सोमवार, 4 सितंबर 2017

👉 तप-तेज के नाश का कारण

🔵 सतयुग के आदि में जंभ नामक एक बड़ा प्रबल दैत्य था। उसने प्रचण्ड तप करके ऐसी शक्ति प्राप्त की थी जिसके बल से उसने सभी देवताओं को परास्त किया।

🔴 एक दिन बालखिल्य ऋषियों के आश्रम में लक्ष्मी जी बैठी हुई थीं। संयोगवश जंभ दैत्य भी उधर से आ निकला। वह लक्ष्मी की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बिठाकर हरण कर ले चला।

🔵 देव गुरु बृहस्पति यह सब देख रहे थे। उनने देवताओं से कहा-बस अब प्रयोजन सिद्ध हो गया। अब इस पर आक्रमण करो, यह अवश्य मारा जायेगा। देवताओं ने पूछा-इसका क्या कारण है? देव गुरू ने कहा- पर नारी की ओर कुदृष्टि से देखने के कारण अब इसका पूर्व संचित तप नष्ट हो गया। अब इसे हरा देना कुछ कठिन नहीं है। देवताओं ने उस पर आक्रमण किया और प्रतापी जंभ दैत्य को आसानी से मार गिराया।

🔴 पर नारी के प्रति कुदृष्टी रखने वाले का तप –तेज नष्ट हो जाता है

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 59)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 इन दिनों नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में अवांछनीय तत्त्वों का इतना अधिक बाहुल्य हो गया है कि शांति और सुव्यवस्था के लिए एक प्रकार से संकट ही उत्पन्न हो गया है। छल, असत्य, बनावट और विश्वासघात का ऐसा प्रचलन हो गया है कि किसी व्यक्ति पर सहज ही विश्वास करना खतरे से खाली नहीं रहा। विचारों की दृष्टि से मनुष्य बहुत ही संकीर्ण, स्वार्थी, ओछा और कमीना होता चला जा रहा है। पेट और प्रजनन के अतिरिक्त कोई लक्ष्य नहीं, आदर्शवादिता और उत्कृष्टता अब कहने-सुनने भर की बात रह गई है। व्यवहार में कोई बिरला ही उसे काम में लाता हो। सामाजिक कुरीतियों का तो कहना ही क्या? विवाहोन्माद, मृत्यु-भोज ऊँच-नीच नारी तिरस्कार, बाल-विवाह वृद्ध-विवाह आदि न जाने कितनी प्रकार की कुरीतियाँ अपने समाज में घुसी बैठी हैं। यदि उन्हें ज्यों का त्यों ही बना रहने दिया गया, तो हम संसार के सभ्य देशों में पिछड़े हुए और उपहासास्पद ही न माने जाएँगे, वरन् अपनी दुर्बलताओं के शिकार होकर अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे।

🔵 अगले दिनों इस बात की आवश्यकता पड़ेगी कि व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरंभ किया जाए। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरंभ किए गए धर्म-युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब मापदण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके, उसे उतना ही बड़ा बहादुर माना जाएगा। उस बहादुरी के ऊपर शोषण-विहीन समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। दुर्बुद्धि और कुत्सा से लड़ सकने में जो लोग समर्थ होंगे, उन्हीं का पुरुषार्थ पीड़ित मानवता को त्राण दे सकने का यश संचित कर सकेगा।
 
🔴 भारतीय समाज को बेईमान और गरीब बनने के लिए विवश करने वाले सत्यानाशी विवाहोन्माद नामक असुर से पूरी शक्ति के साथ जूझना पड़ेगा। अभी प्रचार, विरोध, प्रतिज्ञापत्र आदि के हल्के कदम उठाए गए हैं, आगे चलकर असहयोग, सत्याग्रह और घिराव जैसे बड़े कदम उठाकर इस कुप्रथा को गर्हित और वर्जित बनने के लिए घृणित और दुष्ट समझे जाने के लिए विवश करेंगे। अगले दिनों ऐसा प्रबल लोकमत तैयार करेंगे, जिसमें विवाहों के नाम पर प्रचलित उद्धतपन को जीवित रह सकना असंभव हो जाए। पूर्ण सादगी और स्वल्प खर्च के विवाहों का प्रचलन होने तक अपना संघर्ष चलता रहेगा। हम तब तक न चैन लेंगे और न लेने देंगे, जब तक कि इस अनैतिक एवं अवांछनीय प्रथा का देश से काला मुँह न हो जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.82

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.15

👉 Be like a Swan. (Part 3)

🔵 I was requesting you the same. If you have acknowledged the importance of GAYATRI, start becoming its carrier. Her carrier has only two specifications; one is that it can separate water from milk. Whatever is available in this world is messed. All is mixed. If somewhere is seen an element of truth then soon starts being seen a deep touch of falseness and dishonesty associated with that truth. How then will you separate these two? It is possible only through your discriminative capacity that you separate it. It is said about RAJHANS that ‘YA HANSA MOTI CHUNAI YA LANGHAN MAR JAYE’. It is desirable to die of hunger in place of eating anything you find, for survival. 
 
🔴 If you cannot earn honestly and live a proper life, then what is the use of that life? Do not live. By ‘do not live’ I mean to suggest that you must live hand to mouth, you may live with difficulties also. Majority of persons are compelled to live in poverty. Someone dies of a disease. Someone is lodged in jail. Someone faces premature death of his/her children/wife/ husband/relative. Someone faces another kind of trouble. Majority of people are there in this world who face some or the other kind of trouble. What is the harm if you face troubles of living a true & honest yet in poverty? A pill of dishonesty with coating of honesty—very this way, we can see public around behaving. Very this is called the world. You kindly disassociate yourself with it to try to proceed to become a SWAN. Finished, today’s session.

====== OM SHANTI======

🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 हमारे गुरुदेव

🔵 एक दिन हम लोग उनके पास बैठे थे, तो वे बोले, ‘‘मैं शरीर छोड़ने पर कुछ ऐसा करूँगा जैसे कोई कुर्ता उतारता है, पर फिर मैं तीन स्थानों पर रहूँगा एक माताजी के पास, दूसरा सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा तीसरा #अखंड_दीपक।’’ हमारे साथ #अमेरिका के एक परिजन भी बैठे थे। उन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी, ये तीनों स्थान तो #शान्तिकुञ्ज में हैं और हम लोग तो बहुत दूर हैं।’’ इस पर गुरुजी बोले, ‘‘बेटा! मेरा चौथा स्थान उगता हुआ #सूर्य होगा।’’

🔴 जब #गुरुजी ने शरीर छोड़ने का मन बना लिया था, तो उसकी तैयारी वे बहुत पहले से ही करने लगे थे। उन्होंने संकेत देना प्रारंभ कर दिया था। जहाँ आज सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा है, वहाँ पहले गुलाब की क्यारियाँ थीं। गुरुजी ने एक दिन सोनी जी, महेंद्र जी, कपिल जी, उपाध्याय जी आदि सभी को बुलाया। माताजी भी बैठी थीं और गुरुजी कहने लगे, ‘‘माताजी, हमने अपने लिये स्थान पसंद कर लिया है। वह जो गुलाब की क्यारियाँ हैं, वह हमें बहुत पसंद आईं। हमने सोचा है, वही स्थान हमारे लिये ठीक है।’’

🔵 माताजी ने कहा, ‘‘आप क्या कह रहे हैं?’’ तो गुरुजी बोले, ‘‘शरीर तो हम छोड़ेंगे ही। अमर तो हैं नहीं।’’ फिर अन्य लोगों के उदाहरण देने लगे कि फलाने बाबाजी की समाधी वहाँ बन गई, फलाने की वहाँ। और हम लोगों से कहने लगे कि देखो! हमें बाहर मत ले जाना। हमारा मन है कि हम और माताजी यहीं रहेंगे। हमारी समाधी यहीं बनाना। ’’हम सभी उदास हो गये, माताजी भी रोने लगीं। तब गुरुजी बोले, ‘‘भावुक क्यों होती हो, क्या यह सच नहीं है?’’ माताजी बोलीं, ‘‘पर बच्चों के सामने क्यों...?’’ गुरुजी बोले, ‘‘आज नहीं तो कल, हमको जाना तो है ही।’’ फिर उस दिन गोष्ठी आगे नहीं बढ़ी।

🔴 कुछ दिन बाद गुरुजी ने गोष्ठी में कहा कि हमने अपने दोनों के लिये जगह चुन ली है। हम दोनों के लिये दो घोंसले बनाओ। फिर एक दिन बोले, ‘‘ऋषिकेश जाओ, वहाँ जो गुरुद्वारे में दो छतरियाँ बनी हैं, उन्हें देखकर आओ और हमारे लिये वैसी ही बना दो। एक का नाम होगा, सजल-श्रद्धा और दूसरी का प्रखर-प्रज्ञा इसी दौरान जयपुर से वीरेन्द्र अग्रवाल जी आये, उनके सामने भी चर्चा हुई, तो उन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी, संगमरमर की छतरी बना दें?’’ गुरुजी बोले, ‘‘ठीक है, संगमरमर की बना दो।’’ इस प्रकार गुरुजी ने अपने रहते ही सजल-श्रद्धा और प्रखर-प्रज्ञा का निर्माण करवा दिया था।

🔵 संगमरमर का चबूतरा बना, सामने का फर्श कच्चा रखा गया और गुरुजी ने घोषणा कर दी कि हमारा संस्कार यहीं होगा, हम कहीं बाहर नहीं जायेंगे। हम प्रखर-प्रज्ञा में रहेंगे और माताजी सजल-श्रद्धा में रहेंगी। हमारी #चेतना यहाँ आगामी #सौ वर्षों तक रहेगी और पूरे #विश्व का यह #शक्ति_केंद्र होगा। यहाँ से हम सबको सजल-श्रद्धा और प्रखर-प्रज्ञा का अंश देते रहेंगे। यहाँ हर कोई हमसे मिल सकेगा, अपनी बात कह सकेगा। हम सबकी उसी प्रकार सेवा करते रहेंगे, जैसे जीवित अवस्था में कर रहे हैं। आज सजल-श्रद्धा प्रखर-प्रज्ञा संपूर्ण #गायत्री#परिवार की श्रद्धा का केन्द्र है और परिजन यहाँ पर गुरुजी-माताजी की चेतना को अनुभव भी करते हैं और उनके दर्शन भी।

🔴 जीवन के अंतिम क्षणों में गुरुजी, माताजी को निर्देश दे गये थे कि उनके शरीर छोड़ने पर भी उनके किसी भी कार्य में कोई व्यवधान नहीं आना चाहिये। उस समय माताजी के उस स्वरूप को देखकर हमें आज भी आश्चर्य होता है, और साथ ही विश्वास भी कि वे साक्षात् पार्वती ही थीं, जिन्हें अपने शिव की अनश्वरता का पूर्ण अहसास था, अन्यथा साधारण माटी की महिला तो ऐसा नहीं कर सकती कि मालूम है, गुरुजी शरीर छोड़ चुके हैं, फिर भी प्रवचन दिया, सबसे मिलीं। जितनी भीड़ आई थी, सबको भोजन करने का निर्देश दिया। सबके भोजन कर चुकने के बाद ही गुरुजी के शरीर छोड़ने के विषय में बताया।

🔵 शाम को गुरुजी के पार्थिव शरीर को अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया। उस समय हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, जब माताजी ने नादयोग की घंटी बजाने का निर्देश दिया। हम उनकी ओर देखते रह गये। वे बोलीं, ‘‘गुरुजी का निर्देश है, सब कार्य यथावत् चलेंगे, कोई कार्य रुकेगा नहीं। मैं यहीं हूँ, कहीं नहीं जा रहा, बस स्थूल देह त्यागी है।’’ शाम को माताजी ने सबके लिये खिचड़ी बनाने का निर्देश दिया और कहा, ‘‘कोई भूखा नहीं सोयेगा।’’ अगले दिन सुबह के भी सभी क्रम यथावत् चले, माता जी सबसे मिलीं भी।

🔴 गुरुजी के अंतिम समय के शब्दों को सुनने के लिए हम लोग लालायित थे। बड़ी तड़प थी। सो माताजी से जब अनुनय-विनय किया तो उन्होंने कहा, ‘‘वे बहुत पहले से ही कहने लगे थे कि मैं गायत्री जयंती के दिन यह शरीर छोड़ दूँगा। उस दिन साढ़े चार बजे मैं गुरुजी को प्रणाम करके 6:30 बजे स्टेज पर पहुँच गई। मैंने भाषण भी दिया। चार शादियाँ थीं, बच्चों को आशीर्वाद भी दिया, तिलक किया, माला पहनाई, बच्चों को खाना भी खिलाया। प्रणाम में केवल पाँच व्यक्तियों को मैंने फूल दिये और आगे मैं फूल न दे सकी। कारण, मेरा शरीर प्रणाम करा रहा था, पर मुझे मालूम था कि गुरुजी ने अपने शरीर से विदाई ले ली है। चलते समय गुरुजी ने हाथ पकड़कर अंतिम बार मुझे बस इतना ही कहा था कि मैं गायत्री परिवार के बच्चों की जिम्मेदारी तुम पर और केवल तुम पर छोड़े जा रहा हूँ। मैंने भी वायदा निभाने की सौगंध खाई।’’

🔵 गुरुजी का लिखा यह गीत, जिसे माताजी ने हम सबके लिए गाया है-

तुम न घबराओ, न आँसू ही बहाओ अब,
और कोई हो न हो, पर मैं तुम्हारा हूँ।
मैं तुम्हारे घाव धो, मरहम लगाऊँगा,
मैं खुशी के गीत गा-गाकर सुनाऊँगा।
यह उनके न केवल भाव थे, बल्कि उनका जीवन था, जो हमने देखा।

👉 कण-कण में भगवान

🔴 “मीरा की आदत सी बन गई थी। जब वह मंदिर में बैठती, तो कभी मूर्ति की ओर पीठ कर लेती, तो कभी पैर।

🔵 एक बार वह प्रतिमा की ओर पैर करके बैठी थी, इतने में एक व्यक्ति ने मंदिर में प्रवेश किया। मीरा को इस स्थिति में बैठी देख उसे क्रोध आ गया। उसे भगवान का यह अपमान बर्दाश्त न हो सका। वह आगबबूला हो उठा और मन में जो आया बक डाला।

🔴 अब मीरा को वस्तुस्थिति का बोध हुआ। नाराजगी का कारण समझ में आया, तो मुस्कुरा दिया, कहा- बेटा। गालियाँ क्यों दे रहा है? भला तू ही बता, जिस ओर भगवान नहीं है, मैं उसी ओर पैर कर लूँगी। मुझे तो हर ओर, हर दिशा में, कण-कण में भगवान दिखते हैं।

🔵 व्यक्ति का अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने पैरों में गिरकर क्षमा माँगी और चलता बना।

🔴 संकीर्ण दृष्टि वालों को सर्वत्र बुराई ही दिखती है।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 Sep 2017

🔵 मन की चंचलता से बड़ी कठिनाई यह होती है कि विकास नहीं हो पाता। विकास का नियम है-निरन्तर मन से एक ही दशा में काम लेना, पुनःपुनः अभ्यास करना। चंचल व्यक्ति दस पन्द्रह मिनट भी चित्त को एक स्थान पर एकाग्र नहीं कर पाता। विद्यार्थी, सिनेमा प्रिय, शौकीन, कवि, व्यापारी, यात्री, क्लर्क इत्यादि चंचलता के कारण सदैव यही शिकायत करते हैं कि अमुक पुस्तक या विषय समझ में नहीं आता, आध्यात्म कठिन विषय है इत्यादि। बालक सर्वदा अति चंचल रहते हैं। उनका मनोबल तथा एकाग्रता की शक्तियाँ अति अविकसित रहती है।

🔴 टिड्डी वृत्ति वाला व्यक्ति कभी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक सुनिश्चित, सुकल्पित उद्देश्य पर तीव्रता से नहीं चल पाता। मध्य में आने वाले प्रलोभन, आलस्य, प्रमोद, अशान्ति इत्यादि उसे एकनिष्ठ नहीं रहने देते। उसकी इच्छाएं, वासनाएं और स्मृतियाँ निरन्तर कमजोर होती जाती हैं। मनुष्य के चित्त को विचलित करने वाले दुर्व्यसनों में फँसने वाले अनगिनत मानसिक विकार और भाव हैं। बड़े-बड़े विद्वान मनोवेग और निकृष्ट विकारों से उत्तेजित हो कर बड़े-बड़े अनर्थ कर डालते है, वर्षों का किया कराया क्षण भर में नष्ट कर देते हैं। तनिक से आलस्य या प्रमाद से इतनी भारी गलती हो जाती है कि आयु पर्यन्त वह ठीक नहीं हो पाती विकारमय स्वार्थी विचारों मुक्ति।

🔴 आपका मन दो प्रकार के विचारों में भटकता है। प्रथम तो बाह्य विषयों में दिलचस्पी लेता है। विषय नाना प्रकार के हैं। इनका सम्बन्ध हमारी पाँच इन्द्रियों से है। कामेच्छा, क्षुधा, पिपासा, सुन्दर वस्त्र, गृह सामाजिक प्रतिष्ठा, मान, सौंदर्य, शृंगार, यौवन इत्यादि में मन भटकता है। वह इनका गुलाम बनता है और उद्वेगों का शिकार बनता है।
दूसरे पदार्थ आन्तरिक हैं। आप शान्ति चाहते हैं। मन के अन्दर ईर्ष्या, द्वेष, भय, स्वार्थ, क्रोध, लोभ, इत्यादि वृत्तियाँ सदैव संघर्ष मचाती हैं। वृत्तियाँ चंचल रहती है। आप दिन प्रतिदिन तुच्छ प्रसंग, पुरानी कटु स्मृतियों के कूड़े करकट में फँसे रहते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ब्रह्म साक्षात्कार क्यों नहीं होता? (अंतिम भाग)

🔵 उपासना, साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।

🔴 उपनिषद् में कहा है कि ‘ब्रह्म तल्लक्षमुच्यते” ब्रह्म ही उसका लक्ष है। तो फिर लक्ष को अपनी ओर नहीं खींचा जा सकता, अपने आपको ही लक्ष्य तक पहुँचाना होता है। जिस प्रकार निशाना लगाकर तीर चलाने पर वह सम्पूर्ण रूपेण अपने लक्ष्य के प्रति अपने आपको अर्पण करता है उसी प्रकार ब्रह्म प्राप्ति के लिए उसी में सर्वस्व अर्पण करके तन्मय हो जाना पड़ेगा। सकल अवस्थाओं में सकल कार्यों उपलब्धि एवं स्थितियों में वही एक मात्र भाव बनाये रखना पड़ेगा।

🔵 प्रभु से हमारी दूरी, दुःख, वेदना, क्लान्ति आदि इसलिए है कि हम अपने अहं को मिटा नहीं पात। यह अहं ही हमारे और उनके बीच में दीवार बन बैठा हे जो अपनी स्वतंत्र सत्ता शक्ति सामर्थ्य से उस अखण्ड, सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान को पाने की मिथ्या कल्पना करता है और हमें उनसे दूर रखता हैं इसलिए अहंकार को उसके उच्च शिखर से उतार कर निम्न स्थिति में ले जाना होगा। सकल विश्व के साथ समानता एवं एकता रखकर अपने आपको सब के पीछे ले जाकर खड़ा करना होगा सबसे नीचे बैठना होगा। हम अकिंचनता और दीनता में प्रभु की कृपा दृष्टि पाकर सदा के लिए उनके बन जायेगा। जब हम सब प्राणिमात्र के साथ बैठे है एकता स्थापित करते हैं अपने अहंकार को कम करके परमात्मा के हाथों में अपना समर्पण करते हैं तभी हम उस ब्रह्म की गोद में बैठने के अधिकारी बनते है।

🔴 ब्रह्म साक्षात्कार के लिए अपने ज्ञान की विशुद्धि शक्ति के सचेष्टता के साथ-साथ अपना आत्म संपर्क उस परम सत्ता में करना होगा। अहंकार को मारना होगा। अपने को उस प्रभु के हृदय देश में स्थापित कर उसी की इच्छा से सर्व क्रिया कलाप जारी रखना होगा। अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसमें निवेदित करना होगा। अहंकार, स्वार्थ, तुच्छता संकीर्णता को त्याग नम्रताशील, सामंजस्य, उदारता की साधना करनी होगी। अकिंचन भाव से परमात्मा सत्ता को सर्वत्र स्वीकार करते हुए भेद, विविधता ऊंच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा।

🌹 समाप्त
🌹 श्री स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1961 पृष्ठ 12

👉 आज का सद्चिंतन 4 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 Sep 2017


👉 क्रोध पर नियंत्रण

🔴 एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता, प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी -थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।

🔵 वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की और बैठ गया उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।

🔴 राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है। काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिरा के वापस सामने बैठ गया ।

🔵 अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है, मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है अब मैं इसे नही छोड़ूंगा अब ये जब वापस आएगा तो में इसे खत्म कर दूंगा। इस प्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है।

🔴 काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

🔵 तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द-बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहाँ से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।

🔴 क्योकि उस डाली पर एक भयानक अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी।

🔵 राजा के मन में पश्चॉत्ताप का समन्दर उठने लगता है की हे प्रभु ! यह मैंने क्या कर दिया, जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया। काश मैने सन्तों के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता, अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नही जाती।

🔴 हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया?? हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है। मित्रो इसीलिये कहा गया हैं कि क्षमा औऱ दया धारण करने वाला ही सच्चा वीर होता है क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ-साथ अपने खुद का ही अधिक नुकसान कर देता है।

🔵 क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमें हमेशा अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिये।