सोमवार, 15 जनवरी 2018

👉 नोक वाली पेंसिल

🔶 शिवांगी शहर के प्रतिष्ठित विद्यालय में कक्षा तृतीय की छात्रा है। वह भी अन्य बच्चियों की तरह चंचल, हंसमुख शरारती बच्ची है। दशहरे के बाद विद्यालय खुलने और नये गणित के टीचर आने के बाद से सबके लिये सबकुछ पहले की तरह सामान्य है, किन्तु शिवांगी के लिये उसका प्यारा स्कूल एक भयावह जगह बन गई है।

🔷 आज करीब एक माह से वो मासूम एक नारकीय कष्ट सह रही थी, जिस दिन से उसके गणित के सर ने खेल के लिये निर्धारित पीरियड में अकेले बुलाया। उसे गणित पढ़ाने पर पढ़ाने के बजाये बच्ची को एक नर्क से परिचय करा दिया साथ ही धमकी दी की किसी से कहा तो फेल कर स्कूल से निकाल देंगे, मासूम के लिये यह धमकी काफी थी। आज फिर वही हुआ वह रोती हुई बस में चढ़ी आश्चर्य किसी ने उसके रोने का कारण नहीं पूछा।

🔶 बस से उतर घर आने पर भी किसी ने उसके उदासी का कारण नही पूछा। पड़ोस वाले भैया आये थे जिद करके शिवांगी के तीन साल के भाई को उसकी मर्जी के खिलाफ गोदी में उठा बाहर ले जा रहे थे, बच्चे ने उनकी मनमानी के विरोध में हाथ में रखी पेंसिल उनकी आँख मे डाल दी। परिणाम जो हुआ अच्छा नहीं था सब उन भैया को लेकर अस्पताल भागे माँ और पिता दोनो ने भाई एक एक थप्पड़ मार कर उसे रोता छोड़ उन भैया के परिवार के साथ हो लिये। शिवांगी शायद अपने भाई के दर्द को समझ गई उसने उसे अपने से लिपटा लिया नन्ही दीदी कछ ही पल के लिये माँ बन गई।

🔷 आज सबेरे फिर स्कूल है, गणित के पिरियड में सर ने शिवांगी को फिर बुलाया है गणित समझाने। आज खाने की छुट्टी में शिवांगी ने टिफिन खाने से ज्यादा जरूरी समझा अपनी दोनों पेंसिल की नोक तेज धार करना। खेल के पीरियड में जब गणित के सर ने बुलाया वह गई पर आज की नन्ही शिवांगी और दिनों की तरह सहमी हुई नही थी आज वह आत्भविश्वास से भरी हुई थी, हाँ वह अपनी पेंसिल साथ लेना नही भूली। कुछ ही देर में गेम्सरूम से एक भयानक दिल दहलाने वाली चीख सुनाई दी, सारे शिक्षक गेम्स रूम की तरफ भागे आश्चर्य आज सबने चीख सुनी इतने दिन बच्ची की चीख किसी ने नही सुनी थी खैर।

🔶 गेम्स रूम का दृष्य चीख से भी भयावह था, गणित के सर अर्धनग्न अवस्था में अपने दोनों हाथ अपनी आँखों पर रखे चीख रहे थे जिनसे तेजी से खून बह रहा था, और उनके ठीक सामने नन्ही शिवांगी अपने फटे हुये यूनिफाॅर्म के साथ साक्षात शिव की अर्धांगिनी बन आँखों से आंसू की जगह अंगारे बरसाती अपनी पेंसिल रूपी रक्त से भरी त्रिशूल लिये गर्व से खड़ी थी।

🔷 सर गिरफ्तार हो गये अदालत मे किसी सबूत की जरूरत नहीं पड़ी, जज नया क्या न्याय करते। नन्ही शिवांगी स्वयं साक्षी, साक्ष्य और न्याय करता बन अदालत में खड़ी थी, उसने तो न्याय कर ही दिया था जज ने और दस साल की सजा सुना दी।

🔶 अब शिवांगी निश्चिंत होकर स्कूल जाती है पर साथ में दो अतिरिक्त तेज नोक वाली पेंसिल रखना नही भूूलती

🔷 हाँ उस विद्यालय की सभी छात्राओं की मायें अपनी बेटियों के पेंसिल बाॅक्स में तेज धार की हुई दो पेंसिल याद से रख देती है इस सीख के साथ कि यह सिर्फ पेंसिल नहीं वक्त आने पर तुम्हें दुर्गा बना खुद त्रिशूल बन जायेंगी।

👉 वेश्या से तपस्विनी

🔷 आम्रपाली नामक एक वेश्या भगवान् बुद्ध को भोजन का निमन्त्रण देने गई। उनने स्वीकार कर लिया, थोड़ी देर बाद वैशाली राजवंश के लिच्छवि राजकुमार आये और उनने राजमहल में चलकर भोजन करने के लिए प्रार्थना की तो उनने कहा- मैं अम्वपानी के यहाँ भोजन की स्वीकृति दे चुका हूँ। उनने मीठे चावल और रोटी की भिक्षा प्रेम पूर्वक ग्रहण की। कुछ समय बाद वह वेश्या भी बुद्ध भगवान् के उपदेशों से प्रभावित होकर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।

🔶 पाप से घृणा करते हुए भी पापी से प्यार करके उसे सुधारा जा सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 16 Jan 2018


👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें

🔶 आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

🔷 सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

🔶 ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1973 पृष्ठ 48
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/March/v1.48

👉 अहंता का परिवर्तन

🔶 जैसे कुआँ खोदने पर जमीन में मिट्टियों के कई पर्त निकलते हैं, वैसे ही मनोभूमि की स्थिति है। उनके कार्य, गुण और क्षेत्र भिन्न-भिन्न हैं। ऊपर वाले पर्त- मन और बुद्धि हैं। मन में इच्छाएँ, वासनाएँ, कामनाएँ पैदा होती हैं, बुद्धि का काम विचार करना, मार्ग ढूँढऩा और निर्णय करना है।

🔷 स्थूल मन के प्रमुख भाग दो हैं- चित्त, अहंकार। चित्त में संस्कार, आदत, रुचि, स्वभाव, गुण की जड़ें रहती हैं। अहंकार ‘‘अपने सम्बन्ध में मान्यता’’ को कहते हैं। अपने को जो व्यक्ति धनी-दरिद्र, पापी-पुण्यात्मा, स्त्री-पुरुष, जीव-ब्रह्म आदि जैसा भी कुछ मान लेता है, वह वैसे ही अहंकार वाला माना जाता है। आत्मा के अहम् के सम्बन्ध में मान्यता का नाम ही अहंकार है। इन मन, बुद्धि, अहंकार के अनेकों भेद-उपभेद हैं और उनके गुण, कर्म, अलग-अलग हैं।
  
🔶 जैसे मन और बुद्धि का जोड़ा है, वैसे ही चित्त और अहंकार का जोड़ा है। मन में नाना प्रकार की इच्छाएँ-कामनाएँ रहती  हैं, पर बुद्धि उनका निर्णय करती है कि कौन-सी इच्छा प्रकट करने योग्य है, कौन-सी दबा देने योग्य है? इसे बुद्धि जानती है और वह सभ्यता, लोकाचार, सामाजिक नियम, धर्म, कत्र्तव्य, असम्भव आदि का ध्यान रखते हुए अनुपयुक्त इच्छाओं को भीतर दबाती रहती है। जो इच्छा कार्य रूप में लाये जाने योग्य जँचती है, उन्हीं के लिये बुद्धि अपना प्रयत्न आरम्भ करती है। इस प्रकार यह दोनों मिलकर मस्तिष्क क्षेत्र में अपना ताना-बाना बुनत रहते हैं।
  
🔷 अन्त:करण क्षेत्र में चित्त और अहंकार का जोड़ा अपना कार्य करता है। जीवात्मा अपने को जिस श्रेणी का, जिस स्तर का अनुभव करता है, चित्त में उस श्रेणी के, उसी स्तर के पूर्व संस्कार सक्रिय और परिपुष्ट रहते हैं। कोई व्यक्ति अपने को किसी वर्ग विशेष या समाज के निम्र वर्ग का मानता है, तो उसका यह अहंकार उसके चित्त को उसी जाति के संस्कारों की जड़ जमाने और स्थिर रखने के लिये प्रस्तुत रखेगा। जो गुण, कर्म, स्वभाव इस श्रेणी के लोगों के होते हैं, वे सभी उसके चित्त में संस्कार रूप से जड़ जमाकर बैठ जायेंगे। यदि उसका अहंकार अपराधी या शराबी की मान्यता का परित्याग करके लोकसेवी, महात्मा, सच्चरित्र एवं उच्च होने की अपनी मान्यता स्थिर कर ले, तो अति शीघ्र उसकी पुरानी आदतें, आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ बदल जायेंगी और वह वैसा ही बन जाएगा, जैसा कि अपने सम्बन्ध में उसका विश्वास है। अन्त:करण की एक ही पुकार से, एक ही हुंकार से, एक ही चीत्कार से जमे हुए कुसंस्कार उखड़ कर एक ओर गिर पड़ते हैं और उनके स्थान पर नये, उपयुक्त, आवश्यक, अनुरूप संस्कार कुछ ही समय में जम जाते हैं। जो कार्य मन और बुद्धि द्वारा अत्यन्त कष्ट-साध्य मालूम पड़ता था, वह अहंकार परिवर्तन की एक चुटकी में ठीक हो जाता है।
  
🔶 अहंकार तक सीधी पहुँच साधना के अतिरिक्त और किसी मार्ग से नहीं हो सकती। मन और बुद्धि को शान्त, मूर्छित अवस्था में छोडक़र सीधे अहंकार तक प्रवेश पाना ही साधना का उद्देश्य है। गायत्री साधना का विधान भी इसी प्रकार का है। उसका सीधा प्रभाव अहंकार पर पड़ता है। ‘‘मैं ब्राह्मी शक्ति का आधार हूँ, ईश्वरीय स्फुरणा गायत्री मेरे रोम-रोम में ओतप्रोत हो रही है, मैं उसे अधिकाधिक मात्रा में अपने अन्दर धारण करके ब्राह्मी-भूत हो रहा हूँ।’’ यह मान्यताएँ मानवीय अहंकार को पाशविक स्तर से बहुत ऊँचा उठा ले जाती हैं और उसे देवभाव में अवस्थित करती हैं। गायत्री साधना अपने साधक को दैवी आत्म-विश्वास, ईश्वरीय अहंकार प्रदान करती है और वह कुछ ही समय में वस्तुत: वैसा ही हो जाता है। जिस स्तर पर उसकी आत्म-मान्यता है, उसी स्तर पर चित्त-प्रवृत्तियाँ रहेंगी। वैसी आदतें, इच्छाएँ, रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ क्रियाएँ उसमें दीख पड़ेंगी। जो दिव्य मान्यता से ओत-प्रोत है- निश्चय ही उसकी इच्छाएँ, आदतें और क्रियाएँ वैसी ही होंगी। यह साधना प्रक्रिया मानव अन्त:करण का कायाकल्प कर देती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मानसिक सुख-शांति के उपाय (भाग 4)

🔶 भारतीय दार्शनिकों ने मानसिक सुख-शांति का जो उपाय निर्देश किया है वह सत्य, शाश्वत, सार्वभौम, सार्वजनिक, सुलभ, सरल तथा सात्विकतापूर्ण है। उसका अवलम्बन लेकर क्या धनी, क्या निर्धन, क्या साधन सम्पन्न, क्या असावधान, क्या निर्बल सभी समान रूप से सुखी एवं शान्त रह सकते हैं। भारतीय दार्शनिकों का कहना है कि सच्ची सुख शांति मन की मनमानी करने में नहीं। मन की इच्छाओं एवं लालसाओं की पूर्ति करते रहने से सुख-शान्ति की उपलब्धि कदापि नहीं हो सकती। सच्ची सुख-शान्ति की प्राप्ति मन का रंजन करने से नहीं उसका दमन करने, कामनाओं एवम् लालसाओं को कम करने से ही प्राप्त हो सकती है।

🔷 लालसाओं की ज्यों-ज्यों पूर्ति की जाती है तृष्णा बढ़ती जाती है, जिसका परिणाम असन्तोष एवं अशान्ति के सिवाय और कुछ नहीं होता। मन की लालसा अभिलाषा एक दो हों और वह उन पर स्थिर भी रहे तो सम्भव है कि उनकी पूर्ति की जा सके और मन शान्त एवं सन्तुष्ट रहे। किन्तु यह चंचल मन अनन्त एवं असीम अभिलाषाओं का अभियुक्त होता है, ऐसी दशा में उसे किसी प्रकार भी सुखी तथा सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। मानव मन की विवशता, विपरीतता तथा वितृष्णा स्पष्ट बतलाती है कि अपने सुख के लिये उसकी न तो कोई विशेष अभिलाषा होती है और न उसकी कोई एक ऐसी आकांक्षा होती है जिसकी पूर्ति से वह वास्तव में सुखी एवम् सन्तुष्ट हो सकता है।

🔶 यही नहीं उसका किसी विषय विशेष में भी अभिन्न योग नहीं होता, जिसके प्रसंग से वह सदा सर्वदा को सन्तुष्ट एवं सुखी हो सकता हो। मन प्रयत्नशील होता है वह अबोध बालकों अथवा शेखचिल्लियों की तरह क्षण भर में ‘वह-यह’ किया करता है। उसे डांट-डपट कर इस ‘यह-वह’ से मुक्त कर देना ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर देना है। इस प्रकार कहना न होगा कि भारतीय दार्शनिक द्वारा बताया हुआ उपाय मन का दमन ही उसे सुखी एवम् संतुष्ट कर सकता है। निःसन्देह जिनका मन स्थिर एकाकांक्षी अथवा एक लक्ष्यीय होता है वे अवश्य ही अपेक्षाकृत अधिक सुखी तथा सन्तुष्ट रहा करते हैं। मन की विविधता, बहुलता एवम् चंचलता ही उसके दुःखी एवम् अशान्त होने का मूलभूत कारण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1967 पृष्ठ 9


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/April/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.9

👉 Aruni and Upmanyu

🔷 This is a story about how Aruni and Upmanyu proved their credibility and thus obtained wisdom from their Guru. Aruni was a new entrant into Guru Dhoumya's monastery. He was confronted with a tough test the very first day. The Guru said to him, "Son, it is raining very hard. Will you please go and check that boundary of the paddy field is intact. Otherwise, all the rain water will be wasted." Aruni immediately got up and left for the field. He saw that in the heavy rain, the boundary was really damaged and all the water was flowing away.

🔶 He tried all means to stop the flow, but when nothing worked, he himself lay down across the boundary and blocked the flow with his body. When Aruni did not return the whole night, Guru Dhoumya got worried, and set out to look for him. When he reached the field, he saw Aruni lying unconscious stopping the water flow with his own body. Seeing this, the Guru's eyes were filled with tears. He brought Aruni back and treated him. Aruni had passed the test of trustworthiness in flying colors. The Guru then made him a master of spiritual wisdom in a very short time.

🔷 The Guru ordered his disciple Upmanyu to graze the cattle while studying. He deliberately did not make any arrangements for his sustenance. The disciple begged food from nearby households or drank cow's milk. But, Guru Dhoumya objected, saying, "Son, a disciple must follow the monastery's discipline and should not take anything without Guru's permission. Upamanyu vowed never take anything without Guru's permission. He went without food for several days and became very feeble. He finslly passed the test of credibility and became a great spiritual leader.

📖 From Pragya Puran

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (अन्तिम भाग)

🔶 यह ध्यान जो हम आपको बताते हैं-मेडिटेशन कराते हैं और कहते हैं कि अपने मन का बिखराव-फैलाव रोकिए। फैलाव के कारण न आपका विद्या पढ़ने में मन लगता है, न स्वास्थ्य संवर्द्धन में कभी मन लगता है। हर समय बिखराव ही बिखराव। यह जो मन की अस्त-व्यस्त स्थिति है, इसको आप इकट्ठा कीजिए भगवान के माध्यम से, जप के माध्यम से, ध्यान के माध्यम से और प्रत्येक काम को जब करना हो तो इतना तीखा अभ्यास डालिए कि जब जो काम करना पड़े उसी में तन्मय हो जाएँ। सांसारिक कार्य में भी और भगवान के कार्य में भी। यह एकाग्रता अध्यात्मिकता का गुण है।

🔷 आप जब भी जो भी काम करें उसमें इतने तन्मय हो जाएँ कि 'वर्क इन वर्क', 'प्ले इन प्ले' अर्थात जब आप खेलें तो इस कदर खेलें कि खेल के अतिरिक्त और कोई चीज ध्यान में ही न रहे और जब आप काम करें तो इस मुस्तैदी से काम करें कि काम के अलावा आपको कोई दूसरी चीज दिखाई ही न पड़े। इस तरह की तन्मयता के साथ किए गए काम सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देते हैं। मित्रो, तन्मयता हमारे जीवन का वह वास्तविक स्वरूप होना चाहिए जो वैज्ञानिकों के पास होता है।

🔶 वैज्ञानिकों में और साधारण बी० एस० सी० में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, दोनों एक जैसे होते हैं। वैज्ञानिक उसे कहते हैं जो अपने रिसर्च कार्य में जब लगता है तो इतना गहरा डूबता हुआ चला जाता है जैसे मोती ढूँढ़ने के लिए पनडुब्बी सागर में गहराई तक चला जाता है और उसको बीन करके ले आता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। आपको एकाग्रता केवल भजन में ही नहीं लानी है, वरन हर काम में इसका अभ्यास करना है।
 
🔷 एकाग्रता का अभ्यास न होने के कारण ही सदैव यह शिकायत बनी रहती है कि गुरुजी हमारा मन भजन-पूजन में नहीं लगता। तो क्या किसी काम में आपकी एकाग्रता होती है? हर काम में बिखराव है। आप अपने मन को निग्रहीत करना सीखिए। जब जो काम करना हो, तब उसमें इतनी मुस्तैदी से तन्मय होना सीखिए ताकि आप जब भजन करना शुरू करें तो भजन में भी उतनी तन्मयता हो जाए जितनी एक योगी की होती है। यदि आपने प्रकाश का ध्यान करना सही तरीके से सीख लिया तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जो एक अध्यात्मवादी को प्राप्त करना चाहिए।
 
ॐ शान्तिः
 
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 18)

👉 स्वयं से कहो-शिष्योऽहम्

🔷 गुरुगीता की भक्ति कथा गुरुभक्तों के  लिए अमृत सरोवर है। इसके अवगाहन से मिलने वाले भक्ति-संवेदन गुरु भक्त साधक को सहज ही  सद्गुरु कृपा का संस्पर्श करा देते हैं। परम कृपालु सद्गुरु की कृपा साधक के सभी दोष-दुर्मति जन्य विकारों का हरण करके उसे जीवन के परमलक्ष्य की प्राप्ति करा देती है। इसी सत्य को दर्शाते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने एक स्थान पर कहा है-

तुलसी सद्गुरु त्यागि कै, भजहि जे पामर भूत।
अंत फजीहत होहिं गे, गनिका के से पूत॥

🔶 जो पामर मनुष्य परम कृपालु सद्गुरु और उनके बताए साधन मार्ग को छोड़ कर तंत्र-मंत्र भूत-प्रेतों में उलझे रहते हैं, उनकी अन्त में भारी फजीहत होती है। वे गणिका पुत्र की भाँति हर कहीं दुत्कारे और फटकारे जाते हैं।

🔷 सद्गुरु की कृपा साधक का परम आश्रय है। इस तत्त्व की अनुभूति कैसे और किस तरह हो यही तो गुरुगीता के प्रत्येक मंत्र में उद्घाटित हो रहा है। पिछले मंत्र में भगवान् सदाशिव ने जगन्माता पार्वती को बताया कि गुरु चरणामृत की महिमा अतुलनीय है। गुरु प्रसाद श्रेष्ठतम है। गुरु का सान्निध्य ही पवित्र काशीधाम है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वेश्वर हैं। वही तारक ब्रह्म है। अक्षयवट और तीर्थराज प्रयाग भी वही है। भगवान् महादेव एक ही सत्य को बार-बार सुनाते हैं, बताते हैं, समझाते हैं- अन्यत्र कहीं भटको मत, अन्यत्र कहीं उलझो मत, अन्यत्र कहीं अटको मत। उन्हीं की शरण गहो, जिन्होंने तुम्हें मंत्र का दान दिया, जिन्होंने जीवन की राह दिखाई। जो हर पल, हर क्षण अपनी अजस्र कृपा तुम पर बरसाते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 33

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Jan 2018


👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...