बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

👉 गायत्री की दैनिक साधना (भाग 2)

🔴 जिन्हें मन्त्र ठीक तरह शुद्ध रूप से याद न हो वे नीचे की पंक्तियों से उसे शुद्ध कर लें।
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”

🔵 साधारणतः जप प्रतिदिन का नियम यह होना चाहिए कि कम से कम 108 मन्त्रों की एक माला का नित्य किया जाए। जप के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। शौच स्नान से निवृत्त होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिए। धोती के अतिरिक्त शरीर पर और कोई वस्त्र न रहे। ऋतु अनुकूल न हो तो कम्बल या चादर ओढ़ा जा सकता है। जल का एक छोटा पात्र पास में रखकर शान्त चित्त से जप करना चाहिए। होंठ हिलते रहें, कंठ से उच्चारण भी होता रहे, परन्तु शब्द इतने मंद स्वर में रहे कि पास बैठा हुआ मनुष्य भी उन्हें न सुन सके। तात्पर्य यह है कि जप चुपचाप भी हो और कंठ ओष्ठ तथा जिह्वा को भी कार्य करना पड़े।

🔴 शान्त चित्त से एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिए। मस्तिष्क में त्रिकुटी स्थान पर सूर्य जैसे तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उस प्रकाश की तेजस्वी किरणें मेरे मस्तिष्क तथा समस्त शरीर को एक दिव्य विद्युत शक्ति से भरे दे रही है। जप और ध्यान साथ साथ आसानी से हो सकते हैं। आरम्भ में कुछ ऐसी कठिनाई आती है कि जप के कारण ध्यान टूटता है और ध्यान की तल्लीनता से जप में विक्षेप पड़ता है। यह कठिनाई कुछ दिनों के अभ्यास से दूर हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति 1944 सितम्बर

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? भाग 11)


🌞 पहला अध्याय

🔴 अनेक साधक अध्यात्म-पथ पर बढ़ने का प्रयत्न करते हैं पर उन्हें केवल एकांगी और आंशिक साधन करने के तरीके ही बताये जाते हैं। खुमारी उतारना तो वह है जिस दशा में मनुष्य अपने रूप को भली-भाँति पहचान सके। जिस इलाज से सिर्फ हाथ-पैर पटकना ही बन्द होता है या आँखों की सुर्खी ही मिटती है वह पूरा इलाज नहीं है। यज्ञ, तप, दान, व्रत, अनुष्ठान, जप, आदि साधन लाभप्रद हैं, इनकी उपयोगिता से कोई इन्कार नहीं कर सकता।

🔴 परन्तु यह वास्तविकता नहीं है। इससे पवित्रता बढ़ती है, सतोगुण की वृद्घि होती है, पुण्य बढ़ता है किन्तु वह चेतना प्राप्त नहीं होता जिसके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थों का वास्तविक रूप जाना जा सकता है और सारा भ्रम जंजाल कट जाता है। इस पुस्तक में हमारा उद्देश्य साधक को आत्मज्ञान की चेतना में जगा देने का है क्योंकि हम समझते हैं कि मुक्ति के लिए इससे बढ़कर सरल एवं निश्चित मार्ग हो ही नहीं सकता। जिसने आत्म स्वरूप का अनुभव कर लिया, सद्गुण उसके दास हो जाते हैं और दुर्गुणों का पता भी नहीं लगता कि वे कहाँ चले गये।

🔵 आत्म-दर्शन का यह अनुष्ठान साधकों को ऊँचा उठायेगा। इस अभ्यास के सहारे वे उस स्थान से ऊँचे उठ जायेंगे जहाँ कि पहले खड़े थे। इस उच्च शिखर पर खड़े होकर वे देखेंगे कि दुनियाँ बहुत बड़ी है। मेरा भार बहुत बड़ा है। मेरा राज्य बहुत दूर तक फैला हुआ है। जितनी चिन्ता अब तक थी, उससे अधिक चिन्ता अब मुझे करनी है। वह सोचता है कि मैं पहले जितनी वस्तुओं को देखता था, उससे अधिक चीजें मेरी हैं। अब वह और ऊँची चोटी पर चढ़ता है कि मेरे पास कहीं इससे भी अधिक पूँजी तो नहीं है? जैसे-जैसे ऊँचा चढ़ता है वैसे ही वैसे उसे अपनी वस्तुएँ अधिकाधिक प्रतीत होती जाती हैं और अन्त में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर वह जहाँ तक दृष्टि फैला सकता है, वहाँ तक अपनी ही अपनी सब चीजें देखता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 27 Oct 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 27 Oct 2016


👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 62)

🔵 आलोचक कला की दीर्घाओं में विभिन्न चित्रों को देखता है जिसमें कुछ भीषण त्रासदिक होते हैं कुछ अत्यन्त सुन्दर होते हैं। किन्तु वह स्वयं वास्तव में उन चित्रों में अंकित भावनाओं से प्रभावित नहीं होता। तुम भी उसी प्रकार करो। जीवन मानो एक कला  दीर्घा है, अनुभव मानो विभिन्न चित्र हैं जो समय की दीवार पर टंगे हुए हैं। यदि तुम करना चाहते हो तो उनका अध्ययन करो किन्तु किसी भी प्रकार की भावनात्मक रुचि से स्वयं को मुक्त रखो। अध्ययन करो किन्तु उससे अप्रभावित रहो। इसे ध्यान में रखने पर तुम सचमुच ही साक्षी हो जाओगे। जिस प्रकार एक चिकित्सक शरीर या उसके रोगों का अध्ययन करता है उसी प्रकार अपने मन तथा अनुभवों का अध्ययन करो। अपने स्वयं की आलोचना में कठोर बनो तभी तुम वास्तविक उन्नति कर पाओगे।

🔴 रास्ता लम्बा है। (आत्म) शिक्षा की प्रक्रिया में कई जीवन आवश्यक हैं। किन्तु गहन जीवन जी कर व्यक्ति इस चक्करदार रास्ते से बच सकता है जिस पर की उथला जीवन जीनेवाले चलते हैं जिनका जीवन केवल उनके व्यक्तित्व के सतह पर ही होता है। आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से लगातार विचार करना, इन्छाओं को उच्चाकाक्षा में बदलना, वासनाओं को आध्यात्मिक भाव से भर देना, ये सब इसके उपाय हैं। जब तक कि तुम्हारा संपूर्ण स्वभाव आध्यात्मिक आदर्श तथा इच्छाओं से परिपूर्ण नहीं हो जाता दिन भर की प्रत्येक घड़ी में सतत तद्रूप होने का दृढ़ निश्चय करो।

🔵 सदैव सावधान रहो। जो सभी शुभ वस्तुओं के दाता हैं उनके प्रति सभी कुछ समर्पित कर दो। जो तुम्हें आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिर रखे, फिर चाहे वह मृत्यु का भय ही क्यों न हो, उसे पकड़ रखो। तुम एक नये पौधे हो जिसे सहारे की आवश्यकता है। जो भी वस्तु तुम्हें शक्तिशाली बनाये उसे पकड़ लो। दृढ़ता तथा प्रचण्डता से उससे चिपके रहो। अविचल, निष्ठावान, उद्यत चित्त, सदाचारी बनो तथा प्रत्येक क्षण एवं अवसर का लाभ उठाओ। पथ बहुत लम्बा है। समय भाग रहा है इसलिये जैसा कि मैंने पहले भी बार बार तुमसे कहा है अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को समर्पित कर स्वयं को कार्य में झोंक दो और तब तुम लक्ष्य पर पहुँच जाओगे।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 26 Oct 2016

🔵 मनुष्य कुसंस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह बात ठीक नहीं जचती। यह मनुष्य के संकल्प बल और विचारों के दृष्टिकोण को समझकर कार्य करने पर निर्भर है। महर्षि वाल्मीकि, संत तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका एवं अजामिल के प्रारंभिक जीवन को देखकर और आखिरी जीवन से तुलना करने पर यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है कि दुर्गुणी और पतित लोगों ने जब अपना दृष्टिकोण समझा और बदला तो वे क्या से क्या हो गये? चाहिए संकल्प बल की प्रबलता।

🔴 अपनी असलियत हम जितनी अच्छी तरह जान सकते हैं दूसरे उतनी नहीं। सो दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की चेष्टा हमें अपने आप से आरंभ करनी चाहिए, क्योंकि अपने निकटतम समीपवर्ती हम स्वयं ही हैं। अपने ऊपर अपना जितना प्रभाव और दबाव है उतना और किसी पर नहीं, इसलिए यदि सुधारने का काम आरंभ करना हो तो ऐसे व्यक्ति से आरंभ करना चाहिए जो अपने अधिकतम निकट और अधिकतम प्रभाव, दबाव में हो, ऐसे व्यक्ति हम स्वयं ही हो सकते हैं।

🔵 प्रायः अखबारों में नाम और फोटो छपाने के लोभ में कई लोग सत्कर्मों का बहाना करते रहते हैं। यश मिलने की शर्त पर ही थोड़ी उदारता दिखाने वाले लोग बहुत होते हैं, परन्तु दया, करुणा, त्याग और परमार्थ की भावनाओं को चरितार्थ करने की महत्त्वाकाँक्षाएँ ही सच्ची और श्रेयष्कर महत्त्वाकाँक्षाएँ कही जा सकती हैं। यह वे आध्यात्मिक विभूतियाँ हैं जिन्हें पाकर मनुष्य स्वयं भी आनंद और संतोष लाभ करता है, साथ ही अपने समीपवर्ती समाज को भी सुख-शान्ति का आनंद देता है। व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं के पागलपन ने दुनिया का अनर्थ ही किया है,इन्हें त्यागा ही जाना चाहिए।

*🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...