गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 1)

संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे मशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।

तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।

संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pt Shriram Sharma Acharya, 

आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970

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👉 हम सद्गुणों का उपार्जन क्यों न करें? (भाग 1)

संयम एक प्रकार का अनुशासन है जो साधक में वैराग्य लाता है और उसे योग-पथ पर अग्रसर होने में सहायता प्रदान करता है। यम अथवा आत्मनिग्रह का अभ्यास ही संयम है। यही सारे सद्गुणों का अधिष्ठान है।

संयम ही रोगों के विरुद्ध दृढ़तम चहार दीवारी है यही सारी व्याधियों से सुरक्षित रखता है। इससे सुन्दर स्वास्थ्य शक्ति बल तथा वीर्य की प्राप्ति होती है।

एक सप्ताह के लिए चाय, काफी अथवा धूम्रपान करना बन्द कर दो। इससे तुम्हारी इच्छाशक्ति बलवती होगी जिससे संयम कार्य में मदद मिलेगी। अन्य संयम तुम्हारे लिए सरलतर हो जायेंगे।

संयम का लक्ष्य मन को निम्न पाशवीय अभिरुचियों से ऊपर उठाना ही है। इससे निश्चय ही आत्मपरिष्कार में सहायता मिलती है।

नियताहार, संयम, उपवास, आत्मनियन्त्रण, आत्म-निग्रह, आत्मसंयम, परिमितता ये सब पर्यायवाची हैं।

मदोन्मत्तता, आत्यंतिकता, उद्भ्रान्तता, उन्माद, आत्म-तृप्ति, इन्द्रिय परायणता, लम्पटता, ये सब संयम के विपरीतार्थक शब्द हैं।

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं | Aatmvishwas Kaise Badhaye | https://youtu.be/Av3k4y9QHKE?si=fQDFCkLMpz8EPnzi

भोजन बन्द कर देना भोजन से संयम कहलाता है। अल्पाहार करना ही नियताहार है। अनाहार कभी एक बार कर लिया जाता है परन्तु अल्पाहार अभ्यास की वस्तु है। इच्छित वस्तु का परित्याग ही आत्म-निग्रह है। अनिच्छित वस्तु का परित्याग भी संयम ही है। नियमित समय तक, साधारणतः धार्मिक व्रतों में, भोजन न करना उपवास कहलाता है। युक्ति पूर्वक कुछ विशेष वस्तुओं का सीमित सेवन तथा कुछ का पूर्ण परित्याग ही परिमितता है। हम लोग दुर्गुणों में संयम तथा भोजन में मिताहार का प्रयोग करते हैं।

यह एक सुन्दर सद्गुण है कि एक मनुष्य दूसरों के साथ चाहे उनकी प्रकृति कैसी भी क्यों न हो, अपने को व्यवस्थित तथा उपयुक्त बनाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए यह सर्वोत्तम तथा अनिवार्य सद्गुण है। शनैःशनैः इसका उपार्जन करना आवश्यक है। बहुसंख्यक-जन इसे नहीं जानते कि किस प्रकार दूसरों के साथ अपने को उपयुक्त बनावें। दूसरों के हृदय पर शासन करने के लिए तथा अन्ततः जीवन संग्राम में विजयी होने के लिए यथा काल व्यवस्था एक विचित्र सद्गुण है।

पत्नी नहीं जानती कि पति के साथ किस प्रकार अनुकूल बर्ताव करना चाहिये। वह सदा अपने पति को अप्रसन्न रखती है, घर में झगड़े का कारण बनती है और अन्ततः पति द्वारा परित्यक्त होती है। किरानी नहीं जानते कि अपने मालिक के साथ किस प्रकार व्यवहार करें। वह उससे झगड़ पड़ता है और शीघ्र ही अपनी करनी का फल भोगता है। शिष्य नहीं जानता कि गुरु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। व्यापारी नहीं जानता कि किस प्रकार वह ग्राहकों के साथ व्यवहार करे। फलतः वह अपने व्यापार तथा ग्राहकों से वंचित रह जाता है। दीवान यदि नहीं जानता कि महाराजा के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए तो उसको नौकरी से अलग होना पड़ता है। यथा काल व्यवस्था के ऊपर संसार आधारित है। जो इस कला अथवा विज्ञान को जानता है वह संसार में सकुशल निवास करता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सुखी रहता है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जून 1959

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 April 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 April 2026


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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 1)

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