मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

👉 बहता पानी और चलते विचार

🔷 एक दिन ऋषिवर शिष्य को एक खेत पर लेकर गये जहाँ एक किसान बहती हुई नहर से पानी को रास्ता बनाकर खेत तक ले जा रहा था और ऋषिवर ने वो दृश्य शिष्य को बड़ी गहराई से दिखाया और फिर कहा!

🔶 ऋषिवर - वत्स इस बहते हुये पानी को यदि सही दिशा मिल जायें तो ये पानी खेत तक जाकर वहाँ की फसल को निहाल कर देगी और यदि आप इस पानी को सही दिशा न दोगे तो पानी तो अपना रास्ता स्वयं बनाकर इधरउधर व्यर्थता मे चला जायेगा और खेत की सारी फसल बर्बाद हो जायेगी!

🔷 शिष्य - जी गुरुदेव!

🔶 आगे ऋषिवर ने कहा - वत्स जिस तरह से बहते हुये पानी को सही दिशा देना जरूरी है उसी तरह से चलते हुये विचारों को सही दिशा देना बहुत जरूरी है और विचार कभी नही रुक सकते है वो निरन्तर चलते रहेंगे! विचारों को दिशा देना आपके अपने हाथ मे है तुम चाहो तो उन्हे आध्यात्मिक राह दे दो और तुम चाहो तो उन्हे भोगीयो की राह दे दो! विचार और मन का बहुत गहरा सम्बन्ध है मन वही जायेगा जहाँ उसे विचार लेके जायेंगे इसलिये हमेशा पवित्र और आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रहो ताकि मन ईष्ट मे लगे इस मन को येनकेन प्रकारेण ईष्ट के श्री चरणों मे लगाओ साधना, सत्संग, भजन, कथा, स्वाध्याय और भी जिस भी तरीके से ये ईष्ट मे रमे उसे ईष्ट मे रमाओ क्योंकि यदि तुमने विचारों को सही दिशा प्रदान न की तो विचार और फिर मन गलत दिशा मे चला जायेगा!

🔷 पहले विचार आयेगा फिर कर्म शुरू होगा फ़िर आगे की राह बनेगी और फिर सफलता असफलता मिलेगी! विचारों से ही पराया भी अपना हो जाता है और विचारों से ही अपने भी पराये हो जाते है! हॆ वत्स ये कभी न भुलना की विचार एक महाशक्ति है सकारात्मक विचारधारा एक वरदान है और नकारात्मक विचारधारा एक महाअभिशाप है! समान विचारों से ही रिश्तें युगों युगों तक रहते है और ऐसा कहते है की नही कहते है की भाई मेरे और उसके विचार एक दुसरे से नही मिलते है इसलिये हम दोनो के रास्ते अलगअलग है इसलिये अपने विचारों को अध्यात्मिक राह की और मोड़ देना क्योंकि जब विचारों को सही राह मिल जायेगी तो मन भी सही जगह लग जायेगा और ईष्ट और गुरू चरण के अतिरिक्त इस मन को कही पर भी शान्ति न मिलेगी।

🔶 इसलिये वत्स अपना तन, अपना मन और अपना धन बस अच्छे विचारों मे लगा देना क्योंकि सच्ची सफलता और आत्मशान्ति हमेशा अच्छे विचारों से आती है, और अच्छे विचार के लिये निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहना क्योंकि निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहने से जीवन मे अच्छे विचार ज़रूर आते है!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Dec 2017


👉 दुःखों का कारण और निवारण (भाग 2)

🔷 दुःख का एक स्थूल-सा कारण है वांछा का विरोध। जो हम चाहते हैं उसको न पा सकने पर जो क्षोभ अथवा निराशा होती है वही दुःख रूप में अनुभव होती है। मनुष्य को समझना चाहिए कि किसी की सभी वांछाएं कभी पूरी नहीं होतीं। वांछाएं वे ही पूरी होती हैं जो उचित और उपयुक्त होती हैं। किन्तु अज्ञानी व्यक्ति इसका विचार न कर अपनी वांछाएं बढ़ाते चले जाते हैं, और चाहते हैं कि वे सब बिना विरोध के पूरी होती रहें। ऐसे आदमी यह नहीं सोच पाते कि इस संसार में और दूसरे लोग भी हैं। उनकी भी अपनी कुछ वांछाएं होती हैं, जिनकी पूर्ति का अधिकार उन्हें भी है। यदि किसी एक की ही सारी वांछाएं पूरी होती रहें तो क्या दूसरे लोग अपनी वांछा पूर्ति के अधिकार से वंचित न रह जायेंगे? किसी एक की सारी वांछाएं पूरी होती रहें यह सम्भव नहीं।

🔶 किन्तु स्वार्थी मनुष्य जिनको केवल अपनेपन का ही ध्यान रहता है इस न्याय पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें अपना स्वार्थ, अपना हित और अपना लाभ ही दीखता रहता है। दूसरों के हित-अहित, हानि-लाभ से जैसे कोई मतलब ही नहीं रखते। ऐसे संकीर्णमना व्यक्तियों का दुःखी रहना स्वाभाविक ही है। वे स्वार्थ पूर्ण वांछाएं करते ही रहेंगे वे असफल और अपूर्ण होती रहेंगी, उनके मन में क्षोभ और निराशा उत्पन्न होगी और जिसके फलस्वरूप वे दुःख अनुभव ही करते रहेंगे। इस क्रम में न बाधा आ सकती है और न व्यवधान।

🔷 ऐसे संकीर्ण, स्वार्थ, लिप्सु और हीन-भावना वाले किसी भी व्यक्ति से मिलकर, फिर चाहे वह अमीर हो या गरीब, सम्पन्न हो अथवा अभावग्रस्त, पढ़ा हो अथवा अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष मालूम किया जा सकता है कि क्या वह अपने में जरा भी सुखी है? निश्चय ही वह दुःखी ही निकलेगा। विश्वासपूर्वक पूछने पर वह बतलायेगा कि वह बहुत दुःखी है, सारा संसार उसे दुःख क्लेशों से परिपूर्ण विदित होता है। निश्चय ही ऐसे लोगों के दुःख का कारण उनकी हीन और स्वार्थपूर्ण भावनायें ही होती हैं। दुःख दुर्भावनाओं के कारण होता है। दुर्भावना रखने वाला शैतान ही तो माना गया है, इसलिये महात्मा फ्रांसिस ने कहा है—‘दुःखी रहना शैतान का काम है।’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.14

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Buddha Derives Inspiration from a Bug

🔶 Buddha had not yet obtained self-realization. He was engaged in intense penance. His mind was restless. A thought crossed his mind, "Despite trying very hard, I have failed to attain the objective of self realization. Instead of wasting away all this time in penance, I should have enjoyed my princely life in the palace." 

🔷 All of a sudden he saw a tiny bug trying to climb up a nearby tree. The bug tried again and again but would fall off. Still it would not give up. It tried ten times but failed. On the eleventh attempt it successfully climbed up the tree. It appeared as if this scene was enacted just for the guidance of Buddha. The self-belief in him woke up, and he continued his penance with great conviction and ultimately attained his objective of self realization. He then applied his wisdom for guiding the society on the virtuous path.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 3)

🔶 इस संयोग की वेला में आनन्दानुभूति उठानी चाहिए। माता पुत्र का -प्रेमी प्रेयसी का मिलन जितना सुखद होता है उससे भी अधिक तृप्तिदायक यह आत्म परमात्म मिलन है। इस मिलन की प्रतिक्रिया को भी अनुभूति में उतारना चाहिए। शरीर और मन परमेश्वर को समर्पित किया गया ओर उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद यही होना चाहिए कि अपना काय कलेवर पूर्णतया परमेश्वर की इच्छानुसार गतिशील रहे। अपनी कोई इच्छा में अपनी इच्छा मिलनी जाय। परमेश्वर जिसमें प्रसन्न हो वो सोचना और वही करना सच्चे भजन परायण भक्त के लिए उचित है। बदला पाने के लिए-किया गया भजन तो वेश्यावृत्ति है।
                  
🔷 कहा जा चुका है कि भावनात्मक साधनाओं के लिए संध्या वंदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।”
     
🔶 इस ध्यान को जितनी गहराई से जितनी देर किया जा सके उतना संभव हो करना चाहिए और इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि प्राण-हंस की आत्म सत्ता सर्वथा स्वतंत्र है। शरीर की वस्त्र पेटी और मस्तिष्क की उपकरण पिटारी, जीवन रथ के दो अश्व वाहनों की तरह थी। काल कलेवर लक्ष्य पूर्ति के लिए आत्म-कल्याण के लक्ष्य को तिलाञ्जलि नहीं दी जानी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 4
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.4

👉 हमारी वसीयत और विरासत (अन्तिम भाग )

🌹  आत्मीय जनों से अनुरोध एवं उन्हें आश्वासन

🔷 बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है, पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों ऐसी बात भी नहीं। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हँसने-हँसाने, वस्तुएँ न बिखरने देने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएँ वे भी करते हैं। जितना सम्भव है, उतना तो उन्हें भी करना चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ भी ऐसी ही हैं। गोवर्धन उठाने वाले ने अपने अनगढ़ ग्वाल बालों के सहारे ही गोवर्धन उठाकर दिखाया था। हनुमान की बात किसी ने नहीं सुनी तो अपने सहचर रीछ-वानरों को ही समेट लाए। नव-निर्माण के कन्धे पर लदे उत्तरदायित्व को वहन करने में हम अकेले ही समर्थ नहीं हो सकते थे। यह मिल-जुलकर सम्पन्न हो सकने वाला कार्य था। सो समझदारों में से कोई हाथ न लगा तो अपने इसी बाल-परिवार को लेकर जुट पड़े और जो कुछ, जितना-कुछ सम्भव हो सका करते रहे। अब तक की प्रगति का यही सार संक्षेप है।

🔶 बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिए क्या करना चाहिए। इस कर्तव्य उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है, उसका स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकाँक्षा और आवश्यकता को भुला न दिया जाए। समय विकट है। इसमें प्रत्येक परिजन का समयदान और अंशदान हमें चाहिए। जितना मिलता रहा है, उससे भी अधिक मात्रा में, क्योंकि जो करना है, उसके लिए तत्काल कदम उठाने हैं। सो भी बड़े कामों के लिए बड़े-बड़े लोग चाहिए, बड़े साधन भी। हमारे परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का तो उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। भेड़ों के समूह में पले सिंह शावक की कथा अपने प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के ऊपर लागू होती है या हो सकती है।

🔷 हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता झटक कर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के सत्परामर्शों आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा है। एकाकी चलने का आत्मविश्वास जागा और आदर्शों को भगवान् मानकर कदम बढ़े। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा और न साधनहीन, उपेक्षित स्थिति का कभी आभास हुआ। सत्य का अवलम्बन अपनाने भर की देर थी कि असत्य का कुहासा अनायास ही हटता चला गया।

🔶 हमारा परिजनों से यही अनुरोध है कि हमारी जीवनचर्या को घटना क्रम की दृष्टि से नहीं वरन् पर्यवेक्षक की दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए कि उसमें दैवी अनुग्रह के अवतरण होने से ‘‘साधना से सिद्धि’’ वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है कि दूसरों के अवलंबन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषि परम्परा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे जितनी यथार्थता मिले वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाए कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आंतरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा, वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा जो अध्यात्म तत्त्वज्ञान एवं क्रिया-विज्ञान के साथ जोड़ी और बताई गई है।




🔷 अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत हैं कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें, सफलता जाँचें और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है, घाटे का नहीं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.196

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.23