शनिवार, 11 जून 2016

👉 गायत्री उपासना की सफलता की तीन शर्तें (भाग 1)


🌹 गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ बोलें- 🌹 ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

🔴 मित्रो! हमारा सत्तर वर्ष का संपूर्ण जीवन सिर्फ एक काम में लगा है और वह है- भारतीय धर्म और संस्कृति की आत्मा की शोध। भारतीय धर्म और संस्कृति का बीज है- गायत्री मंत्र। इस छोटे से चौबीस अक्षरों  के मंत्र में वह ज्ञान और विज्ञान भरा हुआ पड़ा है, जिसके विस्तार में भारतीय तत्त्वज्ञान और भारतीय नेतृत्व विज्ञान दोनों को खड़ा किया गया है। ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार चरण गायत्री का व्याख्यान चार वेदों के रूप में किया। वेदों से अन्यान्य धर्मग्रंथ बने। जो कुछ भी हमारे पास है, इस सबका मूल जड़ हम चाहें तो गायत्री मंत्र के रूप में देख सकते हैं। इसलिए इसका नाम गुरुमंत्र रखा गया है, बीजमंत्र रखा गया है।

🔵 बीजमंत्र के नाम से, गायत्री मंत्र के नाम से इसी एक मंत्र को जाना जा सकता है और गुरुमंत्र इसे कहा जा सकता है। हमने प्रयत्न किया कि सारे भारतीय धर्म और विज्ञान को समझने की अपेक्षा यह अच्छा है कि इसके बीज को समझ लिया जाए, जैसे कि विश्वामित्र ने तप करके इसके रहस्य और बीज को जानने का प्रयत्न किया। हमारा पूरा जीवन इसी एक क्रिया- कलाप में लग गया। जो बचे हुए जीवन के दिन हैं, उसका भी हमारा प्रयत्न यही रहेगा कि हम इसी की शोध और इसी के अन्वेषण और परीक्षण में अपनी बची हुई जिंदगी को लगा दें।

🔴 बहुत सारा समय व्यतीत हो गया। अब लोग जानना चाहते हैं कि आपने इस विषय में जो शोध की जो जाना, उसका सार- निष्कर्ष हमें भी बता दिया जाए। बात ठीक है, अब हमारे महाप्रयाण का समय नजदीक चला आ रहा है तो लोगों का यह पूछताछ करना सही है कि हर आदमी इतनी शोध नहीं कर सकता। हर आदमी के लिए इतनी जानकारी प्राप्त करना तो संभव भी नहीं है। हमारा सार और निष्कर्ष हर आदमी चाहता है कि बताया जाए। क्या करें? क्या समझा आपने? क्या जाना? अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि गायत्री मंत्र के ज्ञान और विज्ञान में जिसकी कि व्याख्यास्वरूप ऋषियों ने सारे का सारा तत्त्वज्ञान खड़ा किया है, क्या है?

🔵 गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। त्रिपदा का अर्थ है- तीन चरण वाली, तीन टाँगवाली। तीन टुकड़े इसके हैं, जिनको समझ करके हम गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की आधारशिला को ठीक तरीके से जान सकते हैं। इसका एक भाग है विज्ञान वाला पहलू। विज्ञान वाले पहलू में आते हैं तत्त्वदर्शन, तप, साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। यह विज्ञान वाला पक्ष है। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र का जप करने से, उपासना और ध्यान करने से उसके जो माहात्म्य बताए गए हैं कि इससे यह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनाएँ पूरी होती हैं। अब यह देखा जाए कि यह कैसे पूरी होती हैं और कैसे  पूरी नहीं होती? कब यह सफलता मिलती है और कब नहीं मिलती?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Pravachaan/prachaavachanpart5/gayatri_upasna.1

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 4)


🔴 एक सज्जन, शालीन, सम्भ्रान्त, सुसंस्कृत नागरिक का स्वरूप क्या होना चाहिए? उसके गुण, कर्म, स्वभाव में किन शालीनताओं का समावेश होना चाहिए। इसका एक ढाँचा सर्वप्रथम अपने मस्तिष्क में खड़ा किया जाय। मानवी मर्यादा और स्थिति क्या होगी? इसका स्वरूप निर्धारण कुछ कठिन नहीं है। दिनचर्या की दृष्टि से सुव्यवस्थित, श्रम की दृष्टि से स्फूर्तिवान्, मानसिक दृष्टि से सक्षम, व्यवहार की दृष्टि से कुशल, चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान् आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर, व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मानुशासन की दृष्टि से आत्मावलम्बी और सम्मानित हर श्रेष्ठ मनुष्य में यह विशेषताएँ होनी चाहिए। चरित्र की दृष्टि से उदार और स्वभाव की दृष्टि से मृदुल एवं हँसते-हँसाते रहने वाला उसे होना चाहिए। सादगी और सज्जनता मिले जुले तत्त्व हैं। आन्तरिक विभूतियाँ और बाह्य साधन सम्पत्तियों का सुव्यवस्थित सदुपयोग कर सकने वालों को सुसंस्कृति कहते हैं। अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझने वाले और उनके पालन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर चलने वालों को सभ्य कहा जाता है।

🔵 ऐसी ही विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्ति की सच्चे अर्थों में ‘मनुष्य’ कहा जा सकता है। ‘मनुष्यता’ से मानवी सद्गुणों से विभूषित व्यक्ति ही, मानव समाज का सभ्य सदस्य कहला सकता है। ऐसे सद्गुण सम्पन्न मनुष्य को मापदण्ड मान कर उसके साथ तुलना की जाय तो जो कुछ हम हैं वह भी आत्मिक श्रेष्ठता की अनुभूति होगी और यदि अत्यधिक उच्च स्थिति के महामानवों से तुलना की जाय तो सामान्य स्थिति रहते हुए भी अपनी स्थिति असंतोषजनक और गई-गुजरी प्रतीत होती रहेगी। नाप-तोल को बाँटा, गज, मीटर आदि की जरूरत पड़ती है। तुलनात्मक आधार अपनाने पर ही समीक्षा सम्भव होती हैं अन्यथा वस्तुस्थिति कितना रहना चाहिए, यह विदित रहने पर ही बुखार चढ़ने या शीत का ज्ञान रहने नर ही नापने वाला यह बता सकता है कि ब्लड प्रेशर’ घटा हुआ है या बढ़ा हुआ। इसी प्रकार एक सज्जनता एवं मानवतावादी मनुष्य का जीवन स्तर निर्धारित करने और उसके साथ अपने को तोलने में ही अपनी हेय, मध्यम एवं उत्तम स्थिति का विवेचन, विश्लेषण, निर्धारण सम्भव हो सकेगा।

🔴 हम जिन दुष्प्रवृत्तियों के लिए दूसरों की निन्दा करते हैं उनमें से कोई अपने स्वभाव में सम्मिलित तो नहीं हैं, जिनके लिए हम दूसरों से घृणा करते हैं वैसी दुष्प्रवृत्तियाँ अपने में तो नहीं हैं? जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए नहीं चाहते वैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ तो नहीं करते? जैसे उपदेश हम आये दिन दूसरों को करते रहते हैं वैसे आचरण अपने हैं या नहीं? जैसी कि हम प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा चाहते हैं वैसी विशेषताएँ अपने में है या नहीं? ऐसे प्रश्न अपने आप से पूछने और सही उत्तर पाने की चेष्टा की जाय तो अपने गुण, दोषों का वर्गीकरण ठीक तरह हो सकना सम्भव हो जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1977/January.8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 June 2016


🔵 हम जीवन में जितना निरर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाये। यदि इन शब्दों का उपयोग किसी को सान्त्वना देने, भगवद् पूजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप-कीर्तन में करें तो हमारा और समाज का कितना भला हो सकता है साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष जिनसे लड़ाई-झगड़ा, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जायें।

🔴 विषय वासनाएँ हाथ में पकड़ी हुई छड़ी  की तरह तो हंै नहीं कि हाथ खोल दीजिए वह स्वतः गिर जायेगी। यह जन्म-जन्मांतर का कलुष है, जो मनोदर्पण पर संचित होकर स्थायी बन जाता है। इसे मल-मल कर धोना पड़ेगा। जिस प्रकार मैल को मैल से साफ नहीं कर सकते, उसी प्रकार विषयों को वासना से नहीं धोया जा सकता। इनको धोने के लिए निर्मल भावनाओं की आवश्यकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔵 जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

🔴 जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

🌹 -स्वामी विवेकानन्द

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...