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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (अन्तिम भाग) 👉 परमशान्ति की भावदशा


🔴 भगवान् बुद्ध कहते हैं जो आघात से, संघात से पैदा होता है, आहत होने से जिसकी उत्पत्ति होती है, वह मरणशील है। उसे मरना ही है। इसके विपरीत जो अनाहत है, वह शाश्वत है। मंत्र शास्त्र ने इसके श्रवण की व्यवस्था की है। इन पंक्तियों में हम अपने पाठकों को एक अनुभव की बात बताना चाहते हैं। बात गायत्री मंत्र की है, जिसे हम रोज बोलते हैं। यह बोलना दो तरह का होता है, पहला- जिह्वा से, दूसरा विचारों से। इन दोनों अवस्थाओं में संघात है। परन्तु जो निरन्तर इस प्रक्रिया में रमे रहते हैं, उनमें एक नया स्रोत पैदा होता है। निरन्तर के संघात से एक नया स्रोत फूटता है। अन्तस् के स्वर। ऐसा होने पर हमें गायत्री मंत्र बोलना नहीं पड़ता, बस सुनना पड़ता है।
     
🔵 फिर तो हमारा रोम- रोम गायत्री जपता है। हवाओं, फिजाओं में गायत्री की गूंज उठती है। सारी सृष्टि गायत्री का गायन करती है। यह अनुभव की सच्चाई है। इसमें बौद्धिक तर्क की या फिर किताबी ज्ञान की कोई बात नहीं है। ऐसा होने पर गायत्री का जीवन का स्वर बन जाता है, जो निरन्तर साधना कर रहे हैं, उन्हें एक दिन यह अनुभव अवश्य होता है। यह अनुभव दरअसल अपनी साधना के पकने की पहचान है। इन अनाहत स्वरों को जो सुनता है, वह शाश्वत में प्रवेश करता है। थोड़ा सा अलंकारिक भाषा में कहें तो ये स्वर प्रभु के परम मन्दिर में घण्टा ध्वनि है, जो इस मंदिर में प्रवेश करते हैं, वे इस मधुर ध्वनि को भी सुनते हैं।
   
🔴 इस सूत्र की आखिरी बात है, जो बाहरी और आन्तरिक दोनों चक्षुओं से अदृश्य है, उसका दर्शन करो। इस सूत्र का सच यह है कि हमारी आँखें दो है और दृश्य भी दो हैं। पहली आँख हमारी दृश्येन्द्रिय है, जो घटनाओं को देखती है। वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, संसार इससे दिखाई देता है। जबकि दूसरी आँख हमारे मन की है- यह विचारों को देखती है। तर्क और निर्णय की साक्षी होती है। भगवान् का सच, अध्यात्म का अन्तिम छोर इन घटनाओं और विचारों दोनों के ही पार है। इसके लिए हमें मन के पार जाना पड़ता है। जो मन के पार जाते हैं, वहाँ उस अदृश्य का दर्शन करते हैं। और अनुभव तो यह कहता है कि अपना मन ही उस अदृश्य में विलीन हो जाता है।

इस विलीनता में ही शान्ति की अनुभूति है, जो शिष्य को अपने गुरु के कृपा- प्रसाद से मिलती है। यह सब कुछ स्वयमेव शान्त हो जाता है। साधना के सारे संघर्ष, जीवन के सभी तूफान यहाँ आकर शान्त हो जाते हैं। बस यहाँ तक शिष्य और गुरु का द्वैत भी समाप्त हो जाता है। शिष्य दिखता है होता नहीं है। अस्तित्त्व तो उसी परम सद्गुरु का होता है। यह परम शान्ति की भावदशा शिष्य, सद्गुरु एवं परमेश्वर को परम एकात्म होने की भाव दशा है। यह अकथ कथा कही नहीं जा सकती बस इसका अनुभव किया जा सकता है। बड़भागी हैं वे जो इस अनुभव में जीते हैं और अपने शिष्यत्व की सार्थकता, कृतार्थता का अनुभव करते हैं।

🌹 समाप्त
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/bhav

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 65) 👉 परमशान्ति की भावदशा


🔴 बात भी सही है, जो सीखा गया था, जो जाना गया था, वह तो संसार के लिए था। अब जब चेतना का आयाम ही बदल गया तो सीखे गए, जाने गए तत्त्वों की जरूरत क्या रही। इसीलिए यहाँ कोई नहीं है और न ही पथ प्रदर्शन की जरूरत। यह तो मंजिल है, और मंजिल में तो सारे पथ विलीन हो जाते हैं। जब पथ ही नहीं तब किस तरह का पथ- प्रदर्शन। यहाँ तो स्वयं को प्रभु में विलीन कर देने का साहस करना है। बूंद को समुद्र में समाने का साहस करना है। जो अपने को सम्पूर्ण रूप से खोने का दुस्साहस करता है, वही प्रवेश करता है। इसीलिए सूत्र कहता है कि यहाँ न तो कोई नियम है और न कोई पथ प्रदर्शक।
      
🔵 यहाँ खड़े होकर- जो मूर्त नहीं है और अमूर्त भी नहीं है, उसका अवलम्बन लो। मूर्त यानि कि पदार्थ अर्थात् साकार। और अमूर्त अर्थात् यानि कि निराकार। सूत्र कहता है कि इन दोनों को छोड़ो। और दोनों से पार चले जाओ। यह सूत्र थोड़ा समझने में अबूझ है। परन्तु बड़ा गहरा है। मूर्त और अमूर्त ये दोनों एक दूसरे के विपरीत है। इन विरोधो में द्वन्द्व है। और शिष्य को अब द्वन्द्वों से पार जाना है। इसलिए उसे इन दोनों के पार जाना होगा। सच तो यह है कि मूर्त और अमूर्त में बड़ा भारी विवाद छिड़ा रहता है। कोई कहता है कि परमात्मा साकार है तो कोई उसे निराकार बताता है। और साकारवादी और निराकारवादी दोनों झगड़ते रहते हैं। जो अनुभवी हैं- वे कहते हैं कि परमात्मा इस झगड़े के पार है। वह बस है, और जो है उसे अनुभव किया जा सकता है। उसे जिया जा सकता है, पर उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। जो नहीं कहा जा सकता, उसी में लय होना है।
    
🔴 अगली बात इस सूत्र की और भी गहरी है। इसमें कहा गया है- केवल नाद रहित वाणी सुनो। बड़ा विलक्षण सच है यह। जो भी वाणी हम सुनते हैं, वह सब आघात से पैदा होती है। दो चीजों की टक्कर से, द्वन्द्व से पैदा होती है। हवाओं की सरसराहट में वृक्षों के झूमने, पत्तियों के टकराने का द्वन्द्व है। ताली बजाने में दोनों हाथों की टकराहट है। हमारी वाणी भी कण्ठ की टकराहट का परिणाम है। जहाँ- जहाँ स्वर है, नाद है, वहाँ- वहाँ आहत होने का आघात है। परन्तु सन्तों ने कहा है कि एक नाद ऐसा भी है, जहाँ कोई किसी से आहत नहीं होता। यहाँ नाद तो है, पर अनाहत है।

🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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रविवार, 24 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 64) 👉 परमशान्ति की भावदशा

 🔴 शिष्य संजीवनी की यह सूत्र- माला एक लम्बे समय से शिष्यों को शिष्यत्व की साधना का मर्म समझाती आयी है। उन्हें अपने सद्गुरु की कृपा का अधिकारी बनाती आयी है। अब इस सूत्र- माला का आखिरी छोर आ पहुँचा है। माला के सुमेरू तक हम आ पहुँचे हैं। केवल अन्तिम सूत्र कहा जाना है। यह अन्तिम सूत्र पहले गये सभी सूत्रों का सार है, उनकी चरम परिणति है। इस सूत्र में शिष्यत्व की साधना का चरम है। इसमें साधना के परम शिखर का दर्शन है। इसे समझ पाना केवल उन्हीं के बूते की बात है। जो इस साधना में रमे हैं, जिन्होंने पिछले दिनों शिष्यों संजीवनी को बूंद- बूंद पिया है, इस औषधि पान के अनुभव को पल- पल जिया है। इस सूत्र को समझने के लिए वे ही सुपात्र हैं, जिन्होंने अपने शिष्यत्व को सिद्ध करने के लिए अपने सब कुछ को दांव पर लगा रखा है।
     
🔵 इस अन्तिम सूत्र में पथ की नहीं मन्दिर की झलक है। पथ तो समाप्त हुआ, अब मंगलमय प्रभु के महाअस्तित्त्व में समा जाना है। बूंद- समुद्र में समाने जा रही है। सभी द्वन्द्वों को यहाँ विसॢजत होकर द्वन्द्वातीत होना है। शिष्यत्व के इस परम सुफल को जिन्होंने चखा है, जो इस स्वाद में डूबे हैं, ऐसे महासाधकों का कहना है- ‘जो दिव्यता के द्वार तक पहुँच चुका है, उसके लिए कोई भी नियम नहीं बनाया जा सकता। और न कोई पथ प्रदर्शक ही उसके लिए हो सकता है। फिर भी शिष्यों को संकेत देने के लिए कुछ संकेत दिए गए हैं, कुछ शब्द उचारे गए हैं- ‘जो मूर्त नहीं है और अमूर्त भी नहीं है, उसका अवलम्बन लो। केवल नाद रहित वाणी ही सुनो। जो बाह्य और अन्तर दोनों चक्षुओं से अदृश्य है, केवल उसी का दर्शन करो। तुम्हें शान्ति प्राप्त हो।
        
🔴 शिष्यत्व की साधना का यह अन्तिम छोर अतिदिव्य है। यहाँ किसी भी तरह के सांसारिक ज्ञान, भाव या बोध की तनिक भी गुंजाइश नहीं है। यहाँ शुद्ध अध्यात्म है। यहां केवल शुद्धतम चेतना का परम विस्तार है। यहाँ अस्तित्त्व के केन्द्र में प्रवेश है। यहाँ न तो विधि है, न निषेध। कोई नियम- विधान यहाँ नहीं है। हो भी कैसे सकते हैं, कोई नियम यहाँ पर? नियम तो वहाँ लागू किए जाते हैं, जहाँ द्वैत और द्वन्द्व होते हैं। और द्वैत और द्वन्द्व का स्थान परिधि है, केन्द्र नहीं। उपनिषद् में यही अवस्था नेति- नेति कही गयी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शनिवार, 23 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 63) 👉 व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि


🔴 इस सम्बन्ध में गौर करने वाली विशेष बात यह है कि लोग व्यवहार शुद्धि को ही सब कुछ मान लेते हैं। सांसारिक प्रचलन भी इसका साथ देता है। जो व्यवहार में ठीक है उसे नैतिक एवं उत्कृष्ट माना जा सकता है। पर सत्य इतने तक ठीक नहीं है। नैतिकता की उपयोगिता केवल सामाजिक दायरे तक है। आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए यह निरी अर्थहीन है। इसका मतलब यह नहीं है कि आध्यात्मिक व्यक्ति अनैतिक होते हैं। अरे नहीं, वे तो केवल अतिनैतिक होते हैं। वे नैतिकता की पहली कक्षा पास करके अन्य उच्च स्तरीय कक्षाओं को पास करने लगते हैं। ये उच्चस्तरीय कक्षाएँ विचार शुद्धि एवं संस्कार शुद्धि तक हैं। जो इन्हें कर सका वही अन्तरतम में छुपे हुए परम रहस्य को जानने का अधिकारी होती है।
     
🔵 शुद्धि व्यवहार की, यह केवल पहला कदम है, जो नैतिक नियमों को मानने से हो जाती है। शुद्धि विचारों की, यह किसी पवित्र विचार, भाव, सूत्र अथवा अपने आराध्य या परमवीतराग गुरुसत्ता का ध्यान व चिन्तन करने से हो जाती है। यदि कोई व्यक्ति किसी परम वीतराग व्यक्ति का ध्यान- चिन्तन करते रहे तो उसे विचार शुद्धि की कक्षा पास करने में कोई भी कठिनाई न होगी। इसके बाद संस्कार शुद्धि का क्रम है। यह प्रक्रिया काफी जटिल और दुरूह है। इसे ध्यान की दुर्गम राह पर चल कर ही पाया जा सकता है। इसमें वर्षों का समय लगता है। संक्षेप में इसकी कोई भी समय सीमा नहीं है। सब कुछ साधक के द्वारा किए जाने वाले आध्यात्मिक प्रयोगों की समर्थता व तीव्रता पर निर्भर करता है।
        
🔴 मां गायत्री का ध्यान व गायत्री मंत्र का जप इसके लिए एक सर्वमान्य उपाय है। जो इसे करते हैं उनका अनुभव है कि गायत्री सर्व पापनाशिनी है। इससे सभी संस्कारों का आसानी से क्षय हो जाता है। यदि कोई निरन्तर बारह वर्षों तक भी यह साधना निष्काम भाव से करता रहे तो उसे अन्तरतम में छुपे हुए रहस्य की पहली झलक मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है। लेकिन इस प्रयोग में एक सावधानी भी है कि इन पूरे बारह वर्षों तक गायत्री साधना के विरोधी भाव को अंकुरित नहीं होना चाहिए। यदि इस साधना में भक्ति और अनुरक्ति का अभिसिंचन होता रहा तो सफलता सर्वथा निश्चित रहती है। इस सफलता से अदृश्य के दर्शन का द्वार खुलता है। इसकी प्रक्रिया क्या है इसे अगले सूत्र में पढ़ा जा सकेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 62) 👉 व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि

 🔵 शिष्य संजीवनी के सभी सूत्रों में यह सूत्र अतिदुर्लभ है। इसके रहस्य को जान पाना, इसे प्रयोग कर पाना सबके बस की बात नहीं है। इसकी सही समझ एवं इसका सही प्रयोग केवल वही कर सकते हैं, जो अपने आप को वासनाओं से मुक्त कर चुके हैं। वासनाओं की कीचड़ से सना, इस कालिख से पुता व्यक्ति अपने अन्तरतम की गहराइयों में प्रवेश ही नहीं कर सकता। उसके पल्ले तो भ्रम- भुलावे और भटकनें ही पड़ती हैं। वह हमेशा भ्रान्तियों की भूल- भुलैया में ही भटका करता है। इससे उबरना तभी सम्भव है, जब अन्तःकरण में वासनाओं का कोई भी दाग न हो। अन्तर्मन अपनी सम्पूर्णता में शुभ्र- शुद्ध एवं पवित्र हो।

🔴 बंगाल के महान् सन्त विजयकृष्ण गोस्वामी इन भ्रमों के प्रति हमेशा अपने शिष्यों को सावधान करते रहते थे। उनका कहना था कि साधना की सर्वोच्च सिद्धि पवित्रता है। न तो इससे बढ़कर कुछ है और न इसके बराबर कुछ है। इसलिए प्रत्येक साधक को इसी की प्राप्ति के लिए सतत यत्न करना चाहिए। महात्मा विजयकृष्ण का कथन है कि साधक के शरीर और मन ही उसके अध्यात्म प्रयोगों की प्रयोगशाला है। उसका अन्तःकरण ही इस प्रयोगशाला के उपकरण हैं। अगर यह प्रयोगशाला और प्रयोग में आने वाले उपकरण ही सही नहीं है तो फिर प्रयोग के निष्कर्ष कभी सही नहीं आ सकते। इतना ही नहीं, ऐसी स्थिति में आध्यात्मिक प्रयोगों की सफलता और सार्थकता भी संदिग्ध बनी रहेगी।
   
🔵 इस पथ पर एक बड़ा खतरा और भी है। और यह खतरा है अन्तरात्मा की आवाज का। आमतौर पर जिसे लोग अन्तरात्मा की आवाज कहते हैं वह केवल उनके मन की कल्पनाएँ होती हैं। अपने मन के कल्पना जाल को ही वे अन्तरात्मा की आवाज अथवा अन्तरतम की वाणी कहते हैं। इस मिथ्या छलावे में फँसकर वे हमेशा अपने लक्ष्य से दूर रहते हैं। उनकी भटकने अन्तहीन बनी रहती हैं। ध्यान रहे यदि मन में अभी भी कहीं आसक्तियाँ हैं तो अन्तरतम की आवाज नहीं सुनी जा सकती है। वासनामुक्त हुए बिना जीवन के परम रहस्य को नहीं जाना जा सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 61) 👉 व्यवहारशुद्धि, विचारशुद्धि, संस्कारशुद्धि

  
🔴 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को अपने अन्तरतम में छुपे जीवन के परम रहस्य को अनुभव करने का अवसर देते हैं। यह अवसर अतिदुर्लभ है। युगों की साधना और सद्गुरु कृपा के बल पर कोई विरला शिष्य इसे जानने का अधिकारी हो पाता है। सामान्यतया तो शिष्य और साधक अहंकार की भटकन भरी भूल भुलैया में उलझते- फंसते और फिसलते रहते हैं। शिष्यों का अहं उन्हें सौ चकमे देता है, सैकड़ों भ्रम खड़े करता है। कभी- कभी तो इन भ्रमों व भुलावों में पूरी जिन्दगी ही चली जाती है। अहं के इन्हीं वज्रकपाटों की वजह से अपना ही अन्तरतम अनदेखा रह जाता है। इसके भीतर झांकने और जानने की कौन कहे- इसका स्पर्श तक दुर्लभ रहता है। जबकि जीवन के परम रहस्य इसी में संजोये और समाए हैं। इसी में गूंथे और पिरोये गए हैं।
     
🔵 यह अनुभव उन सभी का है जो शिष्यत्व की कठिन कसौटियों पर कसे गए हैं। जिन्होंने अनगिनत साहसिक परीक्षाओं में अपने को खरा साबित किया है। वे सभी कहते हैं- ‘पूछो अपने अन्तरतम से, उस एक से, जीवन के परम रहस्य को, जो कि उसने तुम्हारे लिए युगों से छिपा रखा है। अनुभव कहता है कि जीवात्मा की वासनाओं को जीत लेने का कार्य बड़ा कठिन है। इसमें युगों लग जाते हैं। इसलिए उसके पुरस्कार को पाने की आशा मत करो, जब तक कि वासनाओं को जीत लेने का दुष्कर कार्य पूरा न हो जाए। इस कार्य के पूरा हो जाने पर ही इस नियम की उपयोगिता सिद्ध होती है। तभी मानव- अतिमानव अवस्था की ड्योढ़ी पर पहुँच पाता है।

🔴 इस अवस्था में जो ज्ञान मिलता है वह इसी कारण मिल पाता है कि अब तुम्हारी आत्मा सभी शुद्धतम आत्माओं में से एक है। और उस परम तत्त्व से एक हो गयी है। यह ज्ञान तुम्हारे पास उस परमात्मा की धरोहर है। उन प्रभु के साथ तनिक सा भी विश्वासघात अथवा इस दुर्लभ ज्ञान का दुरुपयोग अथवा अवहेलना शिष्य या साधक के पतन का कारण भी हो सकता है। कई बार ऐसा होता है कि परमात्मा की ड्योढ़ी तक पहुँच जाने वाले लोग भी नीचे गिर जाते हैं। इसलिए इस क्षण के प्रति श्रद्धा एवं भय के साथ सजग रहो।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 28 जून 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 60):--- 👉 संवाद की पहली शर्त-वासना से मुक्ति


🔴 जो सुनना जानते हैं, उन्हें तो शान्तिकुञ्ज की धरती से साधना का संगीत उभरता नजर आता है। जहाँ गुरुदेव और वन्दनीया माता जी जैसे महायोगी रहे, चले और यहीं धूल में उन्होंने अपनी देह विलीन कर दी, वह धरती साधारण कैसे हो सकती है? बस जरूरत सुनने वालों की है। अगर ये हो तो फिर हवाओं में भी उन्हें महर्षियों के स्वर गुंजते सुनायी देंगे। ध्वनि हवाओं से ही तो बहती है और किसी भी हाल में यह मरती मिटती नहीं। यदि हमने अपनी श्रवण शक्ति को सूक्ष्म कर लिया है तो युगों पूर्व के स्वरों को भी सुना जा सकता है। इतना ही नहीं हवाओं की मरमर में दैवी वाणी भी सुनायी पड़ सकती है।

🔵 रही बात जल की तो इसकी महिमा तो धरती और वायु से भी ज्यादा है। जल की ग्रहणशीलता अति सूक्ष्म है। आध्यात्मि शक्ति के लिए, जल से बड़ा सुचालक और कोई नहीं। यही वजह है मंत्र से अभिमंत्रित जल चमत्कारी औषधि का काम करता है। यही कारण है कि प्राचीन महर्षियों ने नदियों के किनारे अपने आश्रम बनाये थे। उन्होंने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि उनकी तप शक्ति नदियों के जल में चिरकाल तक संरक्षित रह सके। और युगों- युगों तक लोग उसमें स्नान करके धन्यभागी हो सके। तीर्थ जल आज भी साधक से संवाद करते हैं। गंगा- यमुना की सूक्ष्म चेतना का अस्तित्त्व अभी है। हां उनकी स्थूल कलेवर को इन्सान ने आज अवश्य बरबाद कर दिया है।
       
🔴 यदि अभी किसी में इतनी पात्रता नहीं है, तो उसको पवित्र पुरुषों के पास जाकर सत्य को सीखना चाहिए। पवित्र पुरुष सभी बन्धनों से मुक्त होते हैं। उनकी स्थूल देह केवल छाया भर होती है। इसलिए पूछने वालों को उनके दैहिक व्यापारों एवं व्यवहारों पर नजर नहीं रखनी चाहिए। अन्यथा अनेकों तरह के भ्रम व सन्देह की गुंजाइश बनी रहती है। जो इन पवित्र पुरुषों को देह के पार देख सकता है, उनकी परा चेतना की अनुभूति कर सकता है, वही उनसे संवाद कर सकता है। अगर ऐसा नहीं है तो उसे संसार भर के पवित्र पुरुष उसे अपनी ही भांति साधारण रोगी या वासनाओं से भरे नजर आएँगे। यही वजह है कि इनसे संवाद की पहली शर्त है कि हम स्वयं वासना मुक्त हों। वासना मुक्त होने पर इस संवाद के स्वर हमसे क्या कहेंगे- आइये इसे अगले सूत्र में जानें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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Boya Kata - Pt Shriram Sharma Acharya- Lecture 1984
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सोमवार, 27 जून 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 59):-- 👉 संवाद की पहली शर्त-वासना से मुक्ति

🔵 ऊपरी तौर पर देखें तो ये तर्क ठीक नजर आते हैं। लेकन थोड़ा गहराई में उतरें तो इनमें कोई दम नजर नहीं आती। प्रकृति के आधीन होकर जीना तो पशुओं का काम है। पशु सदा प्रकृति के अनुरूप जीते हैं। यद्यपि ये भी वासनाओं के लिए समर्पित नहीं होते। प्रकृति द्वारा निर्धारित किए गए समय के अनुसार ही ये इस जाल में पड़ते हैं। मनुष्य की स्थिति तो पशुओं से भिन्न है। इन्हें प्राण के साथ मन भी मिला है। और मन का उपयोग एवं अस्तित्त्व इसीलिए है कि यह प्राण को परिष्कृत करे, वासना से उसे मुक्त करे। इस प्रक्रिया के पूरी होने पर प्राण प्रखर व उर्ध्वगामी बनता है। ऐसा होने पर स्नायु संस्थान दृढ़ होता है और धारणा शक्ति का विकास होता है। जो ऐसा करते हैं- उनकी प्रतिभा का स्वाभाविक विकास होता है। साथ ही उनमें ऐसी योग्यता विकसित होती है कि ये वातावरण की सूक्ष्मता से संवाद कर सके।

🔴 इन्हीं के लिए कहा गया है कि तुम पूछो पृथ्वी, वायु और जल से। जिनकी भावचेतना इन्द्रिय के इन्द्रजाल से मुक्त नहीं है, वे वातावरण की सूक्ष्मता से संवाद नहीं कर सकते। धरती इन्हें धूल कणों का ढेर मालूम होगी। और हवा के झोंके इन्हें केवल गर्द- गुबार एवं गन्ध उड़ाते नजर आएँगे। जल के बहते स्रोत इन्हें प्यास बुझाने के साधन लगेंगे। लेकिन यदि नजरें बदले तो नजारे बदल सकते हैं। धरती की धूल महत्त्वपूर्ण हो सकती है। महत्त्वपूर्ण न होती तो तीर्थों की रज का इतना महिमागान न होता। धरती के जिस कोने में ऋषियों ने तप किया, महायोगियों ने साधनाएँ की और फिर साधना से पवित्र उनकी देह उसी धूल में विलीन हो गयी। उस धूल के पास बहुत कुछ कहने को है। बस सही ढंग से सुनने वाला होना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया

बुधवार, 8 जून 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 58) :-- 👉 संवाद की पहली शर्त-वासना से मुक्ति

🔴 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को सुपात्र बनाते हैं। शिष्य शब्द को उसका सही अर्थ प्रदान करते हैं। इन सूत्रों के ढलकर जो सुपात्र बन गया है, उस पर अपने आप ही सद्गुरुदेव की अनुकम्पा बरस पड़ती है। उसका अन्तःकरण अपने गुरु की कृपा से लबालब भर जाता है। उसके अस्तित्त्व के कण- कण से शिष्यत्व परिभाषित होता है। ढाई अक्षर का शब्द शिष्य- प्रेम के ढाई अक्षर का पर्याय बन जाता है। गुरुप्रेम ही शिष्य का जीवन है। यही उसका पात्रता और पवित्रता की कसौटी है। शिष्य शब्द का सच्चा अर्थ भी इसी में है। जिन्होंने भी अपनी जिन्दगी में इसे ढूँढ लिया है- वे निहाल हो गए हैं। साधना पथ के शूल में भी उनके लिए फूल बन गए हैं।
   
🔵 जो अभी पथ की खोज में है, उनके मार्गदर्शन के लिए अगला सूत्र प्रस्तुत है। इस सूत्र में शिष्यत्व की साधना के महासाधक बताते हैं- आन्तरिक इन्द्रियों को उपयोग में लाने की शक्ति प्राप्त करके, बाह्य इन्द्रियों की वासनाओं को जीतकर, जीवात्मा की इच्छाओं पर विजय पाकर और ज्ञान प्राप्त करके, हे शिष्य, वास्तव में मार्ग में प्रविष्ट होने के लिए तैयार हो जा। मार्ग मिल गया है, उस पर चलने के लिए अपने को तैयार कर। इस मार्ग के रहस्यों का ज्ञान तू पूछ पृथ्वी से, वायु से, जल से। इन्हीं में इन रहस्यों को तेरे लिए छुपाकर रखा है। यदि तूने अपनी आन्तरिक इन्द्रियों को विकसित कर लिया है, तो तू इस काम को कर सकेगा। इन रहस्यों को तू पृथ्वी के पवित्र पुरुषों से पूछ, यदि तू शिष्यत्व की कसौटी पर खरा है, तो वे तूझे इन रहस्यों का ज्ञान देंगे। तू भरोसा कर- बाह्य इन्द्रियों की लालसाओं से मुँह मोड़ लेने भर से तूझे यह रहस्य ज्ञान पा लेने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा।
    
🔴 इस रहस्यमय सूत्र में आध्यात्मिक जीवन में कई महत्त्वपूर्ण आयाम समाए हैं। इन्हें समझकर आत्मसात कर लिया जाय तो साधना की डगर आसान हो सकती है। इतना ही नहीं इसके शिखर पर भी पहुँचा जा सकता है। लेकिन शुरूआत वासनाओं से मुँह मोड़ने से करनी होगी। जो लालसाओं से लिपटा और वासनाओं से बंधा है, उसके लिए साधना सम्भव नहीं है। साधना के सच केवल साधक को ही मिला करते हैं। और साधक बनने के लिए वासनाओं के बन्धन तोड़ने ही पड़ते हैं। कई बार लोग सवाल करते हैं- ऐसा प्रतिबन्ध क्यों है? इनका कहना है कि कामनाएँ एवं वासनाएँ तो स्वाभाविक हैं, नैसर्गिक हैं। इनकी ओर से मुँह मोड़ने से तो जीवन अप्राकृतिक बन जाएगा। और अप्राकृतिक जीवन को रोगी जिया करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शुक्रवार, 27 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 57) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 एक सूफी दरवेश अमीरूल्लाह हुए हैं। यह बड़े पहुँचे हुए फकीर थे। इनके सान्निध्य में अनेकों को अपने मन की खोई हुई शान्ति वापस मिलती थी। दरवेश अमीरूल्लाह का हर पल, हर क्षण खुदा की इबादत में बीतता है। हिन्दू- मुसलमान, गरीब- अमीर सभी के अपने थे वह। गाँव के लोग उन्हें अमीर बाबा कहकर बुलाते थे। इन्हीं के गाँव में सांझ के समय एक युवक आया। उसके कपड़ों की हालत देखकर लगता था कि वह काफी दूर से चला आ रहा है। फकीर के पास पहुँचकर उसने साष्टांग प्रणाम किया। और उनका शिष्य होने की इच्छा प्रकट की।
    
🔴 दरवेश अमीर बाबा ने उसकी ओर बड़ी बेधक नजरों से देखा और बोले, यदि तुम शिष्य होना चाहते हो, तो पहले शिष्य की जिन्दगी का ढंग सीखो। यह क्या है बाबा? युवक के जिज्ञासा करने पर दरवेश अमीर बाबा ने कहा, बेटा! शिष्य अपनी अन्तरात्मा का सम्मान करना जानता है। वह इन्द्रिय लालसाओं के लिए, थोड़े से स्वार्थ के लिए या फिर अहंकार की झूठी शान के लिए अपना सौदा नहीं करता। वह ऐसी जिन्दगी जीता है जो खुदा के एक सच्चे व नेक बन्दे को जीनी चाहिए। बाबा की इन बातों को सुनते हुए उस युवक को लग रहा था कि दरवेश अपनी बातों का और खुलासा करें।
  
🔵 सो उनके मनोभावों को पढ़ते हुए दरवेश बाबा बोले, बेटा! दुनिया का आम इन्सान दुनिया के सामने झूठी, नकली जिन्दगी जीता है। वह भय के कारण, समाज के डर की वजह से समाज में अपने अच्छे होने का नाटक करता है। परन्तु समाज की ओट में, चोरी- छुपे अनेकों बुरे काम कर लेता है। अपने मन में बुरे ख्यालों व ख्वाबों में रस लेता है। परन्तु खुदा का नेक बन्दा कभी ऐसा नहीं करता। क्योंकि वह जानता है, खुदा सड़क और चौराहों में भी है और कमरों की बन्द दीवारों के भीतर भी। यहाँ तक कि अन्तर्मन के दायरों में भी उसकी उपस्थिति है। सो वह हर कहीं- हर जगह अपने कर्म, विचार व भावनाओं में पाक- साफ होकर जीता है। यही अन्तरात्मा का सम्मान करने का तरीका है। जो ऐसा करते हैं, वे अपने पीर- गुरु को सहज प्यार करते हैं। भगवान् की कृपा भी उन पर सदा बरसती रहती है। इस कृपा की और अधिक सघन अनुभूति कैसे हो। इस रहस्य को शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में बताया जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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सोमवार, 23 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 56) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 यह सूत्र पिछले सभी सूत्रों के मर्म को अपने में समेटे हुए है। जो कुछ भी पहले कहा गया उसका सार इसमें है। जो शिष्य होना चाहता है, उसके लिए पहली एवं अनिवार्य योग्यता है कि वह अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखे। शब्द के रूप में ‘अन्तरात्मा’ का परिचय सभी को है। दिन में कई बार इसे कईयों के मुख से कहा जाता है। परन्तु इसके अर्थ एवं भाव से प्रायः सभी अनजान बने रहते हैं। कई बार तो जानबूझ कर इससे अनजान बनने की, इसे अनदेखा करने की कोशिश की जाती है। रोजमर्रा की जिन्दगी में यदि सबसे ज्यादा किसी की उपेक्षा होती है, तो अन्तरात्मा की। जबकि यही हम सबके जीवन का सार है। भगवान् सनातन एवं शाश्वत है। हमारे व्यक्तित्व का आधार है। जिन्दगी की सभी पवित्र शक्तियों का उद्गम स्रोत है।
    
🔴 इन्द्रिय लालसाओं को पूरा करने का लालच हमें अन्तरात्मा के सच से दूर रखता है। अहं को प्रतिष्ठित करने के फेर में हम इसे बार- बार ठुकराते हैं। मन के द्वन्द्व, सन्देह, ईर्ष्या आदि कुभाव हमें पल- पल इससे दूर करते हैं। अनगिनत अर्थहीन कामों के चक्रव्यूह में फँसकर अन्तरात्मा का अर्थ दम तोड़ देता है। इसके अर्थ को जानने के लिए, इसके स्वरों को सुनने के लिए हमें अपनी जीवन शैली बदलनी पड़ेगी। जो शिष्य होना चाहता है, जो इसकी डगर पर पहले से चल रहे हैं, उन सभी का यह अनिवार्य दायित्व है। उनके जीवन में कहीं कुछ भी अर्थहीन नहीं होना चाहिए। न तो अर्थहीन कर्म रहे और न अर्थहीन विचार और न ही अर्थहीन भावनाएँ।
  
🔵 जब हमारे कर्म, विचार व भाव कलुष की कालिमा से मुक्त होता है तो हमें अन्तरात्मा का स्पर्श मिलता है। अन्तर्हृदय की वाणी सुनायी देती है। यह प्रक्रिया हमारे मुरझाए जीवन में नयी चेतना भरती है। हमारे अंधेरेपन में नया प्रकाश उड़ेलती है। यह अनुभव बड़ा अनूठा है। हालांकि कई बार इस बारे में भी भ्रमों की सृष्टि हो जाती है। अनेकों लोग अपने मन की उधेड़बुन, उलझन एवं मानसिक कल्पनाओं को ही अन्तरात्मा की वाणी मान लेते हैं, यह गलत है। ऐसा होना सम्भव भी नहीं है। सच यही है कि जीवन का ढंग बदले बिना अन्तरात्मा का सम्मान किए बिना अन्तरात्मा की वाणी सुनायी नहीं देती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शनिवार, 21 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 55) :-- 👉 अन्तरात्मा का सम्मान करना सीखें

🔵 शिष्य संजीवनी के सूत्र शिष्यों को जीने का ढंग सिखाते हैं। जिन्दगी जीने का अपना यही अलग ढंग शिष्य को आम आदमी से अलग करता है, उसे विशेष बनाता है। आम इन्सान अपनी जिन्दगी को आधे- अधूरे ढंग से जीता है। उसके जीवन में एक बेहोशी छायी रहती है। अहंता की अकड़ हर वक्त उसे घेरे रहती है। लेकिन एक सच्चा शिष्य इस घेरे से हमेशा मुक्त रहता है। वह हर पल- हर क्षण सिखना चाहता है। सिखने के लिए वह झुकना जानता है। इस झुकने में उसकी अहंता कभी भी बाधक नहीं बनती। उसके जीवन में ऐसा इसलिए होता है- क्योंकि उसे अपनी अन्तरात्मा का सम्मान करने की कला मालूम है। जबकि औसत आदमी अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में, अहंता को सम्मानित करने में जुटा रहता है। अन्तरात्मा का सच तो उसे पता ही नहीं होता।
    
🔴 जबकि शिष्यत्व की समूची साधना अन्तरात्मा के बोध एवं इसके सम्मान पर टिकी हुई है। जो इस साधना के शिखर पर पहुँचे हैं, उन सभी का निष्कर्ष यही रहा है- अपनी अन्तरात्मा का पूर्ण रूप से सम्मान करना सीखो। क्योंकि तुम्हारे हृदय के द्वारा ही वह उजाला मिलता है, जो जीवन को आलोकित कर सकता है। और उसे तुम्हारी आँखों के सामने स्पष्ट करता है। ध्यान रहे, हमेशा ही अपने हृदय को समझने में भूल होती है। इसका कारण केवल इतना है कि हम हमेशा बाहर उलझे- फँसे रहते हैं। जब तक बाहरी उलझने कम नहीं होती, जब तक व्यक्तित्व के बन्धन ढीले नहीं होते, तब तक आत्मा का गहन रहस्य खुलना प्रारम्भ नहीं होता।
  
🔵 जब तक तुम उससे अलग एक ओर खड़े नहीं होते। तब तक वह अपने को तुम पर प्रकट नहीं करेगा। तभी तुम उसे समझ सकोगे और उसका पथ प्रदर्शन कर सकोगे, उससे पहले नहीं। तभी तुम उसकी समस्त शक्तियों का उपयोग कर सकोगे। और उन्हें किसी योग्य सेवा में लगा सकोगे। उससे पहले यह सम्भव नहीं है। जब तक तुम्हें स्वयं कुछ निश्चय नहीं हो जाता, तुम्हारे लिए दूसरों की सहायता करना असम्भव है। जब तुमको पहले कहे गए सभी सूत्रों का ज्ञान हो चुकेगा, और तुम अपनी शक्तियों को विकसित एवं अपनी इन्द्रियों को विषय- भोग की लालसाओं से मुक्त करोगे तभी अन्तरात्मा के परम ज्ञान मन्दिर में प्रवेश मिलेगा। और तभी तुम्हें ज्ञात होगा कि तुम्हारे भीतर एक स्रोत है। जहाँ से वह वाणी मुखरित होती है, जिसमें जीवन के सभी रहस्यार्थ छुपे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शुक्रवार, 20 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 54) :--- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 लेकिन जो जीवन साधना से वंचित हैं, उनकी तो स्थिति ही अलग है। इनका चित्त रुग्ण है, इनका देखने का ढंग पैथालॉजिकल है। ये अपने देखने का ढंग नहीं बदलना चाहते, बस परिस्थिति को बदलने के लिए उत्सुक रहते हैं। इनका रस जीवन की निन्दा में है। ऐसे में खुद के दोषों को समझना बड़ा मुश्किल होता है। यह जो निन्दकों का समूह है, यह अपने और औरों के जीवन को नुकसान तो भारी पहुँचा सकता है, पर परमात्मा की तरफ एक कदम बढ़ने में मदद नहीं कर सकता।
   
🔴 निन्दकों के समूह, गाँव और शहरों की भीड़ में ही नहीं, आश्रमों और मठों में भी होते हैं। बल्कि वहाँ ये थोड़े ज्यादा पहुँच जाते हैं। इनके सिर में अजीब- अजीब दर्द उठते रहते हैं। जैसे कि फलाँ आदमी ऐसा कर रहा है, ढिकाँ औरत ऐसा कर रही है और कुछ नहीं तो इन्हें अपने पड़ोसी की चिंता और चर्चा परेशान करती है। अब इन्हें कौन समझाये कि तुम्हें किसने ठेका दिया सबकी चिंता का? यहीं आश्रम में क्या तुम इसीलिए आये थे। अरे! तुम तो आये थे यहाँ अपने को बदलने को और यहाँ तुम फिक्र में पड़ जाते हो किसी दूसरे को बुरा ठहराने में। ऐसे लोग किसी और को नहीं अपने आप को धोखा देते हैं।
  
🔵 शिष्यत्व की डगर ऐसे वंचनाग्रस्त लोगों के लिए नहीं है। यह तो उनके लिए है, जो हृदय में सृजन की संवेदना सँजोये हैं। जरा देखें तो सही हम अपने चारों तरफ। संवेदनाओं से निर्मित हुआ है सब कुछ। जो हमारी बगल में बैठा है, उसमें भी संवेदना की धड़कन है और जो वृक्ष लगा हुआ है, उसकी भी जीवन धारा प्रवाहित हो रही है। धरती हो या आसमान हर कहीं एक ही जीवन विविध रूपों में प्रकट है। इस व्यापक सत्य को समझकर जो जीता है, वह शिष्यत्व की साधना करने में सक्षम है। इस साधना के नये रहस्य शिष्य संजीवनी के अगले सूत्र में उजागर होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 19 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 55) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 इसी के साथ तुम्हें मानवीय हृदय में झाँकने की कला सीखनी होगी। हमेशा मानव हृदय से उफनती भाव संवेदनाओं की गंगोत्री में स्नान करने की कोशिश करो। तभी तुम जान पाओगे कि यह जगत् कैसा है और जीवन के रूप कितने विविध हैं। इसे जानने के लिए निष्पक्षता और तटस्थता अपनाओ। बुद्धि को साक्षी बने रहने दो। तभी तुम समझ पाओगे कि न कोई तुम्हारा शत्रु है और न कोई मित्र। सभी समान रूप से तुम्हारे शिक्षक हैं। तुम्हारा शत्रु, तुम्हारे लिए एक रहस्यमय प्रश्र की भाँति है, जिसे तुम्हें हल करना है। एक अनबूझ पहेली की भाँति है, जिसे बूझना है। भले ही इसे हल करने में, बूझने में युगों का समय लग जाये। क्योंकि मानव को समझना तो है ही। तुम्हारा मित्र तुम्हारा ही अंग बन जाता है, तुम्हारे ही विस्तार का एक अंश हो जाता है, जिसे समझना कठिन होता है।’
   
🔴 बड़ी मार्मिक बातें उजागर हुई हैं इस सूत्र में। अगर सार रूप में इस सूत्र को एक पंक्ति में परिभाषित करें तो यही कहना होगा कि जो साधना की डगर पर चलना चाहते हैं वे समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें। इसके प्रत्येक हिस्से में महत्त्वपूर्ण संदेश है। हाँ, उसमें भी जिसे हम दुःख कहकर परिभाषित करते हैं और रो- पीटकर पूरे संसार को अपने सिर पर उठा लेते हैं। दरअरसल यदि सच्चाई जाने- परखें तो पता यही चलेगा कि जीवन में दुःख नहीं है। जीवन को देखने के ढंग में दुःख है। यह देखने का ढंग लेकर जो जहाँ भी जायेगा, वही दुःखी होता रहेगा। फिर चाहे वह जगह स्वर्ग ही क्यों न हो।
  
🔵 यही वजह है कि चमड़ा भिगोते जूता गाँठते हुए रैदास परम आनन्दित हो सकते हैं। चरखा कातते हुए कबीर इतने आनन्द विभोर होते हैं कि उनके जीवन में संगीत और काव्य फूटता है। और फिर मिट्टी के बर्तन बनाते- पकाते गोरा कुम्हार, उनके तो आनन्द की कोई सीमा ही नहीं। तो यह आनन्द और इसका स्रोत इनकी परिस्थिति में नहीं, इनकी मनःस्थिति में है। इनके दृष्टिकोण में है, जो कहीं भी आनन्द की सृष्टि करने में सक्षम है। इनके स्वर्गीय दृष्टिकोण में स्वर्ग के निर्माण की क्षमता है और ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि ये समग्र जीवन का सम्मान करना जानते हैं। जीवन का प्रत्येक अंश इनके लिए मूल्यवान् है। फिर भले ही वह कंटकाकीर्ण हो या सुकोमल पुष्पों से सजा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 18 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 52) :-- 👉 समग्र जीवन का सम्मान करना सीखें

🔵 शिष्य संजीवनी के सूत्रों में शिष्य जीवन के अनगिन रहस्य पिरोये हैं। इसका प्रत्येक सूत्र शिष्य जीवन के एक नये रहस्य को उजागर करता है, उसकी समग्र व्याख्या प्रस्तुत करता है। जो इस व्याख्या को समझकर उसे अपने जीवन में अवतरित करने, आत्मसात् करने के लिए तत्पर है, वही शिष्यत्व के सुपात्र- सत्पात्र है। जो ऐसा नहीं कर सकते, वे हमेशा के लिए इसके स्वाद से वंचित रहते हैं। समझ की बात इसमें यह है कि इसके लिए बौद्धिक समझ भर पर्याप्त नहीं है। इसके लिए साधना का बल चाहिए। जीवन साधना का पुरुषार्थ जिनमें है, वही इस कठिन डगर पर चलने के लायक हैं। जो इस डगर पर चल रहे हैं, वे जानते हैं कि इस पर चलते हुए कितनी बार उनके पाँवों में छाले पड़े हैं। कितनी बार ये छाले गहरे घावों में बदले हैं और कितनी बार उन्हें इन घावों की रिसन से मर्मान्तक वेदना झेलनी पड़ी है।
   
🔴 लेकिन इसके बावजूद यह रोमाँचक यात्रा अतीव सुखप्रद है, क्योंकि इसकी अनुभूतियों का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय चेतना के एक नये और अनजाने आयाम को उद्घाटित करता है। इसके नये अन्तर- प्रत्यन्तर खुलते हैं। परत- दर बोध की नूतन दृष्टि मिलती है। और इसमें सबसे बड़ी बात यह पता चलता है कि जीवन के प्रत्येक कण में सार है। इसके प्रत्येक क्षण में अर्थ है। फिर ये कण या क्षण मुश्किलों से भरे हुए ही क्यों न हों। भले ही इनके साथ जीने में विष बुझे बाणों की चुभन का अहसास हो रहा हो। जो इसमें सार- सत्य को ढूँढ लेते हैं, वही जीवन के मर्म को जान पाते हैं।
  
🔵 शिष्य संजीवनी के इस नये सूत्र का संदेश भी है। जो शिष्यत्व की डगर पर चले हैं, जिन्होंने इस साधना में अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति दी है, उन सबका कहना यही है- ‘समग्र जीवन का सम्मान करो, जो तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है। अपने आसपास के अनवरत बदलने वाले प्रवाहमान जीवन को गहराई से देखो, क्योंकि यह मानवीय संवेदनाओं का ही सघन रूप है और ज्यों- ज्यों तुम इसकी बुनावट को परखोगे- बनावट पर ध्यान दोगे, त्यों- त्यों तुम क्रमिक रूप से जीवन के विशालतम शब्द एवं व्यापकतम अर्थ को पढ़ और समझ सकने लायक होगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 17 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 51) :-- सदगुरु से संवाद की स्थिति कैसे बनें

🔵 भावानुभूतियों के इस क्रम में अपने सद्गुरु के साथ बिताए क्षणों का सुयोग भी है। उनके दर्शन की प्यारी झलक, उनके श्री चरणों का सुकोमल स्पर्श अथवा फिर उनकी कही हुई बातें। इस सबका अवसर जीवन में कम आया हो, तो स्वप्र भी झरोखे बन सकते हैं। स्वप्रों में भी दिव्यता उतरती है। धन्य होते हैं, वे पल जब स्वप्र में सद्गुरु की झलक मिलती है। स्वप्र में जब उनके स्पर्श का अहसास मिला- तब यह सब विशेष हो जाता है। क्योंकि ऐसे क्षणों में हमारी अन्तर्चेतना सद्गुरु के साथ लयबद्ध स्थिति में होती है।
   
🔴 इन क्षणों का यदि बारम्बार स्मरण हो सके तो सद्गुरु से संवाद सम्भव बन पड़ता है। ईसाइयों की पुरातन कथाओं में प्रायः ईसेन सम्प्रदाय का जिक्र होता है। कहते हैं कि इसी सम्प्रदाय में ईसा मसीह को दीक्षा मिली थी। इस सम्प्रदाय में साधना की कई अनूठी बातों की चर्चा मिलती है। शोध की जिज्ञासा हो तो यहाँ अध्यात्म की अनेकों खास तकनीकें ढूँढी जा सकती हैं। इन सभी में ध्यान का विशेष महत्त्व है। वैसे भी कहते हैं कि यह सम्पूर्ण सम्प्रदाय ध्यान पर ही टिका हुआ था।
  
🔵 इसके पुरातन आचार्यों का कहना था कि यदि तुम्हारे जीवन में अगर कभी कोई ऐसा क्षण घटा हो, जिस क्षण में विचार न रहे हों और तुम आनन्द से भर गए हो, तो उस क्षण को तुम पुनः पुनः स्मरण करो। उन क्षणों को अपने ध्यान का विषय बनाओ। वह क्षण कोई भी रहा हो, उसी को बार- बार स्मरण करके उस पर ध्यान करो, क्योंकि उस क्षण में तुम अपनी श्रेष्ठतम ऊँचाई पर थे। अब उन्हीं क्षणों में, उसी स्थान में मेहनत करने की आवश्यकता है।

🔴 ऐसे क्षण हम सभी के जीवन में आते हैं। बस हम इन्हें सम्हाल कर नहीं रख पाते। इन्हें सम्हालने की जरूरत है। क्योंकि नीरवता में घुले, आनन्द से भरे इन्हीं क्षणों में हमारी भावचेतना शिखर पर होती है। इन्हीं में सद्गुरु से संवाद की स्थिति बनती है परम चेतना के संकेतों को पाने का सौभाग्य जगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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सोमवार, 16 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 50) :-- सदगुरु से संवाद की स्थिति कैसे बनें

🔵 इस परम सूत्र में जिस महागीत का इशारा किया गया है, निश्चित ही उसे आज की स्थिति में सम्पूर्ण रूप से नहीं सुना जा सकता है। इसे पूरी तरह से सुनने के लिए हमें भी धीरे- धीरे भीतर लयबद्ध होना पड़ेगा। क्योंकि समान ही समान का अनुभव कर सकता है। अगर हमें उस महासंगीत की अनुभूति करनी है तो खुद भी संगीतपूर्ण हो जाना पड़ेगा। अगर हम उस परम प्रकाश को देखना चाहते हैं तो निश्चित ही हमें प्रकाशपूर्ण हो जाना पड़ेगा। अगर उस दिव्य अमृततत्त्व का स्वाद चखना है तो मृत्यु के रहस्य के पार जाना होगा।
   
🔴 दरअसल हम जिसको जानना चाहते हैं, उसके जैसा हमें होना भी पड़ता है। क्योंकि समान की ही अनुभूति पायी जा सकती है। असमान की अनुभूति का कोई उपाय नहीं है। इसीलिए साधना के शिखर को पहुँचे हुए अनुभवी जनों ने कहा है- कि आँख हमारे भीतर सूरज का हिस्सा है, इसीलिए यह प्रकाश की अनुभूति पाने में सक्षम है। कान हमारे भीतर ध्वनि का हिस्सा है, इसीलिए यह सुन पाने में सक्षम है। कामवासना हमारे भीतर पृथ्वी का हिस्सा है, इसीलिए यह हमेशा नीचे की ओर खींचती रहती है। जबकि ध्यान हमारे भीतर परमात्मा का अंश है, इसीलिए हमें परमात्मा की ओर ले जाता है। यह बात जिन्दगी में बार- बार अनुभव होती है कि जो जिससे जुड़ा है, उसी का यात्रा पथ बन जाता है।
  
🔵 विचार करो, अहसास करने की कोशिश करो कि अपना खुद का जुड़ाव कहाँ और किससे है? अगर हम सर्वव्यापी परमचेतना के संगीत को सुनना चाहते हैं, तो उससे जुड़ना भी होगा। यह जुड़ाव कठिन तो है पर एकदम असम्भव नहीं है। भावनाएँ उस ओर बहें तो यह सम्भव है। उन भावनाओं की, उन भावानुभूतियों की स्मृति का स्मरण होता रहे तो यह सम्भव है।

🔴 कभी- कभी अचानक ही ये भावानुभूतियाँ हमें जीवन में घेर लेती हैं। जैसे किसी दिन सुबह सूरज को उगते देखकर रोम- रोम में शान्ति की लहर दौड़ने लगती है या फिर किसी रोज आकाश में तारे भरे हों और हम उन्हें जमीन पर लेटे हुए देख रहे हों, तभी अचानक अन्तर्चेतना में मौन उतर गया हो। ऐसी और भी अनेकों भावानुभूतियाँ हैं जो किसी खास क्षण में उपजती और उतरती हैं। इन अनुभूतियों का स्मरण हमें बार- बार करते रहना चाहिए। इस स्मरण के झरोखे से परम तत्त्व की झांकी उतरती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया

रविवार, 15 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 49) :-- सदगुरु से संवाद की स्थिति कैसे बनें

🔵 शिष्य संजीवनी के प्रत्येक सूत्र में अपनी एक खास विशिष्टता है। इसकी गहनता में जीवन का सुरीला संगीत है। संगीत का अर्थ है कि जीवन का परम रहस्य, स्वरों की भीड़- भाड़ नहीं है, न ही एक अराजकता है, न ही एक अव्यवस्था है, बल्कि सभी स्वर मिलकर एक ही तरंग, एक ही लय, एक ही इंगित, एक ही इशारा कर रहे हैं। जिन्दगी के परम केन्द्र में सभी स्वर परस्पर घुले- मिले हैं। कहीं कोई बैर- विरोध नहीं है। यह जो अव्यवस्था दिखाई पड़ती है, यह हमारे अन्धेपन के कारण है। और जो स्वरों का उपद्रव दिख रहा है, वह हमारे बहरेपन के कारण है। अपनी स्वयं की अक्षमता के कारण हम सभी स्वरों के बीच में बहती हुई समस्वरता का अनुभव नहीं कर पाते।
    
🔴 जबकि इसी अनुभूति में साधना है। इसी में शिष्य और सद्गुरु का मिलन है। इसी के रहस्य को उजागर करते हुए शिष्यत्व के साधना शिखर पर विराजमान जन कहते हैं- ‘‘सुने गए स्वर माधुर्य को अपनी स्मृति में अंकित करो। जब तक तुम केवल मानव हो, तब तक उस महागीत के कुछ अंश ही तुम्हारे कानों तक पहुँचते हैं। परन्तु यदि तुम ध्यान देकर सुनते हो, तो उन्हें ठीक- ठीक स्मरण रखो; जिससे कि जो कुछ तुम तक पहुंचा है, वह खो न जाए। और उससे उस रहस्य का आशय समझने का प्रयत्न करो, जो रहस्य तुम्हें चारों ओर से घेरे हुए है। एक समय आएगा जब तुम अपनी अन्तर्चेतना में सद्गुरु की वाणी की अनुभूति कर सकोगे। इसी परमवाणी में सर्वव्यापी अस्तित्त्व के संकेत हैं।
   
🔵 इन दिव्य संकेतों की स्वर लहरियों से स्वरबद्धता का पाठ सीखो। ध्यान दो इस सत्य पर कि जीवन की अपनी भाषा है और वह कभी मूक नहीं रहती और उसकी वाणी एक चीत्कार नहीं है, जैसा कि तुम भूलवश समझ लेते हो। वह तो एक महागीत है। उसे सुनो और उससे सीखो कि तुम स्वयं उस सुस्वरता के अंश हो। और उससे उस सुस्वरता के नियमों का पालन करना सीखो।’’ साधना का यह परम सूत्र सम्मोहक है और रहस्यमय भी। इसमें प्रवेश करने पर यात्रा का पथ मिलता है, सद्गुरु का द्वार खुलता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शनिवार, 14 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 48) :-- गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में सुनें

🔴  बाबा कबीर के एक शिष्य थे- शेख रसूल। साधना करने की प्रगाढ़ चाहत लिए हुए वे कबीर बाबा के पास आए। उनकी चाहत थी कि बाबा उन्हें मंत्र दें। जप की कोई विधि बताएं। अक्कड़- फक्कड़ कबीर के निराले जीवन की विधियाँ भी निराली थी। उन्होंने शेख रसूल को देखा फिर हंसे और हंसते हुए उन्होंने कहा- देख मैं तुझे मंत्र तो दूंगा, पर तब जब तू सुनने लायक हो जाएगा। अभी तो तू बहरा है, पहले अपने बहरेपन को ठीक कर। अपनी उलटबासियों के लिए विख्यात कबीर की यह उलटबांसी रसूल को समझ में न आयी। क्योंकि उनके कान तो ठीक थे। उन्हें सुनायी भी सही देता है।

🔵  समझने के फेर में पड़े शेख रसूल को बाबा कबीर ने चेताया, अरे भाई ये जो कान है, वे तो दुनियां की बातों को सुनने के लिए हैं। गुरु की बातों को दिल से सुना जाता है। दिल कहे और दिल सुने। ऐसा हो तो गुरु और शिष्य के बीच संवाद पनपता है। बात रसूल को समझ में आ गयी। उसी क्षण से उन्होंने कानों की सुनी पर मन की हटाकर दिल की गहराइयों में प्रवेश करने की तैयारी करने लगे। गुरु के लिए उफनता प्रेम, सच्ची श्रद्धा, वे ही मेरा उद्धार करेंगे, यह वे ही एक मात्र आशा उनकी चेतना की गहराइयों में सघन होने लगी। इस सघनता को लिए वह जीवन के उथलेपन से गहरेपन में प्रविष्ट होने लगे।

🔴  दिन गुजरे, रातें बीतीं। पहले तो सांसारिक कोलाहल ने उनकी राह रोकी। सतही पथरीलापन उनकी राहों में आड़े आया, पर श्रद्धा उनका सम्बल थी, उनके हृदय में आशा का प्रदीप था। सद्गुरु के प्रति अथाह प्रेम उनका पाथेय था। शेख रसूल अपनी गहराइयों में उतरते गए। उन्हें अचरज तब हुआ, जब उन्होंने पाया कि अन्तस की गहराइयों में न तो कोलाहल का अस्तित्व है और न पथरीली ठोकरों का। वहाँ तो बस पवित्र जीवन संगीत प्रवाहित है। यही गहराइयों में उन्होंने अपने सद्गुरु बाबा कबीर की मुस्कराती छबि देखी।

🔵  इस अन्तरदर्शन ने उन्हें जीवन की सार्थकता दे दी। उन्होंने अपने सद्गुरु की प्रेममयी परावाणी को अपने हृदय में सुना- बेटा! जो अपने गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में पहचान लेता है, वही सच्चा शिष्य है। इस घटना के बाद शेख रसूल कबीर के पास काफी दिनों तक नहीं आए। जब किसी ने उन्हें यह बात कही, तो वे जोर से हंस पड़े। उनकी इस हंसी में गुरु की कृपा, और शिष्य साधना का सम्मिलित संगीत था। इस स्वर माधुर्य की स्मृति कैसे बनी रहे? इसकी चर्चा, इसका मनन उन्हें जीवन संगीत का नया बोध देगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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शुक्रवार, 13 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 47) :-- गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में सुनें

🔴  भले ही अभी यह छिपा हो, ढंका हो और यहाँ अभी केवल शून्यता नजर आती हो, पर है यह अवश्य। इसके स्पर्श मात्र से हृदय श्रद्धा, आशा एवं प्रेम से भर उठेगा। स्थिति इसके उलट भी है, यदि हम अपने हृदय को श्रद्धा, आशा एवं प्रेम से से भर दें, तो भी यह दिव्य संगीत हमारे अन्तस में गुंजने लगेगा। ध्यान रहे यदि हमने भूल से पाप के पथ पर पाँव रख दिए तो फिर इस संगीत को कभी भी न सुना जा सकेगा। क्योंकि जो पाप पथ पर चलता है, वह अपने अन्तस की गहराइयों में कभी नहीं उतर पाता। वह अपने कानों को इस दिव्य संगीत के प्रति मूंद लेता है। अपनी आँखों को वह अपनी आत्मा के प्रकाश के प्रति अंधी कर लेता है। उसे अपनी वासनाओं में लिप्त रहना आसान जान पड़ता है।

🔵  तभी वह ऐसा करता है। दरअसल ऐसा व्यक्ति परम आलसी होता है। वह जीवन की ऊपरी पथरीली सतह को ही सब कुछ मान लेता है। उस बेचारे को नहीं मालुम कि जिन्दगी की इस पथरीली की जमीन के नीचे एक वेगवती धारा बह रही है। समस्त कोलाहल के अन्तस में सुरीला संगीत प्रवाहित हो रहा है। यह अविरल प्रवाह न तो कभी रुकता है और न कभी थमता है। सचमुच ही गहरा स्रोत मौजूद है, उसे खोज निकालो। तुम इतना जान लो कि तुम्हारे अन्दर निःसन्देह वह परम संगीत मौजूद है। उसे ढुंढने में लग जाओ, थको- हारो मत। यदि एक बार भी तुम उसे अपने में सुन सके, तो फिर तुम्हें यह संगीत अपने आस- पास के लोगों के अन्तस में झरता- उफनता नजर आएगा।

🔴  इस सूत्र में साधना का परम स्वर है। इसमें जो कहा गया है, जीवन की परिस्थितियाँ उससे एकदम उलट हैं। हमारे जीवन में संगीत नहीं कोलाहल भरा हुआ है। बाहर भी शोर है और अन्तस में भी शोर मचा हुआ है। चीख, पुकारों के बीच हम जी रहे हैं। ऐसे में जीवन के संगीत की बात अटपटी लगती है। लेकिन इस अटपटे पन के भीतर सच है। पर गहरे में उरतने की जरुरत है। गहरे में उतरा जा सके तो ऊपरी दुनियाँ को भी संवारा जा सकता है, सजाया जा सकता है। सन्त कबीर ने भी यही बात अपने दोहे में कही है-

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठि।
मैं बपुरा बुढ़नडरा, रह किनारे बैठि॥
     
यानि कि जो खोजते हैं, वे पाते हैं। पर उन्हें गहरे में डुबकी लगानी पड़ती है। जो डुबने से डरते है, वे तो बस किनारे बैठे रह जाते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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