शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 28)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए

🔵 हेय स्तर में गिने जाने वाले पशु-पक्षियों को कोई नीति मर्यादा मान्य नहीं होती। गिद्ध, कौए और सियार कुछ भी पशुओं को न तो पत्नी और भगिनी-पुत्री के बीच अन्तर करना आता है, और न बीच चौराहे पर यौनाचार करने में कुछ अनुपयुक्त लगता है। इन प्राणियों का कहीं मल-मूत्र त्यागने में भी हिचक नहीं लगती। वे किसी का भी खेत खा सकते हैं। छोटे जल जन्तुओं को बगुले बिना कोई दया भाव दर्शाए नि:संकोच भाव से निगलते रहते हैं। यह एक निराली दुनिया है और उसकी अपनी सीमाएँ हैं, पर मनुष्य तो कुछ विशेष उपलब्धियाँ लेकर जन्मा है। उसकी गरिमा को सृष्टि में सर्वोच्च ठहराया गया है। ऐसी दशा में उसके कन्धों पर कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ भी आती हैं और कड़ी मर्यादाओं का परिपालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन भी आवश्यक हो जाता है।     

🔴 किसी के पास तलवार होने का तात्पर्य यह तो नहीं कि वह कहीं भी कत्लेआम कर डाले? अतिरिक्त बुद्धिमत्ता का तात्पर्य यह तो नहीं हो सकता कि इसके सहारे संसार की सुव्यवस्था को बर्बाद करके रख दें? अनीति बरतने के लिए उसे स्वेच्छाचार का लाइसेंस मिला हुआ नहीं है। इस स्तर की चतुरता अपना लेने का प्रतिफल यह तो नहीं होना चाहिए कि वह आत्मा और परमात्मा की आँखों में धूल झोंककर, अहंकार से उन्मत्त होकर, अपने क्रिया-कलापों से वातावरण को उद्वेगों और अनाचारों से भर दे?      

🔵 दृष्टि पसार कर जिस ओर भी देखा जाये, उसी ओर समस्याओं, उलझनों, विडम्बनाओं, विपत्तियों, विग्रहों, विद्रोहों और संकटों के घटाटोप उमड़ते-उभरते दिखाई देते हैं। जिस प्रकृति का पयपान करके, जिसकी गोद में हम सब क्रीड़ा कल्लोल कर रहे थे। आश्चर्य है कि हम उसी की गर्दन घोंट डालने के लिए उतारू हो गये? जहाँ से हम अन्न-जल और वनस्पति प्राप्त करके जीवन धारण किये रहा करते थे, वह सम्पदा जिसके साथ हमारा सम्बन्ध सहोदर भाई जैसा है, यदि उसे इसी प्रकार नष्ट करते चले गए तो अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह हमारा जीवन भी स्थिर न रह सकेगा।

🔴 भूगर्भ का असीम उत्खनन उसे बाँझ बनाकर छोड़ेगा। जलाशयों की सम्पदा को मारक तत्त्वों से भरते कारखाने, पीने योग्य पानी छोड़ेंगे भी या नहीं? आकाश-वायुमण्डल जिस प्रकार प्रदूषण से, विकिरण से, कोलाहल से निरन्तर भरता चला जा रहा है, उससे पृथ्वी का रक्षा कवच फट रहा है और बाढ़ हुआ तापमान हिम क्षेत्रों को पिघलाकर समुद्र में ऐसी बाढ़ लाने का ताना-बाना बुन रहा है, जिससे जितना थल भाग अभी भी बचा है, उसका अधिकांश भाग उस बाढ़ में समा जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 6)

🔶 हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगा दी है कि शान्तिकुञ्ज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच स...