सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

👉 एहसान

🔶 एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया। वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता।

🔷 उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ। वह बहेलिए के पास गया और कहा- ”मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है। छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?

🔶 बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया। शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था।

🔷 जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी का बहुत कृतज्ञ था।

🔶 अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया। एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी, उकाब से बोली- ”मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?“

🔷 इसके उत्तर में उकाब ने कहा- ”व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।“

🔶 निष्कर्ष- व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन 1 October 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 October 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 17)

👉 त्रिधा भक्ति एवं उसकी अद्भुत सिद्धि   
 
🔶 उपासना का अपना प्रयोगक्रम चला और उसे अनेकानेक परीक्षणों की कसौटियों पर कसे जाने के उपरान्त सही एवं सशक्त पाया गया। इसी आधार पर अब यह सोचने, कहने और करने की व्यवस्था बन गई है कि संसार को एक नया सन्देश दिया जा सके कि उपेक्षित, तिरस्कृत, विडम्बनाग्रस्त अध्यात्म को यदि पुनर्जीवित किया जा सके तो विश्व चेतना के साथ एक उच्चस्तरीय माहौल जुड़ सकता है। तब भौतिक विज्ञान के लिए भी यह न सोचना पड़ेगा कि वह लाभ देने की तुलना में हानि, विनाश के सरंजाम अधिक जुटाता है। इसलिए उसके उपयोग को आशंका एवं भयानकता के साथ जुड़ा हुआ सोचा जाए। वस्तुत: बढ़े हुए विज्ञान के चरणों को आध्यात्मिक प्रगति के साथ जोड़ा जा सके तो हम भूतकाल के सतयुग की अपेक्षा और भी अच्छी स्थिति में पहुँच सकते हैं। यों जिस तरह नया आधार सँजोया गया है, उसे देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि हम और भी अधिक ऊँचे स्तर का ‘‘महासतयुग’’ अगले दिनों अपनी इसी धरती पर उतारकर रहेंगे।
  
🔷 अपने समय का मनुष्य बहुत बौना है। इस बौनेपन को संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में भी लिया जा सकता है, होता यही रहा कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को भी संकीर्ण-स्वार्थों के लिए तथाकथित समर्थ लोगों ने प्रयुक्त किया और असंख्य समस्याएँ उत्पन्न कीं। ठीक इसी प्रकार प्रपंचों से बचकर जो अध्यात्म किसी लँगड़े-लूले रूप में शेष रह गया था उसे भी अपने अथवा अपनों की सम्पन्नता, यशलिप्सा, असाधारण सफलता आदि के लिए ही प्रयुक्त किया जाता रहा। तथाकथित सिद्ध पुरुष भी अपने को वरिष्ठ सिद्ध करने और जिन कुपात्रों ने उन्हें जिस तिस प्रकार प्रसन्न कर लिया, उन्हें उस अध्यात्म द्वारा अधिकाधिक सम्पन्न बनाने में लगे रहे। उस अनुदान का उपयोग निजी विलासिता एवं महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के अतिरिक्त किसी लोकोपयोगी काम में न हो पाया।
  
🔶 अपने प्रयोग में आरम्भ से ही यह व्रतशीलता धारण की गई कि परम सत्ता के अनुग्रह से जो भी मिलेगा उसे उसी के विश्व उद्यान को अधिक श्रेष्ठ, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जाता रहेगा। अपना निजी जीवन मात्र ब्राह्मणोचित निर्वाह भर से काम चला लेगा। औसत नागरिक स्तर से बढ़कर अधिक सुविधा, प्रतिष्ठा आदि की किसी ललक को पास में न फटकने दिया जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 20

👉 The Paradoxical Commandments

🔶 People are illogical, unreasonable, and self-centered. Love them anyway. If you do good, people will accuse you of selfish ulterior motives. Do good anyway. If you are successful, you will win false friends and true enemies. Succeed anyway. The good you do today will be forgotten tomorrow. Do good anyway. Honesty and frankness make you vulnerable. Be honest and frank anyway.

🔷 The biggest men and women with the biggest ideas can be shot down by the smallest men and women with the smallest minds. Think big anyway. What you spend years building may be destroyed overnight. Build anyway. People really need help but may attack you if you do help them. Help people anyway. Give the world the best you have and you’ll get kicked in the teeth. Give the world the best you have anyway.

📖 Kent M. Keith

👉 क्षणिक अस्तित्व पर इतना अभिमान

🔶 अमावस की रात में दीप ने देखा-न चाँद और न कोई ग्रह नक्षत्र न कोई तारा-केवल वह एक अकेला संसार को प्रकाश दे रहा है। अपने इस महत्व को देख कर उसे अभिमान हो गया।

🔷 संसार को सम्बोधित करता हुआ अहंकारपूर्वक बोला-मेरी महिमा देखो, मेरी ज्योति-किरणों की पूजा करो, मेरी दया-दयालुता का गुणगान करो मैं तुम सबको राह दिखाता हूँ, प्रकाश देता हूँ इस प्रगाढ़ अन्धकार में तुम सब मेरी कृपा से ही देख पर रहे हो। मुझे मस्तक नवाओ, प्रणाम करो।

🔶 दीप के इस अहंकारोक्ति का उत्तर और किसी ने तो दिया नहीं, पर जुगनू से न रहा गया बोला-ऐ दीप! क्षणिक अधिकार पाकर इतना अभिमान, एक रात के अस्तित्व पर यह अहंकार केवल इस रात ठहरे रहो। प्रभात में तुमसे मिलूँगा तब तुम अपनी वास्तविकता से अवगत हो चुके होगे!

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1967 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.22

👉 चित्रों का भला और बुरा प्रभाव (भाग 4)

🔶 बहुत से धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। सीता-राम, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु आदि युगल देवों के चित्र बहुधा बड़े ही अश्लील रूप में, अर्धनग्न या गन्दे हाव भावों के साथ मिलते हैं। चित्रकार एवं प्रकाशक का इनके पीछे क्या उद्देश्य रहता है इसकी हम चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन साफ रूप से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अन्य भद्दे चित्रों की तरह ये चित्र भी मनुष्य को भद्दी प्रेरणा देते हैं। बहुत से मन्दिर में देव मूर्तियां भी अश्लील स्थिति में बनी रहती हैं, वे भी इसी श्रेणी में आती हैं।

🔷 कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं।

🔶 अपने निवास स्थान, अध्ययन कक्ष, दुकान कहीं के भी लिए आदर्श चित्रों का चुनाव करें। जिन पर उठते बैठते, चलते फिरते हर समय आपकी नजर पड़ती रहे। इनसे आप को उत्कृष्ट प्रेरणा मिलेगी। अच्छे चित्र, अच्छी पुस्तक का प्रभाव तो उसे पढ़ने उस पर मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गांधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आंख मीच लें और अच्छाई को देखें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 139

👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...