शनिवार, 16 मई 2026

👉 दूसरों की भावनाओं का भी ध्यान रखिए

अँग्रेजी में एक कहावत है “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें” तुम नहीं चाहते कि कोई तुम्हारे साथ अशिष्ट व्यवहार करे, तुम्हारा अपमान करे, तुम्हारी अवहेलना करे यदि कोई ऐसा करता है तो तुम्हें बुरा लगता है। अतः सोचो कि जैसा तुम्हें इन बातों से बुरा लगता है, वैसे ही यदि तुम दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करोगे तो उन्हें भी बुरा लगेगा। अतः कर्त्तव्य है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। यह साधारण कर्त्तव्य है, समझदारी है, मनुष्यता है। मनुष्य के चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा इसी के द्वारा सम्भव है कि उसका व्यवहार दूसरों के प्रति कैसा होता है। एक संभ्रान्त सज्जन मनुष्य वह है जो कि अपने आश्रितों अपने से दुर्बलों तथा परिस्थितियों से लाचार मनुष्यों के प्रति सहृदयता, उदारता तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करता है। जो किसी के बिगड़े समय तथा उसकी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उससे बेजा फायदा उठाता है, वह और भले ही कुछ हो पर निश्चय ही भला आदमी नहीं हैं।

प्रत्येक से मृदु और शिष्ट व्यवहार करो। इससे दूसरों को तुम्हारे प्रति प्रेम और श्रद्धा होगी। इससे अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा ही लाभ है। अतः यदि पुण्य और परोपकार के भाव से नहीं, निस्वार्थ और त्याग के भाव से नहीं तो व्यक्तिगत लाभ, स्वार्थ व्यवहारिकता की दृष्टि से ही दूसरों के प्रति सदय और विनम्र रहो। लेडी माँटग्यू का कहना है कि शिष्टता में जेब से कुछ खर्च नहीं और वह सब कुछ खरीद लेती है। आप अपने गुरुजनों, बड़ों, बराबर वालो, मित्रों छोटों तथा आश्रितों के प्रति समुचित तथा सद्व्यवहार करेंगे तो उनके लिए तथा अपने लिए आनन्द का स्रोत बहावेंगे। दूसरों को इससे इसलिये प्रसन्नता होती है क्योंकि वे समझते हैं कि आप उनके व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धावान हैं। परन्तु हमें स्वयं तो उनसे भी अधिक हर्ष होता है-इसलिये कि हम में दूसरों के हृदयों को जीत लेने की क्षमता है।

सच पूछा जाय तो अच्छे व्यवहार की शिक्षा हमें स्वयं से प्राप्त होती है। यदि हम समझदार हैं तो अपना ही अनुभव हमें इस स्वप्राप्त शिक्षा की उपादेयता बता देगा। यह शिक्षा किसी स्कूल, कालेज या पुस्तक से इतनी और इतनी अच्छी तरह सीखी जा सकती है जितनी कि स्वयं की बुद्धि से। विनम्र, दयालु, शिष्ट, परोपकारी होने में हमें कौन पैसा खर्चना पड़ता है। केवल इच्छा मात्र की आवश्यकता है। श्री सैमुअल स्माइल्स का कहना है कि समाज में भलमनसाहत का व्यवहार एक उस प्रकाश के शान्त प्रभाव के समान है जो समस्त प्रकृति को रंग देता है। मुखरित शक्ति से यह प्रभाव अधिक शक्तिशाली होता है, कहीं अधिक लाभप्रद है।

साधारण छोटी शिष्टतायें या शिष्टतापूर्ण व्यवहार, जीवन के क्षीण परिवर्तन का आधार बनती हैं। अलग-अलग देखने पर वे बहुत थोड़े मूल्य की जँचेगी, पर उनके एकत्रीकरण में बार-बार दोहराने से वे महत्वपूर्ण बन जाती हैं। वे इसी भाँति साधारण हैं जैसे प्रतिदिन एक पैनी बचाने पर बारह मास में या जीवनभर वैसा करने से क्या महत परिणाम होगा, इस सम्बन्ध में सर्वविदित कहावत वाली बात सामने आती है।

अच्छे श्रोता बनिये। हर मनुष्य अपनी ही कहना चाहता है। कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। आप पहले समझदारी से दिल के साथ उसकी पूरी बात सुन तो लीजिये उसे सब कुछ कह तो लेने दीजिये, उसे अपना हृदय तो हल्का कर लेने दीजिये। एक बार उसे मनमानी कह लेने दीजिये। फिर तो आपका बिना मोल का गुलाम हो जायगा। और तब आप उससे चाहे जो कुछ कहेंगे वह ध्यान और प्रेम से आपकी बातें सुनेगा और मानेगा।

वैसे ही दूसरों की सम्मति का आदर कीजिये। कुछ लोग दूसरों की सन्मति सुनना ही नहीं चाहते आपको उससे मतभेद हो सकता है, पर आपमें सहनशीलता तो होनी ही चाहिये। ‘सुने सब की करे मन की’ में भी यही बात बताई गई है। आपको विरोध ही, मतभेद प्रकट करना है तो खूबसूरती से मिठास से, समझदारी से प्रकट करना चाहिये। यह तो आपके हाथ में है। अपने इतिहास में हमने पढ़ा है कि एक महान् यवन सम्राट की लिखी हुई बातों को एक व्यक्ति ने गलत बनाया। सम्राट ने उसके कहे अनुसार परिवर्तन कर दिया। उसके जाने के बाद महामन्त्री ने पूछा आपने ऐसा क्यों किया जबकि आप जानते थे कि आप ठीक थे। सम्राट ने कहा मुझे अपनी बात पर विश्वास था। उसके जाने के बाद मैं फिर पहले का जैसा रहने दूँगा। पर उसके कहे अनुसार करने से मेरी कुछ हानि नहीं हुई और उसको आत्मिक प्रसन्नता हुई होगी। अब आप ही सोचिये यदि उक्त मनुष्य को सम्राट की इस उदारता का जब पता चला होगा तो वह सदा को उनके हाथों बिक गया होगा। उक्त उदाहरण दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो की महत्ता का द्योतक है। सिद्धान्तों और सम्मतियों पर दृढ़ता के साथ स्थिर रहना बुरा नहीं है पर यह काम विनम्रता और स्नेहपूर्वक भी किया जा सकता है, न कि जोर जबरदस्ती लड़ झगड़ कर, घूसों और गालियों के बल पर। कड़े शब्द तथा व्यंग ऐसे है जिनकी चोट का जख्म कभी नहीं भरता। प्रत्येक वस्तु में अपनी आत्मीयता स्थापित करो। दूरी और परायापन अच्छी बात नहीं है। हो सकता है जिसे आज तुम गैर, दूसरा और विरोधी समझ रहे हो, ठीक से देखने-परखने पर तुम्हें अपना और निकट का ही लगे। शर्त केवल एक है, अपनी ही मत हाँके जाओ। अपनी ही भावनाओं इच्छाओं, विचारों का ध्यान मत करो। दूसरों की भावनाओं, विचारों का भी ध्यान रखो। एक बार एक अंग्रेज उपदेशक ने एक सुन्दर चुटकुला कहा। यह वह था- एक दिन प्रातः जब धुन्ध छाया था मैं पर्वत पर जा रहा था। दूर पर्वत पर एक विचित्र सी लगती हिलती-जुलती वस्तु मुझे दीखी जो राक्षस की भाँति मुझे लगी। परन्तु जब मैं अधिक निकट आ गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह एक मनुष्य था। और जब मैं उसके बहुत निकट पहुँच गया तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह तो मेरा ही भाई है।

दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने पर तुम उसके निकट पहुँच सकोगे। उसकी आत्मीयता के कारण तुम उसके वास्तविक, सच्चे रूप को पहचानने में अधिक समर्थ होंगे। अतः संसार को अपने अनुकूल कर लेने का, जीवन में सदा सफलता पाने का दूसरों के हृदयों को जीतने का, स्वार्थ और परमार्थ दोनों के लिये यह आवश्यक है कि तुम दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखो। गरीब, अमीर, विद्वान, मूर्ख, राजा, पुरोहित, व्यापारी, विद्यार्थी, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, युवा सभी के लिए सुलभ है कि वे सहृदय, सरल, सरस सहानुभूतिपूर्ण, सच्चा और खुला हुआ हृदय सबके लिए रखें। यह एक ईश्वरीय वरदान है। जो दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना जानते हैं उनमें ये समस्त गुण स्वतः आ जाते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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👉 इस पवित्र देह से पाप मत कीजिए

मनुष्य का पतन शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से होता है। हमको जिस प्रकार शरीर और व्यवहार सम्बन्धी विषयों में सावधान रहने की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानसिक दोषों से भी सतर्क रहना आवश्यक है। मानसिक दोष सूक्ष्म इन्द्रियों के विषय होने के कारण अधिक कठिनता से दूर किये जा सकते हैं। मानसिक दोष ही वास्तविक पाप हैं और उनसे प्रत्येक क्षण सावधान रहना बचे रहना परमावश्यक है।

काम क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असंयम, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा मनुष्य में रहने वाले ये बाहरी दोष तनिक सा अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।
मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक-एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आक्रमण करता है।”

अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चंचल और आश्रित की रक्षा न करने वाले ये 6 प्रकार के मनुष्य पापी होते हैं। महान संकट के पड़ने पर भी जो निडर होकर पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाले, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी ये सात तथा पहले के छः ये तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस कहे गये हैं। इनसे सावधान रहें?

मनुष्य प्रायः तीन तरह से पाप में प्रवृत्त होता है। (1) शरीर (2) वाणी और (3) मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं। विभिन्न अवस्थायें और स्तर हो सकते हैं। ये प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रक्खें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुये बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाए और पाप पथ पर चले जायं।

शरीर के पापों में से समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं। जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कंचन तुल्य काया में ऐसे विचार उपस्थिति हो जाते हैं जिनसे जीवित अवस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणायें प्राप्त करता है।

हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं, तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद् ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना। हिंसक की आत्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसकी मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष की अग्नि निकला करती है।

चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती, रिश्वत आदि तो स्थूल रूप में चोरी है ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, या सहायता या वस्तु देने आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। इसलिये ये कार्य अनिष्टकारी एवं त्याजनीय हैं।

व्यभिचार मानवता का सबसे निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य-पाप-पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनायें सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान् दुःख होता है। मनुष्य आत्म उन्नति का रोगी बन जाता है, जिससे आत्मा तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक सुख, बाल बच्चों, पत्नि का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है। परमपिता परमात्मा ने यह मनुष्य देह सुकार्य करने के लिए दी है। इसलिए इस जीवन में अच्छे कर्म ही करते रहना चाहिये जिनसे आत्मा का कल्याण हो। तथा साथ ही समाज का भी भला हो, जिससे सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो सके।

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