शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 22 April

🔴 भावना हृदय की आन्तरिक वस्तु है। यदि हम झूठे भाव से अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच अपनत्व, उदारता और त्याग का भाव प्रदर्शन करना चाहेंगे तो कभी न कभी इसकी सत्यता परिलक्षित हो ही जायगी। तब अन्य सदस्यों का दृष्टिकोण हमारे प्रति कितना गलत हो जायेगा। लोग सशंकित हो जायेंगे। हमारे प्रति अश्रद्धालु हो जायेंगे। इस मर्यादा का पालन आन्तरिक गुण है कि हम परिवार में श्रद्धा के पात्र समझे जायं। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं भावना की वस्तु है।

🔵 सफल, प्रगतिशील विकासोन्मुख और सम्मानित जीवन-यापन करना जिन्हें अभीष्ट हो उन्हें इसके लिए अन्तरंग से छिपे हुए सामर्थ्य बीजों को अंकुरित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वे आमतौर से उपेक्षित पड़े रहते हैं, लोग बाह्य साधनों में सफलताओं की सम्भावना एवं कामनाओं की पूर्ति के आधार ढूँढ़ते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि वे आधार बाहर नहीं भीतर है जिनसे व्यक्तित्व को विकसित करना सम्भव होता है और सफलताओं के रुके हुए द्वार खुलते हैं।

🔴 किसी प्रकार सफलता प्राप्त करने की नीति बुरी है। अधिक जल्दी और अधिक लाभ प्राप्त करने की धुन में लोग अनैतिक काम करने पर उतारू हो जाते हैं और अपराधियों जैसी गतिविधियाँ अपनाते हैं। सम्भव है उससे आरम्भ में कुछ लाभ भी रहे, पर पीछे वस्तुस्थिति प्रकाश में आते ही वह बालू का महल पूरी तरह धराशायी हो जाता है। निन्दनीय और अप्रामाणिक ठहराया गया व्यक्ति हर किसी की आँखों से गिर जाता है। उसका नैतिक पतन न केवल व्यक्तित्व को ही अवाँछनीय ठहराता है वरन् उसके किये कामों में भी अविश्वसनीयता का ढिंढोरा पीटता है। ऐसे व्यक्तियों को एक प्रकार से सामाजिक पक्षाघात ग्रसित ही कहना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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