सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 20)

🌹 परिष्कृत प्रतिभा, एक दैवी अनुदान-वरदान  

🔴 बच्चे अपने प्रयास से रेंगने और खड़े होने का प्रयत्न करते हैं, तभी वे चलने और दौड़ने में समर्थ होते हैं। अपने आपको-व्यक्तित्व के हर पक्ष को-समुन्नत बनाने के लिए निरन्तर अवसर तलाशने और प्रयत्न करने पड़ते हैं। इस अवसर पर आत्मनिरीक्षण, आत्मसमीक्षा, आत्मसुधार और आत्मविकास के लिए अपनी दिनचर्या में ही प्रगतिशीलता का अभ्यास करना होता है। इसी प्रकार शरीर से एक कदम आगे बढ़ते ही परिवार-परिकर को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाने पर ही उनका भविष्य निखरता है।                    

🔵 अस्तु, उनके परिशोधन के लिए भी श्रमशीलता, शिष्टता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था और सहकारिता की प्रवृत्तियों को उन सबके अभ्यास में उतारने के लिए कुछ कारगर कदम उठाने पड़ते है। अन्यथा ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’ भर बन जाने से उपहास-तिरस्कार के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। अपनी योग्यता-क्षमता बढ़ा लेने के उपरान्त ही यह बन पड़ता है कि दूसरों पर इच्छित प्रभाव डाला जाए और उन्हें उठने-बैठने में सक्षम बनाया जाए।       

🔴 रेल का इंजन स्वयं समर्थ होता है और साधनों से गति पकड़ता है। तभी उसके साथ जुड़े हुए पीछे वाले डिब्बे भी गति पकड़ते हैं। इंजन की क्षमता यदि अस्त-व्यस्त हो चले, तो फिर वह रेल लक्ष्य तक पहुँचना तो दूर, अन्यों का आवागमन भी रोककर खड़ी हो जाएगी।

🔵 दूसरों की सहायता मिलती तो है, पर उसे प्राप्त करने के लिए, अपनी पात्रता को विकसित करने के लिए असाधारण प्रयत्न करने पड़ते हैं। पात्रता ही प्रकारान्तर से सफलता जैसे पुरस्कार साथ लेकर वापस लौटती है। वर्षा ऋतु कितने ही दिन क्यों न रहे, कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न बरसे, पर अपने पल्ले उतना ही पड़ेगा जितना कि बर्तन का आकार हो अथवा गड्ढे की गहराई बन सके। उन दिनों सब जगह हरियाली उगती है, पर चट्टानों पर एक तिनका भी नहीं उगता। उर्वरता न हो, तो भूमि में कोई बीज उगेगा ही नहीं।
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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