शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

समाज के लिए एक मिसाल........

यूपी की IAS प्रीति यादव ने IAS दिलीप यादव से कोर्ट में जिस सादगी से शादी की वह चर्चा का विषय बन गई है। यह शादी खंडवा के कलेक्टोरेट में हुई जिसे खंडवा कलेक्टर अभिषेक सिंह ने संपन्न करवाया।

प्रीति यादव मूलत: UP की हैं और अभी MP के खंडवा में पदस्थ हैं। वहीं दिलीप जयपुर के रहने वाले हैं और अभी नागालैंड में पदस्थ हैं।

प्रीति से शादी करने के लिए दिलीप खुद खंडवा आये और उन्हें वरमाला पहनाई। दोनों ने कहा कि हमने इसलिए ऐसी शादी कि ताकि लोगों को बता सकें कि कम खर्च में सादगी से शादी हो सकती है, आप उसमें पैसा न बहाएं। जितना अपनी हैसियत में हो खर्च करें वरना कर्ज आदि न लें। समाज में दहेज़ प्रथा जैसी दूषित बिमारी को दूर भगाये।

आप दोनों को कोटि-कोटि बधाई व शुभकामनाएं

👉 आत्मदेव को साधें

🔷 परोक्ष देवता अगणित हैं और उनकी साधना उपासना के हमात्म्य तथा विधा भी बहुतेरे; किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही- इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को अघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।   

🔶 इस बुद्धिवादी युग में देव मान्यता के सम्बन्ध में सन्देह भी प्रकट किया जाता है। यहाँ तक कि अविश्वास एवं उपहास भरी चर्चायें भी होती हैं। ऐसी दशा में हमें सार्वजनीन  ऐसे देवता का आश्रय लेना चाहिए,जो साम्प्रदायिक अन्धविश्वासों से ऊपर उठा एवं सर्वमान्य हो। साथ ही जिसके अनुग्रह और वरदान के सम्बन्ध में भी अँगुली न उठे। 

🔷 ऐसे देवता एक और हैं और वह हैं- आत्मदेव। अपना सुसंस्कृत आपा एवं परिष्कृत व्यक्तित्व। इसका आश्रय रहने पर कोई न अभावग्रस्त रह सकता है और न निराशतिरस्कृत

🔶 अन्य सभी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कष्टसाध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से रहते हूए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्म विकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना स्वर्ग, स्वयं बनायें (अन्तिम भाग)

🔶 यदि आपको ऐसा स्वर्ग वांछित तथा अपेक्षित है, तो अपने आत्म-भाव का विस्तार कर अनुकूल तथा प्रियतापूर्ण परिस्थितियां प्राप्त कर लीजिये। आज से ही अपने-पराये की संकीर्णता त्याग दीजिये। जन-जन को आत्मीयता का अमृत और प्रेम का प्रसाद बांटने लगिये। अपने पड़ौसियों को अपना परिजन, दूसरे के बच्चों को अपना बच्चा और आगे बढ़कर जीव-मात्र को अपना आत्मीय समझिये और वैसा ही व्यवहार करिये। उनके लिये उसी प्रकार का त्याग और वैसी ही सेवा करने में तत्पर रहिये, जैसी कि आप अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये करने को तैयार रहते हैं। दूसरों के दुःख से उसी प्रकार दुःखी और सुख से उसी प्रकार सुखी होइये, जिस प्रकार अपने प्रिय एवं परिजनों के लिये होते हैं। और तब देखिये कि आप वह आनन्द और वह सन्तोष पाते हैं या नहीं, जिसकी कल्पना किसी लोकतांत्रिक स्वर्ग में की जाती है।
   
🔷 शुद्ध और निर्विकार बात तो यह है कि अपनी दी हुई आत्मीयता के बदले में प्रेम अथवा प्रशंसा की कामना न की जाय और सारा सद्व्यवहार केवल अपनी ओर से एकाकी ही करते रहा जाय। इस निस्वार्थ-भाव में जो आनन्द और जो सन्तोष है, वह तो स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष से भी बढ़कर है। तथापि आत्मीयता के बदले में आत्मीयता मिलना स्वाभाविक है। जो जिसको प्रेम देता है, वह उससे प्रेम पाता भी है। जो जिसे अपना मानता है, जैसा व्यवहार करता है, वैसा ही अपनत्व और व्यवहार पाता भी है।

🔶 जब जन-जन को निस्वार्थ-भाव से आत्मीय मानकर तदनुसार व्यवहार करेंगे और दूसरों के आत्मीय बनकर तदनुसार व्यवहार पायेंगे, तो ऐसे किसी सुख-सन्तोष से वंचित नहीं रह सकते हैं, जिसकी कल्पना लोकतांत्रिक स्वर्ग में की जा सकती है। आत्म-निर्मित पृथ्वी का यह स्वर्ग अधिक सत्य, अधिक सरल और अधिक महत्त्वपूर्ण है। यदि आपके इस आध्यात्मिक उपाय से पृथ्वी पर अपना स्वर्ग निर्माण कर लिया, तो निश्चय मानिये इसके उपलक्ष अथवा प्रतिफल में आप उस स्वर्ग को भी प्राप्त कर लेंगे, जिसका वर्णन मन मोह लेता है।

📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1968 पृष्ठ 8
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 When a Saint Led an Army

🔶 This story is about self confidence attracting God's grace. Once upon a time, the king of Taxshila was attacked by a powerful enemy. Seeing the huge army of the opponent the commander of Taxshila's army lost his confidence and told the king, "O King, the enemy's army is huge and well armed. It is better to surrender without a fight." Hearing this, the king became very sad and worried. A saint of Taxshila came to know about this situation. He approached the king and said firmly, "Let the commander of the army be immediately removed, I will myself lead the army in this battle." Now, the king was in a dilemma for a while, but considering that an honorable fight is better than surrender, he finally gave his consent.

🔷 The saint took charge of the army and marched ahead. There was an old temple on their way. Saint said to the soldiers, let us visit the temple and ask God about the outcome of this battle. They went in and the saint tossed a coin, saying, saying, "If it is a tail the victory shall be ours!" And tail it was! Knowing that they had the Divine approval the soldiers fought valiantly with full confidence and won.

🔶Everyone said this is the result of the blessings from the temple's God. But, the saint smiled mysteriously. He showed the coin he had tossed to them. It had tail mark on both the sides. The saint said, "The victory is the result of your own self confidence and valor. God helps those who help themselves!"

📖 From Pragya Puran

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 6)

🔶 धर्मसत्ता और राजसत्ता दोनों समानान्तर हैं। अगर यह राजसत्ता चाहे तो लोगों के मानसिक स्तर को ऊँचा उठा सकती है और लोगों को दिशाएँ दे सकती हैं, लोगों को क्रोध से रोक सकती है और लोगों को शुद्ध और सदाचारी बना सकती है। इसी प्रकार से धर्मसत्ता में भी वह सामर्थ्य है कि लोगों की भावनाओं को पढ़ सकती है और लोगों को अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा दे सकती है। अतः प्रयास यही किया गया कि हम धर्मतन्त्र को सँभालें और उसकी शक्ति का उपयोग करें और लोगों की भावनाओं को ऊँचा उठाने के लिए प्रयास करें। धर्मतन्त्र अपने आप में बड़ा सामर्थ्यवान है।
                 
🔷 धर्मतन्त्र में ५६ लाख व्यक्ति सन्त और महात्मा, बाबा और ब्राह्मण, महात्मा के रूप में भारतवर्ष के ७ लाख गाँवों में रहते हैं। भारतवर्ष में ७ लाख गाँव हैं और ५६ लाख सन्त-महात्मा है। हर गाँव के पीछे ८ आदमी आते हैं। अगर ये ८ आदमी चाहें कि हर गाँव को अपना कार्यक्षेत्र और सेवा-क्षेत्र बना लें तो हर गाँव में से शिक्षा की समस्या को हल किया जा सकता है। सामाजिक गुत्थियों की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। विषमताएँ और दूसरी बुराइयाँ जो हमारे देहातों में व अन्य जगहों में फैली हुई हैं, उनको मिटाया जा सकता है। यह काम कोई कठिन नहीं है सफाई की समस्या को सहज ही हल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सन्त-महात्मा घर-घर भक्ति के नाम पर सहयोग की भावना पैदा करें, कल्याण की भावना पैदा करें।
    
🔶 सरकार का यह व्यक्तिगत उत्तरदायित्व हो तो हमारा विश्वास बन जाता है और हमारा इतिहास अन्य किसी देश की तुलना में आगे बढ़ सकता है, पीछे रहने की कोई जरूरत नहीं हो सकती। लेकिन ये धर्मतन्त्र ठीक तरीके से काम नहीं कर सका। प्रयास युगनिर्माण योजना का यही था कि धर्मतन्त्र में जितने भी व्यक्ति काम करते हैं, उन सबको वह प्रेरणा दी जाए, वह शिक्षा दी जाए कि वह भगवान् का सूक्ष्म स्वरूप समझें, भगवान् का सन्देश समझें और भगवान् की सेवा-पूजा का उद्देश्य समझें।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 8 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Dec 2017


👉 गुरु का स्थान

🔶 एक राजा था. उसे पढने लिखने का बहुत शौक था. एक बार उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की. शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा. राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए, मगर राजा को कोई लाभ नहीं हुआ। गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था. राजा बड़ा परेशान, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्द और योग्य गुरु थे। आखिर में एक दिन रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये।

🔷 राजा ने एक दिन हिम्मत करके गुरूजी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, हे गुरुवर क्षमा कीजियेगा, मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों है ?

🔶 गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया,  राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है…

🔷 गुरुवर कृपा कर के आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये, राजा ने विनती की।

🔶 गुरूजी ने कहा, राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने बड़े होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान और दुखी हैं. माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं। आप हर दृष्टि से मुझ से पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है। गुरु होने के नाते मेरा स्थान आपसे उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं। बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है. आपके राजा होने के कारण मैं आप से यह बात नहीं कह पा रहा था।

🔷 कल से अगर आप मुझे ऊँचे आसन पर बैठाएं और स्वंय नीचे बैठें तो कोई कारण नहीं कि आप शिक्षा प्राप्त न कर पायें।

🔶 राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

🔷 मित्रों, इस छोटी सी कहानी का सार यह है कि हम रिश्ते-नाते, पद या धन वैभव किसी में भी कितने ही बड़े क्यों न हों हम अगर अपने गुरु को उसका उचित स्थान नहीं देते तो हमारा भला होना मुश्किल है. और यहाँ स्थान का अर्थ सिर्फ ऊँचा या नीचे बैठने से नहीं है, इसका सही अर्थ है कि हम अपने मन में गुरु को क्या स्थान दे रहे हैं। क्या हम सही मायने में उनको सम्मान दे रहे हैं या स्वयं के ही श्रेस्ठ होने का घमंड कर रहे हैं?

🔶 अगर हम अपने गुरु या शिक्षक के प्रति हेय भावना रखेंगे तो हमें उनकी योग्यताओं एवं अच्छाइयों का कोई लाभ नहीं मिलने वाला और अगर हम उनका आदर करेंगे, उन्हें महत्व देंगे तो उनका आशीर्वाद हमें सहज ही प्राप्त होगा।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...