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सोमवार, 3 अगस्त 2026

👉 सामयिक चेतावनी (भाग 2)

आत्मिक मार्ग की विभूतियाँ महान् हैं। शरीर को सुख देने वाले भौतिक लाभ उन आत्मिक लाभों की तुलना में अत्यन्त ही तुच्छ और अस्थिर हैं। पर आत्मिक लाभों की महानता और श्रेष्ठता की परख केवल विवेक की कसौटी पर हो सकती हैं। अविवेक पूर्ण स्थूल दृष्टि में तो वह घाटे का मैदा ही प्रतीत होता हैं। क्योंकि मौज मजा छोड़ कर, स्वार्थ और कमाई को घटाकर इसमें तप, त्याग, संयम की प्रक्रिया करके मनोनिग्रह का रूखा मार्ग अपनाना पड़ता हैं। ऐसे नीरस देखने वाले और हानिकर लगने वाले मार्ग पर मोटी बुद्धि के लोग चलने को तैयार नहीं होते। यही कारण हैं कि इस संसार के अधिकांश मनुष्य भौतिक दृष्टिकोण के होते हैं। शरीर को, शरीर के लाभों को ही वे सब कुछ समझते है। आत्मा उनके लिए एक उपेक्षित वस्तु हैं। उसके लिए भी कुछ करना चाहिए ऐसा कभी कभी कुछ सोचते तो हैं, कुछ करने की इच्छा भी करते हैं, पर बन कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि लक्ष शरीर सुख जो हैं। तृष्णा और वासना की पूर्ति में ही अपनी हित दिखता हैं। ऐसी दशा में शारीरिक प्रवृत्तियों के घेरे में अपनी सारी विचारधारा और कार्य पद्धति भ्रमण करती रहे तो उसमें आश्चर्य को क्या बात हैं?

वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न हैं। आत्मिक क्षेत्र में जो लाभ, सुख एवं आनन्द हैं उसका मूल्य और मूल्य, वासना एवं तृष्णा के थोड़े, अनिश्चित, अस्थिर तथा जीवन को निस्तेज, निष्प्रभ, निरर्थक बना देने वाले तुच्छ सुखों की अपेक्षा अत्यधिक हैं। पर उसका मूल्यांकन करने के लिए थोड़ी उच्चकोटि की दूरदर्शिता पूर्ण विवेक बुद्धि की आवश्यकता होती हैं। यदि उसका अभाव रहा तो घटिया दृष्टि से सोचने और घटिया काम करने की बार क्रोध में हो बहुमूल्य जाहन की समाप्ति होगी। पर यदि विवेकशीलता जागृत हो गई और सारी वस्तु स्थिति पर विचार करके जीवन यापन जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर कुछ सारगर्भित निर्णय करने की आकांक्षा जगी तो वह विचारधारा धीरे धीरे हमें वहीं पहुँचा देगी जहाँ संसार के सभी महापुरुष पहुँचे हैं।

जब हमारा बच्चा खेलकूद में मस्त रहकर पढ़ना लिखना छोड़ने लगता हैं तब हम उसे डाँटते और रोकते हैं। उसे पढ़ाई के लाभ और मनोरंजन की व्यर्थता समझाते हैं। पर खेद की बात है कि हम अपने ऊपर उस सिद्धान्त को लागू नहीं करते। वासना और तृष्णा ही हमारे लिए सब कुछ बनी हुई हैं। आत्मा की प्रगति से उपलब्ध होने वाले लाभों की हमें चिन्ता ही नहीं हैं। क्या यह उपेक्षा उस बालक की मूर्खता से कम हैं जो खेलकूद के लिए पढ़ाई छोड़ बैठता है?

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

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रविवार, 2 अगस्त 2026

👉 सामयिक चेतावनी (भाग 1)

हमारा जीवन आत्मा के लिए या शरीर के लिए-इन दोनों बातों में से किसको प्रधानता देती इसका निर्माण हमें अब कर ही लेना चाहिए। सुर दुर्लभ मानव जीवन का अमूल्य अवसर एक-एक दिन करके यों ही बीतता जा रहा है और मृत्यु की बड़ी तेजी के साथ निकट दौड़ती चली आ रही हैं। कभी समय हैं कि हम कुछ सोच सकते हैं और कुछ कर सकते हैं। समय जीतने जाने पर एक दिन पैसा या जाएगा कि न कुछ सोचना बन पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ रहेगा और बातों करोड़ों वर्ष का चौरासी लाख भ्रमण का अन्धकारमय भविष्य ही सामने उपस्थित होगा।

आज की सामयिक चेतावनी यही हैं कि हम समुचित रहते आगे और जो अवसर बाकी हैं उसका सदुपयोग कर लें। हो सकता हैं कि आज हम इन बातों का महत्व न समझें, उपेक्षा और उपहास के साथ उन्हें व्यर्थ मानें। पर यह आज की लापरवाही एक दिन हमें बहुत दुःख देगी। कीट पतंगों की तरह पेट पालने और बच्चे पैदा करने की तुच्छ प्रकृति को पूरा करते रहने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं मिला हैं, इसका उद्देश्य कुछ ऊँचा होगा, उस ऊँचाई को प्राप्त करने की बात यदि हमारी समझ में नहीं आती तो एक दिन यही ना-समझी हमारे लिए आत्महत्या जैसी दुःखदायक सिद्ध होगी। बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी बात यही हो सकती हैं कि हम जीवन लक्ष को समझें और उसे पूरा करने का प्रयत्न करें।

शरीर को सर्वस्व मानने वालों को आत्मा की अपेक्षा करनी पड़ती है? क्योंकि भौतिक जीवन में प्रत्यक्षवाद का आकर्षण बहुत हैं। आत्मिक लाभ समय बाध्य हैं। बालबुद्धि में प्रतीक्षा के लिए गुँजाइश नहीं रहती, बच्चों को धैर्य कहाँ होता हैं। वे आम की गुठली बोते है और क्षण भर बाद उसमें से पौधा उगने की आशा में उलट पलट करते हैं। दो चार घंटे बीत जाने पर भी जब उनके सपने का आम्र वृक्ष नहीं उगता तो वे निराश हो जाते हैं और गुठली को उखाड़ कर फेंक देते हैं। यदि यही दृष्टिकोण आत्मिक जीवन के बारे में भी रहा तो मनुष्य भौतिक लाभों को ही सब कुछ मान लेता हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष हैं। इन्द्रिय सुखों की वासना और धन, सत्ता एवं वैभव की तृष्णा की पूर्ति के लिए किये प्रयत्नों का फल इतना आकर्षण होता हैं कि वह छोड़ते नहीं बनता ।इस आकर्षण के मिठास में चाशनी चाटने वाली मक्खी की तरह जीव के पंख ऐसे चिपक जाते हैं कि फड़फड़ा ने पर भी उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं मिलता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

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शनिवार, 1 अगस्त 2026

👉 परलोक कहाँ है? (अंतिम भाग)

जो क्रोधी है उसे दूसरों की ओर से क्रोध पूर्ण व्यवहार अपने ऊपर होता हुआ दृष्टिगोचर होगा। जो अनुदार है उसके साथ में अन्य व्यक्तियों को अनुदारता पूर्ण व्यवहार होगा। झूठे और लाचार व्यक्ति जहाँ जायेंगे वहीं देखेंगे कि उनके ऊपर अविश्वास एवं निन्दा की बौछार हो रही है व्यभिचारी व्यक्ति को भले घरों में प्रवेश नहीं होने दिया जाता चुगलखोर और यहाँ की बात वहाँ करने वालों के सामने लोग अपने मन की बात नहीं करते। बेईमान आदमी के कार्यों को लोग अविश्वास के साथ देखते हैं और जब तक अनेक प्रकार जाँच-पड़ताल नहीं कर लेते, तब तक भरोसा नहीं करते। इस प्रकार के अपमानजनक व्यवहार दूसरों की ओर से होते देखकर आम तौर से लोग मन ही मन कुड़कुड़ाते हैं और जमाने को, युग को, लोगों को, दुनिया को दोष देते हैं। परन्तु वे अपने निजी दोषों को देखना भूल जाते हैं। 

वास्तव में अपनी निजी दोष असुखकर, अप्रिय, अपमानजनक, संघर्षमय वातावरण उत्पन्न करते हैं। यदि अपने हृदय में सात्विकता की पर्याप्त मात्रा विद्यमान हो तो दुनिया की ओर से अधिकाँश आक्रमण तो अपने आप ही बन्द हो जाते हैं। जो थोड़े बहुत आक्रमण नितान्त दुष्टों की ओर से किये जाते हैं वे प्रायः असफल होते हैं। यदि उन आक्रमणों से कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो वह धर्म-प्रतिरोध करता है। इन आक्रमणों या प्रतिरोधों से उसकी मानसिक शान्ति नष्ट नहीं हो पाती।

स्वः लोक का स्वर्ग अपने भीतर है। यदि हम प्रेम, उदारता, ईमानदारी और भलमनसाहत का व्यवहार दूसरों से करें तो दूसरों के हृदयों में से भी वैसी ही आवाज हमारे लिए आवेगी। अपने मन में पवित्रता, निष्कपटता, सत्यता, संयम एवं निस्वार्थता के भाव विद्यमान हों तो वे सद्भाव ही अपने को सदा प्रफुल्लित एवं सन्तुष्ट रख सकते हैं। बारहसिंगा की नाभि में कस्तूरी होती है, वह अपने ही अन्दर नन्दन वन की सुगन्धि का रसास्वादन करता है। जिस सुगन्ध के लिए दूसरे लोग तरसते हैं और प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के उपाय करते हैं वह बारहसिंगा को अपने अन्दर ही मिल जाती है वह अपनी मस्ती में मस्त हुआ उछलता फिरता है। फिर तुम्हीं दिन-रात दूसरों को हानि पहुँचाने के दुष्प्रयत्नों में मग्न रहकर अपने हृदय को अशान्त क्यों रखते हो? चलो, अपने स्वः लोक को पहचानो और उसमें प्रवेश करो।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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शनिवार, 25 जुलाई 2026

👉 परलोक कहाँ है? (भाग 4)

सत्य, प्रेम और न्याय के जीवन तन्तुओं को झंकृत करते ही आत्मा में एक मधुर संगीत बजने लगता है। पवित्रता का आध्यात्मिक संगीत ही भगवान कृष्ण की त्रिभुवन मोहिनी मुरली का मधुर वेणु नाद है। इसका रस जिसने अनुभव किया है वह धन्य है। आत्मा पवित्र है, उसका मनुष्य के लिए सन्देश है कि “पवित्रता को विचार और कार्यों में ओत-प्रोत करें” यह ईश्वरीय सन्देश जिसने सुन लिया वह बड़भागी है, जिसने सुनकर हृदयंगम कर लिया और तदनुकूल आचरण करना आरम्भ कर दिया वह परमात्मा का सच्चा भक्त है। ऐसे भक्तों के बीच में ही भगवान खेला करते हैं। जिनका हृदय पवित्रता की भावनाओं से भरपूर है वह ईश्वरी लीलाओं का क्रीड़ा-क्षेत्र है। महात्मा ईसा कहा करते थे कि इस पृथ्वी का स्वर्ग भोले बालकों में मौजूद है। सचमुच जिनका हृदय बालकों की तरह कोमल एवं पवित्र है ये स्वयं स्वर्ग रूप हैं, स्वर्ग में जाने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिन तथ्यों के आधार पर स्वर्ग के सुख का निर्माण होता है वे दृश्य इसके हृदय में मौजूद हैं और हर घड़ी स्वर्ग के सुख को उत्पन्न करते रहते हैं।

जो दूसरों को कष्ट में देखकर दया से द्रवित हो जाता है, जो असहायों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता है, जो संसार के सुख में अपना सुख अनुभव करता है, दूसरों को हानि पहुँचाने की जिसे कभी इच्छा नहीं होती, सत्य की बढ़ोत्तरी देखकर जिसे आन्तरिक सुख होता है, जिसे पर स्त्री माता के तुल्य है, जो पर धन को धूलि के तुल्य समझता है, इन्द्रियों को जो मर्यादा से बाहर नहीं जाने देता, चुगली, निन्दा, ईर्ष्या, एवं कुढ़न से जो दूर रहता है, संयम जिसका व्रत है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, मधुरता जिसके होठों से टपकती है, स्नेह एवं सज्जनता से जिसकी आँखें भरी रहती हैं, जिसके मन में केवल सद्भाव ही निवास करते हैं, अनीति की ओर झुकने का जिसे कभी लालच नहीं आता, सादगी सरलता, शिष्टता जिसके रहन-सहन की अंग होती है, ऐसे पवित्र आत्मा व्यक्ति इस लोक के देवता हैं। वे जहाँ रहेंगे, छाया की तरह उनका स्वर्ग उनके साथ रहेगा।

अन्तःकरण की शान्ति बाहरी दुनिया को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण बना देती है। जिसके मन में सात्विकता है उसे दूसरों का धन, वैभव, ज्ञान, रूप, यौवन, देखकर प्रसन्नता होगी कि परमात्मा के इस पुनीत उद्यान का एक पौधा सुविकसित तथा पल्लवित हो रहा है, उस नयनाभिराम दृश्य से शान्त पुरुष का हृदय तृप्त एवं प्रफुल्लित हो जाता है। परन्तु जिसके मन में अशान्ति व्याप रही है, ईर्ष्या की डायन नंगा नृत्य कर रही है उसे दूसरों की बढ़ोत्तरी नहीं सुहाती। भीतर ही भीतर भारी कुढ़न होती है और उस कुढ़न की अग्नि से उसकी छाती भभकने लगती है। जिसकी बढ़ोत्तरी हो रही है उसे नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के षड़यन्त्र रचता है और अनिष्ट कर पथ पर अग्रसर होता है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

👉 परलोक कहाँ है? (भाग 3)

संसार के समस्त दुख मिलकर मनुष्य को उतना दुखी नहीं कर सकते जितना कि भीतर के अन्तर्द्वन्द्व उसे दुखी करते हैं। मृत्यु स्वयं उतना कष्ट नहीं देती जितनी कि मृत्यु का भय दुखी बनाता है। व्यापार में घाटा हो जाने पर भी एक व्यापारी के सामने ऐसा अवसर नहीं आता कि उसे जीवन-यापन में असुविधा हो। तो भी वह इतनी चिन्ता करता है कि सूखकर काँटा हो जाता है। उस घाटे वाले व्यापारी की जो स्थिति है उससे भी बहुत गिरी हुई स्थिति के मजूर हंसते-खेलते प्रसन्नता का जीवन बिताते हैं। घाटे वाले व्यापारी को साँसारिक विपत्ति वास्तव में नहीं आई, केवल उसके मन में विपत्ति की एक झाड़ी उग आई। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, शोक, चिन्ता, कुढ़न, निराशा, भय, आशंका, प्रतिहिंसा स्पर्धा आदि दुर्भावों के कारण कितने ही मनुष्य बुरी तरह व्याकुल रहते हैं, उनके मन में सदा एक बेचैनी, आकुलता, अशान्ति एवं पीड़ा उठती रहती है, जिनके कारण उनका मनः लोक बहुत ही नीरस, गन्दा, शुष्क धुँधला एवं अन्धकार पूर्ण हो जाता है। उन्हें हर घड़ी अशान्ति घेरे रहती है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, छल, पाखण्ड, असंख्य, शोषण, अपहरण, दुराचार, व्यभिचार आदि के कुविचार एक प्रकार के मानसिक शत्रु हैं वे मनः लोक में निशाचरों की भाँति छिपे बैठे रहते हैं और जब भी अवसर मिलता है, दल-बल सहित पूरी तैयारी के साथ निकल पड़ते हैं और जीवन के सुकोमल तन्तुओं को अस्त-व्यस्त कर डालते हैं। जैसे पेट में कोई विषैला पदार्थ पहुँच जाय तो वहाँ बड़ी जलन होती हैं, दस्त या उलटी होने लगती हैं। 

रक्त में कोई विषैला विजातीय पदार्थ पहुँच जाय तो फोड़े-फुन्सी चकते, कोढ़ आदि पैदा हो जाता है। माँस में काँटा घूस जाय तो जब तक वह निकल नहीं जाता निरन्तर पीड़ा होती रहती है। ठीक यही हाल इन कुविचार रूपी तामसिक, नीच, विजातीय, दानवों के मनः लोक में घुस जाने से होता है, यह कुछ न कुछ खुद-बुद किया ही करते हैं। आँख में पड़ी हुई कंकड़ी की भाँति वे अन्तः चेतना को हर समय घायल ही करते रहते हैं। जैसे कोई आदमी लाल मिर्चों की बुकनी मर्म छिद्रों में भर लेने के बाद तड़पता फिरता है, चैन और आराम उसके लिए स्वप्न हो जाता है वैसे ही दुःस्वभावों को अन्तःकरण में स्थान देने से आत्मा में तीव्र जलन होती रहती है, शान्ति के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं ऐसी स्थिति मानसिक नरक ही कही जायगी।

मानसिक स्वर्ग का अर्थ हैं अपने अन्तःकरण में सात्विक विचारों, सद्भावों और सद्गुणों को धारण करना। ईमानदारी की पवित्रता हिमि सी शीतल, पुष्प सी कोमल, चन्दन सी सुगन्धित और नवनीत सी स्वच्छ होती है उसे धारण करते ही आत्मा को बड़ी राहत मिलती है। हिमालय की तपोभूमि में नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्य देखते हुए कन्द-मूल-फल खाते हुए, भगवती भागीरथी, के तट पर निवास करने वाले तपस्वियों को जो शान्ति मिलती है उसी शान्ति को हम ईमानदारी की पवित्रता ग्रहण करके प्राप्त कर सकते हैं। सच्चा मनुष्य विश्वास करता है कि- “ईमानदारी का पवित्र जीवन ही मुझे जीना है, मैं सच्चाई और नेकी से भरे हुए ही अपने विचार रखूँगा, न्याय के ऊपर ही मेरी जीवन नीति निर्भर रहेगी, मैं सत्य को ही सोचूँगा, सत्य के आधार पर ही विचार करूंगा, भलाई नेकी, उदारता और क्षमा का आश्रय ग्रहण करूंगा कुविचार पाप, द्वेष और तुच्छ स्वार्थों से ऊंचा उठकर आध्यात्मिक जीवन जीऊंगा। यह भावनाएं उसके अन्तःकरण में सात्विकता का शीतल झरना प्रवाहित कर देती है।

📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1947

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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

👉 परलोक कहाँ है? (भाग 2)

हर मनुष्य की अपनी एक अलग दुनिया होती है। जानकारी, इच्छा एवं कल्पना के आधार पर हम अपनी मनोभूमि का, निर्माण करते हैं। यह मनोभूमि का ही अपनी दुनिया है। इसमें जैसे इरादे, मनसूबे, यकीदे जम जाते हैं उसी दृष्टिकोण से संसार के समस्त पदार्थों जो वह देखता है। आँखों पर पीला चश्मा पहन लेने से सभी दुनिया पीली दिखाई पड़ती हैं और नीला चश्मा पहन लेने पर हर चीज नीली दिखने लगती है। साधुओं की दृष्टि में यह संसार परमात्मा की पुनीत प्रतिमा है, सिंह की दृष्टि में सब मनुष्य स्वादिष्ट माँस के चलते फिरते लोथड़े हैं, दुकानदारों की निगाह में ग्राहक, वेश्या की दृष्टि में व्यभिचारी, कलार की दृष्टि में नशेबाज, इस दुनिया में भरे हुए है। भीतरी मन की दुनिया जैसी होती है बाहर की दुनिया भी उसी के अनुरूप दिखाई देने लगती है।

मनुष्य को अपनी रुचि जिधर होती है, उधर ही उसका मस्तिष्क ढूँढ़ खोज जारी रखता है। और यह एक प्रकट तथ्य है कि कुछ ढूँढ़ा जाता है वह मिलता है। अपने स्वभाव और विचारों के मनुष्यों को, स्थानों को, वातावरणों को, उसकी अदृश्य चेतना ढूँढ़ती रहती है। और धीरे-धीरे उसे अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है। चोरों को अपने साथी अन्य चोरों का सहयोग हर जगह मिल जाता है और वे चाहे कहीं चले जायें चोरी करने का अवसर या स्थान भी मिल जाता है। इसी प्रकार भले, बुरी, सभी प्रकृति के मनुष्य अपने रुचिकर स्थान को प्राप्त कर लेते हैं। साँसारिक परिस्थितियाँ दोनों ही प्रकार की होती हैं। 

सात्विक परिस्थितियों में सुख-शान्ति, प्रसन्नता तथा तृप्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत तामसिक परिस्थितियों में क्लेश, अशाँति दुख, दरिद्र तथा असन्तोष छाया रहता है, चोर स्वभाव का मनुष्य चोरी करेगा, फलस्वरूप उसे भय, अशान्ति, निन्दा, अविश्वास, राज दण्ड एवं कर्म के कठोर परिपाक का भागी बनना पड़ेगा। इसी प्रकार सदाचारी स्वभाव का मनुष्य सत्कर्म करेगा और फल स्वरूप प्रसन्नता, सन्तोष, प्रशंसा, विश्वास, स्वास्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करेगा। चोर को अपने स्वभाव के लोगों के बीच रहना पड़ेगा और उनका व्यवहार उसके साथ वैसा ही दुखदायक रहेगा जैसा दुष्टों के साथ दुष्टों का रहता हैं। इसके विपरीत सज्जन पुरुष के समीपवर्ती लोग भी वैसे ही होंगे और उनका व्यवहार वैसा ही संतोषजनक रहेगा जैसा सज्जनों का होता है।

चोर और सदाचारी को जो साँसारिक परिस्थितियाँ प्राप्त हैं वह एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। परन्तु इसका मूल कारण मनुष्य का अपना मन है। वह चोर स्वभाव को अपनावे या सदाचार की ओर झुके यह पूर्णतया उसकी इच्छा के ऊपर निर्भर है। मनः लोक का जैसा निर्माण किया जाता है बाहरी दुनिया वैसी ही बन जाती है। मन में यदि शान्ति है तो बाहर भी शान्ति का वातावरण होगा यदि मन में आकुलता है तो बाहर भी आकुलता से भरी हुई घटनाएं चारों ओर मंडरा रही होगी। जिसने मनः लोक में स्वर्ग स्थापित कर लिया है उसके लिए इस संसार में सर्वत्र स्वर्ग है, जिसके मन में नरक है उसे सब ओर नरक की ज्वाला जलती हुई दृष्टि-गोचर होती रहेगी।

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बुधवार, 22 जुलाई 2026

👉 परलोक कहाँ है? (भाग 1)

स्वः लोक अपने अन्दर है।

अपने आप में, अपने अन्तःकरण में एक जबरदस्त लोक मौजूद है। उस लोक की स्थिति इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके सामने भू लोक और भुवः लोक तुच्छ हैं। निस्संदेह बाहर की परिस्थितियाँ मनुष्य को आन्दोलित, तरंगित तथा विचलित करती हैं। परन्तु संसार के समस्त पदार्थों का जितना भला या बुरा प्रभाव होता हैं उससे अनेकों गुना प्रभाव अपने निज के विचारों तथा विश्वासों द्वारा होता है।

गीता में कहा है कि-मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु है। कोई मित्र इतनी सहायता नहीं कर सकता जितनी कि मनुष्य स्वयं अपनी सहायता कर सकता है। इसी प्रकार कोई दूसरा उतनी शत्रुता नहीं कर सकता जितनी कि मनुष्य खुद अपने आप अपने से शत्रुता करता है। अपनी कल्पना शक्ति, विचार और विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी एक दुनिया निर्माण करता है। वही दुनिया उसे वास्तविक सुख-दुख दिखाया करती है।

एक व्यक्ति सुनसान रात में मरघट के पास से निकलता है। उसके मन में कोई आशंका नहीं, तारागणों की सुन्दरता निहारता हुआ, रात्रि की नीरवता और शीतलता को निरखता हुआ, मन्द स्वर से गीत गुनगुनाता हुआ खुशी-खुशी चला जाता है। परन्तु दूसरा व्यक्ति उसी रास्ते जाता है तो मरघट में भूत लोटते दिखाई पड़ते हैं, झाड़ियों में से मसानी और चुड़ैलें झाँकती दिखती हैं, उनके मारे डर थर-थर पैर काँपने लगते हैं, कण्ठ सूख जाता है, निगाह चूकने से एक पेड़ के ठंठ से टकरा जाता है। बस भूत के भयंकर आक्रमण का प्रत्यक्ष दृश्य दिखाई पड़ता है। वह बीमार पड़ जाता है, महीनों चारपाई सेता है, मुश्किल से अच्छा हो पाता है या मर जाता है। रास्ता वही था, रात वही थी, एक आदमी खुशी-खुशी उसी रास्ते चला आया, दूसरे आदमी की जान पर बन आई। यह भेद क्यों हुआ? इसका कारण मनुष्यों की भिन्न मानसिक स्थिति थी। जिसके मन में से भय उत्पन्न हुआ वह भय ही उनकी छाती पर भयंकर मसान बन कर चढ़ बैठा और उसे प्राण घातक संकट में फाँस दिया।

रस्सों को साँप समझ कर अनेक आदमी भयभीत होकर मूर्छित हो जाते हैं। चूहे के काट जाने पर अपने आपको साँप का काटा समझा कर कई मनुष्य मृत्यु के मुख में चले जाते हैं। साधारण रोग को असाध्य रोग मानकर अनेकों रोगी घबरा जाते हैं और वह घबराहट ही उनकी जान की ग्राहक बन जाती हैं। यह आफत के पहाड़ कौन ढ़ाता है? मनुष्य अपने आप अपने विचार बल से उन आफत के पहाड़ों का निर्माण करता है और खुद अपने ऊपर पटककर स्वयमेव चकनाचूर हो जाता है। मनुष्य के मन में प्रचण्ड शक्ति भरी हुई है वह इस शक्ति द्वारा अपने लिये अत्यन्त अनिष्ट कर और अत्यन्त उपयोगी तथ्य निर्मित कर सकता है।

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शनिवार, 18 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (अंतिम भाग)

इतिहास में किसी अत्याचारी अथवा आततायी का वर्णन पढ़कर मनुष्य के हृदय में यह भाव नहीं आता कि वह भी उसी की तरह रक्त पात करता, दूसरों को पीड़ा पहुँचता अथवा किसी का धन अथवा समान लूटता तो बड़ा आनन्द रहता। एक ओर जहाँ मनुष्य की सत्य, शिव और सुंदरम् से प्रेम होता है, वहाँ दूसरी ओर दुष्टता, दुराचार और दुराशा से घृणा और विकर्षण भी होता है। यह विवेकपूर्ण अनुभूति बतलाती है कि मनुष्य का स्वरूप वास्तविक स्वरूप सत्य, शिव और सुन्दर का प्रतिरूप है, उसके उस रूप में कुरूपता, असत्य सत्य, शिव और सुन्दर के सिवाय और कुछ नहीं है, अस्तु उसका अंश भी अपने आदि स्त्रोत के समान उसी का स्वरूप है।

निश्चय ही मनुष्य का सत्य रूप ईश्वर रूप ही है। अपने इस स्वरूप के विपरीत कार्य करने वाले या तो पूरे मनुष्य नहीं माने जा सकते अथवा वह मानना होगा कि वे वह सब करके एक मौलिक अपराध कर रहे है, एक पाप कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना चाहिये।

यह निश्चय हो जाने पर कि मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है, यदि वह अपने गौरव, अपनी गरिमा और अपने महत्व का प्रतिपादन नहीं कर पाता तो यह उसकी कमी ही कही जायेगी किसी महान पिता का पुत्र होकर भी, किसी शक्तिशाली का अंग होकर भी यदि कोई अपने आपमें निकृष्ट और दीन हीन बना रहना चाहता है तो यह उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा। अन्यथा अपने उच्च से उच्च सर्वोच्च स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर निकृष्ट न होगा। ऐसे महान, व्यक्तित्व के पास ईर्ष्या द्वेष, छल कपट, शोषण, क्रूरता आदि आसुरी वृत्तियों का क्या काम रह सकता है।

आइए अपने अन्दर जिज्ञासा जागृत कर अनुभव के आधार पर अपने सत्यस्वरूप का साक्षात्कार करे, उसमें विश्वास और उसी के अनुरूप अपना आचरण बनायें। यदि इस विकास में हमारी निम्न वृत्तियाँ बाधक बनती है तो मान ले कि यही वह अवरोध है, यह वह आवरण है जो हमें अपने वास्तविक स्वरूप की ओर जाते और उसे देखने में बाधा डाल रहा है। सौंदर्यानुभूति और सत्कर्मों की ओर से चलकर और ईर्ष्या द्वेष, मद मत्सर, लोभ, क्रोध आदि दूषणों को छोड़ते हुए आत्मा स्वरूप की ओर सरलतापूर्वक पहुँचा जा सकता है।

हम सब परमपिता परमात्मा, उस सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान तत्व उस आदि एवं अंतिम स्त्रोत से निकली इकाइयाँ है, जिनका वास्तविक स्वरूप वही एक प्रभु एवं विभु है, अपने उस स्वरूप को पहचाने और तद्रूप होकर उसी स्वरूप को प्राप्त करें।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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बुधवार, 15 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग ३)

मनुष्य जब इतिहास के सत्पात्रों के विषय में बढ़ता अथवा उनकी वीरता, बलिदान और त्याग की कथायें सुनता, किसी सत्पुरुष को जनसेवा और लोक रतन के कार्य करते देखता तो उसके मन में इच्छा होती है कि वह भी जनहित में ऐसे ही साहस और वीरता के काम कर सकता। इसी प्रकार त्याग एवं बलिदान द्वारा आत्मा को सुख दे पाता। इसी स्फूर्ति, दृढ़ता और उत्साह आदि गुणों का अधिकारी बनता तो कितना आनन्द, कितना उल्लास और कितनी सुख शाँति होती।

तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस और जहाँ भी सत्य, शिव और सुंदरम् के साथ सतोगुण का दर्शन करता है, उसकी आत्मा में वैसा बनने की प्यास जाग उठती है। उस उन दृश्यों, उन गुणों और उन महानताओं से तादात्म्य अनुभव होने लगता है। उसकी वह कामना, जिज्ञासा अथवा इच्छा उसकी आत्मीयता की ही द्योतक होती है। वास्तविकता यह है कि वह आकर्षण, वह आत्मीयता उस दृश्य की नहीं होती, जिसे वह बाहर देखता है। उसकी सारी सौन्दर्यानुभूति उसकी अपनी अन्तरात्मा की होती है, जो दृश्य का आत्मबल पाकर स्फुरित ही उठती है और जिसे वह अज्ञानवश बाह्य उपकरणों में मानता है।

मनुष्य का वही सुन्दर स्वरूप जिसे वह बाह्य दृश्यों, पर आरोपित करके देखता है, उसका अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसकी उसे जिज्ञासा करनी चाहिये। उसी आन्तरिक सौंदर्य और आनन्दानुभूति को बिना किसी उपादान अथवा आनन्द के देखना और पाना आत्म साक्षात्कार है।

मनुष्य अपने आत्म रूप में बड़ा ही सुन्दर और आनंद मय है। यही कारण है कि जब वह किसी को गदा देखता है तो कामी कामना नहीं करता कि वह भी वैसा ही हो जाता। किसी अपराधी को जेल जाते देखकर उसके मन में यह जिज्ञासा कभी नहीं होती कि वह भी वैसा अपराध करके जेल जा सकता है। किसी शुष्क अथवा निकृष्ट पशु पक्षी को देखकर उसके हृदय में यह उत्सुकता नहीं होती कि वह भी उसी की तरह सूख जाता अथवा उसी की तरह कुरूप बन जाता।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1969

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सोमवार, 13 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग २)

निश्चय रखिये कि आप जो कुछ देखते है, वस्तुतः वह ही नहीं है। यदि वास्तव में वही होते तो अपने को पूर्ण और संतुष्ट अनुभव करते, आनन्दित और उल्लसित बातें मनुष्य अपने तन मन और क्रियाओं द्वारा अपने जिस रूप को व्यक्त करता है, वह उसका वह आदिरूप नहीं है जिसकी शोध वाँछनीय है। वह शरीर और उसके उपादान ही होता, तब तो वह अपने को हर समय जाने ही रहता, कुछ और जानने की आवश्यकता ही न होती। किन्तु आवश्यकता है, उसका अनुभव भी होता है और पूर्ति इच्छा थी। यही आवश्यकता इस बात की साक्षी है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप कुछ और है, जिसको जानना ही चाहिये। क्योंकि उसके बिना न तो पूर्णता प्राप्त हो सकती है और न अक्षय सुख शाँति।

जिस प्रकार एक छोटी सी वस्तु के पीछे एक बृहत् भण्डार, बूँद के पीछे समुद्र, बीज के पीछे वृक्ष और वायु की छोटी सी लहर के पीछे पवनमान अवस्थित है, इसी प्रकार हमारी चेतना के पीछे एक विराट् चेतना छिपी है। जिस प्रकार कोई एक इकाई किसी अनन्तता की साक्षी है, उसी प्रकार हमारी लघु चेतना किसी अखण्ड एवं असीमित चेतना की साक्षी है। जो कुछ वर्तमान अथवा दृश्यमान है, उसका एक आदि स्त्रोत होना ही चाहिये और वह होता भी है। वह प्रच्छन्न आदि स्त्रोत ही किसी वस्तु का सच्चा स्वरूप होती।

बूँद वस्तुतः बूँद नहीं होती है, उसका वास्तविक स्वरूप वह समुद्र है, जिससे वह आई है और जिसमें उसे लय हो जाना ही बीज को उसके उसी रूप में बीज मानना भूल है। बीज वस्तुतः विशाल वनस्पति है, जिससे वह उत्पन्न हुआ है और एक दिन अपना यह माध्यमिक रूप मिटाकर तद्रूप हो जाता है। वायु का लघु प्रवाह एक श्वाँस मात्र नहीं है। वह, वह सर्वव्यापक वायुमण्डल है, जिसमें वह आती और जिसमें जाकर लीन हो जाती है। इसी प्रकार लघु चेतन सागर है, जिसे परमात्मा कहते है और जिससे वह उत्पन्न होता है और अन्ततः जिसमें मिल जाता है। निस्संदेह मनुष्य आत्मा रूप में परमात्मा ही है। वह न शरीर है और न मन, बुद्धि, अहंकार आदि जो कि स्थूल रूप से प्रकट होता रहता है।
यदि सच्ची जिज्ञासा का सहारा लिया जाय तो आये दिन इस सत्य को अनुभव भी किया जा सकता है। यह सत्व तो सर्वथा मान्य ही है कि ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है। 

संसार में जो कुछ सत्य, शिव और सुन्दर है, वह ईश्वर रूप है। जब मनुष्य किसी लहलहाती लता पर हँसते, झूमते किसी फूल को देखता है तो उसे उसके प्रति एक आत्मिक आकर्षण हो उठता है। वह उस सुविकसित एवं सुवासित पुष्प को देखकर केवल प्रसन्न ही नहीं होता बल्कि सोचने लगता है कि कितना अच्छा होता, यदि मैं भी इस पुष्प की तरह सुन्दर सुगंधित और विकसित होता। इसी की तरह संसार को आनन्द देता हुआ, हँसता खेलता और अपने ही आनन्द में मस्त होकर झूमता। हमारा रंग रूप भी इसी की तरह प्यारा प्यारा और आडम्बर रहित होता।

मनुष्य जब वर्षा ऋतु में बादलों की गरज से मत्त होकर नाचते मोर को देखता है तो ठगा सा खड़ा हो जाता है और सोचने लगता है- क्यों न मुझे इस मोर की तरह सुन्दर पंख मिले और क्यों न मैं भी इसकी ही तरह मस्ती पा सका। कितना सुख हो कि इसी की तरह मनमोहक कलेवर पाकर और इसी की तरह विभोरता पाकर मैं भी मदमस्त होकर नृत्य कर सकूँ। इसकी वाणी की तरह मुझे भी लोक रंजन बाह्य मिली होती तो मैं भी बोल बोल कर संसार को अपनी और आकर्षित कर लेता।

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शनिवार, 11 जुलाई 2026

👉 हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा और आकांक्षा (भाग १)

आत्म स्वरूप का ज्ञान, जिज्ञासा द्वारा ही संभव है। हम वस्तुतः है क्या-यह बोध तभी हो सकता है, जब हम उसको जानने के लिए उत्सुक और उत्कंठित हो जिस विषय में कोई रुचि, कोई उत्कंठा नहीं होती उसको कदापि नहीं जाना जा सकता।

ज्ञान का जन्म जिज्ञासा द्वारा ही होता है। पूर्वकालीन ऋषियों को जिज्ञासा हुई कि वे यह जाने कि इस अपार और रहस्यमय सृष्टि का आदि उद्गम क्या है? उनकी इस जिज्ञासा ने उन्हें प्रेरित किया और वे साधना मार्ग से शोध में प्रवृत्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उस ईश्वर को खोज ही लाये, जो इस निखिल ब्रह्माण्ड का रचयिता, पालन कर्ता और लय कर्ता है। उनकी जिज्ञासा ने ही उन्हें यह श्रेय प्रदान किया कि वे सृष्टि के रहस्यों, उसके आदि स्त्रोत ईश्वर का पता ही नहीं लगा सके, बल्कि उससे सीधा सम्पर्क भी स्थापित कर सकें।
वैज्ञानिकों को प्रकृति के रहस्यों और उसके उत्पादनों की प्रक्रिया जानने की जिज्ञासा हुई और वे इस खोज में निरत हो गये। उन्होंने पृथ्वी, पवन, जल और अग्नि के भौतिक रहस्य को जाना और उसका उपयोग किया। उन्होंने वनस्पतियों, औषधियों और प्राणियों के आधिभौतिक स्वरूप की जिज्ञासा की, विज्ञाता ने उन्हें शोभा कार्यों में संलग्न किया। जिसके फलस्वरूप आज के विशाल भौतिक विज्ञान, औषधि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और जीव विज्ञान आदि शास्त्रों की रचना हुई।

मानस शास्त्रियों को जिज्ञासा हुई कि यह जान कि मनुष्य के अन्दर चलने वाले द्वन्द्वों का क्या आधार है। जिज्ञासा ने सक्रियता प्रदान की और उन्होंने स्थूल शरीर से भिन्न एक ऐसे निराकार मानसिक संसार का पता लगा डाला, जो बाह्य जीवन का मुख्य आधार है और आज का मानस ज्ञान एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित है।

अध्यात्म, भौतिक और मानस शास्त्रियों यदि जिज्ञासा न हुई होती तो क्या यह सम्भव था कि यह वैचित्र्यपूर्ण बृहत् ज्ञान मनुष्य जाति के पास होता। जिज्ञासा ही किसी ज्ञान की आधार शिला है, उसकी जननी है। आत्म ज्ञान भी आत्म जिज्ञासा के बिना नहीं हो सकता। यदि अपना, सच्चा और वास्तविक रूप जानना है तो उसे जानने की प्रबल जिज्ञासा करनी होगी, इससे रहित अन्य कोई उपाय नहीं, जिससे मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान पा सके। अस्तु, आत्म ज्ञान के लिये जिज्ञासा करिये और उसकी अनुकूल सक्रियता के लिये विचार, भाव और दृष्टिकोण का निर्माण कीजिये आत्मनिरीक्षण करते हुए अनुभवों की लड़ी बनाते चलिये, एक दिन आपकी आत्म ज्ञान हो जायेगा।

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👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...