सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 13)

🌹 अनास्था की जननी-दुर्बुद्धि
🔵 भस्मासुर, महिषासुर, वृत्तासुर, रावण आदि की सिद्धियाँ अंतत: उनके संबंधियों के लिये विनाश और विपत्ति का कारण ही बनीं। इसके विपरीत उस दिशा में उद्देश्यपूर्ण कदम बढ़ाने वाले स्वल्प साधनों में भी उच्चस्तरीय एवं प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर सके। बुद्ध, गाँधी, अरविंद, रमण, रामकृष्ण, चाणक्य, रामदास, विवेकानंद, दयानंद आदि की साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं, वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हितसाधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है। वे स्वयं तो आकाश में नक्षत्रों की तरह अभी भी चमकते हैं, साथ ही उनके समय में उनके साथ जो भी रहे, वे भी सत्संगजन्य लाभों से निहाल होकर रहे और उच्चकोटि के अनुदान-वरदान प्राप्त करके कृत-कृत्य हो सके।      

🔴 इक्कीसवीं सदी में मानवीय पुरुषार्थ की आवश्यकता तो बहुत पड़ेगी। सतयुग की तरह साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थी, परिव्राजकों की तरह असंख्यों को आत्मोत्कर्ष की सेवा-साधनाओं में भी अपने को खपाना पड़ेगा, किंतु यह नहीं समझा जाना चाहिये कि इतना बड़ा काम मात्र मानवीय भागदौड़ से पूरा हो जाएगा। जब अपने छोटे-से कुटुंब के थोड़े से दायरे में वाद-विवाद मनोमालिन्य व लोकव्यवहार के झगड़े काबू में नहीं आ पाते, तो ६०० करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के पीछे लगी हुई ढेरों दुष्प्रवृत्तियों के कुप्रचलन कुछ थोड़े से व्यक्ति थोड़ी-सी योजनाएँ बनाकर हल्के-फुल्के व्यक्तियों के सहारे उसे पूरा कर सकेंगे, यह आशा कैसे की जा सकती है। इतने प्रबल पुरुषार्थ और समाधान के पीछे दैवी शक्ति का समावेश भी होना चाहिये अन्यथा मानवीय पुरुषार्थ अपनी भूलों, कमजोरियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण ही सफलता के स्थान पर असफलता प्राप्त करते देखते गये हैं।   
   
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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