शुक्रवार, 10 जून 2016

👉 आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 3)


🔴 इन दोनों को आत्म-साधना का अविच्छिन्न अंग माना गया है। प्रातः काल उठते समय अथवा अन्य किसी निश्चिंत, शान्त, एकान्त स्थिति में न्यूनतम आधा घण्टे का समय इस प्रयोजन के लिए निकाला जाना चाहिए। मनन को प्रथम और चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है, पीछे उसे सीता है। डाक्टर पहले नश्तर लगाता है। पीछे मरहम पट्टी करता है। यों यह दोनों ही कार्य मिले जुले हैं और तनिक से अन्तर से साथ प्रायः साथ साथ ही चलते हैं, फिर भी यदि प्रथम द्वितीय का प्रश्न हो तो मनन को पहला और चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है।

🔵 चित का शान्त और स्थान का कोलाहल रहित होना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रातः सायं का समय खाली न हो तो सुविधा का कोई अन्य समय निर्धारित किया जा सकता है। आधा घण्टा की सीमा भी अनिवार्य नहीं है। यह काम चलाऊ मापदण्ड हैं। इसे आवश्यकतानुसार कम या अधिक भी किया जा सकता है, पर अच्छा यही है कि उसमें कम समय का निर्धारण रहे। नियम समय पर नियमित रूप से अपनाई गई कार्यपद्धति अस्त व्यस्त एवं अव्यवस्थित क्रिया प्रक्रिया से कितनी अधिक फलदायक होती है इसे हर कोई जानता है। आत्म चिन्तन अपने आपकी समीक्षा है।

🔴 अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालने का प्रयास भी इसे कहा जा सकता है। प्रयोगशालाओं में पदार्थों का विश्लेषण वर्गीकरण होता है और देखा जाता है कि इस संरचना में कौन-कौन तत्त्व मिले हुए हैं? शवच्छेद की प्रक्रिया में देखा जाता है कि भीतर के किस अवयव की क्या स्थिति थी, उनमें कहीं चोट या विषाक्तता के लक्षण तो नहीं थे। रोगी की स्थिति जानने के लिए उसके मल, मूत्र, ताप, रक्त, धड़कन आदि की जाँच पड़ताल की जाती है। निदान के उपरान्त ही सही उपचार बन पड़ता है। ठीक यही बात आत्म-समीक्षा का यही उद्देश्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1977/January.8

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 June 2016


🔵 उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाय तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का मूल्य है। जिसमें जितनी क्षमता होगी उसे उतना ही लाभ मिलेगा।

🔴 मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे-सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान् कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔵 जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो–वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

🌹 -स्वामी विवेकानन्द

बेटी और बहु


विदा होते समय बस एक यही आवाज सुनाई दे रही थी भा
ई साब आप परेशान ना हो मुक्ति को हम बहू नहीं बेटी बनाकर ले जा रहे हैं!
धीरे धीरे सुबह हुई और गाडी एक सजे हुए घर क सामने
जा रुकी और जोर से आवाज आई!
“जल्दी आओ बहू आ गयी”!! सजी हुई थाली लिए एक लड़की
दरवाजे पर थी! ये दीदी थी जो स्वागत क लिए
दरवाजे पर थी! और पूजा क बाद सबने एक साथ
कहा “बहू को कमरे में ले जाओ” मुक्ति को समझ
नहीं आया कुछ घंटो पहले तक तो मैं बेटी थी
फिर अब कोई बेटी क्यों नही बोल रहा!

बहू के घर से फोन हैं बात करा दो! फ़ोन पर माँ
थी “कैसी हो बेटा”
मुक्ति-“ठीक हू माँ- पापा कैसे हैं दीदी कैसी
हैं अभी तक रो रही ह क्या?”
माँ- “सब ठीक हैं तुम्हारा मन लगा?”

मुक्ति-“ हाँ माँ लग गया” माँ से कैसे कहती
बिलकुल मन नहीं लग रहा घर की बहुत याद आ
रही हैं

फ़ोन रखते हुए माँ ने कहा बेटा देखो बहुत अच्छे
लोग हैं बहू नहीं बेटी बनाकर रखेंगे बस तुम कोई
गलती मत करना !


मुक्ति और उसकी ननद विभा दोनों का
जन्मदिन एक ही महीने में आता था! मुक्ति बहुत
खुश थी साथ साथ जन्मदिन मना लेंगे और पहली
बार ससुराल में जन्मदिन मनाउंगी!

सुबह होते ही घर से सबका फोन आया मन बहुत
खुश था और पति के मुबारकबाद देने से दिन और
अच्छा हो गया था!

खैर शाम होते होते सब लोग एक साथ हुए और
बस केक कट कर दिया गया और सासु माँ ने एक
पचास का नोट दे दिया ! सासु माँ का दिया
ये नोट मुक्ति को बहुत अच्छा लगा ! जन्मदिन
न मन पाने का थोडा दुख हुआ पर फिर लगा
शायद ससुराल में ऐसे ही जन्मदिन मनता होगा !
अगले हफ्ते विभा दीदी का जन्मदिन आया
सुबह से ही सबके फ़ोन आने शुरू हो गये! सासु माँ
ने कहा मुक्ति आज खाना थोडा अच्छा
बनाना विभा का जन्मदिन हैं “जी माँ जी”
शाम होते ही मोहहले भर के लोगो का घर पर
खाने क लिए आगमन हुआ – सबने अच्छे से खाना
खाया!

सासु माँ ने विभा को 1000 का नोट देते हुए
कहा “बिटिया तुम्हारे कपडे अभी उधार रहे”
मुक्ति इस प्यार को देख कर बस मुस्कुरा ही
रही थी की पड़ोस की काकी ने पूछ लिया “
बहू तुम्हारा जन्मदिन कब आता हैं” मुक्ति बड़े
प्यार से बोली- “काकी अभी पिछले हफ्ते ही
गया हैं इसलिए हम दोनों ने साथ साथ मना
लिया क्यू विभा दीदी सही कहा ना”
विभा उसकी तरफ देख कर सिर्फ मुस्कुरा दी !

रसोई में खाना बनाते हुए मुक्ति को एक बात
आज ही समझ आई ! “बेटी बनाकर रखेंगे कह देने
भर से बहू बेटी नही बन जाती” और माँ की बात
याद आ गई
“बस बेटा तुम कोई गलती मत करना”
और आंखे न जाने कब नम हो गयी !!!!!!


पोती पौते सबको प्यारे है
पर बहू सबकी आंख मे खटकती है
क्या वो किसी की बेटी नही है
जो त्याग एक बहू करती है
वो भला कौन कर सकता है

जो सासु बहूऔ से चिढती है
वो भी सोचे की वो भी कभी बहू थी!!

बहू को बहू नही बेटी कहकर दैखे
बेटी कमी महसुस नही होगी!!

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...