रविवार, 19 जनवरी 2020

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग २)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/March/v1.22

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 5)

Q.11. How can one derive maximum benefit from daily Gayatri Upasana during mornings and evenings?

Ans. Regularity in morning and evening Gayatri Upasana must be strictly adhered to. Although total involvement and concentration are essential ingredients of Upasana, this alone is not enough. For keeping good health, one is required to perform a minimum amount of manual labour to digest and assimilate the meals taken during the day. Likewise, to reap the fruits of worship, it is essential to adopt Upasana and Sadhana simultaneously.   

To integrate Upasana, and Sadhana one is required to instill maximum degree of faith (Nistha) in Upasana. Nistha is reflected as steadfastness in keeping one’s words and maintaining discipline and regularity in habits. Incorporation of Nistha in Sadhana enhances steadfastness, which in turn provides strength  to the inherent power of resolution and sufficient spiritual strength. The cumulative effect of these attributes helps and inspires the Sadhak in adopting a strict self-discipline which is called Tapascharya. For Anusthans, these attributes are particularly essential. If  these attributes are incorporated in the day to day routine of worship the level of Sadhana rises to that of an Anusthan.

Q.12. How can I raise the level of my day-to-day Upasana to get the benefit of Anusthan?

Ans. It requires five hundred thousand Japs a year at the rate of 15 Malas per day. Sadhana of this type is known as an Abhiyan Sadhana. Although this number is achievable simply by 15 cycles of Mala each day, it is customary to supplement it with two ‘Laghu Anusthans’ of twenty four thousand Japs each during Navratari which falls in the month of Chaitra (15th March to 15th April )and Ashwin (15th August to 15th Sept.). Even otherwise, this practice is commonly followed by all Sadhaks. Additional Sadhana during Navratris (nine auspicious days occurring twice a year) further adds to the benefits of Abhiyan Sadhana.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 57

👉 बर्बादी की दुष्प्रवृत्ति

समय की बर्बादी को यदि लोग धन की हानि से बढ़कर मानने लगें, तो क्या हमारा जो बहुमूल्य समय यों ही आलस में बीतता रहता है क्या कुछ उत्पादन करने या सीखने में न लगे? विदेशों में आजीविका कमाने के बाद बचे हुए समय में से कुछ घंटे हर कोई व्यक्ति अध्ययन के लिए लगाता है और इसी क्रम के आधार पर जीवन के अन्त तक वह साधारण नागरिक भी उतना ज्ञान संचय कर लेता है जितना कि हम में से उद्भट विद्वान समझे जाने वाले लोगों को भी नहीं होता। जापान में बचे हुए समय को लोग गृह−उद्योगों में लगाते हैं और फालतू समय में अपनी कमाई बढ़ाने के अतिरिक्त विदेशों में भेजने के लिए बहुत सस्ता माल तैयार कर देते हैं जिससे उनकी राष्ट्रीय भी बढ़ती है। एक ओर हम हैं जो स्कूल छोड़ने के बाद अध्ययन को तिलाञ्जलि ही दे देते हैं और नियत व्यवसाय के अतिरिक्त कोई दूसरी सहायक आजीविका की बात भी नहीं सोचते। क्या स्त्री क्या पुरुष सभी इस बात में अपना गौरव समझते हैं कि उन्हें शारीरिक श्रम न करना पड़े।

समय की बर्बादी शारीरिक नहीं मानसिक दुर्गुण है। मन में जब तक इसके लिए रुचि, आकाँक्षा एवं उत्साह पैदा न होगा, जब तक इस हानि को मन हानि ही नहीं मानेगा तब तक सुधार का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा? टाइम टेबल बनाकर—कार्यक्रम निर्धारित कर, कितने लोग अपनी दिनचर्या चलाते हैं? फुरसत न मिलने की बहानेबाजी हर कोई करता है पर ध्यानपूर्वक देखा जाय तो उसका बहुत सा समय, आलस, प्रमाद, लापरवाही और मंदगति से काम करने में नष्ट होता है। समय के अपव्यय को रोककर और उसे नियमित दिनचर्या की सुदृढ़ श्रृंखला में आबद्ध कर हम अपने आज के सामान्य जीवन को असामान्य जीवन में बदल सकते हैं। पर यह होगा तभी न जब मन का अवसाद टूटे? जब लक्षहीनता, अनुत्साह एवं अव्यवस्था से पीछा छूटे?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962 पृष्ठ 23

👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

भाग्य और पुरुषार्थ जिन्दगी के दो छोर हैं। जिसका एक सिरा वर्तमान में है तो दूसरा हमारे जीवन के सुदूर व्यापी अतीत में अपना विस्तार लिए हुए है। यह सच है कि भाग्य का दायरा बड़ा है, जबकि वर्तमान के पाँवों के नीचे तो केवल दो पग धरती है। भाग्य के कोष में संचित कर्मों की विपुल पूँजी है, संस्कारों की अकूत राशि है, कर्म बीजों, प्रवृत्तियों एवं प्रारब्ध का अतुलनीय भण्डार है। जबकि पुरुषार्थ के पास अपना कहने के लिए केवल एक पल है। जो अभी अपना होते हुए भी अगले ही पल भाग्य के कोष में जा गिरेगा।
  
भाग्य के इस व्यापक आकार को देखकर ही सामान्य जन सहम जाते हैं। अरे यही क्यों? सामान्य जनों की कौन कहे कभी-कभी तो विज्ञ, विशेषज्ञ और वरिष्ठ जन भी भाग्य के बलशाली होने की गवाही देते हैं। बुद्धि के सभी तर्क, ज्योतिष की समस्त गणनाएँ, ग्रह-नक्षत्रों का समूचा दल-बल इसी के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। ये सभी कहते हैं कि भाग्य अपने अनुरूप शुभ या अशुभ परिस्थितियों का निर्माण करता है। और ये परिस्थतियाँ अपने आँचल में सभी व्यक्तियों-वस्तुओं एवं संयोगों-दुर्योगों को लपेट लेती हैं। ये सब अपना पृथक् अस्तित्त्व खोकर केवल भाग्य की छाया बनकर उसी की भाषा बोलने लग जाते हैं।
  
लेकिन इतने पर भी पुरुषार्थ की महिमा कम नहीं होती। आत्मज्ञानी, तत्त्वदर्शी, अध्यात्मवेत्ता सामान्य जनों के द्वारा कही-सुनी और बोली जाने वाली उपरोक्त सभी बातों को एक सीमा तक ही स्वीकारते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि पुरषार्थ आत्मा की चैतन्य शक्ति है, जबकि भाग्य केवल जड़ कर्मों का समुदाय। और जड़ कर्मों का यह आकार कितना ही बड़ा क्यों न हो चेतना की नन्हीं चिन्गारी इस पर भारी पड़ती है। जिस तरह अग्नि की नन्हीं सी चिन्गारी फूस के बड़े से बड़े ढेर को जलाकर राख कर देती है। जिस तरह छोटे से दिखने वाले सूर्य मण्डल के उदय होते ही तीनों लोकों का अँधेरा भाग जाता है। ठीक उसी तरह पुरुषार्थ का एक पल भी कई जन्मों के भाग्य पर भारी पड़ता है।
  
पुरुषार्थ की प्रक्रिया यदि निरन्तर अनवरत एवं अविराम जारी रहे तो पुराने भाग्य के मिटने व मनचाहे नए भाग्य के बनने में देर नहीं। पुरुषार्थ का प्रचण्ड पवन आत्मा पर छाए भाग्य के सभी आवरणों को छिन्न-भिन्न कर देता है। तब ऐसे संकल्प निष्ठ पुरुषार्थी की आत्मशक्ति से प्रत्येक असम्भव सम्भव और साकार होता है। तभी तो ऋषि वाणी कहती है- मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६४