकर मनुष्य अन्य सामाजिक सदस्यों को आया हुआ बन्धु समझे तो पूरे समाज में सहयोग और सद्भावना की स्थिति आते देर न लगे।

🔷 मनुष्य को एक सीमित और अनजान अवधि का जीवन रूपी अवसर मिला है, जिसे उसे सुँदर से सुँदर ढंग से बिताना चाहिए। इसे उलझन और अशाँति में व्यतीत करना मानवता नहीं है। हर व्यक्ति को अच्छे से अच्छा जीवन बिताने में सहायता देता हुआ स्वयं भी अच्छे ढंग से जिये, तभी मानव जीवन का उद्देश्य सफल और संसार की सृष्टि का मंतव्य पूरा होगा, अन्यथा नहीं।

✍🏻 ~ लियो टॉलस्टाय
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1970 पृष्ठ 3