शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

👉 श्रेष्ठ शासक की कसौटी


👉 आप निराश मत हूजिए (भाग २)

इसके विपरीत आशावाद मनुष्य के लिए अमृत तुल्य है। जैसे तृषित को शीतल जल, रोगी को औषधि से, अंधकार को प्रकाश से, वनस्पति को सूर्य से लाभ होता है, उसी भाँति आशावाद की संजीवनी बूटी से मृतप्राय मनुष्य में जीवन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। आशावाद वह दिव्य प्रकाश है जो हमारे जीवन को उत्तरोत्तर परिपुष्ट, समृद्धिशाली और प्रगतिशील बनाता है। सुख, सौंदर्य एवं सफलता की अलौकिक छटा से उसे विभूषित कर उसका पूर्ण विकास करता है। उसमें माधुर्य का संचार कर विघ्न-बाधा, दुख, क्लेश और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कराने वाली गुप्त मनःशक्ति जागृत करता है। आत्मा की शक्ति से देदीप्यमान आशावादी उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रोंधता हुआ अग्रसर होता है। वह पथ-पथ पर विचलित नहीं होता, उसे कोई बात असंभव प्रतीत नहीं होती, उसे कोई कार्य असंभव प्रतीत नहीं होता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, संसार की कोई शक्ति उसे नहीं दबा सकती क्योंकि सब शक्तियों का विकास करने वाली “आशा” की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है।

संसार के कितने ही व्यक्ति अपने जीवन को उचित, श्रेष्ठ और श्रेय के मार्ग पर नहीं लगाते। किसी एक उद्देश्य को स्थिर नहीं करते, न वे अपने मानसिक संकल्प को इतना दृढ़ ही बनाते है कि निज प्रयत्नों में सफल हो सकें। सोचते कुछ हैं करते कुछ और हैं। काम किसी एक पदार्थ के लिए करते हैं आशा किसी दूसरे की ही करते हैं। करील के वृक्ष बोकर आम खाने की अभिलाषा रखते हैं। हाथ में लिए हुए कार्य के विपरीत मानसिक भाव रखने से हमें अपनी निदिष्ट वस्तु कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। बल्कि हम इच्छित वस्तु से और भी दूर जा पड़ते हैं। तभी हमें नाकामयाबी, लाचारी, तंगी, क्षुद्रता प्राप्त होती है। अपने को भाग्यहीन समझ लेना, बेबसी की बातों को लेकर झोंकना और दूसरों की सिद्धि पर कुढ़ना हमें सफलता से दूर ले जाता है। विरोधी भाव रखने से मनुष्य उन्नत अवस्था में कदापि नहीं पहुँच सकता। संसार के साथ अविरोधी रहो, क्योंकि विरोध संसार की सबसे उत्कृष्ट वस्तुओं को अपने निकट नहीं आने देता और अविरोध उत्कृष्ट वस्तुओं का एक आकर्षक बिन्दु है।

तुम्हारे भाग्य में आशावाद का स्वर्ग आया है न कि निराशावाद का नर्क। तुम अपनी जीवन यात्रा में मंदगति से घिसटते हुए पशुवत् पड़े रहने के लिए जगत में प्रविष्ट नहीं हुए हो। अपने को अशक्त असमर्थ मानने वाले डरपोक व्यक्तियों की श्रेणी में तुम नहीं हो। तुम दुर्बल अन्तःकरण वाले निराशावादियों की तरह निःसार वस्तुओं के कुत्सित चिंतन में निष्प्रयोजन अपनी शक्तियों का अपव्यय नहीं करते। संसार में तुम उस महान पद पर आसीन होगे जिस पर संसार के अन्य प्रतापी पुरुष होते आये हैं। अभी तुम इस स्थिति में पड़े हो तो क्या, शीघ्र ही उच्चतम विकास के दिव्य प्रदेश में तुम प्रविष्ट होने वाले हो। तुम सर्वेश्वर के पवित्र अंश हो और तुम्हें प्रकृति ने अपनी इष्ट-सिद्धि के लिए पर्याप्त साधन और सामर्थ्य प्रदान किए हैं। तुम एक बार प्रयत्न तो करो।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1950 पृष्ठ 12

👉 QUERIES ABOUT ANUSTHANS (Part 2)

Q.4. What are the basic rules of an Anusthan?

Ans. The set of rules to be followed are :-

(1) As far as practicable, regularity of time and number in the Jap should be maintained in the routine with minimum possible deviations.

(2) The five basic principles i.e. (i) fasting (ii) abstention from sex (iii) self-service (iv) sleeping on ground (v) refraining from leather-ware like shoes etc., are to be followed. (One may instead use synthetics, rubber etc.) If sleeping on ground is not safe because of dampness, insects etc., a hard wooden bed may be used. Self service is essential in making shaves, (avoid the barber) cleaning of clothes (don’t send them to the laundry) personal and for other physical requirements. In case it is inconvenient to cook one’s own food, help of a close family member- wife, mother, sister etc. may be taken. Prepared food items from market (restaurants, dhabas etc.) are strictly forbidden. Sex is taboo during an Anusthan. Not only one should avoid physical sex, stimulation of sex impulse through even casual thoughts and sight should also be checked. Ladies coming in contact should be treated as mother, sister or daughter. The same is applicable to the behaviour of women towards men.

Fasting can be done in one of the following ways:        (a) Only liquid food like buttermilk, milk, fruit juice etc.(b) Subsisting on fruits and vegetables only (c) taking tasteless food items devoid of salt, sugar and spices (d) partaking only one meal a day (e) choosing only two food items during the period of Anusthan.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 72

👉 "एक ले दूजी डाल"

चींटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दाल।
कहत कबीर दो ना मिले, एक ले दूजी डाल।।

एक चींटी अपने मुंह में चावल लेकर जा रही थी, चलते चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई, उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई लेकिन चावल मुंह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी। दाल लेने को जाती है तो चावल नहीं मिलता । चींटी का दोनों को लेने का प्रयास था।
कबीर कहते हैं-- "दो ना मिले इक ले " चावल हो या दाल।

कबीर दास जी के इस दोहे का भाव यह है कि हमारी स्थिति भी उसी चींटी -जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में फंस कर अतृप्त  ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती है तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह परंपरा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है।

यह हमारा मोह है, लोभ है। हमको लोहा मिलता है, किंतु हम सोने के पीछे लगते हैं। पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। काम, क्रोध, लोभ यह तीनों प्रकार के नरक के द्वार हैं। यह आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

"दो ना मिले एक ले दूजी डाल "इस कथन में मुख्य रूप से संतोष की शिक्षा है जो लोभ, मोह आदि से बचने का संदेश है।

वस्तुतः प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है, उसी में संतोष करना चाहिए। क्योंकि जो प्राप्त होने वाला है उसके लिए श्रम करना व्यर्थ है, और जो प्राप्त होने वाला नहीं है उसके लिए भी श्रम करना व्यर्थ है। अपने समय की हानि करनी है। यह समझना चाहिए कि हमारे कल्याण के लिए प्रभु ने जैसी स्थिति में हमको रखा है। वही हमारे लिए सर्वोत्तम है, उसी में हमारी भलाई है, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है, और न मिलने वाली है। क्योंकि तृष्णा  का, कामना का,  कोई अंत नहीं है।
हम भगवान को पसंद करते हैं, तो क्या मांगते हैं। इस पर विचार करना चाहिए, कबीर जी कहते हैं --- "एक ले दूजी डाल"।

हमारा मन भी चींटी सरीखा है। बुद्धि हमारा सारथी है, किंतु उस पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। हम मन के हिसाब से चलते हैं और दुखी होते हैं। अतः "एक ले दूजी डाल" अर्थात जो मिल जाए उसे प्रभु प्रसाद मानकर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें।

👉 खुशियों का खजाना

खुशियाँ चाहते हो? तो सबसे पहले अन्तस् में खोजो। इन्हें बाह्य परिस्थिति में नहीं आन्तरिक मनःस्थिति में ढूँढो। जो खुशियों की खोज अन्तस् में करता है, उसे फिर इन्हें कहीं अन्यत्र नहीं खोजना पड़ता। और जो यहाँ खोजने की कोशिश न करके बाहर खोजता है, वह सदा खोजता ही रहता है, किन्तु पाता कुछ भी नहीं है।
  
एक भिखारी था, वह जिन्दगी भर एक ही जगह पर बैठकर भीख माँगता रहा। उसकी ख्वाहिश थी कि वह भी धनवान् बने। इसलिए वह दिन में ही नहीं रात में भी भीख मांगता। जो कुछ उसे भीख में मिलता उसे खर्च करने की बजाय जोड़ता रहता। अपनी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात भरपूर कोशिश की। लेकिन वह कभी भी धनवान न हो सका। वह भिखारी की ही तरह जिया और भिखारी की ही तरह मरा। जब वह मरा तो उसके कफन के लायक भी पूरे पैसे उसके पास नहीं थे। उसके मर जाने के बाद आस-पास के लोगों ने उसका झोपड़ा तोड़ दिया। फिर सबने मिलकर वहाँ की जमीन साफ की। सफाई करने वाले इन सभी को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्हें उस जगह पर बड़ा भारी खजाना गड़ा हुआ मिला। यह ठीक वही जगह थी, जिस जगह पर बैठकर वह भिखारी जिन्दगी भर भीख माँगा करता था। जहाँ पर वह बैठता था, उसके ठीक नीचे यह भारी खजाना गड़ा हुआ था।
  
जो खुशियों की तलाश में बाहर भटकते हैं, उनकी हालत भी कुछ ऐसी ही है। क्या हममें से हर एक के भीतर ही वह खुशियों का खजाना नहीं छुपा हुआ है, जिसे कि हम सब उम्र भर बाहर खोजते रहते हैं। इसके पहले कि खुशियों के खजाने की तलाश में, आनन्द और आलोक की खोज में, शान्ति और समृद्धि की चाहत में तुम यात्रा की शुरुआत करो, सबसे पहले तो उस जगह को खोज लेना, वहीं पर खोद लेना, जहाँ कि तुम खड़े हो। क्योंकि बड़े से बड़े खोजियों ने, यात्रियों ने सारी दुनियां में, सारी उम्र भटक कर अन्ततः यह खुशियों का खजाना अपने ही अन्तस् में पाया है। इसलिए अन्यत्र इसकी खोज व्यर्थ ही है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८२

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, ...