रविवार, 30 अप्रैल 2017

👉 जीवन की बागडोर आपके हाथ में

🔴 भाष्य ने जहाँ छोड़ दिया, वहीं पड़ गए और कहने लगे कि हम क्या करें, किस्मत साथ नहीं देती, सभी हमारे खिलाफ हैं, प्रतिद्वन्द्विता पर तुले हैं, जमाना बड़ा बुरा आ गया है। यह मानव की अज्ञानता के द्योतक पुरुषार्थहीन विचार हैं, जिन्होंने अनेक जीवन बिगाड़े हैं। मनुष्य भाग्य के हाथ की कठपुतली है, खिलौना है, वह मिट्टी है, जिसे समय-असमय यों ही मसल डाला जा सकता है, ये भाव अज्ञान, मोह एवं कायरता के प्रतीक हैं।

🔵 अपने अंत:करण में जीवन के बीज बोओ तथा साहस, पुरुषार्थ, सत्संकल्पों के पौधों को जल से सींचकर फलित-पुष्पित करो। साथ ही अकर्मण्यता की घास-फूस को छाँट-छाँट कर उखाड़ फेंको। उमंग उल्लास की वायु की हिलोरें उड़ाओ।

🔴 आप अपने जीवन के भाग्य, परिस्थितियों, अवसरों के स्वयं निर्माता हैं। स्वयं जीवन को उन्नत या अवनत कर सकते हैं। जब आप सुख-संतोष के लिए प्रयत्नशील होते हैं, वैसी ही मानसिक धारा में निवास करते हैं, तो संतोष और सुख आप के मुखमंडल पर छलक उठता है। जब आप दु:खी, क्लांत रहते हैं, तो जीवनवृत्त मुरझा जाता है और शक्ति का ह्रास हो जाता है।

🔵 शक्ति की, प्रेम की, बल और पौरुष की बात सोचिए, संसार के श्रेष्ठ वीर पुरुषों की तरह स्वयं परिस्थितियों का निर्माण कीजिए। अपनी दरिद्रता, न्यूनता, कमजोरी को दूर करने की सामर्थ्य आप में है। बस केवल आंतरिक शक्ति प्रदीप्त कीजिए।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-सितं. 1946 पृष्ठ 21

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/September/v1.21

👉 पवित्रता ही प्रभु मिलन का द्वार

🔵 गहन समाधि के नीरव पलों में ईश्वरीय गान गूँजता है- याद रखो, हमेशा याद रखो, पवित्र हृदय वाले व्यक्ति ही मेरा सान्निध्य पाते हैं। जो लोग अपनी आकांक्षाओं के कीचड़ में सने हैं, अपनी वासनाओं के अँधेरों में घिरे हैं, वे परमचेतना का प्रकाश नहीं पा सकते। इसलिए सदा-सर्वदा पवित्रता उपलब्ध करने की तीव्र इच्छा रखो। गहराई और अध्यवसायपूर्वक पवित्रता की खोज करो। केवल यही प्रयोजनीय है।

🔴 पवित्रता परमसत्य को पाने की ड्योढ़ी है। मेरा चिन्तन करने से पूर्व पवित्रता का चिन्तन करो। पवित्रता वह चाबी है जिससे ध्यान रूपी द्वार खुलता है, समाधि के आगार में प्रवेश मिलता है और सर्वशक्तिमान से मिलन होता है।
  
🔵 मेरी शक्ति के समुद्र में स्वयं को फेंक दो। इच्छा न करो। आकांक्षाएँ न रखो। जानो कि मैं हूँ। यही ज्ञान मेरी इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ युक्त होकर तुम्हारा उद्धार करेगा। भयभीत न होओ। क्या तुम मुझमें नहीं हो? क्या मैं तुममें नहीं हूँ? यह जान लो कि सांसारिक यश-वैभव, ऐश्वर्य-ख्याति सब कुछ एक दिन चली जाती है। मृत्यु जीवन के विभिन्न प्रकारों को निगलती हुई सर्वत्र विद्यमान है। मृत्यु और  परिवर्तन आत्मा को छोड़कर अन्य सभी को अपने जाल में फँसाते और बाँधते हैं, इसे जानो। पवित्रता ही इस ज्ञानप्राप्ति का उपाय है। यह आधार भित्ति है। पवित्रता के साथ निर्भयता आती है और आती है स्वतन्त्रता और तुम्हारे स्वरूप की अनुभूति, जिसका सार मैं हूँ।

🔴 तूफान आने दो। किन्तु जब इच्छाएँ तुम्हें जलाएँ, सन्ताप तुम्हें सताए और मन चंचल हो तब मुझे पुकारो। मैं सुनूँगा। लेकिन ध्यान रखो, मुझे भावनाओं के अति सूक्ष्म स्पन्दन भी सुनायी दे जाते हैं, किन्तु हृदयविहीन वाणी की उच्च पुकार भी मुझ तक नहीं पहुँच पाती। हृदय से पुकारो, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। जो मुझे आन्तरिकता पूर्वक पुकारते हैं, मैं उनकी त्याग नहीं करता। केवल आन्तरिकता नहीं, अध्यवसायपूर्वक मुझे पुकारो।

🔵 मैं विश्व नहीं, उसमें समायी आत्मा हूँ। तभी तो मुझे विश्वात्मा कहा जाता है। विश्व कितना भी विशाल क्यों न हो, पर वह मेरे लिए पंचभौतिक देह से अधिक कुछ भी नहीं। मेरी प्रीति केवल आत्मा में है। वस्तुओं की बाहरी विशालता से भ्रमित न होओ। दिव्यता न तो रूप में है और न ही विचारों में। वह शुद्ध, मुक्त, आध्यात्मिक, आनन्दपूर्ण, रूपरहित, विचाररहित चेतना में है। जो कलुष, पाप बन्धन या सीमा से परिचित नहीं है, परिचित हो भी नहीं सकता।

🔴 हे आत्मन्! अन्तर के अन्तर में तुम वही हो। इसकी अनुभूति तुम्हें होगी। इसका होना अनिवार्य है, क्योंकि जीवात्मा के जीवन का यही लक्ष्य है। स्मरण रखो कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं सर्वशक्तिमान, काल का भी काल महेश्वर महाकाल तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी समस्त दुर्बलताओं के निवारण के लिए मैं शक्ति हूँ। तुम्हारे समस्त पापों के लिए मैं क्षमा हूँ। तुम्हारी पीड़ा दूर करने के लिए मैं दया हूँ। तुम्हारे कष्टों को मिटाने के लिए मैं करुणा हूँ। मेरी खोज में मैं तुम्हारा प्रेम हूँ। विश्वास करो मैं ही तुम हूँ, तुम ही मैं हो।

🔵 आत्मा के सम्बन्ध में अन्य सभी विचारों को त्याग दो; क्योंकि इस विचार में कि तुम्हारी आत्मा मुझसे किसी प्रकार भी भिन्न नहीं है सभी अज्ञान और दुर्बलताएँ निहित हैं। ओ ज्योतिस्वरूप! उठो, जानो कि मैं ही तुम्हारी आत्मा हूँ और पवित्रता ही मेरे सान्निध्य का पथ है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 47

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 April 2017



👉 आज का सद्चिंतन 30 April 2017


शनिवार, 29 अप्रैल 2017

👉 जीने योग्य जीवन जियो 29 April

🔴 धिक्कार है उस जिंदगी पर, जो मक्खियों की तरह पापों की विष्ठा के ऊपर भिनभिनाने में और कुत्ते की तरह विषय भोगों की जूठन चाटने में व्यतीत होती है। उस बड़प्पन पर धिक्कार है, जो खुद खजूर की तरह बढ़ते हैं, पर उनकी छाया में एक प्राणी भी आश्रय नहीं पा सकता। सर्प की तरह धन के खजाने पर बैठकर चौकीदारी करने वाले लालची किस प्रकार सराहनीय कहे जा सकते हैं?

🔵 जिनका जीवन तुच्छ स्वार्थों को पूरा करने की उधेड़बुन में निकल गया, हाय! वे कितने अभागे हैं। सुरदुर्लभ देह रूपी बहुमूल्य रत्न, इन दुर्बुद्धियों ने काँच और कंकड़ के टुकड़ों के बदले बेच दिया। किस मुख से वे कहेंगे कि हमने जीवन का सद्व्यय किया। इन कुबुद्धियों को तो अंत में पश्चाताप ही प्राप्त होगा। एक दिन उन्हें अपनी भूल प्रतीत होगी, पर उस समय अवसर हाथ से चला गया होगा और सिर धुन-धुन कर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा।

🔴 मनुष्यों! जियो और जीने योग्य जीवन जियो। ऐसी जिंदगी बनाओ जिसे आदर्श और अनुकरणीय कहा जा सके। विश्व में अपने ऐसे पदचिह्न जोड़ जाओ, जिन्हें देखकर आगामी संतति अपना मार्ग ढूँढ़ सके। आप का जीवन सत्य से, प्रेम से, न्याय से, भरा हुआ होना चाहिए। दया, सहानुभूति, आत्मनिष्ठा, संयम, दृढ़ता, उदारता, आप के जीवन के अंग होने चाहिए। हमारा जीवन मनुष्यता के महान् गौरव के अनुरूप ही होना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति- अगस्त 1946 पृष्ठ 1

👉 भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ

🔵 इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ तनिक भी रुकने का मतलब है, राह में झुलसकर नष्ट हो जाना। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सरल विश्वास को तोड़ने वाले कपटजाल में फँसकर उसका अनुसरण न करो। परम विश्वासी शिष्य की भाँति एक उन्मत्त छलाँग लगाकर स्वयं को सद्गुरु की कृपासागर में डुबो दो।

🔴 ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! सरल विश्वास से बढ़कर और कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं है। इसी क्षण अपने आप से पूछो, क्या तुम विश्वास करते हो? पहले स्वयं पर विश्वास करो आखिर यह सरल, निश्छल एवं वज्र की भाँति वज्र विश्वास ही तो परमशिव है। विश्वास! विश्वास!! विश्वास!!! सभी कुछ विश्वास पर ही निर्भर करता है। वह विश्वास नहीं जो केवल आस्था मात्र है, किन्तु वह विश्वास है जो दर्शन है। संशय के अतिरिक्त और कोई महापाप नहीं। गीता के इस उपदेश को अपने अस्तित्त्व की गहराइयों में अनुभव करो-‘‘संशयात्मा विनश्यति’’ संशय को विष के समान त्याग देना सीखो। सबसे बड़ी दुर्बलता संशय है, जो शिष्य को सद्गुरु के अनुदानों-वरदानों से वंचित रखती है।
  
🔵 ओ अमृतपुत्र! सरल विश्वास से ओत-प्रोत अन्तःकरण में ही सजल भावनाएँ अंकुरित, प्रस्फुटित एवं विकसित होकर श्रद्धा का रूप लेती हैं। सजल श्रद्धा ही समस्त दिव्यशक्तियों का स्रोत है। विश्व के समस्त महामानव इस सजल श्रद्धा की शक्ति से अभिभूत होकर ही अपने महान् लक्ष्य को पा सके। यह शक्ति जो कि जगन्माता का स्वरूप है, परम शिव से सर्वथा अभिन्न है, उसका ध्यान करो और तुम अनायास ही सभी भयों से मुक्त होकर उन महाशक्ति की प्र्ररेणा ग्रहण कर सकोगे। उनके दिव्य-वात्सल्य के सुख को सहज अनुभव कर पाओगे।

🔴 सरल विश्वास और सजल श्रद्धा-प्राण और देह की भाँति गुँथे हुए हैं। द्वैत का आभास होने पर भी इनमें सर्वथा अद्वैत है। शिव और शक्ति भला एक दूसरे से भिन्न हो भी कैसे सकते हैं? स्वयं के अन्तःकरण में इनकी अनुभूति सघन होते ही अपनी अन्तर्दृष्टि के समक्ष प्रखर प्रज्ञा और सजल श्रद्धा की युगल मूर्ति सहज साकार हो उठेगी और सुनायी पड़ने लगेगी-गुरुपर्व पर उनकी यह परावाणी-शब्द कहे जा चुके हैं, उपदेश दिए जा चुके हैं, अब कार्य करने की आवश्यकता है। बिना आचरण के उपदेश व्यर्थ है। तुमने बहुत पहले ही अपने संकल्पों तथा अन्तर्दृष्टि को आचरण में नहीं लाया, इस बात का तुम्हारे साथ हमें भी गहरा दुःख है। जब रास्ता मिल गया है, तब वीरतापूर्वक आगे बढ़ो। जिसने भी श्रद्धा-विश्वास का अवलम्बन लिया है, वह अकेला नहीं है। ईश्वर ही उसका साथी है, मित्र है, सर्वस्व है। मेरी समस्त शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं। आगे बढ़ो और लक्ष्य प्राप्त करो।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 47

👉 आज का सद्चिंतन 29 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 April 2017



शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

👉 उदार जीवन की गरिमा

🔵 संग्रह का मतलब है- स्वर्ग पर अविश्वास, ईश्वर पर अश्रद्धा और भविष्य की अवज्ञा। जब पिछले दिनों हम अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं का अर्जन करते रहें, तो कल नहीं कर सकेंगे, इसका कोई कारण नहीं। यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ ईश्वरीय कृपा से अन्तिम साँस तक मिलते रहेंगे। नियति ने उसकी समुचित व्यवस्था पहले से ही कर रखी है। तृष्णा तो ऐसी बुद्धिहीनता है, जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नता में जलाती रहती है।

🔴 जिन्हें ईश्वर की उदारता पर विश्वास है, वे उदार बनकर जीते हैं। धरती अन्न उपजाती है- अन्न और वनस्पति उगाकर वह समस्त प्राणियों का पेट भरती है, पर यह नहीं सोचती कि मेरा भण्डार खाली हो जाएगा। उसकी यह उदारता सृष्टिक्रम के अनुसार लौटकर उसी के पास वापस आ जाती है, प्राणी पृथ्वी के अनुदान का उपयोग तो करते हैं, पर प्रकारान्तर से उसकी निधि उसी को वापस कर देते हैं। मल-मूत्र, खाद, कूड़ा, मृत शरीर यह सब लौटकर धरती के पास आते हैं और उसकी उर्वरता को सौ गुना बढ़ा देते हैं।
  
🔵 बादलों का कोष कभी नहीं चुका, वे बार-बार खाली होते रहते हैं, और फिर भर जाते हैं। नदियाँ उदारतापूर्वक देती हैं और यह विश्वास करती हैं कि उनका प्रवाह चलता रहेगा, अक्षय जलस्रोत उसकी पूर्ति करते रहेंगे। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं और सोचते हैं कि वे ठूँठ नहीं होंगे। नियति का चक्र उन्हें हरा-भरा रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा। कृपणता, संकीर्ण चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं, पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं, जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।

🔴 पर्वत के उच्चशिखर पर निवास करने वाली चट्टान किसी को कुछ देती नहीं। वह अपनी सम्पदा अपने पास ही समेटे बैठी रहती है। अपनी विभूतियाँ किसी को क्यों दें? यह सोचकर रेतीली मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़, समर्थ चट्टान निष्ठुरता बरतती है और कृपण बनी रहती है, लेकिन जब वर्षा होती है, विपुल जलधार बरसती है तो रेतीली मिट्टी आर्द्र हो उठती है। उसकी तृष्णा तृप्त हो जाती है, पर चट्टान को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। भीतर तो एक बूँद घुसती नहीं, बाहर जो नमी आती है उसे भी पवन एक झोंके में सुखा देता है, जबकि खेत की मिट्टी बाहर भी देर से सूखती है। भीतर तो सरसता का सुखद आनन्द चिरकाल तक लेती रहती है। मिट्टी ने कुछ खोया नहीं, चट्टान ने कुछ पाया नहीं। उदारता अपनाकर मिट्टी वरुण देव के स्नेह से अनायास ही सिक्त हो गयी और चट्टान को सूर्य का कोप सदा ही संतप्त करता रहा।

🔵 खिलते हुए पुष्प हमेशा ही हवा की झोली में अपना सौरभ भरते रहते हैं। अपने पराग से कीट, पतंगों, मधुमक्खियों की सतत उदरपूर्ति करते हैं। ईश्वरीय व्यवस्था उन्हें कभी सौरभ और पराग की कमी नहीं होने देती। बहता हुआ पानी स्वच्छ रहता है, उसे लोग पीते और उसी में नहाते हैं। गड्ढे में रुका हुआ पानी सड़ जाता है, पीने योग्य नहीं रहता। कृपणता रुके हुए गड्ढे की तरह है, उसका सञ्चय सड़कर दुर्गन्ध ही उत्पन्न करता है। गड्ढे की संकीर्णता में बँधकर जल देवता की भी दुर्गति होती है। ऐसी दुर्गति से बचें एवं उदार जीवन की गरिमा समझें, देते रहने का आनन्द पाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 45

👉 मानसिक विकास का अटल नियम 28 April

🔴 जिस प्रकार के विचार हम नित्य किया करते हैं, उन्हीं विचारों के अणुओं का मस्तिष्क में संग्रह होता रहता है। मस्तिष्क का उपयोग उचित और सत्कार्यों में करने से, उसे आलसी निकम्मा न छोड़ने से, मानसिक शक्ति का विकास होता है।

🔵 मस्तिष्क को उत्तम या निकृष्ट बनाना तुम्हारे हाथ में ही है। सोचो, विचारो तथा मनन करो। क्रोध करने से क्रोध वाले अणुओं की संख्या में वृद्धि होती है। चिंता, शोक, भय व खेद करने से इन्हीं कुविचारों के अणुओं का तुम पोषण करते हो और मस्तिष्क को निर्बल बनाते हो। भूतकाल की दुर्घटनाओं या दु:खद प्रसंग को स्मरण कर, खेद या शोक के वशीभूत होकर मस्तिष्क को निर्बल मत बनाओ। शरीर में बल होते हुए भी उसका उपयोग न करने से बल क्षीण होता है।

🔴 इसी प्रकार बिना विचार के मस्तिष्क भी क्षीण होता है। नवीन विचारों का मन में स्वागत करने से मस्तिष्क का मानस-व्यापार व्यापक होता है तथा मन प्रफुल्लित हो जाता है, जीवन व बल की वृद्धि होती है, मन व बुद्धि तेजस्वी बनते हैं। जो विचार हमारे मस्तिष्क में हैं, वे ही हमारे जीवन को बनाने वाले हैं। जिस कला के विचार तथा अभ्यास करोगे, उसी में निपुणता मिलेगी। मस्तिष्क के जिस भाग का उपयोग करोगे, उसी की शक्तियों का विकास होगा।

🌹 ~अखण्ड ज्योति-जुलाई 1946 पृष्ठ 10
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1946/July/v1.10

👉 आज का सद्चिंतन 28 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 April 2017



गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

👉 हम ईश्वर के होकर रहें

🔵 प्रतिमाओं में देखे जाने वाले मनुहार करने पर भी नहीं बोलते हैं, लेकिन अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बोलने के लिए, बातें करने के लिए व्याकुल दिखते हैं। यदि हम अपने को तनिक-सा अन्तर्मुखी कर सकें, तो उनके स्वरों की झंकृति स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। न जाने कब से वे हमसे कह रहे हैं-‘‘मेरे इस अनुपम उपहार मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए, जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न बरबाद करना चाहिए, जैसे कि बरबाद किया जा रहा है। ऐसे न गवाँना चाहिए, जैसे कि गवाँया जा रहा है। यह महत्त्वपूर्ण प्रयोजन के लिए है। ओछी रीति-नीति अपनाकर मेरे इस अनोखे-अनूठे अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।

🔴 जब और भी बारीकी से उनकी भाव-भंगिमा और मुखाकृति को देखेंगे, तो प्रतीत होगा कि वे विचार-विनिमय करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो सही-इस जीवन-सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और सम्भाषण को जारी रखना चाहते हैं।
  
🔵 लेकिन उत्तर तो हम तभी दे सकते हैं, जब अपने को बारीकी से जानने की कोशिश करें, अपनी गहरी छान-बीन करें। स्वयं की रुचियों-प्रवृत्तियों की जाँच-पड़ताल करें? विचारों को ही नहीं, संस्कारों को भी परखें। आखिर कहाँ और कौन-सा वह तत्त्व है, जो हमें भगवान् से सम्भाषण नहीं करने दे रहा है, आखिर किस वजह से हम उन्हें उत्तर देने से कतरा रहे हैं, किस कारण हमारी जीवन-सम्पदा नष्ट होती चली जा रही है?

🔴 कारण कुछ भी हो, अवांछित तत्त्व जहाँ कहीं भी हों, उसे अपने से निकाल फेकें। परिष्कृत होते ही अहसास होगा, अन्तरंग में अवस्थित भगवान् की झाँकी दर्शन, सम्भाषण, परामर्श और पथ-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है। उसमें गाय, बछड़े जैसा विह्वल वात्सल्य भी है। परमात्मा हमें अपना दुग्ध अमृत-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। हमारी क्षुद्रता को अपनी अनन्तता में बदलना चाहते हैं। हमें अपनाने की, अपने में आत्मसात  कर लेने की उनकी उत्कंठा अति प्रबल है।

🔵 फिर देरी क्यों? विलम्ब किसलिए? हम ईश्वर के बनें, उसके होकर रहें, उसके लिए जिएँ। अपने को इच्छाओं और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्मसमर्पण कर सकें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पाएँगे। आनन्द की यह वर्षा हमारे रोम-रोम को पुलकन-प्रफुल्लता, उल्लास और शक्ति से भर देगी, जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाएगा।३

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 44

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (अंतिम भाग 5) 27 April

🔴 सूर्य की बिखरी किरणें मात्र गर्मी और रोशनी उत्पन्न करती हैं। किन्तु जब उन्हें छोटे से आतिशी शीशे द्वारा एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाता है। तो देखते-देखते चिनगारियाँ उठती हैं और भयंकर अग्नि काण्ड कर सकने में समर्थ होती है। बिखरी हुई बारूद आग लगने पर भक् से जलकर समाप्त हो जाती है, किन्तु उसे बन्दूक की नली में सीमाबद्ध किया जाय तो भयंकर धमाका करती है और गोली से निशाना बेधती है। भाप ऐसे ही जहाँ-तहाँ से गर्मी पाकर उठती रहती है, पर केन्द्रित किया जा सके तो प्रेशर कुकर पकाने और रेलगाड़ी चलाने जैसे काम आती है। अर्जुन मत्स्य बेध करके द्रौपदी स्वयंवर इसीलिए जीत सका था कि उसने एकाग्रता की सिद्धि कर ली थी। इसी के बलबूते विद्यार्थी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते, निशानेबाज लक्ष्य बेधते और सरकस वाले एक से एक बढ़कर कौतूहल दिखाते हैं। संसार के सफल व्यक्तियों की, एक विशेषता अनिवार्य रूप से रही है, कि वे अपने मस्तिष्क पर काबू प्राप्त किये रहे हैं। जो निश्चय कर लिया उसी पर अविचल भाव से चलते रहे हैं, बीच में चित्त को डगमगाने नहीं दिया है। यदि उनका मन अस्त-व्यस्त डाँवाडोल रहा होता तो कदाचित ही किसी कार्य में सफल हो सके होते।

🔵 योगाभ्यास में मनोनिग्रह को आत्मिक प्रगति की प्रधान भूमिका बताया गया है। इन्द्रिय संयम वस्तुतः मनोनिग्रह ही है। इन्द्रियां तो उपकरण मात्र हैं। वे स्वामिभक्त सेवक की तरह सदा आज्ञा पालन के लिए प्रस्तुत रहती हैं। आदेश तो मन ही देता है। उसी के कहने पर ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां ही नहीं, समूची काया भले बुरे आदेश पालन करने के लिए तैयार रहती है। अस्तु संयम साधना के लिए मन को साधना पड़ता है। संयम से शक्तियों का बिखराव रुकता है और समग्र क्षमता एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित होती है। फलतः उस मनःस्थिति में जो भी काम हाथ में लिया जाय, सफल होकर रहता है।

🔴 ध्यानयोग सांसारिक सफलताओं में भी आश्चर्यजनक योगदान प्रस्तुत करता है। उसके आधार पर अपना भी भला हो सकता है और दूसरों का भी किया जा सकता है।

🌹 ~समाप्त
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 5......Read Full Please Click
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http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.5

👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2017



बुधवार, 26 अप्रैल 2017

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (भाग 4)

🔴 विचारक, मनीषी, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार वैज्ञानिक आदि अपनी कल्पना शक्ति को एक सीमित क्षेत्र में ही जुटाये रहने के कारण तद्विषयक असाधारण सूझबूझ का परिचय देते हैं और ऐसी कृतियाँ-उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर पाते हैं, जिन पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। बुद्धि की तीव्रता जन्मजात नहीं होती। वह चिन्तन को विषय विशेष में तन्मय करने के फलस्वरूप हस्तगत होती है। चाकू, उस्तरा जैसे औजारों को पत्थर पर घिस देने से वे चमकने लगते हैं और पैनी धार के बन जाते हैं। बुद्धि के संबंध में भी यही बात है। उसे तन्मयता की खराद पर खराद कर हीरे जैसा चमकीला बनाना पड़ता है। जिनका मन एक काम पर न लगेगा, जो शारीरिक, मानसिक दृष्टि से उचकते मचकते रहेंगे, वे अपना समय, श्रम बर्बाद करने के अतिरिक्त उपहासास्पद भी बनकर रहेंगे।

🔵 प्रवीणता और प्रतिभा निखारने के लिए- प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए- एकाग्रता का सम्पादन आवश्यक है। शरीरगत संयम बरतने से मनुष्य स्वस्थ रहता और दीर्घ जीवी बनता है, उसी प्रकार मनोगत संयम-एकाग्रभाव सम्पादित करने से वह बुद्धिमान, विचारकों की गणना में गिना जाने लगता है।

🔴 कछुए और खरगोश की कहानी बहुतों ने सुनी होगी, जिसमें अनवरत चलते रहने वाला उस खरगोश से आगे निकल गया था, जो अहंकार में इतराता हुआ अस्त-व्यस्त चलता था। वरदराज और कालिदास जैसे मूढ़मति समझे जाने वाले जब दत्तचित्त होकर पढ़ने में प्रवृत्त हुए तो मूर्धन्य विद्वान बन गये। यह तत्परता और तन्मयता के संयुक्त होने का चमत्कार है। बिजली के दोनों तार जब संयुक्त होते हैं तो करेण्ट बहने लगता है। गंगा और यमुना के मिलने पर पाताल से सरस्वती की तीसरी धारा उमड़ती है। ज्ञान और कर्म का प्रतिफल भी ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करता है। मन और चित्त के समन्वय से उत्पन्न होने वाली एकाग्रता के भी ऐसे ही असाधारण प्रतिफल उत्पन्न होते देखे गये हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 4


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.4

👉 प्रभु! तुम्हारा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं

🔵 हे प्रभु! मेरी केवल यही कामना है कि मैं संकटों से घबराकर भागूँ नहीं, उनका सामना करूँ। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो, बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख-सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय, तब तुम मुझे सांत्वना दो। मैं अपनी अञ्जली के भाव-सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।

🔴 जब किसी कष्टदायक संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूँ। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाए। हे अन्तर्यामिन्! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी-संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर पल अपने साथ देखते हुए मुसीबतों, परेशानियों को हँसी-खेल समझकर अपने चित्त को हलका रख सकूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
  
🔵 मेरे आराध्य! तुम्हारा विश्वास हर-हमेशा मेरे हृदय-मन्दिर में दीप-शिखा की तरह अखण्ड, अविराम प्रच्वलित रहे। मेरे प्रारब्ध के प्रबल झंझावात, परिस्थितियों की भयावह प्रतिकूलताएँ स्वयं मेरी अपनी मनोग्रन्थियाँ इस ज्योति को बुझा तो क्या, कँपा भी न सकें। विश्वास की यह च्योति हर पल मेरे अस्तित्व में आत्मबल की ऊर्जा एवं तात्कालिक सूझ का प्रकाश उड़ेलती रहे। यह विश्वास मेरे लिए शक्ति बने-याचना नहीं, सम्बल बने-क्षीणता नहीं। कहीं ऐसा न हो कि स्वयं के तमोगुण से घिरकर, तुम्हारे  विश्वास का झूठा आडम्बर रखकर कर्म से विमुख हो जाऊँ, कर्त्तव्य से मुख मोड़ लूँ। चाहे जैसी भी प्रतिकूलाएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े, इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है, लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ, मेरा सर्वस्व छिन गया।

🔴 मैं न अहंकारी बनूँ और न ही अकर्मण्य। स्वयं को तुम्हारे चरणों में समर्पित करते हुए मेरी इतनी ही चाहत है कि जीवन संग्राम में रणबाँकुरे योद्धा की तरह जुझारू बनूँ। तुम्हारे विश्वास की शक्ति से भयावह संकटों के चक्रव्यूहों का बेधन करूँ, उन्हें छिन्न-भिन्न करूँ।

🔵 प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास-पुरुष बनने का गौरव हासिल किया है। जीव और संसार की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। मेरी बस यही कामना है कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए वीरता का पर्याय बने, आलस्य नहीं। वीरता का सम्बल बने, आतुरता का आकुलाहट नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 42

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 26 April 2017


मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

👉 बहादुर हो तो सच्चाई की राह पर बढ़ो

🔴 सन् १९२२ में अमावस्या की एक काली रात और वामक नदी का किनारा। गुजरात के प्रष्ठि समाजसेवी रविशंकर महाराज नदी के किनारे पगडंडी पर आगे बढ़ते चले जा रहे थे। तभी उनके कधे पर पीछे से हाथ रखते हुए किसी ने कहा- महाराज! आप आगे कहाँ जा रहे है ? चलिए वाप॑स लौट चलिए।

🔵 महाराज ने स्वर पहचान लिया, "पूछा कौन है? पुंजा"
हाँ महाराज आगे मत जाइए। आगे खतरा है।''
"कैसा खतरा है ?"
"आगे रास्ते में बहारबटिया छिपे है।"
"कौन ?---  नाम दरिया है।"

🔴 हाँ वही है। मेरी राय है कि आप आगे न जाएँ। व्यर्थ में ही इज्जत देने से क्या लाभ होगा ?

🔵 महाराज हँसे। उन्होंने कहा- "भाई मेरी इज्जत इतनी छोटी नहीं है जो थोडी-सी बात में समाप्त हो जाए। मैं उन्हीं की तलाश में इधर आया था। चलो अब तुम्ही मुझे वहीं तक पहुंचा दो, क्योंकि तुम्हारा सारा रास्ता देखा है और वह ठिकाने भी तुम्हे मालूम है जहाँ यह लोग छिपे रहते है।

🔴 नहीं-नहीं महाराज मेरी हिम्मत वहाँ जाने की नहीं है। अगर उन्होंने कोई हमला किया तो मैं आपको बचा भी न पाऊँगा और मेरे प्राण बेकार में चले जायेंगे।'

🔵 इतना कह पुंजा ठिठक गया। "अच्छा तो तुम रुको। मैं आगे जाता हूँ।" इतना कहकर महाराज आगे बढ़ गए।

🔴 वह चलते-चलते एक खेत की मेड पर खडे हो गए। इतने में ही उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति साफा बाँधे बंदूक लिए उनकी ओर बढ़ता चला आ रहा है। जब दोनों के बीच की दूरी कम रह गई तो उसने सामने बंदूक तान दी।

🔵 महाराज खिलखिला कर हँस पडे। उन्हें वारदोली सत्याग्रह का स्मरण हो आया और उनका साहस दुगुना हो गया। वे बोले क्यो ? क्या आज अकेले ही हो ? तुम्हारे अन्य साथी कहाँ हैं ?

🔴 अब महाराज और बंदूकधारी दोनों ही पास की झोंपडी के निकट आ गए जहाँ अन्य डाकू छिपे थे। एक ने गरजकर कहा खबरदार! जो एक कदम भी आगे बढाया, और महाराज लापरवाही से उसी ओर बढ़ने लगे जिस ओर यह ललकार आई थी। सामने एक घुडसवार डकैत ने आकर पूछा- तुम कौन हो ?

🔵 मैं गाँधी की टोली का बहारबटिया हूँ। आओ हम लोग बैठकर बातचीत करें। मैं तुम सबको बुलाने ही तो आया हूँ।' इतना कहकर महाराज ने घोडे की लगाम पकडने के लिए हाथ बढा़ दिया।

🔴 सब लोग उसी झोंपडी के पास ही बैठ गये। महाराज ने समझाना शुरू किया 'भाइयो! यदि तुमको जौहर ही दिखाना है तो उन अंग्रेजों को क्यों नही दिखाते, जिन्होंने सारा देश ही तबाह कर दिया है। इन गरीबों को लूटकर मर्दानगी दिखाना तो लज्जा की बात है। अब गाँधी जी के नेतृत्व में शीघ्र ही आंदोलन शुरू होगा, यदि तुम में सचमुच पौरुष है, तो गोली खाने चलो। गाँधी जी ने तुम सबको आमंत्रित किया है। यह कहते-कहते महाराज के नेत्र सजल हो गये। गला रुँध-सा गया। डाकू इस अंतरग स्नेह से आविर्भूत हो उठे।

🔵 अपने हथियार डालते हुए उनके सरदार ने कहा-आप निश्चित होकर जाइए। आज हम आपके गॉव में डाका डालने को थे, पर अब नही डालेंगे। साथ में एक आदमी भेज देता हूँ।

🔴 महाराज ने कहा आप मेरी चिंता न करिए, मै अकेला ही आया था और अकेला ही चला जाऊँगा। साथ देना है तो उस काम में साथ दो जिसे गाँधी जी ने, भगवान् ने हम सबको सौंपा है।

🔵 डाकूओं में से कई ने कुकृत्य छोड़ दिये और कईयों ने सत्याग्रह आंदोलन में भारी सहयोग किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 143, 144

👉 सजल संवेदना से हुई निहाल

🔵 मेरी शादी १९८८ में हुई थी। मेरे अभिभावकों ने मेरे पति की पढ़ाई देखकर मेरी शादी तय कर दी थी। मेरे पति एग्रीकल्चर से एम० एससी० कर रहे थे। पिताजी ने सोचा कि लड़का अच्छी पढ़ाई कर रहा है, सर्विस कहीं न कहीं लग ही जाएगी। मेरे मायके में बिजनेस का काम होता था। शादी के बाद धीरे- धीरे परेशानी बढ़ती ही चली गई। मेरे पति इलाहाबाद में कम्पटीशन की तैयारी कर रहे थे। काफी मेहनत कर रहे थे। दिन रात तैयारी में लगे रहने के बावजूद कोई सफलता नहीं मिली। इससे मन बहुत दुखी रहने लगा। इधर दो बार मैं गर्भवती हुई, किन्तु दोनों बार बच्चे खराब हो गए। मैं इन सब बातों से बहुत टूट चुकी थी। मैं दिन रात रोया करती थी।

🔴 इन्हीं दिनों मैं अपने मायके गई हुई थी। मेरा वहाँ भी वही हाल था। मुझे दिन रात चिन्तित देखकर मेरे पिताजी बहुत परेशान रहते थे। शारदीय नवरात्रि नजदीक आ गई थी। तुलसीपुर के विधायक श्री कमलेश सिंह जी सपरिवार शान्तिकुञ्ज जाने के लिए तैयार थे। मेरे चाचा (गुलजारी लाल जी) चाची तथा उनकी लड़की भी साथ जा रहे थे। मेरे पिताजी से चाचाजी ने कहा कि एक सीट खाली है। अगर कोई चलना चाहे तो शान्तिकुञ्ज जा सकता है। चाचाजी की बातों को सुनकर मेरे पिताजी ने कहा कि किसी को क्यों, नीरू को ले जाओ। वह दामाद के सर्विस न मिलने और बच्चे की घटना से दिन- रात रोती रहती है। शायद वहाँ जाने से उसका भाग्य सँवर जाए। इस पर चाचाजी ने कहा कि क्या बात करते हो! सीट न भी खाली होती तो भी हम उसको ले जाते। आप उसको भेज दीजिए। माँ के आशीर्वाद से सब ठीक हो जाएगा। पिताजी ने मुझको यह बात बताई तो मेरे मन में आशा का संचार हुआ। मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरे कष्ट ज्यादा दिन नहीं रहेंगे। मैं नवरात्रि में शान्तिकुञ्ज पहुँची। मैंने वहाँ नौ दिन के अनुष्ठान का संकल्प लिया। मेरा अनुष्ठान निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

🔵 इसके पश्चात् मेरे चाचाजी मुझे लेकर माताजी के दर्शन हेतु पहुँचे। उन्हें देखकर माताजी बोलीं- कहो बेटा कैसे हो? तो चाचाजी ने कहा- माताजी मैं क्या बताऊँ, अगर बच्चे दुखी हैं तो बाप कैसे सुखी रह सकता है। यह मेरे बड़े भइया की लड़की है, लेकिन उसे अपनी बेटी जैसा ही मानता हूँ। इसकी शादी के तीन साल हो गए। भाई साहब ने पढ़ाई देखकर बेटी की शादी कर दी थी। लेकिन दामाद को नौकरी आज तक नहीं मिली है। और इसके दो बच्चे भी खराब हो गए हैं। जिसके कारण यह बहुत परेशान रहती है। दामाद के लिए दुकान खुलवा दूँ। क्या यह ठीक रहेगा?

🔴 चाचाजी की बातें सुनकर मेरा सर सहलाते हुए माताजी कुछ क्षण शान्त हो गईं। उसके पश्चात् बोलीं- गुलजारी परेशान मत होओ, दामाद की बड़ी अच्छी सरकारी नौकरी लगेगी। और इसके दो तीन बच्चे भी होंगे। माताजी के मुख से उनकी वाणी सुनकर मेरी आँखों से आँसू आ गए। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि माँ का आशीर्वाद अवश्य फलीभूत होगा।

🔵 कुछ दिन बाद मेरे पति की कृषि विभाग में नौकरी लगी। उसके पश्चात् उत्तरप्रदेश लोक सेवा आयोग से नायाब तहसीलदार के पद पर चयन हुआ। माँ के आशीर्वाद से मेरे तीन बच्चे भी हुए जो पूर्ण स्वस्थ हैं। इस घटना के बाद से मेरे ससुराल के लोगों को भी गुरुदेव- माताजी के प्रति अनन्य श्रद्धा हो गई। आज हम सभी लोग गुरुकार्य में संलग्न हैं। गुरुदेव- माताजी के आशीर्वाद से मुझे सब कुछ मिला है, जिसकी मुझे आवश्यकता थी। हम उनकी कृपा से अभिभूत हैं।              
  
🌹 श्रीमती नीरू बलरामपुर (उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/sajal

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (भाग 3)

🔴 जिस प्रकार शरीर को सुनिश्चित दिनचर्या के अनुशासन में बाँधने वाला कुछ कहने लायक प्रगति कर सकता है, वैसी ही बात मानसिक नियंत्रण के बारे में भी है। बुद्धिमान लोग अपनी अनगढ़ कल्पनाओं को रोकते रहते हैं और चिन्तन को उसी क्षेत्र में कल्पनाएं करने की छूट देते हैं जिनसे कोई कारगर प्रयोजन सधता हो।

🔵 ऐसे ही लोग अपनी प्रखर बुद्धिमत्ता के सहारे किसी निष्कर्ष पर पहुँचते और दिशाधारा निर्धारित करते हैं। लक्ष्य निर्धारित हो जाने पर उसका मार्ग ढूँढ़ने और साधन जुटाने के निमित्त चेतना शक्ति लगती है और निश्चित मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चलते हुए सफलता ही उस स्थिति तक पहुँचा जाता है जिस पर गर्व, हर्ष और संतोष की अनुभूति हो सके।

🔴 शरीरगत अनुशासन, मनोगत निर्धारण से आगे की भूमिका है- मन को इच्छित, उपयोगी दिशा में ले चलने की संकल्प शक्ति। यह स्वभावतः किन्हीं बिरलों में ही होती है। इसे अर्जित एवं समुन्नत करने के लिए मनुष्य को विशेष रूप से प्रयत्न करना पड़ता है। सरकस वाले जिस प्रकार अपने जानवरों को आश्चर्यजनक करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, ठीक उसी प्रकार साधनापरक हंटर के सहारे मन को मात्र सुविचारों में संलग्न होने के लिए- उपयुक्त एकाग्रता अर्जित करने के लिए- प्रयत्न करना पड़ता है। यही ध्यानयोग का स्वरूप एवं उद्देश्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.4

👉 जीवन की मूल प्रेरणा है परमार्थ

🔵 संसार को आलोकित करने के लिए सूर्यदेव निरन्तर तपा करते हैं। अपने अविराम तप की च्वाला में हर-हमेशा जलते रहकर ही वे धरती के दोनों गोलार्द्धों में प्राण और ऊर्जा का संचार करते हैं। मेघों का अभाव कहीं जीवन ही न सुखा डाले, इसके लिए सागर सतत बड़वानल में जला करते हैं। अपने इस अनवरत अन्तर्दाह को सहकर वे उस सरंजाम को जुटाने में संलग्न रहते हैं, जो तपते-झुलसते जीवन को वर्षा की शीतल फुहार से शान्ति दे सके। सितारे हर रोज चमकते हैं, ताकि मनुष्य अपनी अहंता में ही न पड़ा रहकर विराट् ब्रह्म की प्रेरणाओं से पूरित बना रहे। अपनी हर श्वास के साथ संसार भर का जहर पीने और बदले में अमृत उँड़ेलने का पुण्य-पुरुषार्थ वृक्षों ने कभी बन्द नहीं किया। कर्म का परोपकार में अर्पण, सृष्टि की मूल प्रेरणा है। जिस दिन यह प्रक्रिया बन्द हो जाय, उस दिन विनाश ही विनाश, शून्य ही शून्य, अन्धकार ही अन्धकार के अलावा और कुछ भी नहीं रह जाएगा।

🔴 परोपकार की इस पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने के लिए ही नदियाँ राह में पड़ने वाले पत्थरों की ठोकरें सहकर भी सबको जलदान करती रहती हैं। पवन जमाने भर की दुर्गन्ध का बोझ सहकर भी नित्य चलता है और प्राण-दीपों को प्रज्वलित रखने का कर्त्तव्य पालन करता रहता है। फूल हँसते और मुसकराकर कहते हैं, काँटों की चुभन की परवाह न करके संसार में सुगन्ध भरने और सौन्दर्य बढ़ाते रहने में ही जीवन की शोभा है। कोयल कूकती है तो उसके पीछे जो आभा प्रतिध्वनित होती है, उसमें कोलाहलपूर्ण संसार में माधुर्य बनाए रखने का शान्त सरगम गूँजता प्रतीत होता है। अपने नन्हें से बच्चे की चोंच में दाना डालकर चिड़िया अपने वंश का पोषण ही नहीं करती, अपितु असमर्थ और अनाश्रितों को आश्रय देने की परम्परा पर भी प्रकाश डालती है।
  
🔵 जीवन की मूल प्रेरणा है, परमार्थ और लोक-कल्याण के लिए भावभरा आत्मार्पण। ठीक-ठीक आत्मार्पण किए बिना परमार्थ साधना पूरी नहीं होती। आत्माहुति जितनी सम्पूर्ण होगी, परमार्थ की च्वाला उतनी ऊँची उठेगी। दीप जितना अधिक अपने को जलाता है, ज्योति उतनी ही अधिक प्रखर होती है। जड़ें अपने को जितनी अधिक गहराई में दबाए रखती हैं, वृक्ष उतने ही अधिक मजबूत होते और ऊँचे उठते हैं। जीवन को आधार और ऊर्जा प्रदान करने वाला प्रत्येक घटक इसी पुण्य-परम्परा में संलग्न है। सृष्टि में सन्तुलन बनाए रखने के लिए इसके निर्जीव कण तक पुण्य-प्रक्रिया को जारी रखने में जुटे हैं। ऐसे में स्वयं को जीवित ही नहीं समझदार भी समझने वाला मनुष्य अपने समाज की उपेक्षा कर दे, परमार्थ से मुँह मोड़ ले, उसकी श्रीवृद्धि और सौन्दर्य निखारने का प्रयत्न न करे इससे बढ़कर लज्जा और आपत्ति की बात उसके लिए और क्या हो सकती है?

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 40

👉 अहंकार मरता है...शरीर जलता है

🔴 ऐसा कहते हैं कि नानक देव जी जब आठ वर्ष के थे तब पहली बार अपने घर से अकेले निकल पड़े, सब घर वाले और पूरा गाँव चिंतित हो गया तब शाम को किसी ने नानक के पिता श्री कालू मेहता को खबर दी कि नानक तो श्मशान घाट में शांत बैठा है। सब दौड़े  और वाकई एक चिता के कुछ दूर नानक बैठे हैं और एक अद्भुत शांत मुस्कान के साथ चिता को देख रहे थे, माॅ ने तुरंत रोते हुए गले लगा लिया और पिता ने नाराजगी जताई और पूछा यहां क्यों आऐ। नानक ने कहा पिता जी कल खेत से आते हुए जब मार्ग बदल कर हम यहां से जा रहे थे और मैंने देखा कि एक आदमी चार आदमीयो के कंधे पर लेटा है और वो चारो रो रहे हैं तो मेरे आपसे पूछने पर कि ये कौन सी जगह हैं, तो पिताजी आपने कहा था कि ये वो जगह है बेटा जहां एक न एक दिन सबको आना ही पड़ेगा और बाकी के लोग रोएगें ही।

🔵 बस तभी से मैनें सोचा कि जब एक दिन आना ही हैं तो आज ही चले और वैसे भी अच्छा नही हैं लगता अपने काम के लिए अपने चार लोगो को रूलाना भी और कष्ट भी दो उनके कंधो को, तो बस यही सोच कर आ गया।

🔴 तब कालू मेहता रोते हुए बोले नानक पर यहां तो मरने के बाद आते हैं इस पर जो आठ वर्षीय नानक बोले वो कदापि कोई आठ जन्मो के बाद भी बोल दे तो भी समझो जल्दी बोला

🔵 " नानक ने कहा पिता जी ये ही बात तो मैं सुबह से अब तक मे जान पाया हूं कि लोग मरने के बाद यहां लाए जा रहे हैं, अगर कोई पूरे चैतन्य से यहां अपने आप आ जाऐ तो वो फिर  कभी मरेगा ही नही सिर्फ शरीर बदलेगा क्योंकि मरता तो अंहकार है और जो यहां आकर अपने अंहकार कि चिता जलाता है वो फिर कभी मरता ही नही मात्र मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।

🔴 इसीलिए उन्होंने अमर वचन कहे जप जी सहाब अर्थात  "एक ओंकार सतनाम "

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 April 2017


👉 आज का सद्चिंतन 25 April 2017

रविवार, 23 अप्रैल 2017

👉 गुरु संरक्षण में किया गंगा स्नान

🔵 मेरी लड़की का विवाह सन् २००५ में १७ फरवरी को शांतिकुंज में होना निश्चित हुआ। शान्तिकुञ्ज में शादी होना मेरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ था। मेरे गाँव घर के लोगों एवं रिश्तेदारों को मिलाकर लगभग ७०- ८० लोग शांतिकुंज पहुँचे। बहुत से लोग ऐसे थे जिन्होंने शान्तिकुञ्ज पहली बार देखा था। सभी लोग बहुत उत्साहित थे। तीर्थ में विवाह संस्कार और शान्तिकुञ्ज का दिव्य दर्शन दोनों का लाभ एक साथ पाकर सभी के हृदय पुलकित थे।

🔴 विवाह संस्कार नियत तिथि को बड़े अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। विवाह संस्कार सम्पन्न होने के बाद भोजन आदि के पश्चात् बिटिया की विदाई पाँच बजे शाम को हो गयी। मेरी इच्छा और संकल्प था कि अगर मेरी लड़की की शादी हो जाएगी तो मैं गंगा नहाऊँगी। शान्तिकुञ्ज में शादी होने से मेरे दोनों संकल्प आसानी से पूरे हो रहे थे। शादी तो हो ही चुकी थी। बाकी बचा गंगा स्नान। हमें बहुत सारे और भी काम करने थे। चूँकि शादी में कन्या पक्ष से काफी लोग थे। सभी हर चीज देखना सुनना चाह रहे थे और सभी लोगों को दीक्षा भी दिलवानी थी, इसलिए रात में मैंने अपनी चाची से कहा कि अगर गंगा स्नान की बात सभी को मालूम होगी तो सुबह हम लोग स्नान नहीं कर पाएँगे। सभी तैयार होंगे तो सारा कार्यक्रम लेट हो जाएगा। करीब पचास लोग दीक्षा संस्कार के लिए तैयार थे, इसलिए हमने योजना बनाई कि २.३०- ३.०० बजे के आसपास हम दोनों उठकर चुपचाप बिना किसी को बताए गंगा स्नान को जाएँगे। तुरन्त स्नान कर जल्दी वापस भी आ जाएँगे।

🔵 दूसरे दिन सुबह मैं और मेरी चाची चुपचाप उठकर गंगा स्नान के लिए चल दिए। शान्तिकुञ्ज में तो सब कुछ सामान्य था। लेकिन जब मैं गेट से बाहर सप्तऋषि आश्रम के पास पहुँची तो मुझे बहुत भय लगने लगा। जाड़े का दिन था। कुहरा भी छाया हुआ था। सड़क पर एक दो व्यक्ति चलते हुए दिखाई पड़ रहे थे। धीरे- धीरे आगे बढ़ने पर एकदम सुनसान रास्ता था। मैं अन्दर ही अन्दर बहुत डर रही थी। जाने कितने प्रकार के भाव आ रहे थे। मैं बहुत डरी हुई थी। लेकिन अपने डर को चाची पर प्रकट नहीं होने दिया। चाची ने कहा- रास्ता सुनसान है, तो मैंने कहा कोई बात नहीं, यहाँ कोई डर नहीं रहता। इधर शान्तिकुञ्ज का क्षेत्र है सुरक्षित रहता है। उनको सांत्वना दे रही थी किन्तु मैं अन्दर ही अन्दर गुरुदेव माताजी से प्रार्थना कर रही थी कि गुरुदेव इतनी जल्दी आकर बहुत बड़ी गलती की है। अगर कुछ हो जाता है तो कोई जान भी नहीं पाएगा कि हम लोग कहाँ हैं। गुरुदेव रक्षा करें। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। उस समय मैं एकदम बीच रास्ते पर थी, शांतिकुंज की ओर का रास्ता भी सुनसान था। इस स्थिति में कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं जल्दी- जल्दी गुरुदेव का स्मरण कर आगे बढ़ रही थी। सोचा घाट पर कोई न कोई स्नान करते मिल ही जाएगा।

🔴 लेकिन मेरा सोचना एकदम गलत था। जब मैं घाट पर पहुँची तो वहाँ एकदम सुनसान था! गंगा की लहरें भी बिल्कुल शान्त थीं। मेरा हृदय भय के मारे काँप रहा था। इतना सब सोचने के बावजूद मैंने अपने भय को अन्दर ही छिपाए रखा। चाची को नहीं बताया। वह इससे और डर जाती। यही सब सोचकर गुरुदेव का नाम लेकर मैं सीढ़ियों के नीचे उतर गई। मन में आया अब आ ही गई हूँ तो स्नान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। मैंने गंगा माँ को प्रणाम किया और स्नान करने लगी।

🔵 अचानक मेरी निगाह सीढ़ियों के ऊपर पड़ी। घाट पर घना कुहरा छाया हुआ था। उसी कुहरे में देखा एक वृद्ध पुरुष सफेद धोती- कुर्ता पहने दोनों हाथ पीछे किए एक छोर से दूसरे छोर तक टहल रहे हैं। मैंने सोचा पता नहीं कौन है? इनको दिखाई भी नहीं पड़ता कि औरतें नहा रही हैं। ये यहाँ पता नहीं क्या कर रहे हैं। चाची की भी निगाह पड़ी वह भी बोली कोई बाबा टहल रहें हैं तो मैंने कहा ठीक है टहलने दो। हम दो लोग हैं डरने की कोई बात नहीं। इस प्रकार हम लोग स्नान आदि करके गंगाजी का पूजन करने के बाद सीढ़ियों पर चढ़ते हुए घाट की ओर बढ़ने लगे।

🔴 लेकिन यह क्या! जैसे ही हम लोग घाट के पास पहुँचे वहाँ वह बाबा न जाने कहाँ गायब हो गए। हम लोग सोच में पड़ गए कि ये इतनी जल्दी कहाँ गायब हो गए। काफी देर सोचने के बाद हमने शान्तिकुञ्ज की ओर प्रस्थान किया। तब तक रास्ते में काफी चहल- पहल हो चुकी थी। मेरा डर न जाने कहाँ गायब हो चुका था। दिमाग पर बहुत जोर देने के बाद जब मैंने उस वृद्ध पुरुष का ध्यान किया तो लगा वे तो साक्षात् गुरुदेव ही थे। हम डरें नहीं, कोई दुर्घटना न हो इसलिए वह अपनी उपस्थिति का आभास देकर चले गए। इस घटना को आज भी याद करती हूँ तो अफसोस होता है कि वे आए और हम उन्हें पहचान भी न पाए। जाने कितनी बातें उस समय मैंने उनको कह डालीं। लेकिन भक्तवत्सल गुरुदेव हमेशा अपने बच्चों का ध्यान रखते हैं।                      
   
🌹 श्रीमती ममता सिंह बहराईच(उत्तरप्रदेश)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/bath

👉 इन्द्रियों के गुलाम नहीं, स्वामी बनिए!

🔴 जो आदमी केवल इन्द्रिय सुखों और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति के लिए जीवित है और जिस के जीवन का उद्देश्य ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ है। निस्संदेह वह आदमी परमात्मा की इस सुन्दर पृथ्वी पर एक कलंक है, भार है। क्योंकि उसमें सभी परमात्मीय गुण होते हुए भी वह एक पशु के समान नीच वृत्तियों में फंसा हुआ है। जिस आदमी में ईश्वरीय अंश विद्यमान है, वही अपने सुख से हमें अपने पतित जीवन को दुख भरी गाथा सुनाता है!! यह कितने दुख की बात है। जिस आदमी का शरीर सूजा हुआ, भद्दा लज्जा युक्त दुखी और रुग्ण है व इस सत्य की घोषणा करता है कि जो आदमी विषय वासनाओं की तृप्ति में अंधा धुँध, बिना आगा पीछा देखे, लगा रहता है वही शारीरिक अपवित्रताओं, यातनाओं को सहता है।  

🔵 वास्तव में आदर्श मनुष्य वही है जो समस्त पाशविक वृत्तियों तथा विषय वासनाओं को रखता हुआ भी उनके ऊपर अपने सुसंयता तथा सुशासक मन से राज्य करता है, जो अपने शरीर का स्वामी है, जो अपनी समस्त विषय वासनाओं की लगाम को अपने दृढ़ तथा धैर्य युक्त हाथों में पकड़ कर अपनी प्रत्येक इन्द्रिय से कहता है कि तुम्हें मेरी सेवा करनी होगी न कि मालिकी। मैं तुम्हारा सदुपयोग करूंगा दुरुपयोग नहीं। ऐसे ही मनुष्य अपनी समस्त पाशविक वृत्तियों तथा वासनाओं की शक्तियों को देवत्व में परिणित कर सकते हैं, विलास मृत्यु है और संयम जीवन है। सच्चा रसायन शास्त्री वही है जो विषम वासनाओं के लोहे को आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्तियों के स्वर्ण में पलट लेता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~ अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1945 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1945/December/v1.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 89)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 इतने पर भी वे सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक प्रज्ञा परिवार से प्रायः २४ लाख से भी अधिक व्यक्ति सम्बन्धित हैं। उनमें से जो मात्र सिद्धांतों, आदर्शों से प्रभावित होकर इस ओर आकर्षित हुए हैं, वे कम हैं। संख्या उनकी ज्यादा है, जिनने व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश, दुलार, सहयोग, परामर्श एवं अनुदान प्राप्त किया है। ऐसे प्रसंग मनुष्य के अंतराल में स्थान बनाते हैं। विशेषतया तब जब सहायता करने वाला अपनी प्रामाणिकता एवं निस्वार्थता की दृष्टि से हर कसौटी पर खरा उतरता हो। संपर्क परिकर में मुश्किल से आधे तिहाई ऐसे होंगे, जिन्हें मिशन के आदर्शों और हमारे प्रतिपादनों का गंभीरतापूर्वक बोध है।

🔵 शेष तो हैरानियों में दौड़ते और जलती परिस्थितियों में शान्तिदायक अनुभूतियाँ लेकर वापस लौटते रहे हैं। यही कारण है जिससे इतना बड़ा परिकर बनकर खड़ा हो गया। अन्यथा मात्र सिद्धांत पर ही सब कुछ हो रहा होता, तो आर्यसमाज, सर्वोदय की तरह सीमित सदस्य होते और व्यक्तिगत आत्मीयता, घनिष्ठता का जो वातावरण दीखता है, वह न दीखता। आगंतुकों की संख्या अधिक, समय-कुसमय आगमन, ठहरने-भोजन कराने जैसी व्यवस्थाओं का अभाव जैसे कारणों से इस दबाव का सर्वाधिक भार माताजी को सहन करना पड़ा है, पर उस असुविधा के बदले जितनों की जितनी आत्मीयता अर्जित की है, उसे देखते हुए हम लोग धन्य हो गए हैं। लगता है, जो किया गया वह ब्याज समेत वसूल हो रहा है। पैसे की दृष्टि से न सही भावना की दृष्टि से भी यदि कोई कुछ कम ले, तो उसके लिए घाटे का सौदा नहीं समझा जाना चाहिए।

🔴 आराधना के लिए, लोकमंगल साधना के लिए, गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाए? क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई? कहाँ से जुटाई? इसके लिए मार्गदर्शक ने पहले ही दिन कहा था-जो पास में है, उसे बीज की तरह भगवान के खेत में बोना सीखो? उसे जितनी बार बोया गया, सौ गुना होता चला गया अभीष्ट प्रयोजन में कभी किसी बात की कमी न पड़ेगी। उन्होंने बाबा जलाराम का उदाहरण दिया था, जो किसान थे, अपने पेट से बचने वाली सारी आमदनी जरूरतमन्दों को खिलाते थे।

🔵 भगवान इस सच्ची साधना से अतिशय प्रसन्न हुए और एक ऐसी अक्षय झोली दे गए, जिसका अन्न कभी निपटा ही नहीं और अभी भी वीरपुर (गुजरात) में उनका अन्न सत्र चलता रहता है, जिसमें हजारों भक्तजन प्रतिदिन भोजन करते हैं। जो अपना लगा देता है, उसे बाहर का सहयोग बिना माँगे मिलता है, पर जो अपनी पूँजी सुरक्षित रखता है, दूसरों से माँगता फिरता है, उस चंदा उगाहने वाले पर लोग व्यंग्य ही करते हैं और यत्किंचित् देकर पल्ला छुड़ाते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/jivan.4

👉 आज का सद्चिंतन 24 April 2017


👉 CHINTAN (Last Part)

(studying the past-period of self-being): its Significance & Mechanics
🔴 Self-Refinement comes just next to Self-Inspection or Self-Review. How to refine? What is to be done to refine? There is prevention in second leg called Self-Refinement. For example if you consume liquor, just stop taking it. No sir, I shall not take wine. If you smoke, you hurt your heart then just review that. Now we shall not allow our hearts to be damaged. Self-Refinement is the name of very this action. Just wage a war against mistakes done by you so far and poise to remove that. Use your willpower in such a way that mistakes done by now must not be repeated in future. Prepare a scheme/blueprint to this effect.

🔵 What is the way of not allowing the mistakes to take place? What will we do, if rawness of our temperament compels us to continue with previous routine? The moment your mind begins partiality & favoring with what is convenient to you, be sure that is the right time to discourage and take a stand against it. Just wage a war against it. Very this war/task is called ‘Self-Refinement’. The process of ‘CHINTAN’ (also known as the very first leg towards personality-building/transformation ) comprises of two stages of SELF-INSPECTION/REVIEW and ‘SELF-REFINEMENT’ taken together. It was all that was to be told to you. 

🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya
http://awgpskj.blogspot.in/2017/04/chintan-part-2.html

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 April 2017


👉 वह व्यक्तित्व-जिसने सबका हृदय जीता

🔴 महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व में एक विशेषता यह थी कि वह हर स्तर के व्यक्ति को प्रभावित कर लेते थे। बडे लोगों के प्रति लोगों में सम्मान एवं श्रद्धा का भाव तो होता है, किंतु आत्मीयता नहीं होती। इसी प्रकार छोटों की विशेषताओं की प्रशंसा तो करते हैं किंतु उनके प्रति समानता का व्यवहार नहीं कर पाते। गाँधी जी में वह गुण था जिसके कारण वह समाज के हर वर्ग के साथ आत्मीयता का भाव स्थापित कर लेते थे तथा स्नेह एवं सम्मान दोनों समान रूप से प्राप्त कर लेते थे। वह वास्तव में जन नेता कहे जा सकते थे और उनका जादू सर चढ़कर बोलता था। प्रस्तुत घटना से उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष पर प्रकाश पड़ता है।

🔵 घटना दिसंबर सन् १९४५ की है। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त होना लगभग निश्चित हो गया था। किसी परामर्श वार्ता के सिलसिले में बंगाल के गवर्नर श्री आर० जी० केसी ने गाँधीजी को राजभवन में बुलाया था। श्री केसी प्रतिष्ठित आस्ट्रेलियायी राजनीतिज्ञ थे।

🔴 गाँधी जी के वार्तालाप में उन्हें इतना रस आया कि वे भोजन का समय भी भूल गये। वार्ता के मध्य किसी का जाना मना था, अत: कोई याद दिलाने भी न जा सका। वार्ता समाप्त हुई तो बापू उठकर चल दिए। उन्हें पहुंचाने पीछे-पीछे गवर्नर महोदय भी चल रहे थे। सामान्य शिष्टाचार के नाते भी तथा व्यक्तिगत रूप से गाँधी जी से प्रभावित होने के कारण भी उनका ऐसा करना स्वाभाविक था।

🔵 बाहर जाने के मार्ग में जब वह दोनों बडे़ हाल मे छँचे तो गवर्नर चौंक पडे़। उन्होंने देखा कि हाल में राजभवन के सारे के सारे कर्मचारी उपस्थित है। धोबी से रसोइए तक चौकीदार व अन्य कर्मचारियों से लेकर माली तक, सब मिलाकर लगभग जिनकी संख्या २०० थी, सबके सब उपस्थित थे। सभी शांति के साथ दो लंबी कतारों में खडे़ थे, मानो किसी को गार्ड ऑफ आनर देने की तैयारी है। निश्चित रूप से उन्हें किसी ने एकत्र होने को नही कहा था। वह तो बापू के प्रति सहज इच्छा के कारण उनके दर्शनार्थ एकत्र हो गये थे। उनमें से अनेक तो काम करते-करते वैसे ही भागकर आ गये थे। ऐसी पोशाक में थे कि उस अवस्था मे गवर्नर के सामने आना अनुशासनहीनता के रूप मे दंडनीय था, किंतु यहाँ वह गवर्नर के लिये नहीं, अपने प्यारे बापू के लिये आए थे। बापू यहाँ से गुजरे तो सबने श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। उनका अभिवादन स्वीकार करते हुए बापू अपनी मुस्कान से सबको संतोष देते हुए आगे बड गए।

🔴 श्री केसी खोये-खोये से साथ थे। उन्हें कुछ कहते न बन पड़ रहा था। विचित्र वेशभूषा में कर्मचारियों को देख संकुचित भी थे तथा गाँधी जी के प्रति अनुराग देखकर चकित भी। बोले गाँधीजी! यकीन रखिये, मैंनै उन्हें एकत्र होने के लिए नहीं कहा था। बापू उत्तर न देते हुए, केवल मुस्कुराकर विदा माँगकर चल दिए। श्री केसी को उस समय तक इस विषय में शंका थी कि भारत में विभिन्न संप्रदायों को एक सूत्र में बिना भय के बॉधा जा सकता है, किंतु गाँधी जी का वह अनोखा गार्ड ऑफ आनर देखकर उनकी मान्यता बदल गई। उनके कर्मचारियों में अधिकांश मुसलमान व कुछ इसाई भी थे। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के हर वर्ग के हृदय में गाँधी ने इतना गहरा स्थान बना लिया है इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं थी।

🔵 जन-जन के अंतःकरण मे गाँधी जी ने इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे पा किया था यह अध्ययन का विषय है। उन्होंने जी जान से सबके हित का प्रयास किया था। अपना सब कुछ जनता को देकर ही उन्होने वह स्थान बनाया था, जो किसी भी जन नेता कहलाने वाले के लिए शोभनीय है। बिना उसके थोथी वाह-वाही भले ही कोई पा ले, न तो सही अर्थों में सबका स्नेह पा सकता है और न ही सफल नेतृत्व कर सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 141, 142

👉 व्रतशील जीवन की महिमा

🔵 उथली और मजबूत किनारों से रहित नदियाँ तनिक-सी वर्षा होने पर सब ओर बिखर पड़ती हैं और बाढ़ का रूप धारण कर पास-पड़ोस के खेतों, गाँवों को नष्ट-भ्रष्ट कर देती हैं। इसके विपरीत वे नदियाँ भी हैं, जिनमें प्रचण्ड वेगयुक्त जलधारा बहती है, किन्तु उफनने की दुर्घटना उत्पन्न नहीं होती। कारण कि वे गहरी होती हैं और उनके किनारे मजबूत व सुदृढ़ होते हैं।

🔴 तनिक-से आकर्षण और भय का अवसर आते ही मनुष्य अपने चरित्र और ईमान को खो बैठता है। थोड़ी-सी प्रतिकूलता, तनिक-सी विरोधी परिस्थितियाँ उसे सहन नहीं होतीं और आवेशग्रस्त स्थिति उत्पन्न कर देती हैं; इसका कारण व्यक्ति का आन्तरिक उथलापन है, व्रतशील जीवन की कमी है। ऐसे लोग तभी तक अच्छे लग सकते हैं, जब तक कि परीक्षा का अवसर नहीं आता। जैसे ही परीक्षा की घड़ी आयी, वैसे ही वे मर्यादाओं को तोड़-फोड़ कर उथले नालों की तरह बिखरते हैं और अपने पड़ोस, समाज व पूरी मनुष्यता के लिए बाढ़ का संकट उत्पन्न करते हैं।
  
🔵 मजबूत किनारों का तात्पर्य है-व्रतशील जीवन। व्रत आदर्शों के प्रति विश्वास है, निष्ठा है। व्रत के द्वारा मनुष्य लक्ष्य तक पहुँचने हेतु आत्मशक्ति सँजोने-अर्जित करने का प्रयत्न करता है। विश्वास जितना सशक्त होता है, निष्ठा जितनी अविचल होती है, संकल्प जितना दृढ़ होता है, व्यक्ति उतनी ही सुगमता से तथा सफलता से जीवन की पूर्णता प्राप्त करता है। शक्ति, शक्ति है। इसका समुचित उपयोग तभी सम्भव है, जबकि यह एकत्रित हो और समुचित दिशा की ओर केन्द्रित हो। व्रत से यही असाधारण कार्य सम्पन्न होता है। इससे मानवीय जीवन की खोती-बिखरती शक्तियाँ एकत्रित-एकाग्र होकर जीवन-लक्ष्य की दिशा में प्रवाहित होने लगती हैं।
  
🔴 हर दिन व्रत है, दिन का हर पल व्रत है। सुख-समृद्धि, सन्तान-स्वास्थ्य आकांक्षा में किया जाने वाला प्रयत्न भी व्रत है; तो सिद्ध-बुद्ध-मुक्त अवस्था प्राप्त करने हेतु साधुता को साधते रहना भी व्रत है। खाना भी व्रत है, नहीं खाना भी व्रत है। जीवन संग्राम में जूझना भी व्रत है, मौन-ध्यानी बनकर एकासन पर बैठे रहना भी व्रत है। जीवन का हर कर्म, जीवन का हर प्रयत्न व्रत हो सकता है, यदि उसमें ईश्वर से एकाग्रता की आकांक्षा और आत्मा की जागरुकता निहित हो। आत्म-बल को जगाने-साधने का प्रयत्न ही व्रत है। व्रत में आत्मा, परमात्मा की ओर उन्मुख होती है, अर्थात् जीवन की परमात्मोन्मुखता ही व्रत है।

🔵 व्रत के हजारों-हजारों नाम हैं। सातों वारों के व्रत हैं। पन्द्रहों तिथियों के व्रत हैं। बारह मासों के व्रत हैं। विभिन्न धर्म एवं सम्प्रदाय अपने देश, काल एवं परिस्थिति के अनुरूप इनका औचित्य समझाते हैं, परन्तु ये सभी जहाँ एकत्रित रूप से सम्मिलित हो जाते हैं, वह जीवन व्रत है। जिसके प्रति संकल्पित होने से जीवन में आदर्शों एवं मर्यादाओं की आभा निखर उठती है। जीवनक्रम में ऊर्ध्वगामी प्रेरणाएँ स्वतः उमँगने लगती हैं। जीवन की हर श्वास में परमात्मा की सुवास भर जाती है। इस व्रत सिद्धि के चमत्कार इतने हैं कि जिन्दगी का हर क्षण आश्चर्यजनक सफलता एवं आत्मिक प्रगति से भरापूरा लगने लगता है। इसको जिन्होंने अपनाया है-केवल उन्हीं के लिए सम्भव है कि महामानवों के लिए शोभनीय मार्ग पर अनवरत रूप से बढ़ सकें। व्रतशीलता जीवन का सार-मर्म है-जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट साधन एवं साहस का सुसंचय।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 39

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 April

🔴 जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

🔵 निष्ठुरता, एकाकीपन, अलगाव से भरे आज के समाज में सतयुगी संभावनाएँ तभी साकार होंगी जब मानव के अन्दर ब्राह्मणत्व जागेगा। सादा जीवन, उच्च विचार की परम्परा का विस्तार होगा। गरीबी को जानबूझकर ओढ़ने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा। बड़प्पन की कसौटी एक ही होगी, विकसित भावसंवेदना, श्रेष्ठ-उदात्त चिन्तन व समाज को ऊंचा उठाने वाले सत्कर्म। संधि वेला में ऐसे अनेक नव ब्राह्मण उभरकर आएँगे। जाति, वंश के भेद से परे इन महामानवों की जीवनचर्या परमार्थ पारायण होगी। सतयुग की वापसी तब ही तो होगी।

🔴 ईश्वर एक नियम, मर्यादा एवं व्यवस्था का नाम है। स्वयं को भी उसने अपने को इन अनुशासनों में आबद्ध कर रखा है। फिर मनुष्य के साथ व्यवहार करते समय वह अपनी सुनिश्चित रीति-नीति से पीछे कैसे हट सकता है। उसे चापलूसी के आधार पर किस तरह अपनी ओछी मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए सहमत किया जा सकता है। उस निष्पक्ष न्यायाधीश से कुछ अनुपयुक्त करा लेने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 17)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 समय बड़ा मूल्यवान् है। उसे बड़ी कंजूसी से खर्च करना चाहिए। जितना अपने समय-धन को बचाकर उसे आवश्यक उपयोगी कार्यों में लगावेंगे उतनी ही अपने व्यक्तित्व की महत्ता एवं कीमत बढ़ती जायगी। नियमित समय पर काम करने का अभ्यास डालें। इसकी आदत पड़ जाने पर आपको स्वयं ही इसमें बड़ा आनन्द आने लगेगा।

🔵 यदि मनुष्य प्रतिदिन किसी काम विशेष में थोड़ा-थोड़ा समय भी लगावें तो वह उससे महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त कर सकता है महामनीषी स्वेटमार्डेन ने कहा है, जीवन भर एक विषय में नियमित रूप से प्रतिदिन एक घण्टा लगाने वाला व्यक्ति उस विषय का उद्भट विद्वान बन सकता है। जरा अनुमान लगाइये कोई भी प्रतिदिन एक घण्टे में बीस पृष्ठ पढ़ता है तो साल में 7300 पृष्ठ पढ़ डालेगा। अर्थ हुआ 100 पृष्ठ की 73 पुस्तकें वह एक साल में पढ़ लेगा। दस वर्ष में 730 पुस्तकें पढ़ने वाले व्यक्ति के ज्ञान का विचार-स्तर कैसे होगा? इसके बारे में पाठक स्वयं ही अन्दाज लगा सकते हैं। अतः समय को मामूली न समझें नियमित रूप से कोई भी काम आप करेंगे तो धीरे-धीरे उसमें बहुत बड़ी योग्यता हासिल कर लेंगे यह निश्चित है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (भाग 2)

🔴 बच्चों के शरीर दिन भर उछल कूद करते रहते हैं। उसका प्रयोजन अभी यह होता है अभी वह। जैसा मूड आया वैसी गतिविधियाँ अपनाने लगे। चिड़ियों तथा बन्दरों जैसे पशुओं की अनगढ़ गतिविधियाँ किसी उद्देश्य विशेष के लिए नहीं अपितु अस्त-व्यस्त, अनगढ़ और अर्ध विक्षिप्त सी, ऐसी ही कुछ ऊट-पटाँग सी होती है। जिधर मुँह उठ जाता है, उधर ही वे चल पड़ते हैं, भले ही उस श्रम से किसी प्रयोजन की सिद्धि न होती हो।

🔵 मन को यदि अपने प्राकृतिक रूप में रहने दिया जाय तो उसकी कल्पनाएँ अनगढ़ एवं अनियंत्रित होती हैं। मनुष्य कभी भी कुछ भी सोच सकता है, कभी यह, कभी वह, कल्पना की उड़ानों में ऐसी बातें भी सम्मिलित रहती हैं जिनकी कोई सार्थकता नहीं होती। वैसा बन पड़ना तो सम्भव ही नहीं होता। इन बिना पंखों की रंगीली या डरावनी उड़ानों पर बुद्धिमत्ता ही यत्किंचित् नियंत्रण लगा पाती है और बताती है कि इस प्रकार सोचने से कुछ काम की बात निकलेगी। जिनकी बुद्धिमत्ता कम और कल्पनाशक्ति बचकानी होती है वे कुछ भी सोच सकते हैं। ऐसी बातें भी, जिनका अपनी वर्तमान स्थिति के साथ किसी प्रकार का तारतम्य तक नहीं बैठता।

🔴 शक्तियों को क्रमबद्ध रूप से किसी एक प्रयोजन के लिए लगाया जाय तो ही उसका कोई प्रतिफल निकलता है। बिखराव से तो बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। शरीर को नियत निर्धारित काम पर लगाये रहने पर ही कृषि, व्यापार, मजूरी जैसे काम बन पड़ते हैं और उपयुक्त लाभ मिलता है। आवारागर्दी में घूमते रहने वाले आलसी, प्रमादी अपनी श्रम शक्ति का अपव्यय करते हैं, फलतः उन्हें उपलब्धियों की दृष्टि से छूँछ ही रहना पड़ता है। यही बात मन के संबंध में है। मस्तिष्कीय ऊर्जा, मानसिक तन्तुओं को उत्तेजित करती है। फलस्वरूप रात्रि स्वप्नों की तरह दिवा स्वप्न भी आते रहते हैं और मनुष्य कल्पना लोक में विचरता रहता है।

🔵 यदि नियोजित बुद्धिबल कम हो तो व्यक्ति सनकी जैसा बन जाता है और उपहासास्पद कल्पनाएँ करता रहता है। भीतर की इच्छाएँ और आकाँक्षाएँ ही सुहावने और डरावने दिवा स्वप्न विनिर्मित करती रहती हैं और मस्तिष्क उन्हीं सनकों के जाल जंजाल में फंसा हुआ चित्र-विचित्र, संभव असंभव बातें सोचता रहता है। फलतः मस्तिष्क जैसे बहुमूल्य तंत्र का उत्पादन ऐसे ही बर्बाद होता है और उसका प्रतिफल नहीं के बराबर ही हस्तगत होता है। आवारागर्दी में बालकों, बन्दरों जैसी उछल कूद से मनोविनोद के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। मस्तिष्कीय बर्बादी, शरीरगत श्रम, समय की बर्बादी से भी अधिक हानिकारक होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 3
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.3

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

👉 जब बस कण्डक्टर के रूप में सहायता की

🔵 सन् 2009 की बात है। नवम्बर का महीना था। मैं अपने मायके विहरा गाँव, जो बिहार के सासाराम जिले में है, गई थी। मेरी माँ की तबीयत खराब थी। मैं माँ को देखकर वापस टाटानगर में साकची को जा रही थी। मेरे साथ मेरा छोटा लड़का था। जब मैं बस स्टैण्ड आई, कण्डक्टर से टिकट के लिए कहा तो वह बोला कि सभी सीट पहले से बुक है। मैं बहुत गिड़गिड़ाई। बहुत प्रार्थना की कि भैया हमको जाना बहुत जरूरी है। अगर यह बस मुझे नहीं मिली तो इस समय मैं छोटे बच्चे के साथ कहा जाऊँगी? थोड़ी देर में साँझ घिर जाएगी। लेकिन मेरी बात का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कहने लगा एक सप्ताह बाद आइए, तो आपको सीट मिल जायेगी।
     
🔴 मैं बहुत सोच में पड़ गई। और कोई साधन भी नहीं था जिससे मैं चली जाती। अचानक मुझे ट्रेन की बात याद आई कि क्यों न ट्रेन से चलूँ। लेकिन बाद में याद आया कि आज रविवार का दिन है। आज टाटानगर के लिए कोई ट्रेन नहीं थी। मेरा गाँव स्टेशन से बहुत दूर था। दिन का 2 बज गया था। अब मेरा रास्ता हर जगह से बंद हो गया था। न मैं मायके जा सकती थी और न ससुराल।
     
🔵 धीरे- धीरे सूरज ढल रहा था। शाम हो रही थी। उसी क्रम में मेरी चिन्ता भी बढ़ती जा रही थी। मिथिला का नियम है भदवा तिथि में कहीं निकला नहीं जाता है। दुर्भाग्य! आज वही तिथि पड़ी थी। अब तो मेरा मन और घबरा गया। और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मैं फूट- फूट कर रोने लगी। मुझे रोते हुए देखकर मेरा लड़का अभिजीत भी परेशान हो रहा था। लड़का बोला घबराओ मत। एक बार मैं फिर कण्डक्टर से मिलूँ, अगर होगा तो आगे की तारीख का टिकट कटा लूँगा। जैसे ही हम लोग वहाँ पर गए, हमें एक मन्दिर दिखा। जिसमें माताजी- गुरु जी का फोटो लगा हुआ था। गुरुदेव- माताजी के चित्रों को देखकर मैं फिर रोने लगी और आर्त्तभाव से प्रार्थना करने लगी। हे गुरुदेव! अब रात होने जा रही है। बस जाने वाली है। मैं महिला जाति रात में इधर- उधर कहाँ भटकती फिरूँगी। अब तो आप का ही सहारा है।

🔴 अब गाड़ी स्टार्ट हो गई थी। मैं बस को अपलक निहारे जा रही थी। अचानक बस कण्डक्टर पर नजर पड़ी, तो सन्न रह गई। वह हू- ब-हू गुरुजी जैसा दिख रहा था। इसी बीच वह टिकटों का हिसाब करने लगा। ड्राइवर और कण्डक्टर के बीच बातें होने लगीं। कण्डक्टर कह रहा था कि दो सीट का पैसा कम है। बस मालिक बोल रहा था कि जब एक महीना से पूरी सीट फुल है तो पैसा कहाँ से कम हो जाएगा? जब बस में अन्दर जाकर देखा गया तो बीच में दो सीटें खाली थी। इतना सुनते ही वहाँ भीड़ लग गई। भगदड़ मच गई। सभी यात्रियों को जाने की जल्दी थी। कोई कहता हम एक हजार देंगे, कोई कहता हम दो हजार देंगे। सभी रुपए निकालने लगे।

🔵 इसी बीच कण्डक्टर जोरों से चिल्लाया, मैं किसी का रुपया नहीं लूँगा। अभी कुछ घंटे पहले एक माँ बेटा जो टिकट के लिए घूमकर गए हैं, मैं उन्हीं को यह सीट दूँगा। इतना सुनते ही खुशी के मारे आँसू निकल आए। मैंने श्रद्धापूर्वक गुरु देव- माताजी को प्रणाम किया। तब तक मेरा बेटा भी दौड़कर मेरे पास आया और बोला- माँ टिकट की व्यवस्था हो गई, जल्दी चलो। हम बस की ओर दौड़ पड़े। जब हम बस पर चढ़े तो सभी बस यात्री शोर करने लगे। कहने लगे पीछे जाइए, पीछे जाकर बैठिए। हम लोगों ने एक महीना पहले टिकट बुक कराया है। इसलिए आप पीछे जाकर बैठिए।

🔴 तभी कण्डक्टर आए और बोले, आप परेशान न हों। उन्होंने मुझे और मेरे बेटे को 16- 17 नम्बर की सीट पर बैठा दिया और बोले- आप लोग आराम से बैठिए। चिन्ता न करें। मैं आता- जाता रहूँगा। इस तरह जहाँ- जहाँ बस रुकती, वे हम लोगों से पूछते रहते कि कोई कठिनाई तो नहीं है? इस तरह हम सुबह 9 बजे राँची पहुँच गए। वहाँ से दूसरी बस द्वारा टाटानगर सही सलामत पहुँच गए।

🔵 इस तरह से गुरु देव ने बस में आकर मेरी सहायता की। अब सोचती हूँ तो लगता है कि मेरे प्रार्थना करने पर गुरु देव मेरी सहायता करने स्वयं चले आए! आज भी जब मैं घटना को सोचती हूँ तो गुरु देव की कृपा का सहज ही अहसास हो जाता है और हमारी आँखें श्रद्धा से नम हो जाया करती हैं।                    
  
🌹 शशिप्रभा वर्मा साकची, पूर्वी सिंहभूम (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/won/jab

👉 जीवन को तपस्यामय बनाइए

🔴 प्रकृति का नियम है कि संघर्ष से तेजी आती है। रगड़ और घर्षण यद्यपि देखने में कठोर कर्म प्रतीत होते हैं, पर उन्हीं के द्वारा सौंदर्य का प्रकाश होता है। सोना तपाए जाने पर निखरता है। धातु का एक रद्दी-सा टुकड़ा जब अनेक विध कष्टदायक परिस्थितियों के बीच में होकर गुजरता है, तब उसे भगवान की मूर्ति होने का, या ऐसा ही अन्य महत्त्वपूर्ण गौरवमय पद प्राप्त होता है। 

🔵 जीवन वही निखरता है, जो कष्ट और कठिनाइयों से टकराता रहता है। विपत्ति, बाधा और कठिनाइयों से जो लड़ सकता है, प्रतिकूल परिस्थितियों से युद्ध करने का जिसमें साहस है, उसे-ही, सिर्फ उसे-ही जीवन विकास का सच्चा सुख मिलता है। इस पृथ्वी के पर्दे पर एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ है, जिसने बिना कठिनाई उठाए, बिना जोखिम उठाए, कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर ली हो।

🔴 कष्टमय जीवन के लिए अपने आप को खुशी-खुशी पेश करना, यही तप का मूलतत्त्व है। तपस्वी लोग ही अपनी तपस्या से इंद्र का सिंहासन जीतने में और भगवान का आसन हिला देने में समर्थ हुए हैं। मनोवांछित परिस्थितियाँ प्राप्त करने का संसार में एकमात्र साधन तपस्या ही है। स्मरण रखिए, सिर्फ वे ही व्यक्ति इस संसार में महत्व प्राप्त करते हैं, जो कठिनाइयों के बीच हॅसना जानते हैं, जो तपस्या में आनंद मानते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1945 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.in/magazine/AkhandjyotiHindi/1945/October.1

👉 आज का सद्चिंतन 23 April 2017


👉 CHINTAN (Part 2)

(studying the past-period of self-being): its Significance & Mechanics

🔴 Whenever at some convenient time you sit in solitude, just think we are alone and have no companion or friend. Let the companion, the friend, the family member, the money, the business, the agricultural field be in their places. You only have to think if we have been doing any mistake for last days? Whether have we forgotten the path, deviated? Whether was I born for this only? Whether did I do what for I was born? Whether I was busy earning more than how much was required? Whether I was adding to number of loads unnecessarily by paying attention to family more than what genuinely required? Whether I was busy loading them with gifts they did not required, only for their happiness? Why? r which reasons? Very these are the mistakes of life, we have been committing all along.

🔵 In the same way, whether I took care of food and living style that was to be taken necessarily from health point of view. Whether the required modesty, that ought to be, was incorporated in thinking-style or not? No. We did not fulfill duties either for our bodies or brain or our family members. We stand lagged far behind from point of view of duties. Once think over issues whereat we lagged. Why? What is the advantage of doing this? The advantage is that rectification of mistakes will be possible only when they are known to us. What and why will you rectify when you do not know what and why to do? That is why review or revisit becomes essential. Just review yourself and your past.  

🔴 Not only is the crime that is called the sin. Things, actions making life disordered are also called sins. The theft and the murder are obviously the crimes but not the less is passing time in lethargy & laziness, maintaining an angry temperament, keeping your temperament worried & disordered. What these are? These too are mistakes. Just review repeatedly what mistakes associated with virtues, actions and temperament in your personal life and those associated with your crime both, you have been committing. It is very essential to revisit your past. This action leads us to assess where we are wrong and how much we had been missing and are still missing. The next step is related with rectification of such mistakes and is called Self-Refinement.

🌹 to be continue...
🌹 ~Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 April 2017


👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 88)

🌹 जीवन साधना जो कभी असफल नहीं जाती

🔴 सर्वव्यापी ईश्वर निराकार हो सकता है। उसे परमात्मा कहा गया है। परमात्मा अर्थात आत्माओं का परम समुच्चय। इसे आदर्श का एकाकार कहने में भी हर्ज नहीं। यही विराट् ब्रह्म या विराट विश्व है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को अपने इसी रूप का दर्शन कराया था। राम ने कौशल्या तथा काकभुशुण्डि को इसी रूप को झलक के रूप में दिखाया था और प्राणियों को उनका दृश्य स्वरूप। इसी मान्यता के अनुसार यह लोक सेवा ही विराट् ब्रह्म की आराधना बन जाती है। विश्व उद्यान को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए ही परमात्मा ने बहुमूल्य जीवन देकर अपने युवराज की तरह यहाँ भेजा है। इसकी पूर्ति में ही जीवन की सार्थकता है। इसी मार्ग का अधिक श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करने से अध्यात्म उत्कर्ष का वह प्रयोजन सधता है, जिसे आराधना कहा गया है।

🔵 हम करते रहे हैं। सामान्य दिनचर्या के अनुसार रात्रि में शयन, नित्य कर्म के अतिरिक्त दैनिक उपासना भी उन्हीं बारह घण्टों में भली प्रकार सम्पन्न होती रही है। बारह घण्टे इन तीनों कर्मों के लिए पर्याप्त रहे हैं। चार घण्टा प्रातःकाल का भजन इसी अवधि में होता रहा है। शेष आठ घण्टे में नित्य कर्म और शयन। इसमें शयन की कोताही कहीं नहीं पड़ी। आलस्य-प्रमाद बरतने पर तो पूरा समय ही ऐंड-बेंड में चला जाता है, पर एक-एक मिनट पर घोड़े की तरह सवार रहा जाए, तो प्रतीत होता है कि जागरूक व्यक्तियों ने इसी में तत्परता बरतते हुए वे कार्य कर लिए होते जितने के लिए साथियों को आश्चर्य चकित रहना पड़ता है।

🔴  यह रात्रि का प्रसंग हुआ, अब दिन आता है। उसे भी मोटे रूप में बारह घण्टे का माना जा सकता है। इसमें से दो घंटे भोजन, विश्राम के लिए कट जाने पर दस घण्टे विशुद्ध बचत के रह जाते हैं। इनका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों की लोकमंगल आराधना में नियमित रूप से होता रहा है। संक्षेप में इन्हें इस प्रकार कहा जा सकता है। १-जनमानस के परिष्कार के लिए युग चेतना के अनुरूप विचारणा का निर्धारण-साहित्य सृजन २-संगठन जागृत आत्माओं को युग धर्म के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्तेजना मार्गदर्शन, ३-व्यक्तिगत कठिनाइयों में से निकलने तथा सुखी भविष्य विनिर्मित करने हेतु परामर्श योगदान। हमारी सेवा साधना इन तीन विभागों में बँटी है। इनमें दूसरी और तीसरी धारा के लिए असंख्य व्यक्तियों से संपर्क साधना और पाना चलता रहा है।

🔵 इनमें से अधिकांश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है। इनके नामोल्लेख और घटनाक्रमों का विवरण सम्भव नहीं क्योंकि एक तो जिनकी सहायता की जाए, इनका स्मरण भी रखा जाए। यह अपनी आदत नहीं, फिर उनकी संख्या और विनिर्मित उतनी है कि जितने स्मरण है उनके वर्णन से ही एक महापुराण लिखा जा सकता है। फिर उनको आपत्ति भी हो सकती है। इन दिनों कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रचलन समाप्त हो गया। दूसरों की सहायता को महत्त्व कम दिया। अपने भाग्य या पुरुषार्थ का ही बखान किया जाए। दूसरों की सहायता के उल्लेख में हेटी लगती है। ऐसी दशा में अपनी ओर से उन घटनाओं का उल्लेख करना जिसमें लोगों के कष्ट घटें या प्रगति के अवसर मिलें, उचित न होगा। फिर एक बात भी है कि बखान करने के बाद पुण्य घट जाता है। इतने व्यवधानों के रहते उस प्रकार की घटनाओं के सम्बन्ध में मौन धारण करना ही उपयुक्त समझा जा रहा है और कुछ न कह कर ही प्रसंग समाप्त किया जा रहा है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साकारात्मक हार

🔴 गोपालदास जी के एक पुत्र और एक पुत्री थे। उन्हे अपने पुत्र के विवाह के लिये संस्कारशील पुत्रवधु की तलाश थी। किसी मित्र ने सुझाया कि पास के गांव में ही स्वरूपदास जी के एक सुन्दर सुशील कन्या है।

🔵 गोपालदास जी किसी कार्य के बहाने स्वरूपदास जी के घर पहूंच गये, कन्या स्वरूपवान थी देखते ही उन्हे पुत्रवधु के रूप में पसन्द आ गई। गोपालदास जी ने रिश्ते की बात चलाई जिसे स्वरूपदास जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। स्वरूपदास जी की पत्नी ने मिष्ठान भोजन आदि से आगत स्वागत की।

🔴 संयोगवश स्वरूपदास जी की पत्नी के लिये नवसहर का सोने का हार आज ही बनकर आया था। समधन ने बडे उत्साह से समधी को दिखाया, हार वास्तव में सुन्दर था। गोपालदास जी ने जी भरकर उस हार की तारीफ की। कुछ देर आपस में बातें चली और फ़िर गोपालदास जी ने लौटने के लिये विदा मांगी और घर के लिये चल दिये।

🔵 चार दिन बाद ही स्वरूपदास जी की पत्नी को किसी समारोह में जाने की योजना बनी, और उन्हे वही हार पहनना था। उन्होने ड्रॉअर का कोना कोना छान मारा पर हार नहीं मिला। सोचने लगी हार गया तो गया कहाँ? कुछ निश्चय किया और स्वरूपदास जी को बताया कि हार गोपालदास जी, चोरी कर गये है।

🔴 स्वरूपदास जी ने कहा भागवान! ठीक से देख, घर में ही कहीं होगा, समधी ऐसी हरक़त नहीं कर सकते। उसने कहा मैने सब जगह देख लिया है और मुझे पूरा यकीन है हार गोपाल जी ही ले गये है, हार देखते ही उनकी आंखे फ़ट गई थी। वे बडा घूर कर देख रहे थे, निश्चित ही हार तो समधी जी ही लेकर गये है।आप गोपाल जी के यहां जाईए और पूछिए, देखना! हार वहां से ही मिलेगा।

🔵 बडी ना-नुकर के बाद पत्नी की जिद्द के आगे स्वरूप जी को झुकना पडा और बडे भारी मन से वे गोपाल जी के घर पहूंचे। आचानक स्वरूप जी को घर आया देखकर गोपाल जी शंकित हो उठे कि क्या बात हो गई?

🔴 स्वरूपजी दुविधा में कि आखिर समधी से कैसे पूछा जाय। इधर उधर की बात करते हुए साहस जुटा कर बोले- आप जिस दिन हमारे घर आए थे, उसी दिन घर एक हार आया था, वह मिल नहीं रहा।

🔵 कुछ क्षण के लिये गोपाल जी विचार में पडे, और बोले अरे हां, ‘वह हार तो मैं लेकर आया था’, मुझे अपनी पुत्री के लिये ऐसा ही हार बनवाना था, अतः सुनार को सेम्पल दिखाने के लिये, मैं ही ले आया था। वह हार तो अब सुनार के यहां है। आप तीन दिन रुकिये और हार ले जाईए। किन्तु असलियत में तो हार के बारे में पूछते ही गोपाल जी को आभास हो गया कि हो न हो समधन ने चोरी का इल्जाम लगाया है।

🔴 उसी समय सुनार के यहां जाकर, देखे गये हार की डिज़ाइन के आधार पर सुनार को बिलकुल वैसा ही हार,मात्र दो दिन में तैयार करने का आदेश दे आए। तीसरे दिन सुनार के यहाँ से हार लाकर स्वरूप जी को सौप दिया। लिजिये सम्हालिये अपना हार।

🔵 घर आकर स्वरूप जी ने हार श्रीमति को सौपते हुए हक़िक़त बता दी। पत्नी ने कहा- मैं न कहती थी,बाकि सब पकडे जाने पर बहाना है, भला कोई बिना बताए सोने का हार लेकर जाता है ? समधी सही व्यक्ति नहीं है, आप आज ही समाचार कर दिजिये कि यह रिश्ता नहीं हो सकता। स्वरूप जी नें फ़ोन पर गोपाल जी को सूचना दे दी, गोपाल जी कुछ न बोले।उन्हे आभास था ऐसा ही होना है।

🔴 सप्ताह बाद स्वरूप जी की पत्नी साफ सफ़ाई कर रही थी, उन्होने पूरा ड्रॉअर ही बाहर निकाला तो पिछे के भाग में से हार मिला, निश्चित करने के लिये दूसरा हार ढूढा तो वह भी था। दो हार थे। वह सोचने लगी, अरे यह तो भारी हुआ, समधी जी नें इल्जाम से बचने के लिये ऐसा ही दूसरा हार बनवा कर दिया है।

🔵 तत्काल उसने स्वरूप जी को वस्तुस्थिति बताई, और कहा समधी जी तो बहुत उंचे खानदानी है। ऐसे समधी खोना तो रत्न खोने के समान है। आप पुनः जाईए, उन्हें हार वापस लौटा कर  और समझा कर रिश्ता पुनः जोड कर आईए। ऐसा रिश्ता बार बार नहीं मिलता।

🔴 स्वरूप जी पुनः दुविधा में फंस गये, पर ऐसे विवेकवान समधी से पुनः सम्बंध जोडने का प्रयास उन्हे भी उचित लग रहा था। सफलता में उन्हें भी संदेह था पर सोचा एक कोशीश तो करनी ही चाहिए।

🔵 स्वरूप जी, गोपाल जी के यहां पहूँचे, गोपाल जी समझ गये कि शायद पुराना हार मिल चुका होगा।

🔴 स्वरूप जी ने क्षमायाचना करते हुए हार सौपा और अनुनय करने लगे कि जल्दबाजी में हमारा सोचना गलत था। आप हमारी भूलों को क्षमा कर दिजिए, और उसी सम्बंध को पुनः कायम किजिए।

🔵 गोपाल जी नें कहा देखो स्वरूप जी यह रिश्ता तो अब हो नहीं सकता, आपके घर में शक्की और जल्दबाजी के संस्कार है जो कभी भी मेरे घर के संस्कारो को प्रभावित कर सकते है।

🔴 लेकिन मैं आपको निराश नहीं करूंगा। मैं अपनी बेटी का रिश्ता आपके बेटे के लिये देता हूँ, मेरी बेटी में वो संस्कार है जो आपके परिवार को भी सुधार देने में सक्षम है। मुझे अपने संस्कारो पर पूरा भरोसा है। पहले रिश्ते में जहां दो घर बिगडने की सम्भावनाएं थी, वहां यह नया रिश्ता दोनो घर सुधारने में सक्षम होगा। स्वरूप जी की आंखे ऐसा हितैषी पाकर छल छला आई।

👉 तुम उसे अवश्य पा लोगे

🔵 किसी पहाड़ी झील पर नजर डालो। तुषार की रूपहली चादर बिछी हुई है। हवा चलती है, पानी बरसता है। बादल गरजते हैं, बिजली चमकती है,  किन्तु झील की निश्चलता में कोई अन्तर नहीं आता। किनारों पर रंग-बिरंगे पक्षी कूँजते और किल्लोल करते हैं, किन्तु उस झील में कोई विक्षेप उत्पन्न नहीं होता। तट पर फैली वृक्षावली में एक से एक सुन्दर, सुगन्धित फूल खिलते, शाखा में से टूटकर झील पर गिरते हैं। किन्तु झील के स्थिर हृदय में उनका कोई प्रतिबिम्ब नहीं उठता। वह अपने निर्विकल्पता का धैर्य है, जिसे तुम अवश्य पा लोगे।

🔴 कुम्हार तालाब से मिट्टी खोद लाता है। उसे कूट-पीस कर महीन बनाता और छानकर साफ करके पानी डालकर उसे खूब रौंदता, पीटता है। तैयार हो जाने पर, चाक पर चढ़ाकर अपनी इच्छा के अनुसार वह उसे आदमी, पशु या पक्षी का रूप देता है, किन्तु इतना सब होने पर भी मृत्तिका कुछ नहीं बोलती। सब कुछ समभाव से सहन करती हुई कुम्भकार की इच्छा-वशवर्ती रहती है। यदि तुममें उस मृत्तिका की भाँति सहनशीलता और नम्रता है, तो तुम उसे अवश्य पा लोगे।
  
🔵 मरुस्थल में भटके प्राणी की वांछा में पानी पीने की लालसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पानी के लिए उसकी व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि उसे तपती रेत के कणों में पानी का आभास होने लगता है। वह छटपटाता है, दौड़ता है, विकलाता है, उसकी चाह होती है कि किसी पानी से लबालब भरे जलाशय की नहीं, सिर्फ एक बूँद जल की। वह बूँद में ही अपने सर्वस्व को खोजता है। पनघट पर खड़े पथिक की प्यास में न तो इतनी व्याकुलता होती है और न एकान्तिकता।
  
🔴 वह पानी के अतिरिक्त वहाँ के दृश्य भी देखता और रस भी लेता है। वहाँ पास में खड़े लोगों से गप-शप का आनन्द भी लूटने लगता है। यदि तुम उसे पाना चाहते हो, तो पनघट पर खड़े प्यार से पथिक की इच्छा नहीं, मरुस्थल में भटके तृषित प्राणी की आकांक्षा लेकर चलो, एक दिन तुम उसे अवश्य पा लोगे।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 37

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 April

🔴 काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकारों का आवेश मनुष्य को अन्धा कर देता है। उसका विवेक ठीक काम नहीं करता, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य का उसे ध्यान नहीं रहता और वह उस प्रकार का व्यवहार कर बैठता है जिससे उसे स्वास्थ्य से हाथ धोना पड़ता है, समाज में अपयश होता है, दूसरों से सम्बन्ध खराब होते हैं और वह अविश्वास का पात्र बन जाता है।

🔵 सम्बन्धियों, धन और यश में आसक्ति वाला मनुष्य लेन-देन में पक्ष-पात करता है। चोरी, ठगी और बेईमानी करता है, दूसरों को धोखा देता है, झूठे वादे करता है और चालाकी से काम लेता है। वह भूल जाता है कि पक्षपात से समाज की व्यवस्था खराब होती है, चोरी और बेईमानी से असुरक्षा और भय की स्थिति पैदा होती है, जिसका प्रभाव स्वयं उसके ऊपर भी पड़ सकता है। झूठ और चालाकी से उसका नैतिक पतन होता है और उस अनीति से जो लाभ होता है वह स्थाई नहीं होता।

🔴 स्वर्ग और नरक कहीं और नहीं है। इन्हें मानव स्वयं इसी धरती पर बनाता है। जब मानव नीति, संयम, त्याग, सेवा, तप और सहानुभूति का जीवन जीते हैं तो समाज में स्वास्थ्य, सुख, शान्ति, बाहुल्य, सद्भावना, प्रेम, हंसी-खुशी और पारस्परिक विश्वास का कल्प-वृक्ष उगता है। यही स्वर्ग है। संकुचित स्वार्थ, असंयम, आलस्य, घृणा, द्वेष और दम्भ समाज में उत्पीड़न, भय, असन्तोष, अभाव और अविश्वास का वातावरण बना देते हैं। यही नरक है। हमारा चिन्तन, भावनाएं और कर्म ही स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है। अपने लिए-समस्त संसार के लिए हम स्वर्ग का सृजन करें अथवा नरक का निर्माण करें यह हमारी इच्छा और चेष्टा पर पूर्णतया निर्भर हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समय का सदुपयोग करें (भाग 16)

🌹 समय जरा भी नष्ट मत होने दीजिये

🔴 जरा विचार कीजिये आपको अमुक दिन अमुक गाड़ी से बम्बई जाना है। अगर आप गाड़ी के सीटी देने के एक मिनट बाद स्टेशन पहुंचे तो फिर आपको वह गाड़ी, वह दिन, वह समय कभी नहीं मिलेगा। निश्चित समय निकल जाने के बाद आप किसी दफ्तर में जायें तो निश्चित है आपका काम नहीं होगा। आपको स्मरण होगा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, जार्ज वाशिंगटन आदि को सड़क पर से गुजरते देखकर लोग अपनी घड़ियां मिलाते थे अपने काम और समय का इस तरह मेल रखें कि उसमें एक मिनट का भी अन्तर न आये। तभी आप अपने समय का पूरा-पूरा सदुपयोग कर सकेंगे।

🔵 आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। यह कई रूपों में मनुष्य पर अपना अधिकार जमा लेता है। कई बार कुछ काम किया कि विश्राम के बहाने हम अपने समय को बरबाद करने लगते हैं। वैसे बीमारी, तकलीफ आदि में विश्राम करना तो आलस्य नहीं है। थक जाने पर नींद के लिये विश्राम करना भी बुरा नहीं है। थकावट हो, नींद आये तो तुरन्त सो जायें लेकिन आंख खुलने पर उठ-पड़ें चारपाई न तोड़ें। अभी उठते हैं, अभी उठते हैं, कहते रहें तो यही आलस्य का मन्त्र है। आंखें खुलीं कि तुरन्त अपने काम में लग जायें।

🔴 रस्किन के शब्दों ‘‘जवानी का समय तो विश्राम के नाम पर नष्ट करना ही घोर मूर्खता है क्योंकि वही वह समय है जिसमें मनुष्य अपने जीवन का, अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठण्डा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य का प्रयत्न भी व्यर्थ चला जाता है।’’ विश्राम करें, अवश्य करें। अधिक कार्य क्षमता प्राप्त करने के लिये विश्राम आवश्यक है लेकिन उसका भी समय निश्चित कर लेना चाहिए और विश्राम के लिये ही लेटना चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...