गुरुवार, 8 नवंबर 2018

👉 ध्यान की साधना और मन की दौड़

🔶 एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा, “मेरी पत्नी धर्म-साधना-आराधना में बिलकुल ध्यान नहीं देती। यदि आप उसे थोड़ा बोध दें तो उसका मन भी धर्म-ध्यान में रत हो।”

🔷 साधु बोला, “ठीक है।””

🔶 अगले दिन प्रातः ही साधु उस व्यक्ति के घर गया। वह व्यक्ति वहाँ नजर नहीं आया तो  साफ सफाई में व्यस्त उसकी पत्नी से साधु ने उसके बारे में पूछा। पत्नी ने कहा, “वे जूते वाले की दुकान पर गए हैं।”

🔷 पति अन्दर के पूजाघर में माला फेरते हुए ध्यान कर रहा था। उसने पत्नी की बात सुनी। उससे यह झूठ सहा नहीं गया। त्वरित बाहर आकर बोला, “तुम झूठ क्यों बोल रही हो, मैं पूजाघर में था और तुम्हे पता भी था।””

🔶 साधु हैरान हो गया। पत्नी ने कहा- “आप जूते वाले की दुकान पर ही थे, आपका शरीर पूजाघर में, माला हाथ में किन्तु मन से जूते वाले के साथ बहस कर रहे थे।”

🔷 पति को होश आया। पत्नी ठीक कह रही थी। माला फेरते-फेरते वह सचमुच जूते वाले की दुकान पर ही चला गया था।  कल ही खरीदे जूते क्षति वाले थे, खराब खामी वाले जूते देने के लिए, जूते वाले को क्या क्या सुनाना है वही सोच रहा था। और उसी बात पर मन ही मन जूते वाले से बहस कर रहा था।

🔶 पत्नी जानती थी उनका ध्यान कितना मग्न रहता है। वस्तुतः रात को ही वह नये जूतों में खामी की शिकायत कर रहा था, मन अशान्त व असन्तुष्ट था। प्रातः सबसे पहले जूते बदलवा देने की बेसब्री उनके व्यवहार से ही प्रकट हो रही थी, जो उसकी पत्नी की नजर से नहीं छुप सकी थी।

🔷 साधु समझ गया, पत्नी की साधना गजब की थी और ध्यान के महत्व को उसने आत्मसात कर लिया था। निरीक्षण में भी एकाग्र ध्यान की आवश्यकता होती है। पति की त्रृटि इंगित कर उसे एक सार्थक सीख देने का प्रयास किया था।

🔶 धर्म-ध्यान का मात्र दिखावा निर्थक है, यथार्थ में तो मन को ध्यान में पिरोना होता है। असल में वही ध्यान साधना बनता है। यदि मन के घोड़े बेलगाम हो तब मात्र शरीर को एक खूँटे से बांधे रखने का भी क्या औचित्य?

👉 आज का सद्चिंतन 8 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 November 2018


👉 गृहस्थ में ईश्वर प्राप्ति

🔶 एक बार एक राजा ने अपने मंत्री से पूछा कि “क्या गृहस्थ में रहकर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है?” मंत्री ने उत्तर दिया- हाँ, श्रीमान् ऐसा हो सकता है। राजा ने पूछा कि यह किस प्रकार संभव है? मंत्री ने उत्तर दिया कि इसका ठीक ठीक उत्तर एक महात्मा जी दे सकते हैं जो यहाँ से गोदावरी नदी के पास एक घने वन में रहते हैं।

🔷 राज अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए दूसरे दिन मंत्री को साथ लेकर उन महात्मा से मिलने चल दिया। कुछ दूर चलकर मंत्री ने कहा- महाराज, ऐसा नियम है कि जो उन महात्मा से मिलने जाता है, वह रास्ते में चलते हुए कीड़े-मकोड़ो को बचाता चलता है। यदि एक भी कीड़ा पाँव से कुचल जाए तो महात्मा जी श्राप दे देते हैं। राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली और खूब ध्यानपूर्वक आगे की जमीन देख देखकर पैर रखने लगे। इस प्रकार चलते हुए वे महात्मा जी के पास जा पहुँचे।

🔶 महात्मा ने दोनों को सत्कारपूर्वक बिठाया और राजा से पूछा कि आपने रास्ते में क्या-क्या देखा मुझे बताइए। राजा ने कहा- भगवन् मैं तो आपके श्राप के डर से रास्ते के कीड़े-मकोड़ो को देखता आया हूँ। इसलिए मेरा ध्यान दूसरी ओर गया ही नहीं, रास्ते के दृश्यों के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है।

🔷 इस पर महात्मा ने हँसते हुए कहा- राजन् यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। मेरे श्राप से डरते हुए तुम आये उसी प्रकार ईश्वर के दण्ड से डरना चाहिए, कीड़ों को बचाते हुए चले, उसी प्रकार दुष्कर्मों से बचते हुए चलना चाहिए। रास्ते में अनेक दृश्यों के होते हुए भी वे दिखाई न पड़े। जिस सावधानी से तुम मेरे पास आये हो, उसी से जीवन क्रम चलाओ तो गृहस्थ में रहते हुए भी ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो। राजा ठीक उत्तर पाकर संतोषपूर्वक लौट आये।

📖 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 12

👉 First deserve then desire

🔶 To make the conditions favorable for our progress, we need not beseech anyone. And unless you deserve it, asking anything from the gods is futile, as they bound by their policy of helping only the ones who deserve.

🔷 As we all follow some rules in our lives and never transcend them, so do the gods. They too follow some set rules and never trespass on them. One such rule is for the bestowal of their grace - Grace is reserved only for the one who has performed the most arduous task of refinement of his character and personality.

🔶 This task, to take oneself to task, is one of the most severe penances a person can perform.

🔷 Developing the capacity to attract divine grace or help is similar to developing a tolerance level for drinking warm milk; we need to gradually and continuously increase our tolerance, our capacity for it.

🔶 Wherever this primary condition is satisfied, there the grace and system of God automatically kicks in and help comes pouring in from all the sides.

🔷 The history of our civilization is a witness to this phenomenon.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Sanskriti Sanjeevani Shrimadbhagwat evum Geeta Vangmay 31 Page- 1.125

👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 4)

🔶 किसान का उदाहरण ऊपर दिया गया है इन्हीं गतिविधियों को प्रत्येक महत्वपूर्ण सफलताएं पाने वाला व्यक्ति अपनाता है। विद्वान को विद्या की प्राप्ति चुटकी बजाने भर से—किसी जादू मन्त्र से नहीं हो जाती। इसके लिए उसे पाँच वर्ष की आयु से अध्ययन साधना का शुभारम्भ करना पड़ता है और स्कूल के घण्टे तथा घर पर अभ्यास का समय मिलाकर प्रतिदिन लगभग छह घण्टे का मानसिक श्रम करना पड़ता है। इस श्रम में जितनी एकाग्रता, अभिरुचि तथा तन्मयता होती है, उसी अनुपात से प्रगति होती है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होना इसी मनोयोग तथा उत्साहपूर्ण परिश्रम पर अवलम्बित रहता है। विद्वान समझा जाने वाला व्यक्ति बालकपन से आरम्भ किये अध्ययन क्रम को स्नातक बन जाने पर भी समाप्त करके चुप नहीं बैठा है, वरन् अपनी रुचि के विषयों को पढ़ने के लिए अनेकानेक ग्रन्थों को घण्टों तक पढ़ते रहने का स्वभाव बनाये रहा है।

🔷 आज वह विद्वान समझे जाने पर भी अध्ययन से विरत नहीं हुआ है। उसकी रुचि घटी नहीं है। इस ज्ञान साधना से यों उसे धन भी मिलता है और सम्मान भी। पर इससे बड़ी उपलब्धि है उसका आत्म−सन्तोष। ‘स्वान्तः सुखाय’ उद्देश्य को ध्यान में रखकर वह भले−बुरे दिनों में—हारी−बीमारी में भी—अन्तः प्रेरणा से किसी न किसी प्रकार पढ़ने के लिए समय निकालता रहता है। इसके बिना उसे अन्तःतृप्ति ही नहीं मिलती। आत्म−साधक की मनःस्थिति भी यही होनी चाहिए। उसे सिद्धि के लिए लालायित रहकर अपनी तन्मयता में व्यवधान उत्पन्न नहीं करना चाहिए वरन् साधना को किसी अध्ययन प्रिय की तरह ‘स्वान्तः सुखाय’ ही अपनाना चाहिए। परिणाम तो हर भले−बुरे कर्म का होता है फिर कोई कारण नहीं कि आत्म−साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।

🔶 व्यायामशाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मनःस्थिति और गतिविधि का यदि गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो आत्म साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चित नहीं हो जाता वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम ब्रह्मचर्य की, तेल मालिश की, उपयुक्त दिनचर्या की, प्रसन्नता निश्चिन्तता की भी व्यवस्था करता है। यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाय और मात्र दंड बैठकों को ही जादू की छड़ी मान लिया जाय तो सफलता दूर की चीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता। चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 13


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.13

👉 सद्पात्र की सहायता

🔶 प्रगति के पथ पर बढ़ चलने की परिस्थितियाँ उपलब्ध हों उसके लिए दूसरों से याचना की आवश्यकता नहीं। देवताओं से भी कुछ मांगना व्यर्थ है क्योंकि वे भी सद्पात्र को ही सहायता करने के अपने नियम में बंधे हुए हैं।

🔷 मर्यादाओं का उल्लंघन करना जिस तरह मनुष्य के लिये उचित नहीं है उसी तरह देवता भी अपनी मर्यादाएं बनाए हुए हैं कि जिसने व्यक्तित्व के परिष्कृत करने की कठोर काम करने की तपश्चर्या की हो केवल उसी पर अनुग्रह किये जाय। ईश्वरीय या दैवी अनुकम्पाएँ भी गरम दूध की तरह हैं उन्हें लेने के लिये पहले आवश्यक पात्रता का सम्पादन करना ही चाहिए।

🔶 यह प्राथमिक योग्यता जहाँ उपलब्ध हुई कि ईश्वरीय प्रेरणा एवं व्यवस्था के अनुसार दूसरों की सहायता भी मिलनी अनिवार्य है। संसार का इतिहास इसी तथ्य का साक्षी रहा हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 संस्कृति-संजीवनी श्रीमदभागवत एवं गीता वांग्मय 2 पृष्ठ 1.125

👉 धर्म जीतेगा अधर्म हारेगा

🔶 दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया। संवत् दो हजार के आसपास अधर्म नष्ट हो हो कर फिर जीवित होता हुआ प्रतीत होगा उसकी मृत्यु में बहुत देर लगेगी, पर अन्त में वह मर ही जायेगा।

🔷 तीस वर्ष से कम आयु के मनुष्य अवतार की वाणी से अधिक प्रभावित होंगे वे नवयुग का निर्माण करने में अवतार का उद्देश्य पूरा करने में विशेष सहायता देंगे। अपने प्राणों की भी परवा न करके अनीति के विरुद्ध वे धर्म युद्ध करेंगे और नाना प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जावेंगे। तीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिकाँश की आत्मा भारी होगी और वे सत्य के पथ पर कदम बढ़ाते हुए झिझकेंगे। उन्हें पुरानी वस्तुओं से ऐसा मोह होगा कि सड़े गले कूड़े कचरे को हटाना भी उन्हें पसंद न पड़ेगा। यह लोग चिरकाल तक नारकीय बदबू में सड़ेंगे, दूसरों को भी उसी पाप पंक में खींचने का प्रयत्न करेंगे, अवतार के उद्देश्य में, नवयुग के निर्माण में, हर प्रकार से यह लोग विघ्न बाधाएं उपस्थित करेंगे। इस पर भी इनके सारे प्रयत्न विफल जायेंगे, इनकी आवाज को कोई न सुनेगा, चारों ओर से इन मार्ग कंटकों पर धिक्कार बरसेंगी, किन्तु अवतार के सहायक उत्साही पुरुष पुँगब त्याग और तपस्या से अपने जीवन को उज्ज्वल बनाते हुए सत्य के विजय पथ पर निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ते जावेंगे।

🔶 अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 16

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...