मंगलवार, 29 मार्च 2016

मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ

मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ


यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पारमार्थिक कार्यों में निरन्तर प्रेरणा देने वाली आत्मिक स्थिति जिनकी बन गई होगी, वे ही युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए देर तक धैर्यपूर्वक कुछ कर सकने वाले होंगे । ऐसे ही लोगों के द्वारा ठोस कार्यों की आशा की जा सकती है । गायत्री आन्दोलन में केवल भाषण सुनकर या यज्ञ- प्रदर्शन देखकर जो लोग शामिल हुए थे, वे देर तक अपनी माला साधे न रह सके, पर जिन लोगों ने गायत्री साहित्य पढक़र, विचार मंथन के बाद इस मार्ग पर कदम बढ़ाया था, वे पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं । युग-निर्माण कार्य के लिए हम उत्तेजनात्मक वातावरण में अपरिपक्व लोगों को साथ लेकर बालू के महल जैसा कच्चा आधार खड़ा नहीं करना चाहते ।

इसलिए इस संघ में उन्हीं लोगों पर आशा भरी नजर डाली जाएगी जो बात को गहराई तक समझ  चुके हैं, उसकी जड़ तक जा चुके हैं । वरना ऑंधे-सीधे लोगों का भानमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाए, तो वह ठहरता कहॉं है ? गायत्री परिवार की कितनी  ही शाखाएँ इसी प्रकार ठप्प हुईं, । अब उस गलती को दुबारा नहीं दुहराना चाहिए। जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्त्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं  ? जो लोग अखण्ड-ज्योति नहीं मँगा सके, जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके, वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान दीखने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़े बैठे दीखते हैं । प्रेरणा का सूत्र टूट गया, अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं, फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते ?

इसीलिए हम यह बारीकि से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ, लम्बी-चौड़ी बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखण्ड-ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं ? यदि वह इस की उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि यह देर तक टिकने वाला नहीं है । जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते वे शिष्ठाचार में मीठे शब्द भले ही कहें, गुरुजी-गुरुजी, वस्तुत: वे हमसे हजारों मील दूर हैं, उनसे किसी बड़े काम की कोई आशा नहीं रखी जा  सकती ।

युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (२.५०)

I am not a person I am a thought.

It is an evident fact that peoples’ charity and services to society are a
source of inspiration to others. Only these people can survive and contribute, along with patience, in the mission of changing an era (Yug Nirman). Only such people can be expected to make solid contributions. The people who have joined the Thought Revolution (the Gayatri mission) by being influenced by yagnas and speeches could not stay long. However, those who have stepped forward in the mission after a deep analysis of Gayatri literature are speedily heading towards their targets with deep loyalty and faith. For the mission of the evolution of an era (Yug Nirman Yojna), we do not want to build castles in the air by taking people who are just pumped up with an enthusiastic mentality and simultaneously still immature.

In this mission, expectations will only be from those who have understood
the substance and reached the root of the literature. If we build an organization
with incompetent people, then how long will it last? Many branches of
Gayatri Parivaar have failed due to this basic flaw but we should not repeat this
mistake. People who do not place value in thought cannot
stay with any organizational work. The people who did not subscribe
to Akhand Jyoti and read Gayatri literature, although strong devotees for some time span, later became totally isolated from the mission. The reason behind this idea is that the source of inspiration was broken off. There was no deep level of self involvement that could have remained whilst dealing with materialistic problems.

We frequently observe that person blabbering right in front of us and wonder; Is he attached to our thought process and literature through the Akhand Jyoti or
not? If he/she disowns and ignores the literature, then we are convinced that he/she will not remain attached to the mission for long. One who does not love and relate to our thoughts will not be able to contribute for a long period of time. Even if they have a polite tone and mannerism, their verbal love for Guruji alone cannot contribute any great work.

Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (2.50)

आत्मविकास का लक्ष्य पूरा हो

आत्मविकास का लक्ष्य पूरा हो

सद्गुणों का अर्थ सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईश्वर- भक्ति जैसे उच्च आदर्शों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उनकी परिधि अन्तरंग और बहिरंग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र तक फैली हुई है ।। समग्र व्यक्तित्व को परिष्कृत, सज्जनोचित एवं प्रामाणिक बनाने वाली सभी आदतों एवं रुझानों को सद्गुणों की सीमा में सम्मिलित किया जाएगा ।। कोई व्यक्ति झूठ नहीं बोलता, चोरी नहीं करता, व्यभिचार से बचा है, यह बचाव उचित है और अनुकरणीय भी, पर इतने को ही आत्म- निर्माण मान बैठना अपर्याप्त होगा ।। कीट- पतंग और वृक्ष- वनस्पति भी तो झूठ चोरी से बचे रहते हैं ।। यह स्थूल सदाचार का आंशिक पालन मात्र हुआ ।। इतने भर से आत्मविकास का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता ।। मन में कुहराम मचाने वाली घुटन का भी अन्त होना चाहिए ।। जिन उद्वेगों और विकारों ने मन:क्षेत्र को अस्त व्यस्त करके रख दिया है, उनका भी निराकरण होना चाहिए ।। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अभाव रहने के कारण जो सर्वतोमुखी दरिद्रता छाई हुई है, उसका भी अन्त होना चाहिए ।।

युग निर्माण योजना -- दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- ६६ (२.२२

The goal of self-development should be fulfilled

The meaning of good virtues shouldn’t be restricted only to achieving the high ideals like truthfulness, non-violence, celibacy, devotion to God, etc. Its sphere of influence actually spans far beyond and permeates every single area of the inner (thinking, feelings) and outer (action, speech, conduct, etc.) life. 

Good virtues include all the habits and inclinations which help us to refine the entire personality, make it honest and superb like that of a true gentleman. It is worthy and truly exemplary if someone never lies, never steals or never commits adultery. However, pursuing only this much wouldn’t be enough for the purpose of fulfilling the self-development. Even insects and plants never lie or steal, do they!? These obviously evident virtues form just a small fraction of good conduct but fall well short of fulfilling the goal of self-development.

The all-inclusive process of self-development should resolve the tumult of wayward thoughts going on continually in the mind. It should also get rid of the negative impulses (worry, anger, anxiety, etc.) and depravities which have been wrecking the mind. It should also put an end to a widespread dismal quality of life caused by the lack of excellence in qualities, actions and nature.

Translated from Pandit Shriram Sharma Acharya’s work

Yug Nirmaan Yojanaa: Darshan, swaroopa va kaaryakram 66:2.22

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...