गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 28 Oct 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 28 Oct 2016


👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 12)

🌞 पहला अध्याय

🔴 अब तक उसे एक बहिन, दो भाई, माँ बाप, दो घोड़े, दस नौकरों के पालन की चिन्ता थी, अब उसे हजारों गुने प्राणियों के पालने की चिन्ता होती है। यही अहंभाव का प्रसार है। दूसरे शब्दों में इसी को अहंभाव का नाश कहते हैं। बात एक ही है फर्क सिर्फ कहने-सुनने का है। रबड़ के गुब्बारे जिसमें हवा भरकर बच्चे खेलते हैं, तुमने देखे होंगे। इनमें से एक लो और उसमें हवा भरो। जितनी हवा भरती जायेगी, उतना ही वह बढ़ता जाएगा और फटने के अधिक निकट पहुँचता जाएगा।

🔴 कुछ ही देर में उसमें इतनी हवा भर जायगी कि वह गुब्बारे को फाड़कर अपने विराट् रूप आकाश में भरे हुए महान वायुतत्त्व में मिल जाय। यही आत्म-दर्शन प्रणाली है। यह पुस्तक तुम्हें बतावेगी कि आत्म-स्वरूप को जानो, उसका विस्तार करो। बस इतने से ही सूत्र में वह सब महान विज्ञान भरा हुआ है, जिसके आधार पर विभिन्न अध्यात्म पथ बनाये गये हैं। वे सब फल इस सूत्र में बीज रूप में मौजूद हैं, जो किसी भी सच्ची साधना से कहीं भी और किसी भी प्रकार हो सकते हैं।

🔵 आत्मा के वास्तविक स्वरूप की एक बार झाँकी कर लेने वाला साधक फिर पीछे नहीं लौट सकता। प्यास के मारे जिसके प्राण सूख रहे हैं ऐसा व्यक्ति सुरसरि का शीतल कूल छोड़कर क्या फिर उसी रेगिस्तान में लौटने की इच्छा करेगा? जहाँ प्यास के मारे क्षण-क्षण पर मृत्यु समान असहनीय वेदना अब तक अनुभव करता रहा है। भगवान कहते हैं। ''यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्घाम् परमं मम।'' ''जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता, ऐसा मेरा धाम है।'' सचमुच वहाँ पहुँचने पर पीछे को पाँव पड़ते ही नहीं। योग भ्रष्ट हो जाने का वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता। घर पहुँच जाने पर भी क्या कोई घर का रास्ता भूल सकता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 व्यभिचार की ओर आकर्षित मत होना

🔴 व्यभिचार सबसे बड़ा विश्वासघात है। किसी स्त्री के पास तुम तभी तो पहुँच पाते हो जब उसके घरवाले तुम्हारा विश्वास करते हैं और उस तक पहुँच जाने देते हैं। कौन है जो किसी अपरिचित व्यक्ति के घर में निधड़क चला जावे और उससे मनचाही बातचीत करे। इसलिए सज्जनों! अपने मित्र के घर पर हमला मत करो। जरा पाप से डरो और हया शर्म का ख्याल रखो। क्या पाप, घृणा, बदनामी और कलंक का तुम्हें जरा भी डर नहीं है?

🔵 सद्गृहस्थ वह है जो पड़ौसी की स्त्री के रूप में अपनी माता की छाया देखता है। वीर वह है जो पराई स्त्री पर पाप की दृष्टि से नहीं देखता। स्वर्ग के वैभव का अधिकारी वह है जो स्त्रियों को माता, बहिन, और पुत्री समझता हुआ उनके चरणों में प्रणाम करता है।

🔴 मनुष्यों! व्यभिचार की ओर मत बढ़ो। यह जितना ही लुभावना है, उतना ही दुखदायी है। अग्नि की तरह यह सुनहरा चमकता है। पर देखो, जरा मूल से भस्म कर डालने की उसमें बड़ी घातक शक्ति है। इस सर्वनाश के मार्ग पर मत चलना, क्योंकि जिसने भी इधर कदम बढ़ाया है उसे भारी क्षति और विपत्ति का सामना करते हुए हाथ मल मलकर पछताना पड़ा है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1944

👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 15)

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