संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे मशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।
तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।
संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।
अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pt Shriram Sharma Acharya,
आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।
.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970
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