बुधवार, 11 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 45) :- सदगुरु संग बनें साधना-समर के साक्षी

🔴 साक्षी भाव की खोज होते हुए हमें वह भी मिल जाता है, जो हमारा सेनापति है। हमारा सद्गुरु है। इन्हें पहचानना, इनकी मानना साधना समर का अनिवार्य धर्म है। जिसने अपने सद्गुरु को पा लिया, उन्हें पहचान लिया, समझो उसने अपनी महाविजय को सुनिश्चित कर लिया। यह काम आसान दिखते हुए भी आसान नहीं है। सद्गुरु मनुष्य के वेश में आते हैं। इस वजह से साधकों से, शिष्यों से उन्हें पहचानने में प्रायः भूलें होती हैं। बार- बार उनके प्रति अपने मानवीय भावों का आरोपण होता है और अगर ऐसा न हो तो भी उनकी बातों को अपनाने में कठिनाई आती है।

🔵  इस कठिनाई से वही उबरते हैं जो सद्गुरु के चरणों में स्वयं को विसर्जित करने का साहस करते हैं। यह काम आसान नहीं है। अपमान, तिरस्कार, द्वेष, पीड़ा आदि अनेकों दारुण यातनाओं को प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हुए सद्गुरु की आज्ञा पालन में निरत रहना ही वह रहस्य है, जिसे सच्चे शिष्य जान पाते हैं। सद्गुरु की हर चोट अहंकार पर होती है। वे अपने हर प्रहार से अहंकार को तोड़ते हैं, मनोग्रन्थियों को खोलते हैं। उनकी हर चोट से कर्म संस्कार क्षय होते हैं। हालांकि यह प्रक्रिया कहने में, लिखने में जितनी आसान है, किन्तु है यह भारी पीड़ादायक।

🔴  जो अनुभवी हैं वे जानते हैं कि यह कठिन यातना एक बार प्रारम्भ होने पर वर्षों तक समाप्त ही नहीं होती। कभी- कभी तो यह लगातार बिना रुके, बिना थमे पच्चीस- तीस साल भी चलती रहती है। हालांकि इसकी अन्तिम परिणति साधना के महासमर में विजय ही होती है। पर ऐसे अवसर भी आते हैं कि यह सब शरीर की समाप्ति के साथ ही होता है। ये बातें आश्चर्य भी पैदा कर सकती हैं, और अविश्वसनीय भी लग सकती हैं। पर जो इसे जी रहे हैं वे इसकी सच्चाई पर रंच मात्र भर भी सन्देह नहीं कर सकते। उनके लिए तो यह रोज जिया जाने वाला सच है।

🔵  इस सम्बन्ध में जरूरत अधिक कहने की नहीं, अधिक से अधिक जीने की है। सद्गुरु को प्रति पल अपने हृदय में अनुभव करने की जरूरत है। एक बार यदि गुरु ने शिष्य के हृदय में आसन जमा लिया तो फिर प्रक्रिया कितनी भी जटिल एवं दारूण क्यों न हो, पर अन्तिम परिणाम शुभ के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता। इसलिए सतत उनका आह्वान, सतत उनसे प्रार्थना ही एकमात्र उपाय है। ऐसा हो जाय तो परम सौभाग्य है, परम सदभाग्य है।

🔴  वे जब अन्तर चेतना में अस्तित्त्व के अन्तरतम में मिलेंगे, तो सब कुछ स्वतः सुलभ होने लगेगा। स्वतः ही आदेश एवं संकेत प्राप्त होंगे। यही नहीं विजय का पथ भी प्रशस्त होगा। जीवन का मार्ग भी मिलेगा। तो करते रहें उन परम कृपालु सद्गुरु का आह्वान, निवेदित करते रहे उनसे अपनी प्रार्थना। इसके आगे क्या करना है, इसकी चर्चा अगले सूत्र में किया गया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/sang

👉 आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 11


🔵  हम विचार करते रहते हैं कि कलुषित चूने जैसा, लोगों को खा डालने वाला; दीवार पोतने के काम आने वाला; जहाँ भी डाल दें, वहीं खाली जमीन बना देने वाला बेकार का चूना कपड़े पर डाल दें तो कपड़े को जला दें। मेरा ऐसे चूने जैसा निकृष्ट जीवन यदि हल्दी के साथ मिल गया होता तो रोली बन गया होता। रोली, जिसे हम रोज मस्तक में लगाते हैं और इन्हीं भावनाओं में बहते हुए चले जाते हैं और हमारी उपासना न जाने क्या से क्या हमें दे जाती है?

🔴  मित्रो! जब मैं पूजा पाठ करता हूँ, तो इतना हलका फील करता हूँ कि आप जानते नहीं। भावनाओं के प्रवाह, भावनाओं की तरंगें मेरे अंदर बहती रहती हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि मेरा सारे का सारा मस्तिष्क भाव विभोर होता हुआ चला जाता है। मेरा भगवान् हँसता हुआ जाता है और मैं भगवान् की गोदी में बैठा बैठा पूजा करता रहता हूँ। जब मैं कर्मकाण्ड में बैठा रहता हूँ, तो उसमें भावनाओं का सम्मिश्रण होने के बाद क्या मजा आता है? यही पूजा करने की विधि मैं आपको सिखाने वाला था।

🔵  मित्रो! उपासना अगला वाला हिस्सा नाम जप के बाद शुरू होता है। इसमें नाम जप के साथ साथ ध्यान का समावेश होता है। ‘धी’ मन की एकाग्रता का प्रतीक है। मस्तिष्क में न जाने कितनी धारायें बहती रहती हैं, कितने कंपन बहते रहते हैं। इसके भीतर जितने प्रशांत प्रवाह बहते हैं, उनका यदि एकीकरण कर लिया जाये, तो न जाने क्या से क्या चमत्कार उत्पन्न हो जाये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...