शुक्रवार, 17 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 March 2017


👉 करोगे याद हमको पास अपने शीघ्र पाओगे

🔴 वर्ष १९९९ की बात है। फरवरी का महीना था। पहला सप्ताह रहा होगा। बाहर से अन्दर तक जमा देने वाली ठण्ड में हिम प्रदेश हिमाचल की देवभूमि पर जाने का मौका गुरुकाज से मिला था। हिमाचल के कांगड़ा जिले में पालमपुर तहसील के गाँव दरगील- देवगाँव के निवासी डॉ. अश्विनी कुमार शर्मा, जो इन दिनों लखनऊ स्थित भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में प्रधान वैज्ञानिक हैं; और उनकी धर्मपत्नी, बहिन श्रीमती कंचनबाला शर्मा, संजय गाँधी पी.जी.आई. लखनऊ में कार्यरत हैं के दो सुपुत्रों चि. अर्णव और प्रणव का यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न कराने हम चार गायत्री परिजन लखनऊ से हिमाचल पहुँचे थे।

🔵 हम लोगों का तीन दिनों का हिमाचल प्रवास था। कुल चार बटुकों के यज्ञोपवीत संस्कार, पंचकुण्डीय गायत्री यज्ञ, दीपयज्ञ और विचार संगोष्ठी आदि के त्रिदिवसीय कार्यक्रम सम्पन्न कराकर चौथे दिन प्रातःकाल हम लोगों को पठानकोट के लिए जीप से नीचे आना था। जाड़ा बहुत होता था, हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड में सूर्योदय के पहले स्नानादि करके बन्द कमरे में हम लोग जप- ध्यान का क्रम पूरा कर लेते थे। विदाई वाले दिन हम चारों ने सोचा कि आज की प्रार्थना बर्फ से लदे पर्वत देवात्मा हिमालय के सामने खुले आकाश के नीचे की जाए।

🔴 हमारे टोलीनायक अग्रज श्री राम महेश मिश्र, भाई श्री राधेश्याम गिरि, श्री रामनाथ यादव और हम गाँव के उत्तरी छोर पर खड़े होकर सामूहिक स्वर में विविध प्रार्थनाएँ कर रहे थे। भावातिरेक में कुछ समय के लिए हमारी आँखें बन्द हो गई थीं। अचानक भाई मिश्र जी ऊँची आवाज में बोले- भाई! सब लोग सामने पहाड़ के ऊपर देखिये। उनके स्वर में अजीब सी उत्तेजना थी।

🔵 हम तीनों ने एक साथ आँखें खोलकर पूछा। क्या- कहाँ? उन्होंने दाहिने हाथ की तर्जनी से पर्वत की ऊँची चोटी की ओर इशारा किया। हमने देखा, ट्रेन की हेडलाइट जैसे दो प्रकाशपुँज पर्वत शिखर पर चमक रहे हैं। हम चारों परिजन उन प्रकाशपुंजों को परम पूज्य गुरुदेव और परम वंदनीया माताजी की प्रत्यक्ष उपस्थिति मानकर श्रद्धावनत हो गए।

🔴 हम चारों हर्ष- मिश्रित आँसुओं के साथ गुरुसत्ता की स्तुतियाँ गाए जा रहे थे। लगभग छः मिनट तक वे दोनों प्रकाश पुंज चमकते रहे, फिर धीरे- धीरे मध्यम होते हुए विलीन हो गए। हुआ यह था कि श्री राम महेश जी के मन में प्रार्थना के समय अचानक एक भाव आया। भाव के उसी प्रवाह में उन्होंने पूज्य गुरुदेव से कहा- गुरुवर! ०२ जून, १९९० को आप हम लोगों से बहुत दूर चले गए। तब आपने कहा था कि आप सूक्ष्म व कारण शरीर में हिमालय पर रहेंगे। अब तो हम हिमालय के पास ही हैं, गुरुवर! क्या यहाँ भी अदृश्य ही बने रहेंगे? यह सब सोचते हुए उन्होंने आँखें खोलकर हिमालय की ओर देखा। पूरी तरह बर्फ से ढके हिमालय पर्वत की सबसे ऊँची चोटी के समीप की चोटी पर दो प्रकाशपुञ्ज उन्हें दिखे। प्रकाशपुंज देखते ही मिश्र जी ने हम सबका ध्यान उस ओर आकृष्ट कराया था।

🔵 उस समय सूर्यदेव नहीं निकले थे। ऊषाकाल था, पर्वत की उस ऊँचाई पर न तो कोई रिहायश थी और न ही कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था की कोई संभावना। प्रार्थना शुरू करते समय उस शिखर पर ऐसा कुछ भी नहीं दिखा था। कोई ऐसा निशान नहीं था, जिसे भ्रम कहा जा सके। हम चारों आज भी पूरे विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि प्रकाश पुंज के रूप में प्रकट होकर हमारे आराध्य, हमारे गुरुदेव- माताजी ने अपने उस आश्वासन को पूरा किया, जिसमें उन्होंने कहा था- ‘करोगे याद हमको पास अपने शीघ्र पाओगे’।

🔴 आज जब चिरंजीवी अर्णव शर्मा अमेरिका में एम.एस. कर चुके हैं और प्रणव शर्मा इञ्जीनियर बन चुके हैं, देवभूमि हिमाचल में उनके दादा पुण्यात्मा साधक श्री विशनदास शर्मा जी के पुरखों के घर के पास की वे यादें हम चारों भाइयों के जेहन में ठीक वैसी ही बनी हुई हैं।

🔵 प्रातःकाल की आत्मबोध साधना में जब भी हम उस हिमक्षेत्र की मानसिक यात्रा करते हैं, क्षण मात्र में हमें अपने आस- पास गुरुसत्ता की पावन उपस्थिति की सहज अनुभूति होने लगती है। 

🌹 देवनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ आरक्षी, जिला कारागार, सीतापुर- (उ.प्र.)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 23)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान    

🔴 बिजली की शक्ति-सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। छोटे-बड़े अनेकों यन्त्र-उपकरण उसी की शक्ति से चलते और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित करते हैं। मनुष्य शरीर में भी जीवनचर्या को सुसञ्चालित रखने में जैव विद्युत ही काम आती है। चेहरे पर चमक, स्फूर्ति और पुरुषार्थ कर दिखाना उसी के अनुदान हैं। मन में शौर्य-पराक्रम साहस-विश्वास आदि के रूप में जब उसका अनुपात संतोषजनक मात्रा में होता है, तो उसे प्रतिभा कहते हैं। वह अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाती है। कठिनाइयों से जूझ पड़ना और उन्हें परास्त कर सकना भी उसी का काम है।                         

🔵 महत्त्वपूर्ण सृजन-प्रयोजनों को कल्पना से आगे बढ़कर योजना तक और योजना को कार्यान्वित करते हुए सफलता की स्थिति तक पहुँचाने की सुनिश्चित क्षमता भी उसी प्रतिभा में है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्राणाग्नि एवं तेजस्वी मानसिकता कहते हैं। उपासना क्षेत्र में इसीलिए प्राणायाम जैसे यत्न सरलतापूर्वक किये जाते हैं। तपश्चर्या में तितीक्षा अपनाते हुए साधन-सुविधा की आवश्यकता इसी अन्त:शक्ति के सहारे सम्पन्न कर ली जाती थी। शाप-वरदान एवं असाधारण स्तर के चमत्कार दिखा सकना और कुछ नहीं मात्र प्राणाग्नि के ज्वलनशील होने से उत्पन्न हुई ऋद्धि-सिद्धि स्तर की क्षमता ही है। 

🔴 शरीरबल, धनबल, बुद्धिबल तो कई लोगों में पाए जाते हैं, पर प्रतिभा के धनी कभी कहीं कठिनाई से ही खोजे-पाए जा सकते हैं। दैत्य दुष्प्रयोजनों में और देव सत्प्रयोजनों में इसी उपलब्ध शक्ति का उपयोग करते हैं। समुद्र-मन्थन जैसे महापराक्रम इसी सामर्थ्य की पृष्ठभूमि से बन पड़े हैं।           
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पीड़ित मानवता की करुणाशील सेवा

🔵 ज्येष्ठ का महीना था। दोपहर की कडकडा़ती हुई धूप अपनी चरम सीमा पर थी। इन्हीं दिनों ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बंगाल के कालना गाँव में आवश्यक काम से जाना पडा।

🔴 अभी कुछ ही दूर गये होंगे, एक गरीब आदमी कराहता, हाँफता हुआ रास्ते पर पडा़ दिखाई दिया। उन्होंने दखा कि उसकी गठरी एक तरफ पडी़ हुई है। दूसरी तरफ फटे-पुराने कपडो़ से अपना तन किसी तरह ढके हुए तडफडा रहा है। 

🔵 दीन-हीन नेत्रों से किसी की सहायता के लिए देख रहा है, पर किसका ध्यान उसकी तरफ जाता है ? सभी लोग आते और उसे ऐसी अवस्था में देखकर आँखें फेरते हुए चले जाते। मानो उसे देखा ही नहीं। बेचारा हैजे से बुरी तरह पीडित हो चुका था, कपडे़ मल-मूत्र में सन चुके थे।

🔴 उसे इस स्थिति में देखते ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर का दयालु हृदय करुणा से उमड़ पड़ा। काम तो बडा़ जरूरी था और शीघ्र आवश्यक था। पर उससे भी आवश्यक काम यह दिखाई लगा। अपने कंधे में लटकता हुआ बैग उतारकर एक तरफ रख दिया। रोगी के पास जाकर उसकी स्थिति को अच्छी तरह समझा। उस बेचारे की तो दम निकल रही थी। उसके सिर और पीठ पर हाथ फेरा और कुछ पूछा। पर वह कहाँ बोलता ?  इशारे रो पानी माँगा। आशय समझ गये। चलते समय उन्होंने बैग में शीशियाँ रख ली थीं। तुरंत ही पानी लाए और एक खुराक दवा दी। कपड़े वगैरा कुछ साफ किए। हाथ-पैरों और शरीर में लगी हुई टट्टी साफ की और तुरंत ही अपनी पीठ पर लादकर गॉव को चल दिए।

🔵 साथ में एकदूसरे अधिकारी गिरीशचंद्र जी भी चुप न रह सके। कुछ तो उन्हें भी करना चाहिए था। सो लोक-लाज वश उन्होंने भी पास ही पडी हुई बीमार की गठरी सिर पर रखकर पीछे-पीछे चल दिए। गाँव अभी काफी दूर था। बीच बीच में श्री गिरीश जी रोगी को ले चलने में सहायता करने की बात पूछते, परंतु विद्यासागर ने यही कहा- ''आपका इतना सहयोग भी हमें बहुत साहस दे रहा है। चिंता न करें, हमें कोइ कष्ट नहीं है। गाँव तक सुगमता से लिये चलेंगे।

🔴 कालना पहुँचते ही रोगी को तुरंत उन्होंने हॉस्पिटल में भरती कराया। कालना बडा गाँव है और अच्छा हॉस्पिटल है, डॉक्टर से तुरत मिले और रोगी की स्थिति का पूरा-पूरा विवरण दिया। वहाँ कुछ समय तक रुककर रोगी की सेवा सुश्रूषा में स्वयं भी हाथ बटाते रहे। जब रोगी पूरी तरह अच्छा हो गया तो उसे कुछ रुपये देकर विदा किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 87, 88

👉 माँ से बढ़कर कोई नहीं

🔴 स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया, मां की महिमा संसार में किस कारण से गाई जाती है? स्वामी जी मुस्कराए, उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ। जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, अब इस पत्थर को किसी कपड़े में लपेटकर अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा।

🔵 स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर बांध लिया और चला गया। पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर छण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई। शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए असह्य हो उठा। थका मांदा वह स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला मैं इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूंगा।

🔴 एक प्रश्न का उत्तर पाने क लिए मै इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया। मां अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है। संसार में मां के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है। इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।!

🌹 स्वामी विवेकानन्द के जीवन के प्रेरक प्रसंग

👉 स्वर्ग प्राप्ति के लिए ऊँचा सोचें, अच्छा करें।

🔵 धन वैभव से शारीरिक सुख-साधन मिल सकते हैं। विलास सामग्री कुछ क्षण इन्द्रियों में गुदगुदी पैदा कर सकती है, पर उनसे आन्तरिक एवं आत्मिक उल्लास मिलने में कोई सहायता नहीं मिलती। धूप-छाँव की तरह क्षण-क्षण में आते-जाते रहने वाले सुख-दुःख शरीर और जीवन के धर्म हैं। इनसे छुटकारा नहीं मिल सकता। जिनने अपनी प्रसन्नता इन बाह्य आधारों पर निर्भर कर रखी है, उन्हें असन्तोष एवं असफलता का ही अनुभव होता रहेगा। वे अपने को दुःखी ही अनुभव करेंगे।

🔴 सच्चा एवं चिरस्थायी सुख आत्मिक सम्पदा बढ़ाने के साथ बढ़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में जितनी उत्कृष्टता आती है, उतना ही अन्तःकरण निर्मल बनता है। इस निर्मलता के द्वारा परिष्कृत दृष्टिकोण हर व्यक्ति , हर घटना एवं हर पदार्थ के बारे में रचनात्मक ढंग से सोचता और उज्ज्वल पहलू देखता है। इस दृष्टिकोण की प्रेरणा से जो भी क्रिया-पद्धति बनती है, उसमें सत्य, धर्म एवं सेवा का ही समावेश होता है।

🔵 परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है। स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं, वह तो मनुष्य के सोचने, देखने और करने की उत्कृष्ट मिश्रित प्रक्रिया मात्र है। जो केवल ऊँचा ही सोचता और ऊँचा ही करता है, उसे हर घड़ी स्वर्ग का आनन्द मिलेगा। उसके सुख का कभी अन्त नहीं।

🌹 ~स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1966 पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 March

🔴 अपनी योग्यताओं का उपयोग लोग साँसारिक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने में भी कर सकते हैं किन्तु धन, स्त्री, पुत्र, मिष्ठान, पद, राजनैतिक महत्व आदि भौतिक विभूतियाँ भी स्थायी कहाँ हैं? माना इनमें कुछ सुख और सन्तोष मिलता है पर क्या यह किसी से छुपा है कि भोग अन्त में रोग ओर शोक के रूप में ही परिवर्तित होते हैं। इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होतीं। भोग-भोग की इच्छा को और भी अतृप्त बनाना है। वासना, वासना को ही भड़काती है फलस्वरूप मनुष्य दिन-प्रति दिन वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर ही अग्रसर होता रहता है। साँसारिक कामनाओं में प्रत्येक दृष्टि से सन्तुष्ट व्यक्ति भी भय से नहीं बच पाते। रोग और शोक तो उन्हें भी घेरे रहते हैं।

🔵 अपने आपको जानना ही आत्म-ज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्म-ज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है दूसरी अमरता, एक अन्धकार है दूसरा प्रकाश, एक जन्म-मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बन्धन है दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न-भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिये एक को ग्रहण करने के लिये दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है।

🔴 बुद्धिमान होना अच्छा है किन्तु बुद्धिवादी होना उतना अच्छा नहीं है। आज हम अपने को विगत युगों के मानवों से अधिक बुद्धिमान तथा सभ्य मानते हैं। आज हम अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और कहते हैं कि हमने अपने पूर्वकालीन पूर्वजों से अधिक उन्नति और विकास किया है। यह ठीक है कि आज के मनुष्य ने उन्नति की है, किन्तु याँत्रिक क्षेत्र में। मानवता के क्षेत्र में नहीं। जब तक हम बुद्धि के बल पर मानव मूल्यों की प्रतिस्थापना नहीं करते, सही मानो में बुद्धिमान कहलाने के अधिकारी नहीं हो सकते।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 39)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 अन्धविश्वासियों के विचार में भूत प्रेतों का अस्तित्व होता है और उसी दोष के कारण वे कभी-कभी खेलने-कूदने और तरह तरह की हरकतें तथा आवाजें करने लगते हैं। यद्यपि ऊपर किसी बाह्य तत्व का प्रभाव नहीं होता तथापि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें किसी भूत अथवा प्रेत ने दबा लिया है। किन्तु वास्तविकता यह होती है कि उनके विचारों का विकार ही अवसर पाकर उनके सिर चढ़कर खेलने लगता है। किसी दुर्बुद्धि अथवा दुर्बलमना व्यक्ति का जब यह विचार बन जाता है कि कोई उस पर उसे मारने के लिए टोना कर रहा है तब उसे अपने जीवन का ह्रास होता अनुभव होने लगता है।

🔵  जितना-जितना यह विचार विश्वास में बदलता जाता है उतना उतना ही वह अपने को क्षीण, दुर्बल तथा रोगी होता जाता है अन्त में ठीक-ठीक रोगी बन कर एक दिन मर तक जाता है। जबकि चाहे उस पर कोई टोना किया जा रहा होता है अथवा नहीं। फिर टोना आदि में उनके प्रेत पिशाचों में वह शक्ति कहां जो जीवन-मरण के ईश्वरीय अधिकार को स्वयं ग्रहण कर सकें यह और कुछ नहीं तदनुरूप विचारों की ही परिणति होती है। 

🔴 मनुष्य के आन्तरिक विचारों के अनुरूप ही बाह्य परिस्थितियों का निर्माण होता है उदाहरण के लिए किसी व्यापारी को ले लीजिए। यदि वह निर्बल विचारों वाला है और भय तथा आशंका के साथ खरीद फरोख्त करता है, हर समय यही सोचता रहता है कि कहीं घाटा न हो जाय, कहीं माल का भाव न गिर जाय, कोई रद्दी माल आकर न फंस जाय, तो मानो उसे अपने काम में घाटा होगा अथवा उसका दृष्टिकोण इतना दूषित हो जायेगा कि उसे अच्छे माल में भी त्रुटि दीखने लगेगी, ईमानदार आदमी बेईमान लगने लगेंगे और उसी के अनुसार उसका आचरण बन जायेगा जिससे बाजार में उसकी बात उठ जायेगी। उससे सहयोग करना छोड़ देंगे और वह निश्चित रूप से असफल होगा और घाटे का शिकार बनेंगे। अशुभ विचारों से शुभ परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 17)

🌹 पात्रता से दैवी अनुग्रह की प्राप्ति  

🔵 नवसृजन के इस विश्वमानव के भाग्य-भविष्य को नये सिरे से लिखने वाले सुयोग में दैवी शक्ति का निश्चित रूप से बड़ा योगदान रहेगा। इसके लिये किसी को किसी से कुछ माँगने की, अनुग्रह या अनुरोध करने की आवश्यकता नहीं है। अपनी पात्रता अनुरूप बना लेने पर सब कुछ अनायास ही खिंचता चला आता है। वर्षाकाल में खुले में रखा बर्तन अनायास ही भर जाता है, जब छोटी कटोरी हो तो उसमें उतना ही कम पानी दीखेगा, जबकि बड़ी बाल्टी पूरी तरह भरी हुई मिलेगी। यह पात्रता का ही चमत्कार है। गहरे सरोवर लबालब भर जाते हैं, जबकि ऊँचे टीलों पर पानी की कुछ बूँदें भी नहीं टिकतीं।        

🔴 वर्षा में उपजाऊ जमीन हरियाली से लद जाती है, पर ऊसर बंजर ज्यों-के त्यों वीरान पड़े रहते हैं। नदियाँ चूँकि समतल की अपेक्षा गहरी होती हैं, इसलिये चारों ओर का पानी सिमटकर उनमें भरने और बहने लगता है। यह पात्रता ही है, जिसके अनुसार छात्रवृत्ति, प्रतिस्पर्धा, पुरस्कार आदि उपलब्ध होते हैं। यह लाभ मात्र चापलूसी करने भर से किसी को नहीं मिलते। कोई अफसर रिश्वत या खुशामद से प्रसन्न होकर किसी को यदि अनुचित पद या उपहार प्रदान कर दे तो उसकी न्यायनिष्ठा पर कर्तव्यपालन की जिम्मेदारी पूरी न करने का आक्षेप लगता है और उस कारण उसकी खिंचाई होती है। यह नियम शाश्वत है, इसलिये इंसान पर भी लागू होता है और उनके भगवान् पर भी।       

🔵 पात्रता अर्जित कर लेने पर बिना किसी अतिरिक्त कोशिश-सिफारिश के, अपनी योग्यता के अनुरूप पद प्राप्त कर लिये जाते हैं, इसलिये दैवी शक्तियों के अवतरण के लिये पहली शर्त है-साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता। सर्वत्र इसी की खोज और माँग है, क्योंकि विवाह योग्य हो जाने पर अभिभावक उपयुक्त जोड़ा तलाश करने के लिये काफी भाग-दौड़ करते हैं, किन्तु कोई कुपात्र पड़ोस में बसता हो, तो भी उसकी ओर से मुँह फेर लेते हैं-खुशामद-सिफारिश और संदेश पहुँचने पर भी ध्यान नहीं देते। आध्यात्मिक सिद्धियाँ ईश्वर की पुत्रियाँ हैं। उन्हें प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को सर्वांग सुंदर होना चाहिये-भीतर से भी और बाहर से भी। यही पात्रता की परिभाषा है।  
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 21)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

🔴 हममें से हर आदमी को आलस्यरहित होना चाहिए। दिनचर्या बनाकर चलना चाहिए और काम करना चाहिए। हमारे स्वभाव के बहुत सारे दोष और दुर्गुण हैं।  इसमें खास तौर से क्रोध करना और आवेश में आ जाना, दूसरों को कड़वे वचन कह देना और बेकाबू हो जाना। ये तो बुरी बात है और आदमी का लोभ उतना करना, जिससे कि सारे के सारे अपने धन और क्षमता को केवल अपने शरीर व अपने कुटुम्ब के लिए खर्च करे। जिसकी ये हिम्मत न पड़े कि हमको समाज के लिए खर्च करना चाहिए और समाज के लिए अनुदान देना चाहिए। ऐसे आदमी को लोभी, कंजूस और कृपण कहा जाता है। आदमी को कृपण, कंजूस और लोभी नहीं होना चाहिए।        

🔵 समाज के प्रति व्यक्ति को उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए। काम वासना का अर्थ है कि नारियों के प्रति और दूसरे लिंग के प्रति, मनुष्य को दुर्भावनाएँ और पापवृत्तियाँ नहीं रखनी चाहिए। स्त्रियाँ हैं तो क्या? पुरुष हैं तो क्या? इनसान तो हैं। इनसान, इनसान के प्रति अच्छे भाव रखे। उनमें सरसता के भाव रखे, तो इसमें क्या बुरा है? काम वासना की बात सोचे, ये क्या बात है? स्त्री है, इसका मतलब कि ये सिर्फ काम- वासना के ही लिए है क्या?    

🔴 हमारी माँ भी तो स्त्री है, बहिन भी तो स्त्री है, हमारी बेटी भी तो स्त्री ही है। क्या हम काम- वासना के भाव रखते हैं? स्त्री- पुरुष के बीच एक काम- वासना का ही रिश्ता है क्या? नहीं, ये बहुत बुरी बात है। दिमाग में काम- वासना के विचारों को रखे रहना और क्रोध का आचार, बात- बात में आवेश में आ जाना, दूसरों की गलतियों के ऊपर आपे से बाहर आ जाना ठीक नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 78)

🌹 मथुरा के कुछ रहस्यमय प्रसंग

🔴 यह रहस्यमयी बातें हैं। आयोजन का प्रत्यक्ष विवरण तो हम दे चुके हैं, पर जो रहस्यमय था, सो अपने तक सीमित रहा है। कोई यह अनुमान न लगा सका कि इतनी व्यवस्था, इतनी सामग्री कहाँ से जुट सकी, यह सब अदृश्य सत्ता का खेल था। सूक्ष्म शरीर से वे ऋषि भी उपस्थित हुए थे, जिनके दर्शन हमने प्रथम हिमालय यात्रा में किए थे। इन सब कार्यों के पीछे जो शक्ति काम कर रही थी, उसके सम्बन्ध में कोई तथ्य किसी को विदित नहीं। लोग इसे हमारी करामात चमत्कार कहते रहे, भगवान साक्षी है कि हम जड़ भरत की तरह, मात्र दर्शक की तरह यह सारा खेल देखते रहे। जो शक्ति इस व्यवस्था को बना रही थी, उसके सम्बन्ध में कदाचित ही किसी को कुछ आभास हुआ हो।

🔵 तीसरा काम जो हमें मथुरा में करना था, वह था गायत्री तपोभूमि का निर्माण। इतने बड़े कार्यक्रम के लिए छोटी इमारत से काम नहीं चल सकता। वह बनना आरम्भ हुई। निर्माण कार्य आरम्भ हुआ और हमारे आने के बाद भी अब तक बराबर चलता ही रहा है। प्रज्ञा नगर के रूप में विकसित-विस्तृत हो गया है। जो मथुरा गए हैं, गायत्री तपोभूमि की इमारत और उसका प्रेस, अतिथि व्यवस्था, कार्यकर्ताओं का समर्पण भाव आदि देख कर आए हैं, वे आश्चर्यचकित होकर रहे हैं। इतना सामान्य दीखने वाला आदमी किस प्रकार इतनी भव्य इमारत की व्यवस्था कर सकता है। 

🔴 इस रहस्य को जिन्हें जानना हो, उन्हें हमारी पीठ पर काम करने वाली शक्ति को ही इसका श्रेय देना होगा, व्यक्ति को नहीं। अर्जुन का रथ भगवान सारथी बनकर चला रहे थे। उन्होंने जिताया था, पर जीत का श्रेय अर्जुन को मिला और राज्याधिकारी पाण्डव बने। इसे कोई चाहे तो पाण्डवों का पुरुषार्थ-पराक्रम कह सकता है, पर वस्तुतः बात वैसी थी नहीं। यदि होती तो द्रौपदी का चीर उनकी आँखों के सामने कैसे खींचा जाता? वानप्रस्थ काल में जहाँ-तहाँ छिपे रहकर जिस-तिस की नगण्य सी नौकरियाँ क्यों करते फिरते?

🔵 हमारी क्षमता नगण्य है, पर मथुरा जितने दिन रहे, वहाँ रहकर इतने सारे प्रकट और अप्रकट कार्य जो हम करते रहे, उसकी कथा आश्चर्यजनक है। उसका कोई लेखा-जोखा लेना चाहे, तो हमारी जीवन साधना के तथ्यों को ध्यान में रखे और हमें नाचने वाली लकड़ी के टुकड़े से बनी कठपुतली के अतिरिक्त और कुछ न माने, यही हमने सम्पर्क में आने वालों को भी सिखाया व सत्ता द्वारा परोक्ष संचालन हेतु स्वयं को एक निमित्त मानकर उपासना, साधना, आराधना के विविध प्रसंगों का समय-समय पर रहस्योद्घाटन किया है। जो चाहे उन्हीं प्रसंगों से हमारी आत्मकथा का तत्त्व दर्शन समझते रह सकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 79)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ

🔴 अगले कदम बढ़ने पर तीसरी मंजिल आती है- आत्मवत सर्व भूतेषु। अपने समान सबको देखना। कहने- सुनने में यह शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यत: नागरिक कर्तव्य का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार    की सीमा तक पहुँच कर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुत: इस तत्त्व ज्ञान की सीमा अति विस्तृत है। उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्म सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। साधना के लिए दूसरे के अन्तरंग के साथ अपना अन्तरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी सम्वेदनाओं को अपनी सम्वेदना समझना पड़ता है।          

🔵 वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता का यही मूर्त रूप है कि हम हर किसी को अपना मानें, अपने को दूसरों में और दूसरों को अपने में पिरोया हुआ- घुला हुआ अनुभव करें। इस अनुभूति की प्रतिक्रिया यह होती है कि दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दु:ख में अपना दु:ख अनुभव होने लगता है। ऐसा मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रह सकता, स्वार्थों की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दु:ख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते हैं, मानों यह सब अपने यह सब अपने नितान्त व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। 

🔴 संसार में अगणित व्यक्ति पुण्यात्मा और सुखी हैं, सन्मार्ग पर चलते और मानव जीवन को धन्य बनाते हुए अपना व पराया कल्याण करते हैं। यह देख- सोचकर जी को बड़ी सान्त्वना होती है और लगता है सचमुच यह दुनियाँ ईश्वर ने पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई। यहाँ पुण्य और ज्ञान मौजूद है। जिसका सहारा लेकर कोई भी आनन्द- उल्लास की, शांति और सन्तोष की दिव्य उपलब्धियाँ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकता है। पुण्यात्मा, परोपकारी और आत्मावलम्बी व्यक्तियों का अभाव यहाँ नहीं है। वे संख्या में कम भले ही हों अपना प्रकाश तो फैलाते ही हैं और उसे चाहे थोड़े से प्रयत्न से सजीव एवं सक्रिय कर सकता है। धरती वीर विहीन नहीं, यहाँ नर- नारायण का अस्तित्व विद्यमान है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...