मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

👉 तृप्‍ति के क्षण

🔶 एक छोटा सा फकीर का झोंपड़ा था। रात थी, जोर से वर्षा होती थी। रात के बारह बजे होंगे फकीर और उसकी पत्‍नी दोनों सोते थे। किसी आदमी ने दरवाजे पर दस्‍तक दी। छोटा सा झोंपड़ा कोई शायद शरण चाहता था। उसकी पत्‍नी से उसने कहा कि द्वार खोल दें, कोई द्वार पर खड़ा है, कोई यात्री कोई अपरिचित मित्र। सुनते है उसकी बात, उसने कहां, कोई अपरिचित मित्र, हमारे तो परिचित है, वह भी मित्र नहीं है। उसने कहां की कोई अपरिचित मित्र, प्रेम का भाव है।

🔷 कोई अपरिचित मित्र द्वार पर खड़ा है, द्वार खोल उसकी पत्‍नी ने कहां, लेकिन जगह तो बिलकुल नहीं है। हम दो के लायक ही मुश्‍किल से है। कोई तीसरा आदमी भीतर आयेगा तो हम क्‍या करेंगे।

🔶 उस फकीर ने कहा, पागल यह किसी अमीर का महल नहीं है, जो छोटा पड़ जाये। यह गरीब को झोंपड़ा है। अमीर का महल छोटा पड़ जाता है। हमेशा एक मेहमान आ जाये तो महल छोटा पड़ जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है।

🔷 उसकी पत्‍नी ने कहां—इसमे झोपड़ी.. अमीर और गरीब का क्‍या सवाल है? जगह छोटी है। उस फकीर ने कहा कि जहां दिल में जगह बड़ी हो वहां, झोपड़ी महल की तरह मालूम हो जाती है। और जहां दिल में छोटी जगह हो, वहां झोंपड़ा तो क्‍या महल भी छोटा और झोंपड़ा हो जाता है।द्वार खोल दो, द्वार पर खड़े हुए
आदमी को वापस कैसे लौटाया जा सकता है? अभी हम दोनों लेटे थे, अब तीन लेट नहीं सकेंगे,तीन बैठेंगे। बैठने के लिए काफी जगह है।

🔶 मजबूरी थी, पत्‍नी को दरवाजा खोल देना पडा। एक मित्र आ गया, पानी से भीगा हुआ। उसके कपड़े बदले और वे तीनों बैठ कर गपशप करने लग गये। दरवाजा फिर बंद कर दिया।

🔷 फिर किन्‍हीं दो आदमियों ने दस्‍तक दी। अब उस मित्र ने उस फकीर को कहा, वह दरवाजे के पास था, कि दरवाजा खोल दो। मालूम होता है कि कोई आया है। उसी आदमी ने कहा, कैसे खोल दूँ दरवाजा, जगह कहां हे यहां।

🔶 वह आदमी अभी दो घड़ी पहले आया था खुद और भूल गया वह बात की जिस प्रेम ने मुझे जगह दी थी। वह मुझे जगह नहीं दी थी, प्रेम था उसके भीतर इस लिए जगह दी थी। अब कोई दूसरा आ गया जगह बनानी पड़ेगी। लेकिन उस आदमी ने कहा, नहीं दरवाजा खोलने की जरूरत नहीं; मुश्‍किल से हम तीन बैठे हे। वह फकीर हंसने लगा। उसने कहां, बड़े पागल हो। मैंने तुम्‍हारे लिए जगह नहीं की थी। प्रेम था, इसलिए जगह की थी। प्रेम अब भी है, वह तुम पर चुक नहीं गया और समाप्‍त नहीं हो गया। दरवाजा खोलों, अभी हम दूर-दूर बैठे है।

🔷 फिर हम पास-पास बैठ जायेंगे।  पास-पास बैठने के लिए काफी जगह है। और रात ठंडी है, पास-पास बैठने में आनंद ही और होगा।

🔶 दरवाजा खोलना पडा। दो आदमी भीतर आ गये। फिर वह पास-पास बैठकर गपशप करने लगे। और थोड़ी देर बीती है और रात आगे बढ़ गयी है और वर्षा हो रही है ओर एक गधे ने आकर सर लगाया दरवाजे से। पानी में भीग गया था। वह रात शरण चाहता था।

🔷 उस फकीर ने कहा कि मित्रों, वे दो मित्र दरवाजे पर बैठे हुए थे जो पीछे आये थे; दरवाजा खोल दो, कोई अपरिचित मित्र फिर आ गया। उन लोगों ने कहा, वह मित्र वगैरह नहीं है, वह गधा है। इसके लिए द्वार खोलने की जरूरत नहीं है। उस फकीर ने कहा कि तुम्‍हें शायद पता नहीं, अमीर के द्वार पर आदमी के साथ भी गधे जैसा व्‍यवहार किया जाता है। यह गरीब की झोपड़ी है, हम गधे के साथ भी आदमी जैसा व्‍यवहार करेने की आदत भर हो गई है। दरवाजा खोल दो। पर वे दोनों कहने लगे, जगह। उस फकीर ने कहा, जगह बहुत है; अभी हम बैठे है, अब खड़े हो जायेंगे। खड़े होने के लिए काफी जगह है। और फिर तुम घबडाओं मत, अगर जरूरत पड़ेगी तो मैं हमेशा बहार होने के लिए तैयार हूं। प्रेम इतना कर सकता है।

🔶 एक लिविंग एटीट्यूड, एक प्रेमपूर्ण ह्रदय बनाने की जरूरत है। जब प्रेम पूर्ण ह्रदय बनता है।तो व्‍यक्‍तित्‍व में एक तृप्‍ति का भाव एक रसपूर्ण तृप्‍ति.....।

🔷 क्‍या आपको कभी ख्‍याल है कि जब भी आप किसी के प्रति जरा-से प्रेमपूर्ण हुए, पीछे एक तृप्‍ति की लहर छूट गयी है। क्‍या आपको कभी भी खयाल है कि जीवन में तृप्‍ति के क्षण वही रहे है। जो बेशर्त प्रेम के क्षण रहे होंगे। जब कोई शर्त न रही होगी प्रेम की। और जब आपने रास्‍ते चलते एक अजनबी आदमी को देखकर मुस्कुरा दिया होगा - उसके पीछे छूट गयी तृप्‍ति का कोई अनुभव है? उसके पीछे साथ आ गया एक शांति का भाव। एक प्राणों में एक आनंद की लहर का कोई पता है। जब राह चलते किसी आदमी को उठा लिया हो, किसी गिरते को संभाल लिया हो, किसी बीमार को एक फूल दे दिया हो। इसलिए नहीं कि वह आपकी मां है, इसलिए नहीं की वह आपका पिता है। नहीं वह आपका कोई नहीं है। लेकिन एक फूल किसी बीमार को दे देना आनंद पूर्ण है।

🔶 व्‍यक्‍तित्‍व में प्रेम की संभावना बढ़ती जानी चाहिए। वह इतनी बढ़ जानी चाहिए—पौधों के प्रति, पक्षियों के प्रति पशुओं के प्रति, आदमी के प्रति, अपरिचित के प्रति, अंजान लोगों के प्रति, विदेशियों के प्रति, जो बहुत दूर है उसके प्रति, प्रेम हमारा बढ़त चला जाए..........................................

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 28 Feb 2018


👉 सुखद और सरल सत्य ही है

🔶 नि:संदेह सत्य का मार्ग उतना कठिन नहीं है। जितना दीखता है। जो वस्तु व्यवहार में नहीं आती, जिससे हम दूर रहते हैं, वह अजनबी, विचित्र तथा कष्टïसाध्य लगती है, पर जब वह समीप आती है, तो वह स्वाभाविक एवं सरल बन जाती है। चूँकि हमारे जीवन में झूठ बोलने की आदत ने गहराई तक अपनी जड़ जमा ली है। बात-बात में झूठ बोलते हैं। बच्चों की हँसी-जिन्दगी में, शेखी बघारने के लिए, लोगों को आश्चर्य में डालने के लिए अक्सर अतिरंजित बात कही जाती है। इनसे कुछ विशेष लाभ होता हो, या कोई महत्त्वपूर्ण स्वार्थ सधता हो, सो बात भी नहीं है, पर यह सब आदत में सम्मिलित हो गया है, इसलिए अनजाने ही हमारे मुँह से झूठ निकलता रहता है।
  
🔷 वेदों में स्थान-स्थान पर सत्य की महत्ता को समझाया गया है और सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठï बनने के लिए प्रेरणा दी गयी है। सत्य का मार्ग चलने में सरल है। यह मार्ग संसार सागर से तरने के लिए बनाया गया है। यही मार्ग द्युलोक तक गया है।
  
🔶 स्वार्थ के लिए, आर्थिक लाभ के लिए, व्यापार में झूठ बोलना तो आज उचित ही नहीं, एक आवश्यक बात भी समझी जाने लगी है। ग्राहक को भाव बताने में अक्सर दुकानदार झूठ बोलते हैं। घटिया को बढिय़ा बताते हैं, चीज के दोषों को छिपाते हैं और गुणों को अतिरंजित करके बताते हैं, जिनसे भोला ग्राहक धोखे में आकर सस्ती और घटिया चीज को बढिय़ा समझ कर अधिक पैसे में खरीद ले। दुकानदार की इस आमप्रवृत्ति को, ग्राहक भी समझने लगे हैं और वे मन ही मन दुकानदार को झूठा, ठग तथा अविश्वस्त मानते हैं। उसकी बात पर जरा भी विश्वास नहीं करते। अपनी निज की समझ का उपयोग करते हैं, दुकानदार की सलाह को ठुकरा देते हैं, दस जगह घूमकर भाव-ताव मालूम करते हैं। चीजों का मुकाबला करते हैं, तब अंत में वस्तु को खरीदते हैं।

🔷 यह व्यापारी के लिए एक बड़ी लज्जा की बात है कि उसे आमतौर से झूठा और बेईमान समझा जाय, उसकी प्रत्येक बात को अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखा जाय। ऐसे लोग भले ही लाभ कमाते हैं, पर वस्तुत: मानव के मूल्यांकन में ये बहुत ही निर्धन, निम्र स्तर के तथा घटिया लोग हैं। जिसे अविश्वस्त समझा जाय, जिनकी नीयत पर संदेह किया जाय, जिसे ठग, धोखेबाज और बहकाने वाला माना जाय, वह नि:संदेह अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खो चुका। इतनी कीमती वस्तु खोकर यदि किसी ने धन कमा भी लिया, तो इसमें न कोई गौरव की बात है और न प्रसन्नता की। अपना सामाजिक सम्मान खोकर कई लोग धन कमा लेते हैं। लुच्चे, लफंगे, जेबकट और लुटेरे भी अपनी उस्तादी से बहुत पैसे बनाते हैं। और मौज की छानते हैंं। क्या इनकी प्रशंसा की जायेगी? क्या इनका कोई सराहनीय सामाजिक स्तर गिना जायेगा? नहीं, विचारशील क्षेत्रों में इन्हें निम्रकोटि का इन्सानियत से गिरा हुआ व्यक्ति ही गिना जायेगा। ऐसी कमाई, जिससे मनुष्य घृणास्पद बनता हो, अपना आत्म-सम्मान खोता हो, धिक्कार के ही योग्य है। असत्यवादी चाहे वह अपनी चालाकी से किसी क्षेत्र में कितनी ही सफलता क्यों न प्राप्त कर सका हो, धिक्कार योग्य ही माना जायेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों द्वारा जीवन लक्ष्य की प्राप्ति (भाग 1)

🔶 प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों द्वारा ही अपना आत्म निर्माण करता है। क्योंकि विचार का बीज ही समयानुसार फलित होकर गुणों का रूप धारण करता है और वे गुण, मनुष्य के दैनिक जीवन में कार्य बनकर प्रकट होते रहते हैं। विचार ही वह तत्व है जो गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में, दृष्टिगोचर होता है। मन, कर्म, वचन में विचारों का ही प्रतिबिम्ब सदा परिलक्षित होता रहता है।

🔷 मानव मनोभूमि में सत् और असत् दो प्रकार के संकल्प काम करते रहते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही ओर मन चलता रहता है। इस द्विधा में जिधर रुचि अधिक हुई, उधर ही प्रकृतियां बढ़ जाती है। यदि असत मार्ग पर चला गया तो अपयश, द्वेष, चिन्ता, दैवी प्रकोप, शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता दरिद्रता एवं अप्रतिष्ठा प्राप्त होती है। और यदि सत मार्ग का अनुगमन किया गया तो प्रशंसा, प्रतिष्ठा, प्रेम, सहयोग, संतोष, दीर्घ जीवन, शारीरिक और आत्मिक बलिष्ठता एवं सदा आनन्द ही आनन्द का रसास्वादन होता है। दो प्रकार के विचार ही मनुष्य समाज को दो भागों में बाँटते हैं। सुखी-दुखी, रोगी-निरोगी, दरिद्र-सम्पन्न, दृष्ट-सज्जन, पापी-पुण्यात्मा, निन्दित-पूज्य, प्रसन्न-चिन्तित आदि द्विविधि श्रेणियाँ केवल मात्र द्विविधि विचारों द्वारा ही विनिर्मित होती हैं।

🔶 अधिक संख्या में जनसमुदाय का मानसिक धरातल परिमार्जित नहीं होता, उसमें पाश्विक वृत्तियों की प्रधानता रहती हैं। अविवेक, अज्ञान, अदूरदर्शिता, संकुचित स्वार्थपरायणता, लोभ विषय विकारों में आसक्ति एवं निकृष्ट कोटि के मनोरंजन की अभिलाषाओं से मनः दोष भरा रहता है। जिससे उसके सोचने, कार्य करने और आनंद लाभ करने की परिधि ऐसी सीमित हो जाती है जिसमें बुराई, तामसिकता एवं अशान्ति ही उत्पन्न हो सकती है। इसी कटघरे में अधिकाँश लोग बंद रहते हैं माया का यह घेरा मनुष्य को बुरी तरह जकड़े रहता है। वह जकड़ा हुआ प्राणी पराधीनता जन्म नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त करता रहता है। यही भव बन्धन है।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1950 पृष्ठ 15-16
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.15

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 1)

🔷 पिछली भूलों का परिमार्जन, वर्तमान का परिष्कृत निर्धारण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो इसके लिए विचार संस्थान पर दृष्टि जमानी चाहिए। इस मान्यता को सुस्थिर करना चाहिए कि समस्त समस्याओं का उद्गम भी यही है और समाधान भी इसी क्षेत्र में सन्निहित है। यह सोचना सही नहीं है कि धन-वैभव के बाहुल्य से मनुष्य सुखी एवं समुन्नत बनता है। इसलिए सब छोड़कर उसी का अधिकाधिक अर्जन जैसे भी संभव हो करना चाहिए। इस भ्रान्ति से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके, उतना ही उत्तम है।

🔶 शरीर की बलिष्ठता और चेहरे की सुन्दरता का अपना महत्त्व है। धन की भी उपयोगिता है और उसके सहारे शरीर यात्रा के साधन जुटाने में सुविधा रहती है। इतने पर भी यह तथ्य भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का स्तर और स्वरूप चिन्तन क्षेत्र के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व का स्तर ही वस्तुतः किसी के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण होता है। उसी के अनुरूप भूतकाल बीता है, वर्तमान बना है और भविष्य का निर्धारण होने जा रहा है। उसकी उपेक्षा करने पर भारी घाटे में रहना पड़ता है। स्वास्थ्य का, शिक्षा का, प्रतिभा का, सम्पदा का, पद-अधिकार का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, पर उनका लाभ मात्र सुविधा संवर्धन तक सीमित है। यह सम्पदा अपने लिए तथा दूसरों के लिए मात्र निर्वाह सामग्री ही जुटा सकती है, पर इतने भर से बात बनती नहीं। आखिर शरीर ही तो व्यक्तित्व नहीं है? आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता? कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन्न ही सब कुछ बन गये होते। तब महामानवों की कहीं कोई पूछ न होती, न आदर्शों का स्वरूप कहीं दृष्टिगोचर होता और न मानवी गरिमा का प्रतिनिधित्व करने वाले महामानवों की कहीं आवश्यकता-उपयोगिता समझी जाती।

🔷 समझा जाना चाहिए कि व्यक्ति या व्यक्तित्व का सार तत्व उसके मनःसंस्थान में केन्द्रीभूत है। अन्तःकरण, अन्तरात्मा आदि नामों से इसी क्षेत्र का वर्णन-विवेचन किया जाता है। शास्त्रकारों ने ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षये’’ ‘‘आत्मैव आत्मनः बन्धु आत्मैव रिपुरात्मनः’’ ‘‘उद्धरेदात्मनात्मानम् नात्मानमवसादयेत्’’ आदि अभिवचनों में एक ही अंगुलि निर्देश किया है कि मन के महत्त्व को समझा जाय और उसके निग्रह के, परिशोधन-परिष्कार के निमित्त संकल्पपूर्वक साधनारत रहा जाय। मन को जानने की उपमा विश्व विज्ञान से दी गई है। जो अपने ऊपर शासन कर सकता है, वह सबके ऊपर शासन करेगा इस कथन में बहुत कुछ तथ्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 28 Feb

🔷 Family life is best for most of us. But it is so, subject to condition that one develops and gives a proper decorum to all the members. Parents will have to bear the responsibility of mutual harmony, education, manners. Love and affection and also observe proper development of children. Marriage is not simply a atmosphere of  physical relation but a team for moral and spiritual progress in a blissful way.

🔶 What are needed for a happy blissful life are good health, ability and high moral values. One should develop all this by constant practice. Instead of planning for high ambitions, one should go on earning virtues and distributing side by side to other needy. Self satisfaction in the availing – circumstances is an art in life. Beyond sensual pleasures, there are other higher dimensions for growth in life, which can easily be attained under discipline and ethos.

🔷 Man has control on his destiny. Based on practice of virtues and velour. Nothing is beyond his reach. There is along history that man has earned great height through his hard work and intellect, why you can not. Be sure you have every thing in you in a seed form. But you will have to grow that. That is the royal path which leads historic people to their summits. Thoughts are the power to push you up to great success of life. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 17)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 इसलिए मित्रो! इन लोगों से हमारा क्या बनने वाला है? क्या करेंगे हम इन मुरदा आदमियों का? इनसे हमारा कुछ काम नहीं बनेगा। हमको जीवट वाले आदमियों को तलाश करना पड़ेगा। अतः आपको जहाँ कहीं भी जीवट वाले आदमी मिलें, आप वहाँ जाना। हमारा संदेश लेकर के जाना और कहना कि हम आपकी तलाश करते रहे हैं। हम इसलिए तलाश करते रहे हैं कि हमारा ये ख्याल था, भगवान् जाने सही था या गलत था कि आपके अंदर जीवट नाम की कोई चीज है। इस जन्म की नहीं, तो पहले जन्म की है।

🔷 कभी भी हमारी इन आँखों ने चमक में धोखा नहीं खाया है। आपके बारे में हमने अपने मन में यह ख्याल बना करके रखा था कि आप जिंदा इंसानों में से हैं और आपके अंदर दरद नाम की कोई चीज है। आपके अंदर विवेक नाम की कोई चीज है और आपके अंदर तड़प नाम की कोई चीज है। अगर हमको ये चीजें न मालूम पड़ें, तो फिर मुरदे आदमियों को ढोने में क्या आनंद आता है? लाशों को ढो-ढोकर हम कहाँ डालेंगे? सड़े हुए बदबूदार आदमियों को हम कहाँ कंधे पर लिए फिरेंगे? मित्रो! इनको हम बैकुंठ का रास्ता कैसे दिखा देंगे? इनको हम स्वर्ग की कहानी कैसे कह देंगे? भगवान् से मिलने की बात हम कैसे कह देंगे?

🔶 मित्रो! हम सड़े हुए मनुष्यों और मरे हुए मनुष्यों की मनोकामना पूर्ण करने की जिम्मेदारी कैसे उठा लेंगे? हमारे लिए यह बिलकुल असंभव था, नामुमकिन था। हमारा एक ही ख्याल था कि आप लोग जिंदा आदमी हैं। अगर आप वास्तव में जिंदा आदमी हैं, तो यहाँ से जाने के बाद जिंदा आदमियों के तरीके से अपनी जिंदगी जीना। विवेकशील लोगों के तरीके से जीना, विचारशील और भावनाशील लोगों के तरीके से जीना, दिलवाले आदमियों के तरीके से जीना। अगर आप इस तरह से जिएँ, तो फिर तलाश करना और यदि कहीं कोई जिंदा आदमी दिखाई पड़े, तो आप उसके आस-पास चक्कर काटना। आप इस तरीके से चक्कर काटना, जिस तरीके से भौंरा खिले हुए फूल के पास चक्कर काटता है। खिले हुए फूल के आस-पास तितलियाँ और मधुमक्खियाँ चक्कर काटती हैं, जैसे हम बराबर आपके पास चक्कर काटते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 53)

👉 भावनाओं का हो सद्गुरु की पराचेतना में विसर्जन

🔶 इस भाव सत्य से जुड़ा एक बहुत ही प्रेरक प्रसंग है। यह प्रसंग श्री श्रीरामकृष्ण परमहंस देव के गृही शिष्य श्री रामचन्द्र दत्त के जीवन का है। श्री दत्त महाशय की भक्ति अपने गुरु के प्रति बढ़ी-चढ़ी थी; परन्तु इसी के साथ उनमें सांसारिक बुद्धि की भी छाया थी। उनमें अपनी विद्या-बुद्धि एवं धन-पैसे का अहंकार भी था। उनके संदर्भ में एक बात और उल्लेखनीय है कि श्री परमहंस देव के संन्यासी शिष्य स्वामी अद्भुतानन्द पहले इन्हीं के यहाँ नौकरी करते थे। इन अद्भुतानन्द को श्री रामकृष्ण के भक्त समुदाय में लाटू महाराज के नाम से जाना जाता है। दत्त महाशय ने ही उन्हें ठाकुर से मिलवाया था। बाद में उनकी भक्ति भावना को देखकर उन्हें ठाकुर की सेवा में अर्पित कर दिया।
  
🔷 यही दत्त महाशय एक दिन श्री श्री ठाकुर के पास दक्षिणेश्वर आये हुए थे। स्वाभाविक रूप से वे अपने साथ अपने गुरुदेव के लिए कुछ फल-मिठाइयाँ एवं कुछ अन्य सामान लाये हुए थे। ठाकुर ने स्वभावतः यह सामान युवा भक्त मण्डली में बाँट दिया। उन्हें इस तरह सामान बाँटते देखकर दत्त महाशय थोड़ा कुण्ठित हो गये। उन्हें लगा कि इतना कीमती सामान और इन्होंने इन लड़कों में बाँट दिया। अच्छा होता कि ये इस सबको अपने लिए रख लेते और बहुत दिनों तक इसका उपयोग करते रहते। उनकी ये सांसारिक भावनाएँ ठाकुर से छिपी नहीं रहीं। जिस समय वे यह सब सोच रहे थे, उस समय शाम का समय था और वे परमहंस देव के पास बैठे उनके पाँव दबा रहे थे।
  
🔶 इन भावनाओं के उनके मन में उठते ही श्री श्रीरामकृष्ण देव ने अपने पाँव से उनके हाथ झटक दिये और बाँटने से बचा हुआ उनका सामान उनके पास फेंकते हुए बोले-तू अब जा यहाँ से। मैं तुझे अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। रही बात उस सामान की, जो तू अब तक यहाँ लाया करता था, वह भी और उससे ज्यादा तुझे मिल जायेगा। मैं माँ से प्रार्थना करूँगा कि वह सब कुछ बल्कि उससे बहुत ज्यादा तुझे लौटा दे। अचानक ठाकुर में आये इस भाव परिवर्तन से दत्त महाशय तो हतप्रभ रह गये; पर साथ ही वे यह भी समझ गये कि अन्तर्यामी ठाकुर ने उनके मन में उठ रही सभी भावनाओं को जान लिया है।
  
🔷 पर अब किया भी क्या जा सकता था? शाम गहरी हो गयी थी। वापस कलकत्ता भी नहीं लौट सकते थे। वैसे भी ऐसे मनःस्थिति में वह कलकत्ता लौटना भी नहीं चाहते थे। बस भरे हुए मन से सोचा ठाकुर के द्वारा तिरस्कृत जीवन अब किस काम का? और उनके अन्दर उमड़ आयी भक्ति भावना ने यह प्रेरणा दी कि क्यों न माँ के मन्दिर के पास बैठकर ठाकुर के नाम का जप किया जाय। बस ‘ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय’ उनके कण्ठ से, प्राणों से और हृदय से बहने लगा। उनकी भावनाएँ अपने दिव्य गुरु में विलीन होने लगी। रात गहरी होती गयी और वह अपने सद्गुरु की पराचेतना में विलीन होते गये। भाव विलीनता इतनी प्रगाढ़ हुई कि शिष्यवत्सल श्री परमहंस देव स्वयं उनके पास आ गये और बोले-चल तेरा परिमार्जन हो गया। श्री ठाकुर के चरणों को अपने आँसुओं से धोते दत्त महाशय अनुभव कर रहे थे कि सद्गुरु की पराचेतना ही चिंतनीय-मननीय है। इस सत्य को हम भी अनुभव कर सकते हैं।                                 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 87