बुधवार, 10 जून 2026

👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 1)

मौन वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिए जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य आदि का विधान है, उसी तरह वाणी के संयम के लिए मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है, अगर बोलना ही हो तो कम-से-कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” फैंकलिन के शब्दों में “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है।” कालाइल ने कहा है, “मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति होती है।”

मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे- सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान कार्य करना चाहे तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह और उद्रेक होता है।

आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए तो मौन बहुत ही आवश्यक है। योगी अरविन्द ने कहा है “आध्यात्मिक जीवन अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को प्रतिष्ठित करने और उसे सहज रूप में व्यक्त होने देने की साधना है और इस साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”

शास्त्रकार ने कहा है- “मौन उस अवस्था को कहते हैं जो वाक्य और विचार से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है, जहाँ अनन्त वाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।” अध्यात्म जगत का साधक तो मौन के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्मशक्ति से मनुष्य तब तक सम्बंध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक वह बाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अन्तर्मुखी होने और अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एकाग्र और संगठित करने के लिए मौन का अवलम्बन श्रेयार्थी के लिए आवश्यक है।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 सच्चाई जीवन की सर्वश्रेष्ठ रीति-नीति (भाग ३)

निर्विकार, निर्लेप और निर्भय जीवन जीने के लिए सत्य से बढ़कर कोई उपाय नहीं। सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। संसार में जहाँ जो भी धर्म-ग्रन्थ और आर्ष अभिवचन पाये जाते हैं, उनमें जिन नियमों की विशेषता दी गई है, सत्याचरण व सत्य भाषण उनमें सर्वप्रधान है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बतलाया है और सत्य पर आरूढ़ रहने का उपदेश किया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है, जो सूर्य के समान हर स्थान पर समान रूप से चमकता रहता है।

सृष्टि के आदि में सत्य की जो महत्ता और श्रेष्ठता थी वैसी आज बनी बनी हुई है। कोई मानवीय नियम समय के अनुसार भले ही बदले और संशोधित किए गये हों किन्तु सत्य के नियम में आज तक परिवर्तन नहीं किया गया और न कभी किया जा सकता है। सत्य सारे जीवन और सारी सृष्टि का एक मात्र आधार है। सत्य की महत्ता बतलाते हुए महात्मा इमरसन ने एक स्थान पर कहा है- “जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह है- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।”

आत्मिक उन्नति के जो साधन और उपाय ऋषियों, मुनियों और धर्म-प्रवर्तकों ने प्रतिपादित किए हैं, सत्य को उनमें सबसे पहला स्थान दिया है। कोई भी साधना, फिर वह कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती। सत्य सारे साधनों की आधार-शिला है। एक सत्य का आधार ले लेने के बाद यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिये अन्य बहुत से साधन भी किए जाएं। सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि साधन बतलाया है, एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को संसार सागर से पार कर देता है। महाभारत के उद्योग पर्व में आया है-

“सत्य स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव।’’
-समुद्र में नाव के समान सत्य स्वर्ग का सोपान है। अर्थात्- जिस प्रकार नाव का सहारा व्यक्ति को समुद्र के बीच से पार कर किनारे पर पहुँचा देता है उसी प्रकार सत्य व्यक्ति को संसार से पार कर स्वर्ग पहुँचा देता है।
शाँति पर्व में कहा गया है-
“नास्ति सत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम।
श्रुतिहिं सत्य धर्मस्य तस्यात्सत्यं न लोप्यते॥”
-सत्य के बढ़ कर कोई धर्म नहीं। असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं है। सत्य ही धर्म का आधार है। अतएव सत्य का परित्याग कभी भी नहीं करना चाहिये।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1968

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 10 June 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 June 2026


👉 उतना बोलिए जितना आवश्यक हो (भाग 1)

मौन वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिए जिस तर...