गुरुवार, 15 जून 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 June

🔴 अपने दुःख अभाव और क्लेशों के लिए लोग प्रायः भाग्य को दोष देते हैं, परिस्थितियों को कारण बताते हैं और सोचते रहते हैं कि काश ! ऐसा हो सका होता तो अच्छा रहता। यह चिन्तन ही हताश और निराश का द्योतक है। अन्यथा मनुष्य अपने आपसे इतना सर्वांगपूर्ण है कि यदि वह ठीक ढंग से सोचना, समझना सीख जाए और समुचित रीति से प्रयत्न करने लगे तो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो वह आगे बढ़ने और प्रगति करने की राह निकाल ही लेता है। कठिन में कठिन और प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य अपना आत्मविश्वास, साहस, सूझ-बूझ और मनोबल न खोये तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों से हार न माननी पड़े।

🔵 अधिकाँश लोग अपनी आर्थिक स्थिति के कारण चिन्तित रहते हैं। अर्थाभाव के कारण हजारों, लाखों नहीं करोड़ों लोग दिन रात चिन्ता और निराशा के थपेड़ों में अपनी जीवन नैया खेने का प्रयास करते हैं। परन्तु जो लोग इन अंधड़ों में आशा और पुरुषार्थ की पतवार बाँध सके, उनके न केवल परिस्थितियों को परास्त कर दिखाया वरन् अपने ही समान अन्य व्यक्तियों के लिए भी अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है। भले ही ऐसे व्यक्तियों की संख्या थोड़ी हो, पर है अवश्य और थोड़ी इसलिए है कि अधिकाँश व्यक्ति निर्धनता और धनाभाव के सामने इस प्रकार घुटने टेक देते हैं कि उन्हें कुछ करने की सूझ ही नहीं पड़ती।
                                              
🔴 ‘साधना’ शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है, यह अलग बात है। लेकिन शुद्ध रूप में साधना शब्द अर्थ से परे है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 44)

🌹  मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे। 🔴 मनुष्य की श्...