शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 हे महाकाल!

हे महाकाल! तुम्हारी यह कैसी लीला है? आज लाखों आदमी निर्दयता से मारे जा रहे है, करोड़ों आदमी भूखों मर रहे हैं, उन्हें रात में सोने को भी जगह नहीं हैं, जीवनोपयोगी पदार्थों का ध्वंस हो रहा है मनुष्य मनुष्य को खाये जा रहा है, यह सब क्या है! तुम्हारी संहार लीला असमय में ही ऐसा प्रलयंकर रूप क्यों धारण कर रही है?

क्या कहते हो? यह मनुष्य के पापों का ही फल है? मनुष्य दल बाँधकर जब दूसरे मनुष्यों को देशों और वर्गों को चूस डालना चाहता है तब उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।

हे भयंकर! आदमियत पढ़ाने का तुम्हारा यह तरीका बड़ा निर्दय है पर क्या तुम समझते हो कि आदमी में इस प्रकार शैतानियत बढ़ाकर नंगा चित्र खींचकर तुम उसे दूर कर सकोगे? अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ, शैतानियत बढ़ती ही जा रही है।

क्या कहते हो? जब तक आँच से लोहा गलेगा नहीं तब तक ढाला न जायगा! क्या इसीलिये मनुष्य जाति को इस प्रकार भट्टी में झोंके जाते हो। क्या मनुष्य जाति के भाग्य में और भी भयंकर विपदाएं वदी हैं? पर करोड़ों आदमी इतने में भी घबरा उठे है- उन्हें अभी भी यह सब असह्य है!

क्या कहते हो? जब वेदना असह्य होगी तब सब गल जायेंगे? क्या तभी अक्ल आयेगी? पर बहुतों को अक्ल आ चुकी है-वे गल भी गये हैं। अब तो थोड़े के पीछे बहुतों को गलना पड़ा रहा है।

ऐ! क्या कहते हो! बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है? तो क्या जब तक थोड़े न गलेंगे तब तक बहुतों को भी गलना पड़ेगा! हे न्याय मूर्ति! बात तो सच कहते हो। संसार पर शैतानियत का ताँडव करने वाले मुट्ठीभर लोग ही है, पर उनको उन लोगों का भी पीठ बल है जो उनकी शैतानियत से पिस रहे हैं। इन लड़ाकू स्वभाव के लोगों के पीछे उन मजबूरों, गरीबों तक का बल है जो खुद पूँजीवाद से कराह रहे हैं! पर दूसरे देशों के गरीबों को सताने में अपने नेताओं का साथ दे रहे हैं। तब तुम्हारा कहना ठीक ही है कि भस्म होकर भी बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है। पर हे शिव, ऐसे भी तो लोग हैं देश हैं जिनके न थोड़े न बहुत, किसी को पीसना नहीं चाहते है वे तो गले हुए हैं उन्हें भट्टी में क्यों डाल रक्खा है?

क्या कहा? वे कच्चा लोहा हैं? उनमें बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे जलाकर नष्ट कर देना है। तो क्या उन्हें भी बहुत देर तक भट्टी में रहना पड़ेगा? हे शंकर यह क्या कहते हो? वे तो बहुत निर्बल हैं, दीन हैं, न्याय चाहते हैं। उन्हें यह दण्ड क्यों?

क्या कहते हो! निर्बलता का नाम या संयम नहीं है! ओह! तुम बड़े कठोर हो। पर मैं मानता हूँ कि तुम्हारे कहने में जरा भी झूठ नहीं है। निर्बल निर्बल नरों को चूसते हैं वहाँ हैवानियत है-संयम नहीं है। जब तक हैवानियत भस्म न हो जायेगी तब तक तुम उन्हें भी भट्टी में झोंके रहोगे। हे महादेव! तुम्हीं सत्य हो। जैसा समझो करो। तुम महाकाल हो, अनन्त हो। हम चार दिन के कीड़े तुम्हारी अनन्त गम्भीर, अनन्त उन्नति और अनन्त व्यापक नीति को क्या समझें! -संगम

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 10

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 3 April 2020


👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग २)

यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है। इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग २)

चतुरंगिणी सेनाएं शत्रुओं का संहार करने के लिये कूच कर रही हैं, रोगों को मिटा देने के लिए वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं बड़े-बड़े अनुसन्धान कर रही हैं, आर्थिक कष्टों को मिटाने के लिए अर्थशास्त्री प्रयत्नशील हैं, राजनैतिक दिमाग लगे हुए हैं। वे लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों में बड़े परिश्रम और जाँ किसानी के साथ लगे हुए हैं। कर्तव्य निष्ठा सराहनीय वस्तु है। जो लोग वर्तमान महा विपत्तियों का समाधान करने के लिए कार्य कर रहे हैं, वे सचमुच प्रशंसा के पात्र हैं। आग लगने पर उसे बुझाने का प्रयत्न करना हर एक विचारशक्ति रखने वाले का परम पवित्र कर्तव्य है। हिन्दू धर्म शास्त्रों की ऐसी आज्ञा है कि सामूहिक आपत्ति को निवारण करने में हर एक मनुष्य को सहयोग देना चाहिए, अन्यथा घोर पाप का भागी होना पड़ता है।

कहीं आग लगने पर जो बालक, रोगी या असमर्थ उसे बुझाने के लिए जाने में समर्थ नहीं होते उन्हें पाँच कदम उस दिशा में चल कर पाँच मुट्ठी रेत और एक लोटा पानी फैलाकर प्रायश्चित्त कर लेने का विधान है। आज संसार में आग लग रही है, जिसकी ज्वाला में देश के देश और परिवार के परिवार जले जा रहे हैं, इस अग्नि को बुझाने में जो लोग आना-कानी करते हैं, अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते, वे निःसन्देह एक महान पाप के भागी होते हुए अपने लिए घोर गौरव नरक का निर्माण करेंगे।

भौतिक और शारीरिक दृष्टि से किसे क्या करना चाहिए, इस पर हम अधिक प्रकाश नहीं डालेंगे, क्योंकि अनेक सूत्रों से उन कर्तव्यों की जानकारी पाठकों को प्राप्त होती रहती है। हमें तो उस मूल कारण के सम्बन्ध में कुछ कहना है, जिसके कारण यह सारी विपत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं। तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भौतिक उपकरण प्रयोग होते हैं। पर स्थायी शान्ति के लिए उन आध्यात्मिक शस्त्रों की आवश्यकता हैं, जिनसे अधर्म की सारी किलेबन्दी को ढहा कर विस्मार कर दिया जाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1