बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 62)

🔵 आलोचक कला की दीर्घाओं में विभिन्न चित्रों को देखता है जिसमें कुछ भीषण त्रासदिक होते हैं कुछ अत्यन्त सुन्दर होते हैं। किन्तु वह स्वयं वास्तव में उन चित्रों में अंकित भावनाओं से प्रभावित नहीं होता। तुम भी उसी प्रकार करो। जीवन मानो एक कला  दीर्घा है, अनुभव मानो विभिन्न चित्र हैं जो समय की दीवार पर टंगे हुए हैं। यदि तुम करना चाहते हो तो उनका अध्ययन करो किन्तु किसी भी प्रकार की भावनात्मक रुचि से स्वयं को मुक्त रखो। अध्ययन करो किन्तु उससे अप्रभावित रहो। इसे ध्यान में रखने पर तुम सचमुच ही साक्षी हो जाओगे। जिस प्रकार एक चिकित्सक शरीर या उसके रोगों का अध्ययन करता है उसी प्रकार अपने मन तथा अनुभवों का अध्ययन करो। अपने स्वयं की आलोचना में कठोर बनो तभी तुम वास्तविक उन्नति कर पाओगे।

🔴 रास्ता लम्बा है। (आत्म) शिक्षा की प्रक्रिया में कई जीवन आवश्यक हैं। किन्तु गहन जीवन जी कर व्यक्ति इस चक्करदार रास्ते से बच सकता है जिस पर की उथला जीवन जीनेवाले चलते हैं जिनका जीवन केवल उनके व्यक्तित्व के सतह पर ही होता है। आध्यात्मिक विषयों पर गहराई से लगातार विचार करना, इन्छाओं को उच्चाकाक्षा में बदलना, वासनाओं को आध्यात्मिक भाव से भर देना, ये सब इसके उपाय हैं। जब तक कि तुम्हारा संपूर्ण स्वभाव आध्यात्मिक आदर्श तथा इच्छाओं से परिपूर्ण नहीं हो जाता दिन भर की प्रत्येक घड़ी में सतत तद्रूप होने का दृढ़ निश्चय करो।

🔵 सदैव सावधान रहो। जो सभी शुभ वस्तुओं के दाता हैं उनके प्रति सभी कुछ समर्पित कर दो। जो तुम्हें आध्यात्मिक मार्ग पर स्थिर रखे, फिर चाहे वह मृत्यु का भय ही क्यों न हो, उसे पकड़ रखो। तुम एक नये पौधे हो जिसे सहारे की आवश्यकता है। जो भी वस्तु तुम्हें शक्तिशाली बनाये उसे पकड़ लो। दृढ़ता तथा प्रचण्डता से उससे चिपके रहो। अविचल, निष्ठावान, उद्यत चित्त, सदाचारी बनो तथा प्रत्येक क्षण एवं अवसर का लाभ उठाओ। पथ बहुत लम्बा है। समय भाग रहा है इसलिये जैसा कि मैंने पहले भी बार बार तुमसे कहा है अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को समर्पित कर स्वयं को कार्य में झोंक दो और तब तुम लक्ष्य पर पहुँच जाओगे।

🌹 क्रमशः जारी
*🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर*

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