गुरुवार, 23 अगस्त 2018

👉 प्रेम का अर्थ

🔶 “प्रेम करने का अर्थ है विश्व के सब जीवों और वस्तुओं से आत्मीयता, बन्धुत्व और एकता का अनुभव करना, और इतना गहरा अनुभव करना कि अपने आस-पास के सब लोगों पर उसका प्रभाव पड़े ओर उन्हें अधिक सुरक्षा और एकता की प्रतीति हो। प्रेम से सब के कल्याण और उन्नति की भावना उत्पन्न होती है। प्रेम से निर्भीकता, स्पष्टता, स्वतंत्रता और सत्यता बढ़ती है। प्रत्येक माता जानती है कि प्रेम देश और काल से सीमित नहीं होता। प्रेम से हमें अपनी अनन्तता और असीमता का अनुभव होने में सहायता मिलती है। प्रेम द्वारा ऐसी भावना बनाने से घृणायुक्त व्यक्ति में भी अच्छाई और प्रेम का जीवन भरा जा सकता है। प्रेम में महान उत्पादक शक्ति है। इसका परिणाम प्रारम्भ में चाहे धीरे-धीरे हो किन्तु स्थायी होता है। यह प्रभाव जिस व्यक्ति से प्रेम या विश्वास किया जाता है, उसके हृदय और चरित्र में बैठ जाता है।”

✍🏻 बी-ग्रेग

👉 आज का सद्चिंतन 23 Aug 2018


👉 ज्ञान बढाती है ‘जिज्ञासा’:-

🔶 जिज्ञासु व्यक्ति किसी भी बात की तह तक बैठकर उसमें से किसी न किसी प्रकार की उपयोगिता खोज लाता है। जिज्ञासा शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चारों उन्नतियों की हेतु होती है। मनुष्य को अपनी जिज्ञासा को प्रमादपूर्वक नष्ट नहीं करना चाहिए। उसे विकसित एवं प्रयुक्त करना चाहिए और जिसमें नहीं है, उसे चाहिए कि वह तन्मय एवं गहरे पैठने के अभ्यास से उसे पैदा करे, क्योंकि जिज्ञासा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में प्रगति एवं उन्नति का आधार बनती है।

🔷 एक बादशाह का एक बहुत ही मुँह लगा नौकर था। वह दिन-रात बादशाह की सेवा में लगा रहता था। एक दिन उसे विचार आया कि वह बादशाह की सेवा में दिन-रात लगा रहता है, तब भी उसे केवल पाँच रुपये ही मिलते हैं और मीर मुँशी जो कभी कुछ नहीं करता पाँच सौ रुपये वेतन पाता है। इस भेद का क्या कारण है? उनने अपने यह उलझन बादशाह को कह सुनाई।

🔶 बादशाह ने हँसकर कह दिया- “किसी दिन मौके पर बतलाऊँगा।“ एक दिन एक घोड़ों का काफिला उसकी सीमा से गुजरा। बादशाह ने अपने सेवक को भेजा कि “जाकर मालूम कर यह काफिला कहाँ जा रहा है?”

🔷 नौकर गया और आकर बतलाया कि “हुजूर वह काफिला सीमा के कंधार देश जा रहा है।“

🔶 अब बादशाह ने मीर मुंशी को भेजा। उसने आकर बतलाया कि “यह काफिला काबुल से आ रहा है और कंधार जा रहा है। उसमें पाँच सौ घोड़े और बीस ऊँट भी है। मैंने अच्छी तरह पता लगा लिया है कि वे सब सौदागर हैं और घोड़े बेचने जा रहें हैं। खरीदना चाहें तो कम कीमत पर मिल सकते हैं। मैंने पचास ऐसे घोड़ों को छाँट लिया है, जो नौजवान और बड़ी ही उत्तम नस्ल के हैं।“

🔷 बादशाह ने तुरंत ही पचास घोड़े खरीद लिए, जिससे उसे कम दामों पर अच्छे घोड़े मिल गए। काफिले के विषय में चिंता जाती रही और उन परदेशी सौदागरों पर बादशाह की गुण-ग्राहकता का बड़ अनुकूल प्रभाव पड़ा। बादशाह ने नौकर से कहा- “देखा तुम्हें पाँच रुपये क्यों मिलते हैं और मीर मुँशी को पाँच सौ क्यों?”

🔶 नौकर ने इस अंतर के रहस्य को समझा और सदा के लिए सावधान हो गया।

📖 अखण्ड ज्योति Nov 1999 से साभार

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 35)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔶 धूर्तता इन दिनों इस कदर बढ़ी हुई है कि वह कानूनी दंड व्यवस्था से लेकर धर्मोपदेश स्तर की नीति मर्यादा को भी अँगूठा दिखाती है। सदाशयता का जोर-शोर से समर्थन करने वाले ही जब नये-नये मुखौटे बदलकर कृत्य-कुकृत्य करने की दुरभिसंधियाँ रचते रहे हैं, तो उन्हें कौन किस प्रकार समझाए? जागते हुए को कोई क्या कहे? क्या सोते से जाग पड़ने की आवश्यकता समझाए? प्रचार माध्यम अब अपनी विश्वसनीयता खोते चले जा रहे हैं, क्योंकि उपदेष्टा ही कथन के ठीक विपरीत आचरण करें तो उसे क्या कहकर, किस प्रकार समझाया जाए? उसकी बात पर कोई क्यों और किस आधार पर, कितना विश्वास करे?

🔷 उपाय एक ही शेष रह जाता है कि ऐसी प्रतिभाएँ नये सिरे से उभरें, जो अपना निज का आदर्श प्रस्तुत करते हुए सिद्ध करें कि सही मार्ग पर चलना न तो घाटे का सौदा है, न असंभव और अव्यवहारिक। खरा उदाहरण प्रस्तुत करना ही एकमात्र ऐसा उपाय अभी भी शेष है, जिसके आधार पर आदर्श अपनाने के लिए लोगों को सहमत एवं प्रोत्साहित किया जा सकता है। चोर, जुआरी, लावारिस, व्यभिचारी, नशेबाज, अनाचारी जब अपनी कथनी और करनी में एकता दिखाकर अनेकों को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर सकते हैं, तो आदर्शों का अनुकरण करने के लिए तैयार करना भी कठिन नहीं है।
  
🔶 प्राचीन काल में ऋषि ऐसे ही जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया करते थे। उच्च आदर्शों के अनुरूप स्वयं के आचरण बनाने-ढालने के कष्टसाध्य क्रम को ही तपश्चर्या कहा जाता रहा है। वशिष्ठ हों या विश्वामित्र, चरक हों या याज्ञवल्क्य, सभी ने समय के अनुरूप नयी शोध की, उसे स्वयं पर घटित करके उसकी प्रामाणिकता सिद्ध की और इसी आधार पर सारे समाज को लाभान्वित किया। बुद्ध इसी आधार पर अवतार कहलाए और गाँधी इसी प्रक्रिया की कसौटी पर कसे जाकर राष्ट्रपिता का सम्मान पा सके। वर्तमान समय की समस्याएँ भी, युग प्रतिभाओं से इसी स्तर के समाधान चाहती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 45

👉 Scientific Basis of Gayatri Mantra Japa (Part 2)

🔶 The extrasensory components like the sat cakras, upatyikas and the marvellous nerve network hidden in it are found to be like nuclei and canals of cosmic energy. Having the model of the limitless cosmos in its small structure makes the human body the supreme creation in the physical manifestation of Nature. Japa-sadhana is a scientific method devised by the Rishis to activate the extrasensory energy centers within to facilitate the sublime flow of vital spiritual currents in this majestic living system.

🔷 The japa of Divine Name or Mantras has been an integral part of all modes of worship or prayer in every religion be it Hindu, Sikh, Islam, Buddhist, Christian, Tao, Bahai, etc. As the specific pattern of controlled wind-flow through the holes of a flute produces specific sonorous tune, likewise, the vibrations induced by the repeated rhythmic chanting of a specific mantra generate specific pulsation of prana and stimulate the extrasensory energy nuclei in the body accordingly.

🔶 The japa- sadhana of mantras is therefore practiced to educe supernatural talents and potentials. The preeminence of the japa of Gayatri Mantra lies in its unique intellectual, emotional and spiritual effects in addition to other soul-elevating effects of mantra-japa. This mantra contains the essence of divine knowledge and wisdom. Even its literal translation implies a prayer for the refinement and illumination of our mind and intellect and for well-being of the world. This is why the Vedic Rishis revered Gayatri as  Vedmata, Devamata and Vishwamata (the origin of the Vedas, the Mother of godly-beings and the Mother of the whole world respectively). Not only the Hindu religion, but also the follower of other religions and paths of spiritual seeking revere this sacred mantra.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (अन्तिम भाग)

🔶 वर्तमान समय की चतुर्मुखी दुर्दशा का एक ही कारण “नैतिकता का पतन हो जाना है”। मन की वृत्तियों का स्वार्थ प्रधान हो जाना ही पाप है। यह पाप पिछली एक शताब्दी से तो बहुत अधिक मात्रा में बढ़ गया है। सच्चे धर्म का, हृदय की विशालता का, लोप हो रहा है उसके स्थान पर ‘मजहबी कर्म काण्डों’ को धर्म कहा जाने लगा है। नदी नालों में गोता लगाकर, तस्वीर खिलौनों के दर्शन करके, किसी पुस्तक के पन्ने रट देने, तिलक छाप लगा लेने, शिर मुड़ा लेने, दाढ़ी रखा लेने, खड़ाऊ पहनने, सात बार आचमन कर लेने, तेरह बार हाथ माँज लेने या ऐसे ही किसी अन्य कर्मकाण्ड को करने वाले लोग धर्मध्वजी समझे जाते हैं, चाहे उनके आचरण और विचार कैसे ही क्यों न हों।

🔷 वेशभूषा और साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के आधार पर धर्म की विवेचना होना इस बात का द्योतक है कि सच्चे धर्म की तो जानकारी भी लोगों को नहीं रही, धर्म के स्थान पर पाखंड विराजमान हो गया, ईश्वर के स्थान पर शैतान की पूजा होने लगी। आज जो मनुष्य जितना धर्मात्मा बनने का ढोंग रचता है परीक्षा करने पर उसका हृदय उतनी ही मात्रा में अनुदारता, निर्दयता, कपट, असत्य, घमंड और स्वार्थ रूपी पापों से भरा पूरा मिलता है। ढोंग के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहते दिखाई देते हैं पर सच्चे धर्म के लिए कोई कौड़ियाँ भी लगाने को तत्पर नहीं होता। यह सब परिस्थितियाँ बताती हैं कि मानव जाति से धर्म का लोप बहुत बड़ी मात्रा में हो गया है। पाखंड की आड़ में अधर्म का साम्राज्य छाया हुआ है ऐसी दशा में पाप की दुर्गन्ध से अदृश्य लोकों का गंदा होना और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इन कष्ट क्लेशों का आना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.6

👉 परिशोधन प्रगति का प्रथम चरण

🔶 पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरे की उपमा पा लेता है। यों उसका अनगढ़ प्रयोग करने वाले अँगीठी में जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पूर्व ही विषैली गैस के कारण मर चुके होते हैैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, रांगा, सीसा, अभ्रक जैसे सामान्य खनिजों काबजारू मूल्य तुच्छ होता है, पर उन्हें जब भस्म रासायन बनाकर ग्रहण किया जाता है, तो वे संजीवनी बूटी का काम करते और मंहगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब डिस्टिल्ड वाटर बना लिया जाता है, तब उसकी गणना औषधियों में होती है, उसे कई रासायनिक क्रियाओं एवं सम्मिश्रणों में प्रयुक्त किया जाता है।

🔷 मानव समुदाय पर भी यही बात लागू होती है। वे भी यों तो गलीकूचों में भीड़ लगाते और गंदगी फैलाते देखे जाते हैं, पर उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान् बना लिया जाता है, तो फिर वे ऋषि- देवता कहाते और अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है।

🔶 हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के रूप में ही है। कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है, जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जन्म- जन्मान्तरों के संस्कारों की  अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं,पर जो उन्हें कुरेदता- उभारता है, वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊंचा उठते हुए महामानव का पद पाता है। अपना परिशोधन, तप- प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उत्पादनों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं, जिन्हें पार करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुंजायश नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य