रविवार, 8 अप्रैल 2018

👉 रामकृष्ण परमहंस और माँ काली

🔶 रामकृष्ण भी मरते वक्त कैंसर से मरे। गले का कैंसर था। पानी भी भीतर जाना मुश्किल हो गया, भोजन भी जाना मुश्किल हो गया। तो विवेकानंद ने एक दिन रामकृष्ण को कहा कि आप, आप कह क्यों नहीं देते काली को, मां को? एक क्षण की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा! तो रामकृष्ण हंसते, कुछ बोलते नहीं।

🔷 एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण ने कहा, तू समझता नहीं। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है।

🔶 विवेकानंद ने कहा कि न इतना कहें, इतना ही कह दें कम से कम कि गला इस योग्य तो रहे जीते जी कि पानी जा सके, भोजन जा सके! हमें बड़ा असह्य कष्ट होता है। तो रामकृष्ण ने कहा, आज मैं कहूंगा।

🔷 सुबह जब वे उठे, तो बहुत हंसने लगे और उन्होंने कहा, बड़ी मजाक रही। मैंने मां को कहा, तो मां ने कहा कि इसी गले से कोई ठेका है? दूसरों के गलों से भोजन करने में तुझे क्या तकलीफ है? तो रामकृष्ण ने कहा कि तेरी बात में आकर मुझे तक बुद्ध बनना पड़ा है! नाहक तू मेरे पीछे पड़ा था। और यह बात सच है, जाहिर है, इसी गले का क्या ठेका है? तो आज से जब तू भोजन करे, समझना कि मैं तेरे गले से भोजन कर रहा हूँ।

🔶 फिर रामकृष्ण बहुत हंसते थे उस दिन, दिन भर। डाक्टर आए और उन्होंने कहा, आप हंस रहे हैं? और शरीर की अवस्था ऐसी है कि इससे ज्यादा पीड़ा की स्थिति नहीं हो सकती! रामकृष्ण ने कहा, हंस रहा हूं इससे कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया कि मुझे खुद खयाल न आया कि सभी गले अपने हैं। सभी गलों से अब मैं भोजन करूंगा! अब इस एक गले की क्या जिद करनी है।

👉 Importance of daily worship

🔶 It isn’t right to completely omit or give up the daily routine of prayer to God. Even if one finds it uninteresting, he/she should make determined and relentless efforts to include worship in their daily routine.

🔷 Whenever someone has been able to attain spiritual power or inner powers, their faith and worship have always been contributory factors in one way or another.  We should remember and contemplate on the Supreme Being who is omnipresent, impartial, just and the one who gets
pleased or displeased depending only on the qualities of person’s thoughts and actions.

🔶 The daily worship of that Supreme Being must be done in one form or another, even if it may be only a fifteen-minute slot on waking up or just before going to bed. This is a matter of having interest in it rather than having a spare time to be able to do it.

🔷 As soon as one gets interested in daily worship, they will start to enjoy it and what is more, they will also find some spare time to do it however busy their life may be!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (5.9)

👉 उपासना का महत्व

🔶 ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में से बिल्कुल हटा देना किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए।

🔷 आत्म-शक्ति जब कभी जिस किसी को प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह-पन्द्रह मिनट तक ही सर्वव्यापक, निष्पक्ष, न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप में दैनिक उपासना तो किया करें।

🔶 इसमें प्रश्न फुरसत का नहीं, अभिरुचि का है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग में आनन्द आने लगता है और फुरसत भी मिलने लगती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.९)

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 9 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 9 April 2018


👉 श्रद्धा और निष्ठा

🔶 बहुत-से व्यक्ति थे जो पहले सिद्धान्तवाद की राह पर चले और भटक कर कहाँ से कहाँ पहुँचे? भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको! मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य तपस्वी थे। पहले जब उन्होंने उपासना-साधना शुरू की थी, तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गए थे। तप और पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे, लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गए। भस्मासुर का क्या हो गया? जिसको प्रलोभन सताते हैं वे भटक जाते हैं और कहीं के मारे कहीं चले जाते हैं।
 
🔷 साधु-बाबाजी जिस दिन घर से निकलते हैं, उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है, महात्मा बनना है, ऋषि बनना है, तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े दिनों बाद वह जो उमंग होती है, वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खींचते हैं। किसी की बहिन-बेटी की ओर देखते हैं, किसी से पैसा लेते हैं। किसी को चेला-चेली बनाते हैं। किसी की हजामत बनाते हैं। फिर जाने क्या से क्या हो जाता है? पतन का मार्ग यहीं से आरम्भ होता है। ग्रेविटी-गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है।
 
🔶 संसार भी एक ग्रेविटी है। आप लोगों से सबसे मेरा यह कहना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत। रोज सबेरे उठकर भगवान के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिए कि हमने किन सिद्धान्तों के लिए समर्पण किया था? और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धान्तों के आधार पर उठाया था? उन सिद्धान्तों को रोज याद कर लिया कीजिए। रोज याद किया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में और उस निष्ठा में, उस संकल्प और उस त्यागवृत्ति में कहीं फर्क तो नहीं आ गया। संसार में हमको खींच तो नहीं लिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 King JanaShruti and Saint Raikya

🔶 King Janashruti had obtained the ability to understand bird's language. One morning he heard a pair of swans talking to each other. One of them said, "I consider Saint Raikya to be even greater than King Janashruti, since the saint is always engaged in helping out others." Hearing this, the King felt offended. The next day he called for saint Raikya, who used to drive a chariot for a living. The King offered many gifts to the saint and said, "I have heard great praise about you.

🔷 Will you please teach me the spiritual science?" The saint's reply was very simple, "O King, if you truly wish to learn spirituality, make yourself pious from the inside. Suppress your ego and be meek and you shall attain true wisdom." The King realized his folly. He corrected himself and instead of boasting about his achievements he tried to develop true greatness from within.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 7)

🔶 रामू के बारे में सुना है न आपने। रामू नाम का एक लड़का था। आगरा जिले के भेड़ियों की माँद में पाया गया इनसान का बच्चा था। भेड़िये उठा के ले गए; पर खाया नहीं, पाल लिया उन्होंने। शिकारियों ने भेड़ियों को मार करके उस रामू मनुष्य के बच्चे को पकड़ लिया। फिर क्या हुआ? वह जंगली जानवरों के तरीके से रहता था। बोलता भी वैसे ही था, चलता भी वैसे ही था। कच्चा माँस खाता था। कुछ भी नहीं आया। उसको लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कर दिया गया। चौदह वर्ष की उम्र तक जिया; लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी कुछ नहीं आया, कुछ बन नहीं सका। क्यों? क्योंकि छोटी उम्र में संस्कार नहीं डाले गये थे।

🔷 संस्कार डालना आदमी के लिए बेहद जरूरी है। संस्कार के बिना आदमी स्वभाव का कैसा हो सकता है? फूहड़ है, अनगढ़ है, बेहूदा है। इसलिए आपको, अपने आपको संस्कारवान स्वयं बनाना चाहिए। कौन बनाएगा? दूसरा कहाँ तक बनाएगा? बचपन में तो होता भी है। गुरुकुलों में ऋषि लोग छोटे बच्चों को महापुरुष बनाने की शिक्षा देते थे। आरण्यकों में वानप्रस्थों को भरती करने के बाद में शिक्षण देने की बात भी चलती है; पर सामान्य जीवन कैसे चले? बताइए आप।

🔶 सामान्य जीवन में कौन पीछे लगेगा आपके? एक-एक गलती, एक-एक विचारधारा, एक-एक भूल के बारे में कौन सुधार करे? इसलिए ये काम आप को स्वयं ही करना पड़ेगा। आप ही अपने गुरु हैं, आप ही अपने शिक्षक हैं और आप ही अपने साधक हैं, आप ही अपने मार्गदर्शक हैं। अगर आप यह समझ लें, तो आपके जिम्मे एक ही काम रह जाता है कि आप अपने आपको सुधारिए, आप अपने आप को सँभालिए, आप अपने आप को ठीक कीजिए और अपने भगवान के नजदीक जाइए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 84)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना

🔶 गुरुगीता शिष्यों के लिए आध्यात्मिक कल्पतरु है, जो शिष्य इसके मंत्रों के मर्म को जान लेते हैं, उन्हें जीवन की सभी आध्यात्मिक सफलताएँ मिलती हैं। इस सत्य को वे सभी अपनी अनुभूति बना सकते हैं, जिनके अन्तस् में शिष्यत्व की सजल संवेदना प्रवाहित है। शिष्यत्व उर्वर कृषि भूमि है और आध्यात्मिकता बीज। जिसे कृपालु सद्गुरु न केवल अपने शिष्यों के अन्तःकरण में बोते हैं, बल्कि इसके अंकुरण के लिए उपयोगी खाद-पानी भी जुटाते हैं। सद्गुरु तो सदा होते ही हैं—भाव संवेदनाओं की साकार मूर्ति। उन्हें तो हमेशा कृपा करना आता है। पर इसके लिए सत्पात्र भी तो हो। सुशिष्य ही सत्पात्र होते हैं। उनकी अन्तर्भूमि ही आध्यात्मिक बीजों के लिए उर्वर व उपयोगी होती है। यह उपयोगिता व उत्कृष्टता तब और सघन हो जाती है, जब उन्हें गुरुगीता की सघन आध्यात्मिक छाँव प्राप्त हो।
  
🔷 पूर्वोक्त मंत्रों में भगवान् भोलेनाथ ने शिष्यों को चेताया है कि वे कभी भी किसी भी अवस्था में सद्गुरु की अवहेलना न करें। परिस्थितियाँ कुछ भी हों, पर वे अपने सद्गुरु के प्रति न केवल शिष्ट, शालीन व विनम्र रहें, बल्कि भक्तिपूर्ण भी हों। गुरुदेव के हर कार्य का विशिष्ट अर्थ होता है। फिर यह कार्य ऊपरी तौर पर देखने से कितना ही निरर्थक क्यों न लग रहा हो। गुरु की अवहेलना करने वाला बुद्धिमान होने पर भी ब्रह्म राक्षस की तरह अभिशप्त हो जाता है। विश्व की सभी आध्यात्मिक शक्तियों के रुष्ट होने पर सद्गुरु त्राण कर लेते हैं, परन्तु गुरुदेव के रुष्ट होने पर कोई त्राणदाता नहीं मिलता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 128

👉 अपने ऊपर विश्वास कीजिए

🔶 विश्वास कीजिये कि वर्तमान निम्न स्थिति को बदल देने की सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। आप जो सोचते हैं, विचारते हैं, जिन बातों को प्राप्त करने की योजनाएँ बनाते हैं, वे आन्तरिक शक्तियों के विकास से अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।

🔷 विश्वास कीजिए कि जो कुछ महत्ता, सफलता, उत्तमता, प्रसिद्ध, समृद्धि अन्य व्यक्तियों ने प्राप्त की है, वह आप भी अपनी आन्तरिक शक्तियों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। आपमें वे सभी उत्तमोत्तम तत्व वर्तमान हैं, जिनसे उन्नति होती है। न जाने कब, किस समय, किस अवसर किस परिस्थिति में आपके जीवन का आन्तरिक द्वार खुल जाय और आप सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच जायं।

🔶 विश्वास कीजिये कि आपमें अद्भुत आन्तरिक शक्तियाँ निवास करती हैं। अज्ञानवश आप की अज्ञात, विचित्र, और रहस्यमय शक्तियों के भंडार को नहीं खोलते। आप जिस मनोबल आत्मबल या निश्चयबल का करिश्मा देखते हैं, वह कोई जादू नहीं, वरन् आपके द्वारा सम्पन्न होने वाला एक दैवी नियम है। सब में से असाधारण एवं चमत्कारिक शक्तियाँ समान रूप से व्याप्त हैं। संसार के अगणित व्यक्तियों ने जो महान् कार्य किये हैं, वे आप भी कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1948 अक्टूबर पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/October/v1.1

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 8 April 2018