सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 March 2017


👉 दीपयज्ञ ने दिया बेटी को जीवन दान

🔵 यह मेरे जीवन की ऐसी घटना है, जिसके स्मरण मात्र से मन ही मन सिहर उठता हूँ। किसी को शायद विश्वास हो या न हो किन्तु मैं उसे परम पूज्य गुरुदेव का प्रत्यक्ष आशीर्वाद मानता हूँ। घटना २ जुलाई १९९९ की है। उस दिन हमारे घर में दीपयज्ञ था। कार्यक्रम शाम के समय था, मगर सुबह से ही हम सभी तैयारी में लगे थे। घर बर्तन सब धोये जा रहे थे। उस समय सुबह के करीब ६ बजे होंगे। मेरी ९ साल की बेटी अणिमा दौड़- दौड़ कर माँ के काम में हाथ बँटा रही थी। किसी काम से उसकी माँ ने उसे पड़ोसी के यहाँ भेजा। घर के सामने बिजली का एक खम्भा था। उस दिन उसमें करण्ट आ रहा था। बच्ची इस बात से अनजान थी। असावधानीवश खम्भा उसे छू गया। छूते ही बच्ची करण्ट के चपेट में आ गई।

🔴 अचानक पड़ोसी ललऊ सिंह गौर और उनकी पत्नी की पुकार सुनी। वे चिल्लाकर कह रहे थे- बच्ची को करण्ट लग गया, जल्दी दौड़ो। हम जल्दी से निकल आए। देखा घर के सामने बिजली के खम्भे के साथ चिपककर वह खड़ी है। आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे उस अर्ध मृत अवस्था में देखकर हम जल्दी से उसके पास गए। संयोग से मैंने प्लास्टिक की चप्पल पहन रखी थी। एक चप्पल निकालकर उसी के सहारे खम्भे से बच्ची को अलग किया।

🔵 तब तक मेरी धर्मपत्नी भी आ गईं। बच्ची को इस तरह अचेत अवस्था में देख वह रोने लगी। यह सब देख मैं घबरा गया। पत्नी को सँभालूँ या बच्ची को लेकर डॉक्टर के पास जाऊँ। मन में सोचा गुरुजी भी अजीब परीक्षा लेते हैं। आज शाम को घर में पूजा है और इधर यह परिस्थिति आन पड़ी। फिर अचानक न जाने कहाँ से मेरे अन्दर स्फूर्ति आई। पूरे विश्वास के साथ मैंने धर्मपत्नी से कहा ‘गुरुजी को याद करो, गायत्री मंत्र का जप करो। सब अच्छा होगा।’

🔴 पत्नी को शांत कराकर मैं बच्ची के उपचार में लग गया। करण्ट लगने के जो भी उपचार होते हैं वह सब पड़ोसियों की मदद से कर रहा था। कोई प्रभाव न होता देख मेरी प्रार्थना और आकुल होती गई। करीब दस- पन्द्रह मिनट बाद उसे होश आया। वह जोर से चिल्लाई। उसे होश में आई देख जल्दी से डॉ. भगवती प्रसाद शुक्ला जी के पास ले गया। वहाँ दो- तीन घण्टे के उपचार के बाद वह स्वस्थ हो गई। उसे लेकर घर वापस आया तो देखा धर्मपत्नी सब काम छोड़कर प्रार्थना में तल्लीन है। बच्ची को स्वस्थ देखकर उसने सजल नयनों से गुरुदेव का धन्यवाद किया और फिर शाम के कार्यक्रम की व्यवस्था में लग गई।

🔵 हमारे घर की नन्ही सी वह दीया उस दिन बुझने से बच गई। इसे मैं गुरुदेव का दिया उपहार ही मानता हूँ। हमारा दीपयज्ञ वास्तव में सफल हो गया।

🌹 रामसेवक पाल, रमाबाई नगर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/dipyagya

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 20)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  

🔴 बच्चे अपने प्रयास से रेंगने और खड़े होने का प्रयत्न करते हैं, तभी वे चलने और दौड़ने में समर्थ होते हैं। अपने आपको-व्यक्तित्व के हर पक्ष को-समुन्नत बनाने के लिए निरन्तर अवसर तलाशने और प्रयत्न करने पड़ते हैं। इस अवसर पर आत्मनिरीक्षण, आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार और आत्मविकास के लिए अपनी दिनचर्या में ही प्रगतिशीलता का अभ्यास करना होता है। इसी प्रकार शरीर से एक कदम आगे बढ़ते ही परिवार-परिकर को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाने पर ही उनका भविष्य निखरता है।                    

🔵 अस्तु, उनके परिशोधन के लिए भी श्रमशीलता, शिष्टता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था और सहकारिता की प्रवृत्तियों को उन सबके अभ्यास में उतारने के लिए कुछ कारगर कदम उठाने पड़ते है। अन्यथा ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’ भर बन जाने से उपहास-तिरस्कार के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। अपनी योग्यता-क्षमता बढ़ा लेने के उपरान्त ही यह बन पड़ता है कि दूसरों पर इच्छित प्रभाव डाला जाए और उन्हें उठने-बैठने में सक्षम बनाया जाए।       

🔴 रेल का इंजन स्वयं समर्थ होता है और साधनों से गति पकड़ता है। तभी उसके साथ जुड़े हुए पीछे वाले डिब्बे भी गति पकड़ते हैं। इंजन की क्षमता यदि अस्त-व्यस्त हो चले, तो फिर वह रेल लक्ष्य तक पहुँचना तो दूर, अन्यों का आवागमन भी रोककर खड़ी हो जाएगी।

🔵 दूसरों की सहायता मिलती तो है, पर उसे प्राप्त करने के लिए, अपनी पात्रता को विकसित करने के लिए असाधारण प्रयत्न करने पड़ते हैं। पात्रता ही प्रकारान्तर से सफलता जैसे पुरस्कार साथ लेकर वापस लौटती है। वर्षा ऋतु कितने ही दिन क्यों न रहे, कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न बरसे, पर अपने पल्ले उतना ही पड़ेगा जितना कि बर्तन का आकार हो अथवा गड्ढे की गहराई बन सके। उन दिनों सब जगह हरियाली उगती है, पर चट्टानों पर एक तिनका भी नहीं उगता। उर्वरता न हो, तो भूमि में कोई बीज उगेगा ही नहीं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विवाह की अपेक्षा सेवा धर्म श्रेयष्कर

🔴 एक साथ, एक ही गॉव में छह बच्चे एक ही बीमारी से पीडित। सभी लकवे के शिकार है। तेज और असह्य बुखार। उसने ऐसे मरीज पहले कभी न देखे थे।

🔵 यह बात १९१० ई० की है, जब एक युवती अपने घोडे पर चढी़ आस्ट्रेलिया के एक आदिवासी क्षेत्र में घूमने आई थी। अब तक जिसे अपने वैभव और ऐश्वर्य से ही अवकाश न मिलता था, आज उसे पता चला कि दुनिया में दैन्य और दारिद्रय भी कम नहीं। परमात्मा के प्रति वह कृतज्ञ होती आई थी, पर जब उसने देखा कि हमने स्वयं उसकी अनंत कृपा के प्रति अपना कर्तव्य-भाव जागृत नहीं किया तो उसे बडी ग्लानि हुई। जब आधे से अधिक संसार अविकसित, अशिक्षित और पीड़ाओं से घिरा पडा हो तो साधन संपन्न खुशियाँ मना रहे हों यह कल्पना भी उसे असह्य प्रतीत हुई। एक डॉक्टर को तार भेजा। डॉक्टर ने जबाव भेजा अभी समय नहीं है।

🔴 उसने थोड़ी नर्सिग सीखी थी। डाक्टरों के अध्ययन से भी कुछ समाधान प्राप्त किये थे सो उसने अपने ही विश्वास पर औषधि मँगाकर उन बच्चों को दी। थोडी गर्मी प्रतीत हुई। जिन अंगों में रक्त-संचार बंद हो गया था, धीरे-धीरे फिर प्रारंभ हो गया। कई दिन कई रातों की अथक सुश्रूषा के बाद बच्चे उठ बैठे। युवती को ऐसा लगा जैसे सेवा के सुख से बढकर संसार में और कोई वस्तु नहीं। सम्मान तो सब कोई ले सकता है, पर आत्मीयता भरा प्यार का आनंद वही प्राप्त कर सकता है, जिसे सेवा का सौभाग्य मिला हो।

🔵 यह बात डॉक्टरो ने सुनी। उन्होंने इस लड़की की बडी़ प्रशंसा की और उसे नियमित रूप से नर्सिग करने के लिए प्रोत्साहित किया। लड़की को अपनी योग्यता पर विश्वास न था, सो वह बोली- यह जो कुछ हुआ वह भगवान् की कृपा मात्र थी, मै तो नर्सिंग पढी़ भी नही, मुझमें यह योग्यता कहाँ से आयेगी ?

🔴 एक डॉक्टर ने कहा क्षमता अपने भीतर से उत्पन्न होती है। तुम नहीं जानती मनुष्य में कितनी शक्ति है ? उसका उपयोग न करने के कारण सब कुछ असंभव लगता है, यदि तुम अपने आप पर विश्वास करो तो इन्हीं परिस्थितियों में पहाड़ के बराबर काम कर सकती हो?

🔵 'सचमुच कोई क्षमता जाग जाए तो हर व्यक्ति एक-डॉक्टर है, शिक्षक है, इंजीनियर है, नेता है, समाज सुधारक है। मनुष्य का ढाँचा सर्वत्र एक है, एक ही दिशा में योग्यता का विकास ही उसे डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, नेता या समाज-सुधारक बना देता है। 'चाहे यह योग्यता विद्यालय में विकसित हुई हो या अपने आप पैदा कर ली गई हो। दोनों ही रास्ते एक ही लक्ष्य की पूर्ति करते हैं।

🔴 लडकी ने अपनी योग्यताएँ बढा़नी शुरू की। नर्सिंग की अनेकों पुस्तकें मंगाकर उसने पढी़। डॉक्टरों से पूछताछ की। सामान्य मरीजों पर औषधियों के प्रयोग किए, हिम्मत खुलती चली गई और एक दिन उसने यह सिद्ध कर दिखाया कि योग्यताएँ संस्थानो में ही नहीं पनपती, वरन् घरों में अवकाश के प्रत्येक क्षण के उपयोग से कहीं भी बैठकर वे बढा़ई जा सकती हैं। ऐसी योग्यताऐं किसी भी विधिवत् शिक्षण प्राप्त योग्यता से कम नहीं होतीं। प्रमाणत वह प्रथम महायुद्ध में एक जहाजी अस्पताल में नर्स नियुक्त कर ली गई।

🔵 बहुत दिनों से उसके एक संबंधी की इच्छा थी कि वह शादी कर ले। उन्होंने विनम्र भाव से अपनी असहमति प्रकट करते हुए कहा- जब बहुत सारा संसार दीन-हीन अवस्था में पडा हो तब कुछ ऐसे व्यक्ति भी निकलने ही चाहिए जो सांसारिक सुखों का स्वेच्छा से त्यागकर अपने आपको इन कल्याण कार्यों में नियोजित कर सकें। मेरे लिए अब 'सेवा ' ही शादी है। लौकिक सुखों का यों परित्याग करते और अपनी योग्यताऐं बढा़ने के लिए प्रति पल सन्नद्ध रहने वाली, किसी स्कूल से जिसे डिग्री नहीं मिली, यही वीर बाला एक दिन सिस्टर एलिजाबेथ केनी के नाम से सारे विश्व में विख्यात हुई। उसकी शोध की हुई अनेक औषधियाँ अमेरिका, पेरिस, ब्रसेल, मास्को और ब्रिटेन तक पहुँची। अनेक विश्व विद्यालयों ने उसे डॉक्ट्रेट ' की उपाधि से विभूषित किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 79, 80

👉 पगडंडियाँ न खोजें राजमार्ग पर चलें

🔵 जीवन एक वन है जिसमें फूल भी है और कांटे भी; जिसमें हरी-भरी सुरम्य घाटियाँ भी हैं और ऊबड़-खाबड़ जमीन भी। अधिकतर वनों में वन्य-पशुओं और वनवासियों के आने-जाने से छोटी-मोटी पगडण्डियाँ बन जाती हैं। देखने में तो यह सुव्यवस्थित रास्ते प्रतीत होते हैं किन्तु यह जंगलों में जाकर लुप्त हो जाते हैं। आसानी और शीघ्रता के लिए बहुधा यात्री इन पगडंडियों को पकड़ लेते हैं और सही रास्ते को छोड़ देते हैं।

🔴 जीवन-वन में ऐसी पगडंडियाँ बहुत हैं जो छोटी दीखती हैं, पर गंतव्य स्थान तक पहुँचती नहीं है। जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ही ढूंढ़ते हैं, किन्तु उनको यह मालूम नहीं होता है कि ये अन्त तक नहीं पहुँचती और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर दल-दल में फँसा देती है। ये रास्ते वास्तव में बड़े ही आकर्षक होते हैं।

🔵 पाप और अनीति का मार्ग जंगल की पगडंडी, मछली की वंशी और चिड़ियों के जाल की तरह है। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाये, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं जो जल्दी ही सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही वाँछनीय हैं, पर उतावली में उद्देश्य को ही नष्ट कर देना, बुद्धिमत्ता नहीं माना जायगा।

🔴 जीवन-वन का राजमार्ग सदाचार और धर्म है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय-साध्य तो हैं, पर जोखिम उसमें नहीं है। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती है, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी बन्धन है, पर अनीति का वह दल-दल, वन की वह कँटीली झाड़ियाँ और ऊबड़-खाबड़ जमीन राजमार्ग में कहाँ ? जिनमें फँसकर जीवनोद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। हम पगडंडियों पर न चलें, राजमार्ग ही अपनावें। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शान्तिदायक भी।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1975 पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1975/February.3

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 March

🔴 मनुष्य कितना दीन-हीन, स्वल्प शक्ति वाला, कमजोर प्राणी है, यह प्रतिदिन के उसके जीवन से पता चलता है। उसे पग-पग पर परिस्थितियों का आश्रित होना पड़ता है। कितने ही समय तो ऐसे आते हैं, जब औरों से सहयोग न मिले तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इस तरह विचार करने से तो मनुष्य की लघुता का ही आभास होता है। किन्तु मनुष्य के पास एक ऐसी भी शक्ति है जिसके सहारे वह लोक-परलोक की अनन्त सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी बनता है। यह है प्रार्थना की शक्ति -परमात्मा के प्रति अविचल श्रद्धा और अटूट विश्वास की शक्ति । मनुष्य प्रार्थना से अपने को बदलता है, शक्ति प्राप्त करता है और अपने भाग्य में परिवर्तन कर लेता है। विश्वासपूर्वक की गई प्रार्थना पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं। सचमुच उनकी प्रार्थना में बड़ा बल है, अलौकिक शक्ति और अनन्त सामर्थ्य है।

🔵 संतोष करने का अर्थ है कि आपने प्रकृति के साथ मित्रता कर ली है। कुछ दिन इस तरह का अभ्यास डाल लेने से सुख और दुःख दानों का स्तर समान हो जायगा। तब केवल अपना ध्येय जीवन-लक्ष्य प्राप्त करना ही शेष रहेगा, इसलिये समझाना पड़ता है कि दुःख सुख इनमें से किसी के प्रभाव में न पड़ो । दोनों का मिला जुला जीवन ही मनुष्य को लक्ष्य तक पहुंचाता है। जीवन-लक्ष्य का प्रादुर्भाव दुःख और सुख के सम्मिलन से होता है।

🔴 विचार एक शक्ति है। आज तक संसार में जो परिवर्तन हुए और जो शक्ति दिखाई दे रही है, वह सब विचार की ही शक्ति है। इस शक्ति का स्वरूप जब तक सद् में स्थित रहता है तब तक रचनात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित होती रहती हैं और मनुष्य समाज की सुख-सुविधाओं में अभिवृद्धि होती रहती है किन्तु जब उनमें विकृति आ जाती है तो सर्वनाश के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। अतः सद्विचार को ही रचनात्मक विचार कहेंगे। विचार का अनादर करना अर्थात् उसे विकृत करना भयंकर भूल है, इससे मनुष्य का अहित ही होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 35)

🌹 विचार ही चरित्र निर्माण करते हैं

🔴 मन और मस्तिष्क, जो मानव-शक्ति के अनन्त स्रोत माने जाते हैं और जो वास्तव में हैं भी उनका प्रशिक्षण विचारों द्वारा ही होता है। विचारों की धारणा और उनका निरन्तर मनन करते रहना मस्तिष्क का प्रशिक्षण कहा गया है। उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति अपने मस्तिष्क में कोई विचार रखकर उसका निरन्तर चिन्तन एवं मनन करता रहता है, वे विचार अपने अनुरूप मस्तिष्क में रेखायें बना देते हैं, प्रणालियां तैयार कर दिया करते हैं कि मस्तिष्क की गति उन्हीं प्रणालियों के बीच ही उसी प्रकार बन्ध कर चलती है, जिस प्रकार नदी की धार अपने दोनों कूलों से मर्यादित होकर।

🔵 यदि दूषित विचारों को लेकर मस्तिष्क में मन्थन किया जायेगा, तो मस्तिष्क की धारायें दूषित हो जायेंगी, उनकी दिशा विकारों की ओर निश्चित हो जायेगी और उसकी गति दोषों के सिवाय गुणों की ओर न जा सकेगी। इसी प्रकार जो बुद्धिमान मस्तिष्क में परोपकारी और परमार्थी विचारों का मनन करता रहता है, उसका मस्तिष्क परोपकारी और परमार्थी बन जाता है और उसकी धारायें निरन्तर कल्याणकारी दिशा में ही चलती रहती हैं।

🔴 इस प्रकार इसमें कोई संशय नहीं रह जाता कि विचारों की शक्ति अपार है, विचार ही संसार की धारणा के आधार और मनुष्य के उत्थान-पतन के कारण होते हैं। विचारों द्वारा प्रशिक्षण देकर मस्तिष्क को किसी ओर मोड़ा और लगाया जा सकता है। अस्तु बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य मनोविकारों और बौद्धिक स्फुरणाओं में से वास्तविक विचार चुन ले और निरन्तर उनका चिन्तन एवं मनन करते हुए, मस्तिष्क का परिष्कार कर डाले। इस अभ्यास से कोई भी कितना ही बुद्धिमान, परोपकारी, परमार्थी और मुनि, मानव या देवता का विस्तार पा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 13)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि
🔵 भस्मासुर, महिषासुर, वृत्तासुर, रावण आदि की सिद्धियाँ अंतत: उनके संबंधियों के लिये विनाश और विपत्ति का कारण ही बनीं। इसके विपरीत उस दिशा में उद्देश्यपूर्ण कदम बढ़ाने वाले स्वल्प साधनों में भी उच्चस्तरीय एवं प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर सके। बुद्ध, गाँधी, अरविंद, रमण, रामकृष्ण, चाणक्य, रामदास, विवेकानंद, दयानंद आदि की साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं, वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हितसाधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है। वे स्वयं तो आकाश में नक्षत्रों की तरह अभी भी चमकते हैं, साथ ही उनके समय में उनके साथ जो भी रहे, वे भी सत्संगजन्य लाभों से निहाल होकर रहे और उच्चकोटि के अनुदान-वरदान प्राप्त करके कृत-कृत्य हो सके।      

🔴 इक्कीसवीं सदी में मानवीय पुरुषार्थ की आवश्यकता तो बहुत पड़ेगी। सतयुग की तरह साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थी, परिव्राजकों की तरह असंख्यों को आत्मोत्कर्ष की सेवा-साधनाओं में भी अपने को खपाना पड़ेगा, किंतु यह नहीं समझा जाना चाहिये कि इतना बड़ा काम मात्र मानवीय भागदौड़ से पूरा हो जाएगा। जब अपने छोटे-से कुटुंब के थोड़े से दायरे में वाद-विवाद मनोमालिन्य व लोकव्यवहार के झगड़े काबू में नहीं आ पाते, तो ६०० करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के पीछे लगी हुई ढेरों दुष्प्रवृत्तियों के कुप्रचलन कुछ थोड़े से व्यक्ति थोड़ी-सी योजनाएँ बनाकर हल्के-फुल्के व्यक्तियों के सहारे उसे पूरा कर सकेंगे, यह आशा कैसे की जा सकती है। इतने प्रबल पुरुषार्थ और समाधान के पीछे दैवी शक्ति का समावेश भी होना चाहिये अन्यथा मानवीय पुरुषार्थ अपनी भूलों, कमजोरियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण ही सफलता के स्थान पर असफलता प्राप्त करते देखते गये हैं।   
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 17)

🌹 दीक्षा के अंग-उपअंग

🔴 यज्ञोपवीत धारण- इसी तरीके से यज्ञोपवीत जिन लोगों ने लिया है, उन यज्ञोपवीत लेने वालों को बायें हाथ पर यज्ञोपवीत रखना चाहिए और दाहिने हाथ से इसको ढँक लेना चाहिए और ये ध्यान करना चाहिए कि हम इसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यज्ञ भगवान् और सूर्य नारायण, इन पाँच देवताओं का आवाहन कर रहे हैं और ये पाँच शक्तियाँ, पाँच तत्त्व जिनसे हमारा शरीर बना हुआ है, इन पाँच तत्त्वों की अधिनायक हैं। पाँच हमारे प्राण हैं और हमारे सूक्ष्म शरीर की पाँच प्रक्रियाएँ मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और जीवात्मा- ये पाँचों देवता माने गये हैं। पाँच शरीर में रहने वाले पाँच तत्त्वों को भी पाँच देवता माना गया है। इन शारीरिक और आध्यात्मिक पाँच देवताओं को यज्ञोपवीत में बुलाते हैं और ये ख्याल करते हैं कि ये यज्ञोपवीत में सारे जीवन भर हमारे साथ में रहा करेंगे।

🔵 बायें हाथ पर यज्ञोपवीत रखा और दाँयें से ढका और आँखें बंद की और ध्यान किया कि इसमें ब्रह्मा की उत्पादक शक्ति यज्ञोपवीत में प्रवेश कर रही है और यज्ञोपवीत कराने वाले सज्जन ब्रह्मा जी के आवाहन का मंत्र बोलें- ॐ ब्रह्म ज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्, विसीमतः सुरुचो वेनऽ आवः। सऽबुध्न्या उपमाऽ अस्यविष्ठाः, सतश्च योनिमसतश्च विवः। ॐ ब्रह्मणे नमः। पुष्पाक्षत को सिर पर लगा लिया जाये और ध्यान किया जाए, ब्रह्मा जी हमारे इस यज्ञोपवीत में निवास करने के लिए विराजमान हुए।

🔴 अब इसके बाद में फिर ध्यान किया जाय कि विष्णु भगवान् इस यज्ञोपवीत में आये और विष्णु भगवान् ने इस यज्ञोपवीत में निवास करना शुरू किया। संस्कार कराने वाले सज्जन ये मंत्र बोलें- ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा œ सुरे स्वाहा ॥ ॐ विष्णवे नमः। मस्तक से हाथ लगा लिया जाए। ये ध्यान किया जाए कि विष्णु भगवान् हमारे इस यज्ञोपवीत में आये। अब इसके बाद शंकर भगवान् का ध्यान किया जाए और ये विश्वास किया जाए कि इस संसार की संहारक- संरक्षक और नियंत्रण में रखने वाली शक्ति हमारे इस यज्ञोपवीत में आयी और यहाँ आकर विराजमान हुई। संस्कार कराने वाले को ये मंत्र बोलना चाहिए- ॐ नमस्ते रुद्र मन्यवऽ, उतो त ऽ इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः। ॐ रुद्राय नमः। मस्तक पर हाथ लगा लिया जाए, ध्यान किया जाए कि शंकर भगवान् हमारे इस यज्ञोपवीत में आए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Diksha/d

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 74)

🌹 विचार क्रांति का बीजारोपण पुनः हिमालय आमंत्रण
 

🔴 इससे हमारी स्वयं की संगठन सामर्थ्य विकसित हुई है। हमने गायत्री तपोभूमि के सीमित परिकर में ही एक सप्ताह, नौ दिन एवं एक-एक माह के कई शिविर आयोजित किए। आत्मोन्नति के लिए पंचकोशी साधना शिविर, स्वाध्याय सम्वर्धन हेतु कायाकल्प सत्र एवं संगठन विस्तार हेतु परामर्श एवं जीवन साधना सत्र उन कुछ प्रमुख आयोजनों में से हैं, जो हमने सहस्र एवं शतकुण्डीय यज्ञ के बाद मथुरा में मार्गदर्शक के निर्देशानुसार सम्पन्न किए। गायत्री तपोभूमि में आने वाले परिजनों से जो हमें प्यार मिला, परस्पर आत्मीयता की जो भावना विकसित हुई, उसी ने एक विशाल गायत्री परिवार को जन्म दिया। यह वही गायत्री परिवार है, जिसका हर सदस्य हमें पिता के रूप में, उँगली पकड़ कर चलाने वाले मार्गदर्शक के रूप में, घर परिवार और मन की समस्याओं को सुलझाने वाले चिकित्सक के रूप में देखता आया है।

🔵 इसी स्नेह सद्भाव के नाते हमें भी उनके यहाँ जाना पड़ा, जो हमारे यहाँ आए थे। कई स्थानों पर छोटे-छोटे यज्ञायोजन थे, कहीं सम्मेलन तो कहीं प्रबुद्ध समुदाय के बीच तर्क, तथ्य प्रतिपादनों के आधार पर गोष्ठी आयोजन। हमने जब मथुरा छोड़कर हरिद्वार आने का निश्चय किया तो लगभग दो वर्ष तक पूरे भारत का दौरा करना पड़ा। पाँच स्थानों पर तो उतने ही बड़े सहस्र कुण्डी यज्ञों का आयोजन था, जितना बड़ा मथुरा का सहस्र कुण्डी यज्ञ था। ये थे टाटानगर, महासमुन्द, बहराइच, भीलवाड़ा एवं पोरबन्दर।

🔴  एक दिन में तीन-तीन स्थानों पर रुकते हुए हजारों मील का दौरा अपने अज्ञातवास पर जाने के पूर्व कर डाला। इस दौरे से हमारे हाथ लगे समर्पित, समयदानी कार्यकर्ता। ऐसे अगणित व्यक्ति हमारे सम्पर्क में आए, जो पूर्व जन्म में ऋषि जीवन जी चुके थे। उनकी समस्त सामर्थ्य को पहचान कर हमने उन्हें परिवार से जोड़ा और इस प्रकार पारिवारिक सूत्रों से बँधा एक विशाल संगठन बनकर खड़ा हो गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/vichar.1

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 75)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ
🔴 अपनी अध्यात्म साधना की दो मंजिलें २४ वर्ष मे पूरी हुई। मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् के आदर्शों में व्यतिक्रम प्रायः युवावस्था मे ही होता है। काम और लोभ की प्रबलता के वही दिन हैं,सो पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर २४ वर्षों मे ४० तक पहुँचते- पहुँचते वह उफान ढल गया। कामनाएँ, वासनाएँ, महत्त्वाकाँक्षाएँ प्रायः इसी आयु में आकाश्- पाताल के कुलावे मिलाती है। यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्मसंयम और जप्- ध्यान की साधना मे लग गई, इसी आयु मे बहुत करके मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को ही प्रयुक्त किया जाता है।  

🔵 उठती उम्र के लोग अर्थ व्यवस्था से लेकर सैन्य संचालन तक अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते है और उन्हें उठाने चाहिए। महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों में बहुत अवसर रहता है। सेवा कार्यों मे योगदन भी नवयुवक बहुत दे सकते है, पर लोकमंगल के लिए नेतृत्व करने की वह अवधि नहीं हैं। शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द्, रामदास, मीरा, निवेदिता जैसे थोड़े ही अपवाद ऐसे है जिन्होंने उठती उम्र मे ही लोकमंगल के नेतृत्व क भार कन्धों पर सफलतापूर्वक वहन किया हो। आमतौर से कच्ची उम्र गड़बड़ी ही फैलाती है।

🔴 यश- पद की इच्छा का प्रलोभन, वासनात्मक आकर्षण के बने रहते जो सार्वजनिक क्षेत्र मे प्रवेश करते हैं वे उल्टी विकृति पैदा करते है। अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता रहता है। यो बुराई किसी आयु विशेष से बँधी नहीं रहती,पर प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है जिसके कारण युवावस्था महत्त्वाकांक्षाओं की अवधि मानी गई है। ढलती उम्र के साथ- साथ स्वभावतः आदमी कुछ ढीला पड़ जाता है,तब उसकी भौतिक लालसाएँ भी ढीला पड़  जाता हैं। मरने की बात याद आने से लोक- परलोक,धर्म भी रुचता हैं, इसलिए तत्त्ववेत्ताओं ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan

👉 हमारी होली (अंतिम भाग)

🔵 इन सब तस्वीरों में आनन्द की खोज करते करते चिरकाल बीत गया पर राजहंस को ओस ही मिली। मोती? उसकी तो खोज ही नहीं की। मानसरोवर की ओर तो मुँह ही नहीं किया। लम्बी उड़ान भरने की तो हिम्मत ही नहीं बाँधी। परों को फड़-फड़ाया, परन्तु फिर मटर के खेत में मोतियों का खजाना दिखाई पड़ गया। मन ने कहा, “जरा इसे और देख लें। आँखों से न दीख पड़ने वाली मानसरोवर में मोती मिल ही जायेंगे इसी की क्या गारंटी है।” फिर ओस चाटी और फिर फड़-फड़ाया। फिर वही, यहीं पहिया चलता रहता है।

🔴 आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये, जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम-धाम से तैयारियाँ की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।

🔵 मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?

🔴 आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।

अखण्ड-ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें। यही आज मेरी प्रार्थना है।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1940 पृष्ठ 4
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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