सोमवार, 13 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 75)

🌹 हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ
🔴 अपनी अध्यात्म साधना की दो मंजिलें २४ वर्ष मे पूरी हुई। मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् के आदर्शों में व्यतिक्रम प्रायः युवावस्था मे ही होता है। काम और लोभ की प्रबलता के वही दिन हैं,सो पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर २४ वर्षों मे ४० तक पहुँचते- पहुँचते वह उफान ढल गया। कामनाएँ, वासनाएँ, महत्त्वाकाँक्षाएँ प्रायः इसी आयु में आकाश्- पाताल के कुलावे मिलाती है। यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्मसंयम और जप्- ध्यान की साधना मे लग गई, इसी आयु मे बहुत करके मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों को ही प्रयुक्त किया जाता है।  

🔵 उठती उम्र के लोग अर्थ व्यवस्था से लेकर सैन्य संचालन तक अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते है और उन्हें उठाने चाहिए। महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों में बहुत अवसर रहता है। सेवा कार्यों मे योगदन भी नवयुवक बहुत दे सकते है, पर लोकमंगल के लिए नेतृत्व करने की वह अवधि नहीं हैं। शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द्, रामदास, मीरा, निवेदिता जैसे थोड़े ही अपवाद ऐसे है जिन्होंने उठती उम्र मे ही लोकमंगल के नेतृत्व क भार कन्धों पर सफलतापूर्वक वहन किया हो। आमतौर से कच्ची उम्र गड़बड़ी ही फैलाती है।

🔴 यश- पद की इच्छा का प्रलोभन, वासनात्मक आकर्षण के बने रहते जो सार्वजनिक क्षेत्र मे प्रवेश करते हैं वे उल्टी विकृति पैदा करते है। अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता रहता है। यो बुराई किसी आयु विशेष से बँधी नहीं रहती,पर प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है जिसके कारण युवावस्था महत्त्वाकांक्षाओं की अवधि मानी गई है। ढलती उम्र के साथ- साथ स्वभावतः आदमी कुछ ढीला पड़ जाता है,तब उसकी भौतिक लालसाएँ भी ढीला पड़  जाता हैं। मरने की बात याद आने से लोक- परलोक,धर्म भी रुचता हैं, इसलिए तत्त्ववेत्ताओं ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamare_drash_jivan

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