मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 1)

🔷 पिछली भूलों का परिमार्जन, वर्तमान का परिष्कृत निर्धारण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो इसके लिए विचार संस्थान पर दृष्टि जमानी चाहिए। इस मान्यता को सुस्थिर करना चाहिए कि समस्त समस्याओं का उद्गम भी यही है और समाधान भी इसी क्षेत्र में सन्निहित है। यह सोचना सही नहीं है कि धन-वैभव के बाहुल्य से मनुष्य सुखी एवं समुन्नत बनता है। इसलिए सब छोड़कर उसी का अधिकाधिक अर्जन जैसे भी संभव हो करना चाहिए। इस भ्रान्ति से जितनी जल्दी छुटकारा पाया जा सके, उतना ही उत्तम है।

🔶 शरीर की बलिष्ठता और चेहरे की सुन्दरता का अपना महत्त्व है। धन की भी उपयोगिता है और उसके सहारे शरीर यात्रा के साधन जुटाने में सुविधा रहती है। इतने पर भी यह तथ्य भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का स्तर और स्वरूप चिन्तन क्षेत्र के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व का स्तर ही वस्तुतः किसी के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण होता है। उसी के अनुरूप भूतकाल बीता है, वर्तमान बना है और भविष्य का निर्धारण होने जा रहा है। उसकी उपेक्षा करने पर भारी घाटे में रहना पड़ता है। स्वास्थ्य का, शिक्षा का, प्रतिभा का, सम्पदा का, पद-अधिकार का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, पर उनका लाभ मात्र सुविधा संवर्धन तक सीमित है। यह सम्पदा अपने लिए तथा दूसरों के लिए मात्र निर्वाह सामग्री ही जुटा सकती है, पर इतने भर से बात बनती नहीं। आखिर शरीर ही तो व्यक्तित्व नहीं है? आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता? कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन्न ही सब कुछ बन गये होते। तब महामानवों की कहीं कोई पूछ न होती, न आदर्शों का स्वरूप कहीं दृष्टिगोचर होता और न मानवी गरिमा का प्रतिनिधित्व करने वाले महामानवों की कहीं आवश्यकता-उपयोगिता समझी जाती।

🔷 समझा जाना चाहिए कि व्यक्ति या व्यक्तित्व का सार तत्व उसके मनःसंस्थान में केन्द्रीभूत है। अन्तःकरण, अन्तरात्मा आदि नामों से इसी क्षेत्र का वर्णन-विवेचन किया जाता है। शास्त्रकारों ने ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षये’’ ‘‘आत्मैव आत्मनः बन्धु आत्मैव रिपुरात्मनः’’ ‘‘उद्धरेदात्मनात्मानम् नात्मानमवसादयेत्’’ आदि अभिवचनों में एक ही अंगुलि निर्देश किया है कि मन के महत्त्व को समझा जाय और उसके निग्रह के, परिशोधन-परिष्कार के निमित्त संकल्पपूर्वक साधनारत रहा जाय। मन को जानने की उपमा विश्व विज्ञान से दी गई है। जो अपने ऊपर शासन कर सकता है, वह सबके ऊपर शासन करेगा इस कथन में बहुत कुछ तथ्य है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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