शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 Feb 2017


👉 ..और आखिर गुरुदेव ने सुनी उनकी बात

🔴 नवयुग के निर्माण के लिये युग शिल्पियों की जो विशाल सेना युगऋषि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने खड़ी की है, उसके एक सजग और समर्पित सेनानी हैं श्री  विजय शर्मा। वे गया में उप कृषि निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। जुलाई, २०१० के तीसरे सप्ताह में श्री शर्मा की तबीयत अचानक खराब हो गई। वह भी इस हद तक कि घर में कोहराम मच गया। उन्हें तुरन्त ही शहर के एक बड़े क्लीनिक में ले जाया गया। सघन जाँच हुई और ई.सी.जी. तथा टीएमटी की रिपोर्ट से इसके स्पष्ट संकेत प्राप्त हुए कि श्री शर्मा कॉरोनरी आर्टरी डिजीज़ के मरीज हैं। स्थिति इसलिए भी खतरनाक मानी गई कि यह उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह के पुराने रोगी हैं।

🔵 दिनांक २३ जुलाई को श्री शर्मा जी का एन्जियोग्राफी मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट, फरीदाबाद में डॉ. नीरज जैन, डी.एम., कॉर्डियोलॉजिस्ट के द्वारा किया गया। श्री शर्मा एन्जियोग्राफी के तीन- चार दिन पहले से ही इस बात को लेकर चिंतित थे कि यदि एन्जियोप्लास्टी अथवा बाईपास सर्जरी कराना पड़ा, तो इसका व्यय भार वहन करना उनके लिए कहीं से भी सम्भव नहीं हो पायेगा। दूसरा संकट यह भी था कि इतनी लम्बी छुट्टी विभाग से कैसे मिलेगी। चिन्ता जब चरम पर पहुँच गई, तो उन्होंने परम पूज्य गुरुदेव की सुपुत्री स्नेहसलिला शैलबाला पण्ड्या से फोन पर सम्पर्क करके अपनी परेशानी बताई, तो आदरणीया शैल जीजी ने कहा- आप चिन्ता मत करिए। गुरुजी सब सम्हाल लेंगे। सब कुछ नॉर्मल होगा।

🔴 उसी रात सोने से पहले ध्यान लगाकर उन्होंने पूज्य गुरुदेव से द्रवित मन से प्रार्थना की। उन्होंने कहा - गुरुदेव! इतने महँगे इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं, दफ्तर से छुट्टी भी नहीं मिलेगी। मैं बहुत मुश्किल में हूँ। कुछ ऐसा कीजिए, गुरुदेव! कि  सिर्फ  एक ही दिन में मेरी चिकित्सा पूरी हो जाय और इलाज में अधिक से अधिक ३०,००० रुपये खर्च हों।

🔵 .... और सचमुच परम पूज्य गुरुदेव ने उनकी बात सुन ली। इलाज एक ही दिन में हो गया और खर्च हुए मात्र २३,००० रुपये। २३ जुलाई, २०१० को जब शर्मा भाई साहब ने एन्जियोग्राफी करवाया, तो रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य निकला। मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट शत- प्रतिशत सामान्य पाई गई। दिनांक ७ सितम्बर को श्री शर्मा जी ने जब आदरणीया जीजी से हरिद्वार आकर मुलाकात की, तो जीजी ने आतुरता से उनकी कुशल- क्षेम पूछी। जाँच की रिपोर्ट के बारे में जानने के बाद उन्होंने गहरी साँस लेते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह सब गुरुदेव की लीला है, पर उनकी आँखें साफ बोल रही थीं कि गुरुदेव अपने अंग अवयवों की रक्षा में संसार की सीमाओं को भी लांघ जाते हैं।

🌹 नीरज तिवारी पूर्वजोन, शांतिकुंज, हरिद्वार(उत्तराखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 4)

🌹 सर्वोपरि उपलब्धि-प्रतिभा    
🔴 प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारण जनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है, उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है; किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर और अपनी छत्र-छाया के सम्पर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं।        

🔵 प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं, जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है। वे ऊर्जा और आभा के स्वयं तो उद्गम होते ही हैं, अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं, वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर को शक्ति-पुञ्ज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही है। प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्त:करण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ यही है। जो इससे वञ्चित रह गया, उसे मार्ग ढूँढ़ने का अवसर नहीं मिलता। मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जिस-तिस के पीछे चलकर, जहाँ भाग्य ले पहुँचाता है, वहाँ जाकर, ऐसा व्यक्ति अशक्त परावलम्बियों जैसा जीवन जीता है। कठिनाइयों के समय यह मात्र घुटन अनुभव करता और आँसू भर बहाकर रह जाता है।

🔴 संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गई-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। निजी समर्थता का अभाव देखकर उन पर विपन्नता और प्रतिगामिता के अनेक उद्भिज चढ़ दौड़ते हैं। दुर्व्यसन दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं और उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे भारभूत लोग अपने लिए, साथी-सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पञ्जे फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकञ्जे कसते हैं। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आँकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपने को अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कन्धों पर लादकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विनयात् याति पात्रवाम्

🔴 विनयशीलता, नम्रता, सौम्यता व्यक्तित्व को उच्च स्थिति प्रदान करते है। लोगों के अंतःकरण जीतने का सबसे सरल मंत्र है कि हमारा जीवन, हमारा व्यवहार अत्यंत विनम्र हो।

🔵 यह धारणा डॉ० राजेंद्र प्रसाद की थी। जो अपनी विनम्रता के बल पर ही कम शिक्षा, अत्यंत सादगी, वहुत सरल विचारों के होते हुए भी, इस देश के सर्वप्रथम राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और जब तक रहे उसी आदर भावना से उच्च पद पर प्रतिष्ठित रखे गए।

🔴 सामान्य लोगों में बडे़ और जिनसे स्वार्थ सधता हो उन्हीं तक विनम्र होने का संकीर्ण स्वभाव रहता है। आफिस में अफसर के सामने बहुत उदार हो जाते हैं, पर घर में पत्नी, बच्चे, नौकर के सामने ऐसे अकड़ भरते है जैसे वह कोई सेनापति हो, और वैसा करना आवश्यक हो, जिसने विनम्रता-सौम्यता त्यागी, उसने अपना जीवन जटिल बनाया प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और सद्भाव का आनंद गँवाया। यदि इस जीवन को सफल, सार्थक और आनंदयुक्त रखना है तो स्वभाव उदार होना चाहिए। यह मनुष्यता की दृष्टि से भी आवश्यक है कि दूसरों से व्यवहार करते समय शब्दों और भाव-भंगिमाओं से कटुता प्रदर्शित न की जाए।

🔵 राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति जीवन की एक घटना है। उनकी हजामत के लिये जो नाई आया करता था, उसके हाथ-मुँह साफ नही रहते थे। गंदगी किसी को भी अच्छी नहीं लगती, तो फिर वह क्यों पसंद करते 'उन्होंने नाई से कहा आप हाथ-मुँह साफ करके आया करे। यह कहते हुए उन्होंने शब्दो में पूर्ण सतर्कता रखी। जोर न देकर शिष्ट भाव अधिक था, तो भी उन सज्जन पर इन शब्दों का कोई प्रभाव न पडा। वे अपने पूर्व क्रमानुसार ही आते रहे।

🔴 राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति थे। अपने अधिकारियों से वे कठोर शब्दों में कहला सकते थे। यह भी संभव था कि नाई बदलवाकर किसी स्वच्छ साफ-सुथरे नाई की व्यवस्था कर लेते, पर मानवीयता की दृष्टि से उन्होंने इनमें से किसी की आवश्यकता नहीं समझी। एक व्यक्ति को सुधार लेना अच्छा, उसे बलात् मानसिक कष्ट देना या बहिष्कार करना अच्छा नहीं होता। मृदुता और नम्र व्यवहार से पराए अपने हो जाते हैं तो फिर अपनों को अपना क्यों नही बनाया जा सकता।

🔵 पर अब उन्हें इस बात का संकोच था कि दुबारा कहने से उस व्यक्ति को कहीं मानसिक कष्ट न हो। कई दिन उनका मस्तिष्क इन्हीं विचारों में घूमता रहा। यह भी उनका बडप्पन ही था कि साधारण-सी बात को भी उन्होंने विनम्रतापूर्वक सुलझाने में ही ठीक समझा।

🔴 दूसरे दिन नाई के आने पर बडी़ विनम्रता से बोले- आपको बहुत परिश्रम करना पड़ता होगा, उससे शायद वहाँ समय न मिलता होगा, इसलिए यहाँ आकर हाथ-मुँह धो लिया करे।

🔵 नाई को अपनी गलती पर बडा दुःख हुआ, साथ ही वह राजेंद्र बाबू की सहृदयता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अनुभव किया कि छोटी-छोटी बातों की उपेक्षा करने से ही डॉट-फटकार सुननी पडती है, पर विनम्रता से तो उसे भी ठीक किया जा सकता है। उसने उस दिन से हाथ-मुँह धोकर आने का नियम बना लिया। फिर कोई शिकायत नहीं हुई और न कोई कटुता ही पैदा हुई।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 48, 49

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Feb 2017

🔴 भाग्यवाद का नाम से कर अपने जीवन में निराशा निरुत्साह के लिए स्थान मत दीजिए। आपका गौरव निरन्तर आगे बढ़ते रहने में है। भगवान् का वरद-हस्त सदैव आपके मस्तक पर है। वह तो आपका पिता अभिभावक, संरक्षक, पालक सभी कुछ है। उसकी अकृपा आप पर भला क्यों होगी? क्या यह सच नहीं है कि उसने आपको यह अमूल्य मनुष्य शरीर दिया है। बुद्धि दी है, विवेक दिया है। कुछ अपनी इन शक्तियों से भी काम लीजिए, देखिए आपका भाग्य बनता है या नहीं? भाग्य सदैव पुरुषार्थ का ही साथ देता है।

🔵 दुर्भाग्य के प्रमुख कारण मनुष्य के मनोविकार हैं। इन्हीं के जीवन बर्बाद होता है। काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि के द्वारा ही मनुष्य का जीवन अपवित्र बनता है। संक्षेप में इसी को ही दुर्भाग्य की संज्ञा दी सकती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह इन्द्रिय, मन और बुद्धि की अस्वच्छता को शुद्ध बनाने का सदैव अभ्यास करता रहे, इससे वह भविष्य सुन्दर बना सकता है। अनावश्यक वस्तुओं के अधिक से अधिक संचय को ही भाग्य नहीं कहते। वह मनुष्य जीवन में अच्छाइयों का विकास है, इसी से उससे शाश्वत सुख और शान्ति की उपलब्धि होती है। सत्कर्मों का आश्रय ही एक प्रकार से सौभाग्य का निर्माण करता है।

🔴 कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री—सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे उपलब्ध हो, वही सच्चा भाग्यशाली है और इसके लिए किसी दैव के भरोसे नहीं बैठना पड़ता। कर्मों का सम्पादन मनुष्य स्वयं करता है। अतः अपने अच्छे-बुरे भाग्य का—निर्णायक भी वही है। अपने भाग्य को वह कर्मों द्वारा बनाया-बिगाड़ा करता है। हमारा श्रेय इसमें है कि सत्कर्मों के द्वारा अपना भविष्य सुधार लें। जो इस बात को समझ लेंगे और इस पर आचरण करेंगे उनको कभी दुर्भाग्य का रोना नहीं रोना पड़ेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 20)

🌹 विचारों का व्यक्तित्व एवं चरित्र पर प्रभाव

🔴 इसके विपरीत जो स्वास्थ्य सम्बन्धी सद्विचारों की साधना करते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र चंगे हो जाया करते हैं। रोगी इस प्रकार सोचने के अभ्यस्त होते हैं। वे उपचार के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभकर लेते हैं— मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार ठीक-ठीक पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-दिन मेरा रोग घटता जाता है और मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव करता हूं। मेरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने में अब ज्यादा देर नहीं है। इसी प्रकार जो निरोग व्यक्ति भूलकर भी रोगों की शंका नहीं करता और अपने स्वास्थ्य से प्रसन्न रहता है। जो कुछ खाने को मिलता है, खाता और ईश्वर को धन्यवाद देता है, वह न केवल आजीवन निरोग ही रहता है, बल्कि दिन-दिन उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है।

🔵 जीवन की उन्नति और विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है। जो व्यक्ति दिन रात यही सोचता रहता है कि उसके पास साधनों का अभाव है। उसकी शक्ति सामर्थ्य और योग्यता कम है, उसे अपने पर विश्वास नहीं है। संसार में उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। विपरीत परिस्थितियां सदैव ही उसे घेरे रहती हैं। वह निराशावादी व्यक्ति जीवन में जरा भी उन्नति नहीं कर सकता। फिर चाहे उसे कुबेर का कोष ही क्यों न दे दिया जाय और संसार के सारे अवसर ही क्यों न उसके लिए सुरक्षित कर दिये जाय।

🔴 इसके विपरीत जो आत्म-विश्वास, उत्साह, साहस और पुरुषार्थ भावना से भरे विचार रखता है। सोचता है कि उसकी शक्ति सब कुछ कर सकने में समर्थ है। उसकी योग्यता इस योग्य है कि वह अपने लायक हर काम कर सकता है। उसमें परिश्रम और पुरुषार्थ के प्रति लगन है। उसे संसार में किसी की सहायता के लिए बैठे नहीं रहना है। वह स्वयं ही अपना मार्ग बनायेगा और स्वयं ही अपने आधार पर, उस पर अग्रसर होगा—ऐसा आत्मविश्वासी और आशावादी व्यक्ति अभाव और प्रतिकूलताओं में भी आगे बढ़ जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 2)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हमारी सरकार भगवान् है और मनुष्य के पास जो कुछ भी विभूतियाँ, अक्ल और विशेषताएँ हैं, वे अपनी व्यक्तिगत ऐय्याशी और व्यक्तिगत सुविधा और व्यक्तिगत शौक- मौज के लिए नहीं हैं और व्यक्तिगत अहंकार की तृप्ति के लिए नहीं है। इसलिए जो कुछ भी उसको विशेषता दी गई है। उसको उतना बड़ा जिम्मेदार आदमी समझा जाए और जिम्मेदारी उस रूप में निभाए कि सारे के सारे विश्व को सुंदर बनाने में, सुव्यवस्थित बनाने में, समुन्नत बनाने में उसका महान् योगदान संभव हो।

🔵 भगवान् का बस एक ही उद्देश्य है- निःस्वार्थ प्रेम। इसके आधार पर भगवान् ने मनुष्य को इतना ज्यादा प्यार किया। मनुष्य को उस तरह का मस्तिष्क दिया है, जितना कीमती कम्प्यूटर दुनिया में आज तक नहीं बना। करोड़ों रुपये की कीमत का है, मानवीय मस्तिष्क। मनुष्य की आँखें, मनुष्य के कान, नाक, आँख, वाणी एक से एक चीज ऐसी हैं, जिनकी रुपयों में कीमत नहीं आँकी जाती है। मनुष्य के सोचने का तरीका इतना बेहतरीन है, जिसके ऊपर सारी दुनिया की दौलत न्यौछावर की जा सकती है।

🔴 ऐसा कीमती मनुष्य और ऐसा समर्थ मनुष्य- जिस भगवान् ने बनाया है, उस भगवान् की जरूर ये आकांक्षा रही है कि मेरी इस दुनिया को समुन्नत और सुखी बनाने में यह प्राणी मेरे सहायक के रूप में, और मेरे कर्मचारी के रूप में, मेरे असिस्टेण्ट के रूप में मेरे राजकुमार के रूप में काम करेगा और मेरी सृष्टि को समुन्नत रखेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/11

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 28)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 हेय स्तर में गिने जाने वाले पशु-पक्षियों को कोई नीति मर्यादा मान्य नहीं होती। गिद्ध, कौए और सियार कुछ भी पशुओं को न तो पत्नी और भगिनी-पुत्री के बीच अन्तर करना आता है, और न बीच चौराहे पर यौनाचार करने में कुछ अनुपयुक्त लगता है। इन प्राणियों का कहीं मल-मूत्र त्यागने में भी हिचक नहीं लगती। वे किसी का भी खेत खा सकते हैं। छोटे जल जन्तुओं को बगुले बिना कोई दया भाव दर्शाए नि:संकोच भाव से निगलते रहते हैं। यह एक निराली दुनिया है और उसकी अपनी सीमाएँ हैं, पर मनुष्य तो कुछ विशेष उपलब्धियाँ लेकर जन्मा है। उसकी गरिमा को सृष्टि में सर्वोच्च ठहराया गया है। ऐसी दशा में उसके कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ भी आती हैं और कड़ी मर्यादाओं का परिपालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन भी आवश्यक हो जाता है।     

🔴 किसी के पास तलवार होने का तात्पर्य यह तो नहीं कि वह कहीं भी कत्लेआम कर डाले? अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करके रख दें? अनीति बरतने के लिए उसे स्वेच्छाचार का लाइसेंस मिला हुआ नहीं है। इस स्तर की चतुरता अपना लेने का प्रतिफल यह तो नहीं होना चाहिए कि वह आत्मा और परमात्मा की आँखों में धूल झोंककर, अहंकार से उन्मत्त होकर, अपने क्रिया-कलापों से वातावरण को उद्वेगों और अनाचारों से भर दे?      

🔵 दृष्टि पसार कर जिस ओर भी देखा जाये, उसी ओर समस्याओं, उलझनों, विडम्बनाओं, विपत्तियों, विग्रहों, विद्रोहों और संकटों के घटाटोप उमड़ते-उभरते दिखाई देते हैं। जिस प्रकृति का पयपान करके, जिसकी गोद में हम सब क्रीड़ा कल्लोल कर रहे थे। आश्चर्य है कि हम उसी की गर्दन घोंट डालने के लिए उतारू हो गये? जहाँ से हम अन्न-जल और वनस्पति प्राप्त करके जीवन धारण किये रहा करते थे, वह सम्पदा जिसके साथ हमारा सम्बन्ध सहोदर भाई जैसा है, यदि उसे इसी प्रकार नष्ट करते चले गए तो अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह हमारा जीवन भी स्थिर न रह सकेगा।

🔴 भूगर्भ का असीम उत्खनन उसे बाँझ बनाकर छोड़ेगा। जलाशयों की सम्पदा को मारक तत्त्वों से भरते कारखाने, पीने योग्य पानी छोड़ेंगे भी या नहीं? आकाश-वायुमण्डल जिस प्रकार प्रदूषण से, विकिरण से, कोलाहल से निरन्तर भरता चला जा रहा है, उससे पृथ्वी का रक्षा कवच फट रहा है और बाढ़ हुआ तापमान हिम क्षेत्रों को पिघलाकर समुद्र में ऐसी बाढ़ लाने का ताना-बाना बुन रहा है, जिससे जितना थल भाग अभी भी बचा है, उसका अधिकांश भाग उस बाढ़ में समा जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...