गुरुवार, 8 नवंबर 2018

👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 4)

🔶 किसान का उदाहरण ऊपर दिया गया है इन्हीं गतिविधियों को प्रत्येक महत्वपूर्ण सफलताएं पाने वाला व्यक्ति अपनाता है। विद्वान को विद्या की प्राप्ति चुटकी बजाने भर से—किसी जादू मन्त्र से नहीं हो जाती। इसके लिए उसे पाँच वर्ष की आयु से अध्ययन साधना का शुभारम्भ करना पड़ता है और स्कूल के घण्टे तथा घर पर अभ्यास का समय मिलाकर प्रतिदिन लगभग छह घण्टे का मानसिक श्रम करना पड़ता है। इस श्रम में जितनी एकाग्रता, अभिरुचि तथा तन्मयता होती है, उसी अनुपात से प्रगति होती है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होना इसी मनोयोग तथा उत्साहपूर्ण परिश्रम पर अवलम्बित रहता है। विद्वान समझा जाने वाला व्यक्ति बालकपन से आरम्भ किये अध्ययन क्रम को स्नातक बन जाने पर भी समाप्त करके चुप नहीं बैठा है, वरन् अपनी रुचि के विषयों को पढ़ने के लिए अनेकानेक ग्रन्थों को घण्टों तक पढ़ते रहने का स्वभाव बनाये रहा है।

🔷 आज वह विद्वान समझे जाने पर भी अध्ययन से विरत नहीं हुआ है। उसकी रुचि घटी नहीं है। इस ज्ञान साधना से यों उसे धन भी मिलता है और सम्मान भी। पर इससे बड़ी उपलब्धि है उसका आत्म−सन्तोष। ‘स्वान्तः सुखाय’ उद्देश्य को ध्यान में रखकर वह भले−बुरे दिनों में—हारी−बीमारी में भी—अन्तः प्रेरणा से किसी न किसी प्रकार पढ़ने के लिए समय निकालता रहता है। इसके बिना उसे अन्तःतृप्ति ही नहीं मिलती। आत्म−साधक की मनःस्थिति भी यही होनी चाहिए। उसे सिद्धि के लिए लालायित रहकर अपनी तन्मयता में व्यवधान उत्पन्न नहीं करना चाहिए वरन् साधना को किसी अध्ययन प्रिय की तरह ‘स्वान्तः सुखाय’ ही अपनाना चाहिए। परिणाम तो हर भले−बुरे कर्म का होता है फिर कोई कारण नहीं कि आत्म−साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।

🔶 व्यायामशाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मनःस्थिति और गतिविधि का यदि गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो आत्म साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चित नहीं हो जाता वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम ब्रह्मचर्य की, तेल मालिश की, उपयुक्त दिनचर्या की, प्रसन्नता निश्चिन्तता की भी व्यवस्था करता है। यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाय और मात्र दंड बैठकों को ही जादू की छड़ी मान लिया जाय तो सफलता दूर की चीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता। चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 13


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.13

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