गुरुवार, 25 जनवरी 2018

👉 सच्ची भक्ति की महिमा

🔶 एक बुढ़िया माई को उनके गुरु जी ने बाल-गोपाल की एक मूर्ती देकर कहा- "माई ये तेरा बालक है,इसका अपने बच्चे के समान प्यार से लालन-पालन करती रहना।"
बुढ़िया माई बड़े लाड़-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी।

🔷 एक दिन गाँव के बच्चों ने देखा माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड़ कर रही है! बच्चो ने माई से हँसी की और कहा - "अरी मैय्या सुन यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है।

🔶 मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये..!" बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।

🔷 अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दुसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया।.....

🔶 बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही। उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया!

🔷 भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरेलाल को उठाने !" मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई!

🔶 तब श्यामसुंदर ने कहा - "मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!" माई ने कहा - "क्या? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से..!

🔷 " (बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है, क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना-ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये )।

🔶 ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले :-"अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ती से प्रसन्न हूँ" बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाय" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।

🔷 भगवान को पाने का सबसे सरल मार्ग है, भगवान जी को प्रेम करो - निष्काम प्रेम जैसे बुढ़िया माई ने किया!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 26 Jan 2018


👉 गुरु ही साधक व साधना है

🔶 गुरु वह तत्त्व है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके ज्ञान रूपी तेज का प्रकाश करता है। ‘गु’ अन्धकार का वाचक है और ‘रु’ प्रकाश का।  ऐसे सदगुरु के लिए लगन, उनको पाने के लिए गहरी चाहत, उनके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए आतुरता में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है। वे कृतार्थ और कृतकृत्य होते हैं, जो सदगुरु के चरणों में भक्तिपूर्वक अपने को न्यौछावर करने की आगे बढ़ते हैं, क्योंकि गुरु चरणों की महिमा अपार है।
  
🔷 गुरुचरण ही अपने तात्त्विक रूप में परब्रह्म का स्वरूप है। लेकिन इसे जाना और समझा तभी जा सकता है, जब साधक अपनी गुरुभक्ति की साधना के शिखर पर आरूढ़ हो जाता है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है—‘श्रीचरणों में नेह है। साधना और सिद्धि है यह॥’ अर्थात् गुुरुचरणों में अनुराग साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो उसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होती है। गुरुचरणों के भावभरे ध्यान से इसकी शुरूआत होती है। भाव भरे ध्यान का रूप कुछ इस अटल विश्वास से है कि सदगुरु का स्थूल रूप और कुछ नहीं, परब्रह्म का घनीभूत प्राकट्य है। बिना किसी शर्त, माँग, अधिकार के स्वयं को उनके श्रीचरणों मेेें न्यौछावर कर देना ही गुुरुचरणों की सच्ची सेवा है। इससे हमारे जन्म-जन्मान्तर के सारे पाप धुल जाते हैं और आत्मा का विशुद्ध स्वरूप निखरने लगता है। साथ ही अन्तर्चेतना में अयमात्मा ब्रह्म की अनुभूति होने लगती है।
  
🔶 साधनामय जीवन की सर्वोच्च व्याख्या का सार है-साधक का सद्ïगुरु में समर्पण, विसर्जन, विलय। अनन्य चिन्तन की निरन्तरता साधक के सदगुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है और तब आती है-विलीनता की अवस्था। इस भावदशा में शिष्य-साधक का काय-कलेवर तो यथावत्ï बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है। वहाँ उपस्थित होती है उसके सदगुरु की चेतना। वह दिखते हुए भी नहीं होता, होता है केवल उसका सदगुरु।
  
🔷 जो गुरुभक्ति की डगर पर चलने का साहस करते हैं, उन्हें दो-चार कदम आगे बढ़ते ही बहुत से साधना-सत्यों का साक्षात्कार होने लगता है। वे जानते हैं कि सदगुरु ही साधक हैं, वही साधना हैं और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं।
  
🔶 तात्पर्य यह है कि सदगुरु की कृपाशक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सदगुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है। तब उसे उस सत्य का बोध होता है कि सदगुरु ही साध्य है; क्योंकि सद्ïगुरु और इष्ट दो नहीं, बल्कि एक हैं। अपने गुुरु ही गोविन्द हैं। वही सदाशिव और परम शक्ति हैं।
  
🔷 प्रयत्न पूर्वक सद्ïगुरु की आराधना के सिवाय कुछ भी करने की जरूरत नहीं। मन से सदगुरु का चिन्तन-स्मरण, हृदय से अपने गुरु की भक्ति, वाणी से उनके पावन नाम का जप और शरीर से उनके आदशों का निष्ठपूर्वक पालन करने से समस्त दुर्लभ आध्यात्मिक विभूतियाँ, शक्तियाँ सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाती हैं। गुरु ही ब्रह्म है, उनके वचनों में ही ब्रह्मविद्या समायी है। इस सत्य को जो अपने जीवन में धारण करता है, आत्मसात् करता है, अनुभव करता है, वही शिष्य है, वही साधक है। वस्तुत: गुरुतत्व से भिन्न और अन्य कुछ भी नहीं है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अहिंसा और हिंसा (अंतिम भाग)

🔶 यह सोचना गलती है कि दुख देना हिंसा और आराम देना अहिंसा है। तत्वतः काम के परिणाम और करने वाले की नियत के अनुसार हिंसा अहिंसा का निर्णय होना चाहिये। तात्कालिक और क्षणिक दुख-सुख में दृष्टि को अटकाकर उससे उत्पन्न होने वाले परिणाम की ओर से आँखें बन्द कर लेना बुद्धिमानी न होगी। किये हुए कार्य के परिणाम का गंभीरतापूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के उपरान्त उसके उचित या अनुचित होने का निर्णय करना चाहिए और उसी के आधार पर उस कार्य को हिंसा या अहिंसा ठहराना चाहिये।

🔷 विवेकपूर्वक पालन की जाने वाली अहिंसा में दंड देने की, शस्त्र प्रहार करने की युद्ध और संघर्ष करने की गुंजाइश है। एक विचारवान व्यक्ति नेक नीयती, परोपकार और धर्म भावना से अहिंसा धर्म के अनुसार दुष्ट को जान से भी मार सकता है और इसके लिए वह बिलकुल निष्पाप रहेगा। किन्तु एक कायर, बुज़दिल, अकर्मण्य और अशक्त व्यक्ति यदि अपना गलती को छिपाने के लिए कष्ट से डरकर अन्याय सहन करे तो वह अहिंसक कदापि नहीं होगा, बल्कि उसे सच्चे अर्थों में पातकी की और हिंसक कहा जायेगा। वास्तव में कायरता और हिंसा एक ही वस्तु के दो स्वरूप हैं। दोनों की जननी स्वार्थ बुद्धि है। वीरता और उदारता अहिंसा है। जो परमार्थ बुद्धि के कारण उत्पन्न होती है।

📖 अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 2)

🔷 निश्चित ही मनुष्य को जो मिला है, वह उसकी पात्रता देखते हुए किसी विशेष प्रयोजन के लिए धरोहर रूप में दिया गया है। खड़े होकर चलने वाले पैर, दस उँगलियों और अनेक मोड़ों वाले हाथ, बोलने वाली जीभ, सूझबूझ वाला मस्तिष्क, दूरदर्शी विवेक अन्य किसी प्राणी के हिस्से में नहीं आया। परिवार बसाने, समाज बनाने, आजीविका कमाने, वाहनों का उपयोग करने, प्रकृति की रहस्यमयी परत कुरेदने, शिक्षा, चिकित्सा, कला व्यवसाय, सुरक्षा जैसे साधन जुटाने में अन्य कौन प्राणी मनुष्य की समता कर सकता है।

🔶 यह सभी विभूतियाँ ऐसी हैं जिनका महत्त्व उपभोक्ता को तो प्रतीत नहीं होता, पर जब वे छिन जाती है तो स्मरण आता है कि जो सौभाग्य अपने को हस्तगत हुआ था उसे प्राणि जगत के साथ तुलना करने पर अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता था। उसका सदुपयोग न कर सकने पर जो पश्चाताप होता है, उसकी व्यथा और शृंखला इतनी लम्बी होती है कि जन्म जन्मान्तरों तक उस भूल की पीड़ा व्यथित करती रहे।

🔷 सृष्टा ने मनुष्य स्तर तक पहुँचाने पर जीवधारियों की क्रमिक प्रगति और पात्रता को देखते हुए सोचा, कि क्यों न इसे सृष्टि की सुव्यवस्था में सहयोगी बनाकर अपना थोड़ा सा भार हल्का किया जाय? इसी दृष्टि से उसे युवराज का पद प्रदान किया गया और तदनुरूप समर्थता से सम्पन्न किया गया कि सृष्टि की सुन्दरता, सुव्यवस्था प्रगति एवं सुसंस्कारिता को बढ़ाने में वह विशेष योगदान भी कर सकेगा।

🔶 इसी आशा अभिलाषा के अनुरूप मनुष्य का सृजन हुआ है। और उसके निर्माण से सृष्टा का समूचा कौशल दाव पर लगा है। उसे अपनी अनुकृति के स्तर का ही बनाया गया है। जो विभूतियाँ उसमें थी उन सभी को बीज रूप में उसने काया के अनेकानेक कोश भण्डार में इस प्रकार भर दिया है कि वह जब चाहे तब उन्हें फलित, प्रस्फुटित करके उच्च स्तरीय बना सके। संक्षेप में यही है मनुष्य की सत्ता और महत्ता का सार संक्षेप।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 26 Jan

🔷 Outer cleanliness is very important but no less is the importance  of internal holiness, i.e. sacredness of life. Both are complimentary to each others. Outer decoration is only useful if organs of internal body are also healthy. But to achieve that sacred condition of life one will have develop virtues and high moral codes in life Healthy body, healthy mind must also bear high character and ideality in life.
 
🔶 The original divinity of human being manifest its potentiality if we discipline our life by five restraint of Panch-sheel These are – hard working habit, management gentlemanship, economical planning and by caring and sharing the sorrows of others. These five trends in life mould the entire personality of a man. Our yielidind to the attraction of sensual passion and attraction is true slavery of human life.

🔷 In coming days if people change their views for the object of life, and does not stick to materialistic life, the era will change. It is our ignorance; tension and scarcity are the main factors which create well in our life. All the dirt and four smelling are when wiped off cleans the home. Similarly when the things will improve and men will rectify himself, the golden era will appears everywhere in this world.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 6)

🔷 मित्रो! लोगों की आर्थिक समस्या का समाधान इस तरह से हम कर सकते हैं। सबसे पहले आपको अपने खर्च में मितव्ययिता बरतनी चाहिए, ताकि आपको कर्जदार होने का मौका न मिले। ताकि आपको परेशान होने का मौका न मिले। आर्थिक समस्याओं के समाधान करने के लिए इन सूत्रों को स्वर्णिम अक्षरों से और हीरे की कलम से अपने मन-मस्तिष्क में लिखने वाले, सचमुच में जहाँ कहीं भी ये सूत्र लोगों के हृदय में हृदयंगम कर लिए जायेंगे, वहाँ लोगों की हालत ठीक होती हुई चली जायेगी। जहाँ मनुष्यों को शराब पीने की आदत होगी, कोकाकोला पीने की आदत होगी, सिनेमा देखने की आदत होगी। आरामपरस्ती की आदत बनी रहेगी, हरामखोरी की आदत बनी रहेगी। आदमी काम से जी चुराते रहेंगे, वहाँ सम्पन्नता और खुशहाली कैसे आ सकती है?

🔶 मित्रो! हम मनुष्य की सारी समस्याओं का समाधान करने चले हैं, जिसमें आर्थिक समस्या भी शामिल है, पैसे की समस्या भी शामिल है। समाज की समस्या भी शामिल है, पारिवारिक समस्या भी शामिल है। वे सारी समस्याएँ भी शामिल हैं, जिससे कि मनुष्य पीड़ित हो रहा है, दुखी हो रहा है, उद्विग्न हो रहा है। इन सारी की सारी समस्याओं का समाधान करने का हमारा एक ही तरीका है कि हम अपने विचारों को किस तरह से अच्छा बनायें। विचारों को किस तरीके से श्रेष्ठ बनायें। विचारों की शृंखला को किस तरह से सुव्यवस्थित बनायें। आज मनुष्य को हर जगह से पीड़ा घेरे हुए है। अशान्तियाँ घेरे हुए हैं। अव्यवस्थाएँ घेरे हुए हैं। इनका समाधान और निराकरण करने का जो ठोस, मूलभूत और चिरस्थाई उपाय है, उसको हम खोज सकें, हल निकाल सकें, उसके लिए हम आपको भेज रहे हैं। अध्यात्म का असली शिक्षण देने के लिए हम आपको बाहर भेज रहे हैं।

🔷 मित्रो! राम नाम की माला घुमाने की नसीहत देने के लिए हम आपको नहीं भेजते हैं। माला घुमाने की प्रारम्भिक शिक्षा गूढ़ है। माला के १०८ दाने जिस तरह से घुमाए जाते हैं, उसी तरह हमारे जीवन के प्रत्येक स्रोत और प्रकृति को आध्यात्मिकता के आधार पर घुमाया जाना चाहिए। जादू या चमत्कार माला के अन्दर नहीं है। माला के अंदर प्रेरणा है, शिक्षा है। माला के अंदर दिशायें हैं, जिसमें माला के अंदर मीठा बोलने का मनका नम्बर एक, परिश्रमी होने का माला का मनका नम्बर दो।

🔶 सच बोलने का माला का मनका नंबर-तीन, सफाई से रहने का माला का मनका नम्बर-चार आदि है। इस तरह से माला के १०८ मनके होते हैं, जो मनुष्यों के स्वभाव और मनुष्यों की सत्प्रवृत्तियों को सुव्यवस्थित बनाने के लिए हैं। यह जादू नहीं है, मैजिक नहीं है, जैसा कि आप लोगों को बता दिया गया है कि लकड़ी के टुकड़ों को आप बार-बार घुमा दिया करें और थोड़े से अक्षरों का-मंत्रों का उच्चारण कर लिया करें। इसमें न कोई जादू है और न ही कोई चमत्कार पैदा होने वाला है। इससे न कोई सिद्धि पैदा होने वाली है, न कोई भूत पैदा होने वाला है। इसमें से ऐसा कुछ भी पैदा होने वाला नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 23)


👉 सब कुछ गुरु को अर्पित हो

🔷 कर्म ही नहीं, मन और वाणी से भी गुरु आराधना करनी चाहिए। बार-बार और हमेशा ही यह सत्य ध्यान में रखना चाहिए कि गुरु आराधना गुरु की शरीर सेवा तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक दायरे में सद्गुरु के विचारों का प्रसार व उनके अभियान को गति देने के लिए प्राण-पण से प्रयास करना भी शामिल है। इस हेतु न केवल स्वयं का जीवन अर्पण करना चाहिए; बल्कि अपनी पत्नी एवं परिवार के अन्य सदस्यों को लगाना चाहिए। अपनी यह देह पंचमहाभूतों के विकार के सिवा भला और है ही क्या? इस देह की सार्थकता सद्गुरु के कार्य के प्रति समर्पित होने में ही है।
  
🔶 स्वामी विवेकानन्द महाराज के दो शिष्य थे स्वामी कल्याणानन्द और स्वामी निश्चयानन्द। एक दिन स्वामी जी ने इन दोनों को अपने पास बुलाया और कहा- देखो हरिद्वार में साधुओं की सेवा की कोई व्यवस्था नहीं है। उन दिनों आज से करीब सौ वर्ष पूर्व हरिद्वार का समूचा क्षेत्र महाअरण्य था। साधु हों या फिर तीर्थयात्री इन सभी को सामान्य औषधि एवं चिकित्सा के अभाव में अनेकों कष्ट उठाने पड़ते थे। कई बार तो इन्हें मरना भी पड़ता था। स्वामी जी ने अपने इन दोनों शिष्यों को इनकी सेवा का आदेश दिया। इन दोनों साधन विहीन साधुओं के पास अपने सद्गुरु के आदेश के सिवा और कोई भी सम्पत्ति न थी। जब स्वामी कल्याणानन्द एवं स्वामी निश्चयानन्द स्वामी जी को प्रणाम करके चलने लगे, तो उन्होंने कहा- अब तुम दोनों इधर लौटकर फिर कभी न आना, बंगाल को भूल जाना। आदेश अति कठिन था; परन्तु शिष्य भी सद्गुरु को सम्पूर्ण रीति से समर्पित थे।
  
🔷 बेलूड़ मठ से चलकर ये दोनों ही हरिद्वार आए। उन्होंने कनखल में अपनी झोपड़ियाँ बनाई और जुट गए सेवा कार्यों में। दिन भर बीमार साधुओं एवं तीर्थ यात्रियों की सेवा और रात भर अपने सद्गुरु का ध्यान। कार्य चलता रहा, वर्ष बीतते रहे। इस बीच स्वामी जी ने इच्छामृत्यु का वरण किया; परन्तु सद्गुरु आदेश के व्रती ये दोनों गुरु के अन्तिम दर्शन में भी नहीं गए। गुरु कार्य के लिए उन्होंने अनेकों अपमान झेले, तिरस्कार सहे; पर सब कुछ उनके लिए गुरु कृपा ही थी। लगातार ३५ सालों तक उनका यह सेवा कार्य चलता रहा। उनके कार्यों का स्मारक आज भी कनखल क्षेत्र में श्री रामकृष्ण  सेवाश्रम के रूप में स्थित है। सद्गुरु के कार्य के प्रति निष्ठापूर्ण समर्पण ने उन्हें अध्यात्म के शिखरों तक पहुँचा दिया। इन दोनों के लिए स्वामी जी ने स्वयं अपने मुख से कहा था- हमारे ये बच्चे परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जाएँगे। गुरुकृपा से यही हुआ भी। ऐसे कृपालु सद्गुरु को शत-सहस्र-कोटिशः नमन!

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 43

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...