गुरुवार, 15 जून 2017

👉 अपनी स्थिति के अनुसार साधना चाहिए।

🔵 साधु, संत और ऋषियों ने लोगों को अपने-अपने ध्येय पर पहुँचने के अनगिनत साधन बतलाये हैं। हर एक साधन एक दूसरे से बढ़कर मालूम होता है, और यदि वह सत्य है, तो उससे यह मालूम होता है कि ये सब साधन इतनी तरह से समझाने का अर्थ यह है कि ज्यादातर एक कोई भी साधन उपयोग में आ सकता है। और यह है भी स्वाभाविक ही कि वह किसी एक के लिए उपयोगी हो।

🔴 परन्तु बहुधा ऐसा होता है कि बहुत से साधन अपने अनुकूल नहीं होते। कठिनाई यह है कि हम लोगों में वह शक्ति नहीं है कि उस साधन को खोज निकालें जिसके कि हम सचमुच योग्य हैं। इसके विपरीत हम दूसरे ऐसे साधन अनिश्चित समय के लिए अपनाते हैं जो हमारी शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं होते। आज ऐसे अनुभवी पथ-प्रदर्शकों की भी भारी कमी है जो अपनी सूक्ष्म दृष्टि से यह जान लें कि किस व्यक्ति के अनुकूल क्या साधन ठीक होगा।

🔵 जो व्यक्ति जिस साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।

🔴 हमें चाहिए कि अपना एक ध्येय निर्धारित करें और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऐसे साधन चुनें जो निर्धारित उद्देश्य की ओर तेजी से हमें बढ़ा ले चलें, साथ ही उन साधनों का अपनी रुचि, प्रकृति और स्थिति के अनुकूल होना भी आवश्यक है। यदि ऐसा न हुआ तो उत्साह थोड़े ही समय में शिथिल हो जाता है और दुर्गम मार्ग पर चलने का अभ्यास न होने से बीच में ही यात्रा तोड़ने को विवश होना पड़ता है।

🔵 लक्ष्य-लक्ष्य के अनुकूल, साधन-साधन के अनुकूल, अपनी स्थिति- इन तीन बातों का जहाँ समन्वय हो जाता है यहाँ सफलता मिलने में संशय नहीं रहता। हमें अपना विवेक इतना जाग्रत करना चाहिए जो इस दिशा में समुचित ज्ञान रखता हो और अपने उज्ज्वल प्रकाश में हमें अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सके।

🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1949 पृष्ठ 23

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 113)

🌹  ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 विश्वामित्र गायत्री महामंत्र के द्रष्टा, नूतन सृष्टि के सृजेता माने गए हैं। उनने सप्तऋषियों सहित जिस क्षेत्र में तप करके आद्यशक्ति का साक्षात्कार किया था, वह पावन भूमि यही गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज की है, जिसे हमारे मार्गदर्शक ने दिव्य चक्षु प्रदान करके दर्शन कराए थे एवं आश्रम निर्माण हेतु प्रेरित किया था। विश्वामित्र की सृजन साधना के सूक्ष्म संस्कार यहाँ सघन हैं। महाप्रज्ञा को युग शक्ति का रूप देने उनकी चौबीस मूर्तियों की स्थापना कर सारे राष्ट्र एवं विश्व में आद्यशक्ति का वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सद्बुद्धि की प्रेरणा वाला संदेश यहीं से उद्घोषित हुआ। अनेक साधकों ने यहाँ गायत्री अनुष्ठान किए हैं एवं आत्मिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की है। शब्द शक्ति एवं सावित्री विधा पर वैज्ञानिक अनुसंधान विश्वामित्र परम्परा का ही पुनर्जीवन है।

🔴 जमदग्नि का गुरुकुल-आरण्यक उत्तरकाशी में स्थित था एवं बालकों, वानप्रस्थों की समग्र शिक्षा व्यवस्था का भांडागार था। अल्पकालीन साधना, प्रायश्चित, संस्कार आदि कराने एवं प्रौढ़ों के शिक्षण की यहाँ समुचित व्यवस्था थी। प्रखर व्यक्तित्वों के उत्पादन, वानप्रस्थ, परिव्राजक हेतु लोकसेवियों का शिक्षण, गुरुकुल में बालकों को नैतिक शिक्षण तथा युग शिल्पी विद्यालय में समाज निर्माण की विधा का समग्र शिक्षण इस ऋषि परम्परा को आगे बढ़ाने हेतु शान्तिकुञ्ज द्वारा संचालित ऐसे ही क्रिया कलाप हैं।

🔵 देवर्षि नारद ने गुप्त काशी में तपस्या की। वे निरंतर अपने वीणवादन से जन-जागरण में निरत रहते थे। उन्होंने सत्परामर्श द्वारा भक्ति भावनाओं को प्रसुप्ति से प्रौढ़ता तक समुन्नत किया था। शान्तिकुञ्ज के युग गायन शिक्षण विद्यालय ने अब तक हजारों ऐसे परिव्राजक प्रशिक्षित किए हैं। वे एकाकी अपने-अपने क्षेत्रों में एवं समूह में जीप टोली द्वारा भ्रमण कर नारद परम्परा का ही अनुकरण कर रहे हैं।

🔴 देव प्रयाग में राम को योग वशिष्ठ का उपदेश देने वाले वशिष्ठ ऋषि धर्म और राजनीति का समन्वय करके चलते थे। शान्तिकुञ्ज के सूत्रधार ने सन् १९३० से सन् १९४७ तक आजादी की लड़ाई लड़ी है। जेल में कठोर यातनाएँ सही हैं। बाद में साहित्य के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है। धर्म और राजनीति के समन्वय साहचर्य के लिए जो बन पड़ा है, हम उसे पूरे मनोयोग से करते रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.3

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 16 Jun 2017


👉 पाप का फल भोगना पड़ता है।

🔵 प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान जब बालक था तो उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक बौद्ध मठ में भेज दिया। मठ में धर्म-शिक्षा के साथ खेती भी की जानी थी और उसका कार्य मठ के निवासी हो करते थे।

🔴 एक दिन फाहियान अन्य बालकों के साथ एक धान के खेत को काटने के लिए भेजा गया। जब वे धान को काट रहे थे तो कुछ चोर बल पूर्वक वहाँ घुस आये और उन्होंने बालकों को डरा कर वहाँ से भगा दिया। पर फाहियान वहाँ से नहीं हटा, थोड़ी दूर पर खड़ा होकर कुछ सोचने लगा।

🔵 चोरों ने सोचा कि वह अकेला क्या कर सकता है, अतः उसकी तरफ ध्यान न देकर उन्होंने तमाम फसल काट डाली और गट्ठर बाँध कर ले जाने को तैयार हुये।

🔴 यह देखकर फाहियान बोला-भाइयों आपकी आधी से अधिक अवस्था समाप्त हो चुकी है। इस प्रकार का पाप कर्म करने से परलोक से आपको क्या गति होगी? पिछले जन्म में जो पाप किये थे उनके फल से आज दरिद्रावस्था से पड़े हो। अब फिर वैसे ही कर्म करके अपने लिए विष वृक्ष क्यों बो रहे हो?”

🔵 फाहियान इतना कह कर मठ की तरफ चल दिया, पर उस छोटे बालक की बातों का चोरों के मन पर इतना असर हुआ कि वे कटे हुए धान को वहीं छोड़ गये और सदा के लिए चोरी को त्याग दिया।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 June

🔴 अपने दुःख अभाव और क्लेशों के लिए लोग प्रायः भाग्य को दोष देते हैं, परिस्थितियों को कारण बताते हैं और सोचते रहते हैं कि काश ! ऐसा हो सका होता तो अच्छा रहता। यह चिन्तन ही हताश और निराश का द्योतक है। अन्यथा मनुष्य अपने आपसे इतना सर्वांगपूर्ण है कि यदि वह ठीक ढंग से सोचना, समझना सीख जाए और समुचित रीति से प्रयत्न करने लगे तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो वह आगे बढ़ने और प्रगति करने की राह निकाल ही लेता है। कठिन में कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास, साहस, सूझ-बूझ और मनोबल न खोये तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों से हार न माननी पड़े।

🔵 अधिकाँश लोग अपनी आर्थिक स्थिति के कारण चिन्तित रहते हैं। अर्थाभाव के कारण हजारों, लाखों नहीं करोड़ों लोग दिन रात चिन्ता और निराशा के थपेड़ों में अपनी जीवन नैया खेने का प्रयास करते हैं। परन्तु जो लोग इन अंधड़ों में आशा और पुरुषार्थ की पतवार बाँध सके, उनके न केवल परिस्थितियों को परास्त कर दिखाया वरन् अपने ही समान अन्य व्यक्तियों के लिए भी अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। भले ही ऐसे व्यक्तियों की संख्या थोड़ी हो, पर है अवश्य और थोड़ी इसलिए है कि अधिकाँश व्यक्ति निर्धनता और धनाभाव के सामने इस प्रकार घुटने टेक देते हैं कि उन्हें कुछ करने की सूझ ही नहीं पड़ती।
                                              
🔴 ‘साधना’ शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है, यह अलग बात है। लेकिन शुद्ध रूप में साधना शब्द अर्थ से परे है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 4)

🔵 कहा गया है कि “अखण्ड ज्योति” परिजन स्वयं पाँच-पाँच के मण्डलों में गठित हों और पाँच से पच्चीस बन कर मण्डल को पूर्णता तक पहुँचाएँ। साथ ही कहा गया है कि वे अपने परिवार तथा संपर्क क्षेत्र में से ढूंढ़ खोज कर पाँच प्रतिभाशाली महिलाओं की एक मण्डली बनाएँ। वे भी परस्पर संपर्क साधते हुए पाँच से पच्चीस बनने का लक्ष्य प्राप्त करें। साप्ताहिक सत्संग उनके लिए भी उसी प्रकार अनिवार्य किया गया है जैसा कि पुरुषों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इतना बन पड़ने पर ही यह माना जाएगा कि पुरुषों का एवं नारियों का सतयुग की वापसी के लिए खड़ा किया जाने वाला प्रथम प्रयास जड़ पकड़ गया।

🔴 पुरुषों को नैतिक, बौद्धिक, सामाजिक क्रान्ति की तैयारी करनी है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की संरचना की भी। व्यक्ति, परिवार और समाज के तीनों ही क्षेत्रों में सत्प्रवृत्ति संवर्धन और कुरीति उन्मूलन की बहुमुखी प्रवृत्तियों को जन्म देना और मार्गदर्शन करना है। इसके लिए कार्यकर्ताओं की योग्यता और परिस्थितियों की आवश्यकता से तालमेल बिठाते हुए अनेक प्रकार के छोटे-बड़े कार्यक्रम हाथ में लिए जाने है, जिनके लिए आवश्यकता हो तो शांतिकुंज के साथ विचार विनिमय भी करते रहा जा सकता है।

🔵 महिलाओं के लिए सामूहिक सत्संगों को सुनिश्चित बनाने के उपरांत शिक्षा संवर्धन, आर्थिक स्वावलम्बन सम्बन्धित गृह उद्योग, संगीत अभ्यास से मुखर होने और अभिव्यक्तियों को प्रकट कर सकने का अभ्यास, कुरीति उन्मूलन के लिए छोटे-बड़े आयोजन तथा परिवार निर्माण की समुचित योग्यता प्राप्त करना सभी महिला मण्डलों के लिए समान कार्यक्रम बना है। इससे आगे उन्हें भी ऐसा कुछ कर दिखाना है जिससे मात्र व्यक्तिगत स्थिति ही न सुधरे वरन् व्यापक नारी समस्याओं के समाधान के लिए अभीष्ट तंत्र खड़े करने का सरंजाम जुट सकें। असहाय महिलाओं को समर्थ बनाना और उन्हें लोक सेविका बनाने का कार्यक्रम भी इसी योजना को निकट भविष्य में कार्यान्वित किया जाने वाला बड़ा कदम है, जो अपने समय पर अपने ढंग से निरंतर उठते रहेंगे, गति पकड़ते रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 60

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 13)

🌹  मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रख रहेंगे।

🔵 मन का स्वभाव बालक जैसा होता है, उमंग से भरकर वह कुछ न कुछ कराना एवं बोलना चाहता है। यदि दिशा दी जाए और उसकी क्रियाशीलता के अनुसार कार्य मिलता रहे, तो वह स्वयं भी संतोष पाता है तथा दूसरों को भी सुख देता है। मन के लिए उसकी कल्पना-शक्ति के अनुसार सद्विचारों एवं सद्भावनाओं का क्षेत्र खोल दिया जाए, तो वह संतुष्ट भी रहता है तथा हितकारी भी सिद्ध होता है। स्नेह, कृतज्ञता, सौहार्द्र सहयोग आदि के विचारों को बार-बार दुहराया जाए, तो मन में कुविचारों और दुर्भावनाओं को जगह न मिलेगी।

🔴 परिस्थिति एवं वातावरण के प्रभाव से बहुत बार मन पर उनका असर होने लगता है। उस स्थिति में कुविचारों के विपरीत, सशक्त सद्विचारों से उन्हें काटना चाहिए। जैसे स्वार्थपरता, धोखेबाजी, कामचोरी के विचार आएँ तो श्रमशीलता और प्रमाणिकता से लोगों की अद्भुत प्रगति के तथ्यपूर्ण चिंतन से उन्हें हटाया जा सकता है। यदि किसी के विपरीत आचरण पर क्रोध आए या द्वेष उभरे तो उसकी मजबूरी समझकर उसके प्रति करुणा, आत्मीयता से उसे धोया जा सकता है। यह विद्या सत्साहित्य के स्वाध्याय, सत्पुरुषों की संगति एवं ईमानदारी से किए गए आत्म-चिंतन से ही पाई जा सकती है।    

🔵 लोहा, लोहे कोक काटता है। गरम लोहे को ठंडा लोहे की छैनी काटती है। चुभे हुए काँटे को निकालने के लिए काँटे का ही प्रयोग करना पड़ता है। विष को विष मारता है। हथियार से हथियार को मुकाबला किया जाता है। किसी गिलास में भरी हुई हवा को हटाना हो तो उसमें पानी भर देना चाहिए। पानी का प्रवेश होने से हवा अपने आप निकल जाएगी। बिल्ली पाल लेने से चूहे घर में कहाँ ठहरते हैं? कुविचारों को मार भगाने का एक तरीका है कि उनके स्थान पर सद्विचारों की स्थापना की जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.20

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 1)

🌹 गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!! 

🔴 बात कल्प-साधना की बात चल रही थी। आप कल्प की इच्छा के लिए आये हैं न। कल्प में आपके सारे शरीर को बदलना तो मुमकिन नहीं है; पर आपका मन बदल सकता है। आपका स्तर बदल सकता है, आपका भविष्य बदल सकता है। आपका भूतकाल जो कि घिनौना भूतकाल, खाली हाथ वाला भूतकाल, चिंताजनक वाला भूतकाल रहा है, वह ऐसे उज्ज्वल भविष्य में बदल सकता है, जिसकी कि आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। भूतकाल कैसा रहा है? आपको अपनी आँख से कैसा दीखता है? क्या कहूँ मैं आपसे!आपने अपना मकान बना लिया, लड़कों के लिए धन इकट्ठे कर दिये, लड़के को वकील बना दिया, लड़कियों की शादी में ढेरों पैसा खर्च कर दिया। आप अगर इन्हीं बातों को अपनी सफलता की निशानी मानते हैं; तो मानते रहिए, मैं कब कहता हूँ कि यह आपकी सफलताएँ नहीं है; लेकिन मेरी दृष्टि में यह सफलताएँ नहीं हैं।

🔵 आपकी सफलता रही होती तब, जब आप दूसरे नानक रहे होते, कबीर रहे होते, रैदास रहे होते, विवेकानन्द रहे होते, गाँधी हो गए होते, तो मैं आपके भूतकाल को शानदार मानता; लेकिन भूतकाल कैसा था? जानवरों का जैसा होता है; पेट भरते रहते हैं, बच्चे पैदा करते रहते हैं। वह भी तो आपको इतिहास है। पिछले दिनों आपने क्या किया? बताइए? एक तो आपने पेट भरा और दूसरे औलाद पैदा की है। औलाद की जिम्मेदारियाँ सिर पर आएँगी ही और आपको वहन करना ही पड़ेगा। क्यों करना पड़ेगा? जब आपने गुनाह किया है, तो उसकी सजा तो आपको ही भुगतनी पड़ेगी। आपने बच्चे पैदा किए हैं न, तब सजा भी भुगतिए।

🔴 सारी जिंदगी भर उनके लिए कमाइए, कोल्हू के बैल की तरह चलिए, पीसिए अपने आपको, निचोड़िए अपने आपको, निचोड़ करके उनके खिलाइए; क्योंकि आपने गुनाह तो किया ही है। एक औरत को हैरान किया है न, बेचारी ने आपकी वजह से नौ महीने पेट में वजन रखा, कष्ट उठाया, छाती का दूध पिलाया, फिर आप क्यों कष्ट नहीं उठायेंगे? आप भी कोल्हू में चलिए, आप भी मुसीबत उठाइए। आपको भी बीस साल की कैद होती है। बीस साल का बच्चा जब तक न हो जाए, तब तक आप कैसे पीछा छुड़ा पायेंगे। यही तो भूतकाल है आपका! यही तो आपकी परिणति है। यही तो आपने पुरुषार्थ किया है। कोई ऊँचे स्तर से विचार करेंगे, तो आपके भूतकाल को कैसे प्रोत्साहित करेगा?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य