शनिवार, 23 सितंबर 2017

👉 मातृत्व का सम्यक् बोध ही नवरात्रि का मूल (भाग 2)

🔴 जगन्माता की श्रद्धा में डूबे, अपने अनुष्ठान संकल्प-साधना में निमग्न सब ऐसे होते हैं, जैसे वे एक ही वृक्ष के पत्ते हों, फूल हों, फल हों, फल में निहित बीज हों। वे सिर्फ पहचान पाना चाहते हैं, अपने अस्तित्व के मूल की पहचान। अपनी सबकी माँ की पहचान, जो सब कुछ देती है, सतत् अविराम। जीवन भी उससे मिलता है, जीवन यापन के साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं। लेकिन हमारी ये सभी इच्छाएँ माँ से जुड़कर ही पूर्ण होती है। जब हम अपने अन्तर का सब कुछ माँ के चरणों में न्यौछावर कर देते हैं और एक आन्तरिक शून्यता की अनुभूति पाते हैं, तो माँ बरबस ही इस शून्यता में पूर्णता भर देती है। क्योंकि शून्यता में ही पूर्णता भरती है। और जब अनेक एक साथ मिलकर मेला बनकर, माला की तरह गुँथकर, आन्तरिक शून्यता को पाते हैं, जो जीवन की परम सम्भावना प्रकट होती है।

🔵 जीवन की समस्त सम्भावनाओं की कोख क्या है? जिस कोख में ये सम्भावनाएँ, इस प्रकार के भाव और प्रतीति पलती हैं और जहाँ से वह प्रसवित होती है, वह है मनुष्य के लिए जननी की कोख और सृष्टि के लिए धरती की कोख। इसमें फर्क कोख का नहीं, क्रम का है, कर्म का है, ज्ञान का है। हमारी जननी का माँ होना ही हमारे लिए और सृष्टि के लिए विशिष्ट बात है। जन्म देना और जन्म लेना एक भौतिक एवं प्राकृतिक बात है। पर उसका अच्छा या बुरा होना, मंगलमय या अमंगलपूर्ण होना हमारी और प्रकृति की प्रवृत्ति, संकल्प और संस्कार पर निर्भर है। नारी जननी क्यों बनी? धरती पर अंकुर क्यों उगा? यदि वह ऊटपटांग ढंग से उगा होता तो जंगली होगा और यही किसी माली ने जतन से उगाया होगा तो उपवन और उद्यान की महक लिए होगा। यही क्रम है सृष्टि का, यही सार है मनुष्य के जन्मने और जीने का।यही है जननी के माँ होने का पुण्य प्रताप। अनादि को भी अपना आदि माँ से ही मिलता है।

🔴 नवरात्रि के नौ दिन इसी अनादि की आदि ‘माँ’ की पहचान करने के लिए है। अपवाद की बात छोड़ दें तो प्रायः किसी को यह सच्ची पहचान मिल नहीं पायी। हम माँ के द्वार दरबार में आते हैं, घर पर पूजा बेरी के ऊपर रखे माँ के चित्र के सामने माथा नवाते हैं, पर हृदय नहीं उड़ेलते। आन्तरिक शून्यता की अनुभूति नहीं कर पाते। और शून्यता के बिना माँ पूर्णता दे भी तो कैसे? हम दिखावे के लिए माँ की आरती उतारते हैं, पर दरअसल हम अपना आरत (दुःख) माँ के माथे मढ़ते हैं। भूखे रहकर मढ़ते हैं, कीर्तन करके मढ़ते हैं, जप करके मढ़ते हैं। उसकी पूजा करने का धोखा देकर मढ़ते हैं। जैसे माँ नहीं अपना दुःख, पीड़ा फेंकने का कोई कूड़ा-घर हो। भला यह कैसी पूजा, जिसमें श्रद्धा कम, लोभ और भय अधिक समाया रहता है। तनिक निहारें तो सही अपने अंतर्मन को कि नवरात्रि के ये नौ दिन हमारी श्रद्धा के हैं या स्वार्थ के? प्रार्थना के हैं अथवा फिर कामना या वासना के।

🌹 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 2002 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/2002/April/v1.12

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 72)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  
🔴 यह आवश्यकता हम लोगों को ही पूरी करनी होगी। दूसरों लोग इस मोर्चे से पीछे हट रहे हैं। उन्हें नेतागिरी यश, प्रशंसा और मान प्राप्त करने की ललक तो है, पर अपने को आदर्शवाद की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करने का साहस नहीं हो रहा है। आज के अगणित तथाकथित लोकसेवी अवांछनीय लोकमान्यताओं के ही अनुगामी बने हुए हैं। धार्मिक क्षेत्र के अधिकांश नेता, संत-महंत जनता की रूढ़ियों, मूढ़ताओं और अंध-परम्पराओं का पोषण उनकी अवांछनीयताओं को समझते हुए भी करते रहते हैं। राजनैतिक नेता अपना चुनाव जीतने के लिए वोटरों की अनुचित माँगें पूरी करने के लिए भी सिर झुकाए रहते हैं।
     
🔵 इस स्थिति में पड़े हुए लोग जनमानस के परिष्कार जैसी लोकमंगल की मूलभूत आवश्यकता पूर्ण कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। इस प्रयोजन की पूर्ति वे करेंगे, जिनमें लोकरंजन की अपेक्षा लोकमंगल के लिए आगे बढ़ने का, निंदा, अपयश और विरोध सहने का साहस हो। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने बंदूक की गोलियाँ खाई थीं। बौद्धिक पराधीनता के विरुद्ध छेड़े हुए अपने विचार क्रांति संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों को कम से कम गाली खाने के लिए तैयार रहना ही होगा, जो गाली खाने से डरेगा, वह अवांछनीयता के विरुद्ध आवाज कैसे उठा सकेगा?
   
🔴 अनुचित से लड़ कैसे सकेगा? इसलिए युग परिवर्तन के महान् अभियान का नेतृत्व कर सकने की आवश्यकता शर्त यह है कि इस क्षेत्र में कोई यश और मान पाने के लिए नहीं विरोध, निंदा और तिरस्कार पाने की हिम्मत लेकर आगे आए। नव निर्माण का सुधारात्मक अभियान गतिशील बनाने में मिलने वाले विरोध और तिरस्कार को सहने के लिए आगे कौन आए? इसके लिए प्रखर मनोबल और प्रचंड साहस की आवश्यकता होती है। इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मूर्धन्य स्तर के लोग भी साहस विहीन लुंज-पुंज दिखाई दे रहे हैं और शौर्य पराक्रम के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से डरकर आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

🔵 आज सच्चे अध्यात्म को कल्पना लोक से उतार कर व्यावहारिक जीवन में उतारे जाने की नितांत आवश्यकता है। इसके बिना हम आत्मिक प्रगति न कर सकेंगे। अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित न कर सकेंगे और यदि यह न किया जा सका, तो समाज के नव निर्माण का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपना समस्त साहस बटोर कर अपनी वासनाओं, तृष्णाओं, संकीर्णताओं और स्वार्थपरताओं से लड़ पड़ें। इन भव बंधनों को काट डालें और जीवन को ऐसा प्रकाशवान् बनाएँ, जिसकी आभा से वर्तमान युग का सारा अंधकार तिरोहित हो सके और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ आलोकित हो उठें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.102

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 Shrutayudh and Bhasmasur

🔴 Both the devils had got boons due to their austerities. It was their immoral intelligence, which made them to choose such things that ultimately became the cause of their deaths. Shrutayudh had got a Gada, which he had got by the boon from Lord Shiva on the condition that he would not misuse it. If he did then it would in turn destroy him. In the battle of Mahabharata, in a fit of anger he used it on Shri Krishna who was charioteer of Arjun. The Gada returned from midway and tore him apart. Bhasmasur had asked for a boon that the person would be destroyed if he places his hand on his head. When he started misusing this power, God created illusion and made him keep his hand on his own head, which resulted in his death.

🔵 It is the direction of choice that decides our destiny and future.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2017

🔵 प्रेमास्पद के प्राणों में अपने प्राण, अपनी इच्छा और आकाँक्षायें घुलाकर व्यक्ति उस “अहंता” से बाहर निकल आता है तो पाप और पतन की ओर प्रेरित कर ऐसे दिव्य मनुष्य को नष्ट करता रहता है। प्रेमी कभी यह नहीं चाहता मुझे कुछ मिले वरन् वह यह चाहता है कि अपने प्रेमी के प्रति अपनी निष्ठा कैसे प्रतिपादित हो इसलिये वह अपनी बातें भूलकर केवल प्रेमी की इच्छाओं में मिलकर रहता है, जब हम अपने आपको दूसरों के अधिकार में डाल देंगे तो पाप और वासना जैसी स्थिति आवेगी ही क्यों और तब मनुष्य अपने जीवन-लक्ष्य से पतित ही क्यों होगा? सच्चा प्रेम तो प्रेमी की उपेक्षा से भी रीझता है। प्रेम की तो व्याकुलता भी मानव अन्तःकरण को निर्मल शान्ति प्रदान करती है।

🔴 मन जो इधर-उधर के विषयों और तुच्छ कामनाओं में भटकता है, प्रेम उसके लिये बाँध देने को रस्सी की तरह है। प्रेम की सुधा पिये हुये मन कभी भटक नहीं सकता, वह तो अपना सब कुछ त्याग करने को तैयार रहता है। जो समर्पित कर सकता है, पाने का सच्चा सुख तो उसे ही मिलता है। प्रेमी को भोग तो क्या स्वर्ग भी आसक्त नहीं कर सकते और परमात्मा को पाने के लिये भी तो यह सन्तुलन आवश्यक है। प्रेम साधना द्वारा मनुष्य लौकिक जीवन का पूर्ण रसास्वादन करता हुआ पारमार्थिक लक्ष्य पूर्ण करता है। इसलिये प्रेम से बड़ी मनुष्य-जीवन में और कोई उपलब्धि नहीं।

🔵 स्वाति नक्षत्र के बादल चातक के मुख पर क्या चुपचाप जल बरसा जाते हैं? नहीं, वे गरज कर कठोर ध्वनि करते और डराते हैं। पत्थर ही नहीं कई बार तो रोष में भरकर बिजली भी गिराता है, वर्षा और आँधी के थपेड़े क्या कम कष्ट देते हैं किन्तु चातक के मन में अपने प्रियतम के प्रति क्या कभी नाराजी आती है? तुलसी दास ने बताया कि यह प्रेम की ही महिमा है कि चालक पयोद के इन दोषों में भी उसके गुण ही देखता है। अमंगल सी दिखने वाली भगवान की सृष्टि में कठिनाइयों के झंझावात कम हैं, न अभाव और कष्ट-पीड़ायें, एक-एक पग भार है और लक्ष्य प्राप्ति का बाधक है, पर यह केवल उनके लिये है जिन्होंने प्रेम तत्व को जाना नहीं। प्रेम तो समुद्र की तरह अगाध है, उसमें जितने गहरे पैठा जाये उतने ही बहुमूल्य उपहार मिलते और मानव-जीवन को धन्य बनाते चले जाते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यान-साधना की सिद्धि की सात कसौटियाँ (भाग 2)

🔴 महासिद्ध सरहपा कहते हैं कि साधक यदि अपने ध्यान को जाँचना चाहता है तो उसे निम्न मानदण्डों पर अपने को परखना चाहिए।- 1. आहार संयम, 2. वाणी का संयम, 3. जागरुकता, 4. दौर्मनस्य का न होना, 5. दुःख का अभाव, 6. श्वास की संख्या में कमी हो जाना और 7. संवेदनशीलता। ये सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
 
🔵 पहली कसौटी आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।

🔴 दूसरी कसौटी है- वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 2003 पृष्ठ 3

👉 आज का सद्चिंतन 23 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Sep 2017


👉 भावना से सिद्धि :-

🔵 महाराज अंबरीष के संबंध में प्रजा में प्रख्यात था कि वे बड़े ही धर्म परायण व्यक्ति है। प्रतिदिन राजमहल के प्रांगण में ही बनवाये गये भगवान विष्णु के मंदिर में प्रातःकाल उषा बेला में पहुंचने, भगवान के विग्रह की पूजा अर्चना करने, संध्या, उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती।

🔴 इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभावग्रस्तों को प्रतिदिन एक स्वर्णमुद्रा बांटते थे, जिनकी भीड़ रोज प्रातः से ही लग जाया करती थी।

🔵 पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरांत अंबरीष अपनी समस्याओं को उनके पास लेकर सुलझाने के लिए आये नागरिकों से भेंट करते, उनके कष्ट सुनते, और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे।

🔴 इन सभी कार्यों से निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिये ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुंच जाते थे। महाराज अंबरीष को यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्टसाध्य जीवन जीते हुए ईश्वर भक्ति और प्रजावत्सलता के पुण्य कार्यों में लगे रहने के कारण अंबरीष को एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति से अपनी कष्टसाध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गये थे।

🔵 महाराज अंबरीष की ख्याति से प्रभावित होकर अवंती राज्य के नरेश उदयभानु ने अपनी कन्या उदयानी के विवाह का प्रस्ताव किया। अंबरीष ने स्पष्ट कह दिया कि वह कठोर दिनचर्या का अभ्यस्त है और उसके साथ विवाह कर उदयानी को कष्ट तथा असुविधायें ही मिलेंगी।

🔴 परंतु उदयभानु ने कहा कि- ‘उदयानी स्वयं भक्ति, सेवा तथा तप तितिक्षा में विशेष रुचि रखती थी। यह प्रस्ताव भी उसी का है।’

🔵 अंबरीष ने प्रसन्न होकर विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात् प्रथम रात्रि को उषाकाल में, अंबरीष के उठने से पहले ही उदयानी जाग गयी और उसने विष्णु मंदिर में जाकर पूजा-अर्चा कर ली। अंबरीष जब जागकर मंदिर में गये तो यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि उनसे पहले ही उदयानी पूजा-पाठ से निवृत्त हो चुकी है और वह भी उन्हीं के मंदिर में। प्रथम पूजा का श्रेय उन्हें ही मिलना चाहिए यह सोचकर अंबरीष ने उदयानी को निर्देश दे दिया कि वह बाद में ही पूजा के लिए जाया करे। उदयानी ने सहर्ष इस निर्देश को अंगीकार कर लिया।

🔴 कुछ समय बाद अंबरीष अनुभव करने लगे कि उदयानी उनकी अपेक्षा साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमंडल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य-शांति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उदयानी भाव समाधि की स्थिति में जा पहुंची हैं।

🔵 मैं इतने समय से पूजा, भक्ति और सेवा साधना में लगा हुआ हूं। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। उदयानी किस प्रकार इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार अंबरीष को और भी खिन्न और उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि भी कम होने लगी।

🔴 इन्हीं दिनों अंबरीष के गुरु, उस समय के प्रख्यात सिद्धयोगी राज-प्रासाद में आये। दिव्य दृष्टि से योगी ने महाराज अंबरीष के मनोद्वेगों को ताड़ लिया और पूछा ‘राजन्! आजकल आप निराश और खिन्न से क्यों दिखाई देते हैं?’

🔵 अंबरीष ने अपनी मनोव्यथा खोल दी तो योगी ने समाधान किया- ‘‘राजन्! सिद्धि पूजा या दीर्घ अवधि का नहीं भावना का परिणाम है। तुम जो पूजा साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है, जबकि राजमहिषी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया उसके पास अहं कहां बचा? और जहां अहं मिट जाता है वहां ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।’’

🔴 इन वचनों ने अंबरीष की साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।

🌹 ...........अखण्ड ज्योति फरवरी 1979

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...