सोमवार, 17 जून 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 June 2019


👉 आज का सद्चिंतन 17 June 2019


👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 16)

👉 नैतिकता की नीति, स्वास्थ्य की उत्तम डगर

कभी- कभी तो ये रोग इतने विचित्र होते हैं कि इन्हें महावैद्य भी समझने में विफल रहते हैं। घटना महाभिषक आर्य जीवक के जीवन की है। आर्य जीवक तक्षशिला के स्नातक थे। आयुर्विज्ञान में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की थी। गरीब- भिक्षुक से लेकर धनपति श्रेष्ठी एवं नरपति सम्राट सभी उनसे स्वास्थ्य का आशीष पाते थे। मरणासन्न रोगी को अपनी चमत्कारी औषधियों से निरोग कर देने में समर्थ थे आर्य जीवक। उनकी औषधियों एवं चिकित्सा के बारे में अनेकों कथाएँ- किंवदन्तियों प्रचलित थी। युवराज अभयकुमार एवं सम्राट बिम्बसार भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे।

ऐसे समर्थ चिकित्सक जीवक अपने एक रोगी को लेकर चिन्तित थे। इस रोगी का रोग भी बड़ा विचित्र था। यूं तो वह सभी तरह से स्वस्थ था, बस उसे तकलीफ इतनी थी कि उसकी दायीं आँख नहीं खुलती थी। इस परेशानी को लेकर जीवक अपनी सभी तरह की चिकित्सकीय पड़ताल कर चुके थे। कहीं कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। शरीर के सभी अंगों के साथ आँख के सभी अवयव सामान्य थे। आर्य जीवक को समझ में नहीं आ रहा था- क्या करें? हार- थक कर उन्होंने अपनी परेशानी महास्थविर रेवत को कह सुनायी। महास्थविर रेवत भगवान् तथागत के समर्थ शिष्य थे। मानवीय चेतना के सभी रहस्यों को वह भली- भाँति जानते थे।

जीवक की बातों को सुनकर पहले तो उन्होंने एकपल को अपने नेत्र बन्द किए, फिर हल्के से हँस दिए। जीवक उनके मुख से कुछ सुनने के लिए बेचैन थे। उनकी बेचैनी को भांपते हुए महाभिक्षु रेवत ने कहा- महाभिषक जीवक, तुम्हारे रोगी की समस्या शारीरिक नहीं मानसिक है। उसने अपने जीवन में नैतिकता की नीति की अवहेलना की है। इसी वजह से वह मानसिक ग्रन्थि का शिकार हो गया है। उसकी मानसिक परेशानी ही इस तरह शारीरिक विसंगति के रूप में प्रत्यक्ष है। इसका समाधान क्या है आर्य? जीवक बोले। इसे लेकर तुम भगवान् बुद्ध के पास जाओ। प्रभु के प्रेम की ऊष्मा से इसे अपनी मनोग्रन्थि से मुक्ति मिलेगी। और यह ठीक हो जाएगा।

जीवक उसे लेकर भगवान् के पास गए। भगवान् के पास पहुँचते ही उस रोगी युवक ने अपने मन की व्यथा प्रभु को कह सुनायी। अपने अनैतिक कार्यों को प्रभु के सामने प्रकट करते हुए उसने क्षमा की प्रार्थना की। भक्तवत्सल भगवान् ने उसे क्षमादान करते हुए कहा- वत्स नैतिक मर्यादाएँ हमेशा पालन करनी चाहिए। आयु, वर्ग, योग्यता, देश एवं काल के क्रम में प्रत्येक युग में नैतिकता की नीति बनायी जाती है। इसका आस्थापूर्वक पालन करना चाहिए। नैतिकता की नीति का पालन करने वाला आत्मगौरव से भरा रहता है। जबकि इसकी अवहेलना करने वालों को आत्मग्लानि घेर लेती है।

प्रभु के वचनों ने उस युवक को अपार शान्ति दी। उसे अनायास ही अपनी मनोग्रन्थि से छुटकारा मिल गया। जीवक को तब भारी अचरज हुआ, जब उन्होंने उसकी दायीं आँख को सामान्यतया खुलते हुए देखा। अचरज में पड़े जीवक को सम्बोधित करते हुए भगवान् तथागत ने कहा- आश्चर्य न करो वत्स जीवक, नैतिकता की नीति स्वास्थ्य की उत्तम डगर है। इस पर चलने वाला कभी अस्वस्थ नहीं होता। वह स्वाभाविक रूप से शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होता है। जो इसे जानते हैं, वे कर्मसु कौशलम् के रहस्य को जानते हैं।


.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 26)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

Taken together, virtues in this world are far in excess of vices. No doubt, immorality is also there, but morality is much more prevalent. There is more enlightenment than ignorance in this world. There are bad people everywhere in the world, but they have more virtues than vices in them. We should keep in sight only the goodness of the world, enjoy the beauty of the virtuous
and work for enhancement of these virtues.

Nature has made a provision of day and night to teach us how to behave in the world. During the day we keep awake, take advantage of the sunlight for working and prefer to live in an illuminated place, than in darkness. Light gives us the advantage of acquiring knowledge through sight. When darkness of night descends, we go to sleep or, if required to work, use artificial light. Because of the natural structure of eyes, man intrinsically prefers to live in an illuminated environment. Light makes our perspective illuminated. In the light we clearly see objects as they are and dispel our ignorance about them. It shows that we should ignore the dark side of the world and become more enlightened by preferring to look only at the brighter aspects of human personalities i.e. virtues.

We should make an endeavour to enjoy, imbibe and encourage only the virtuous traits in a person. It does not mean that we close our eyes to the blemishes. Be aware of the vices but do not get involved in them. There is that well known story of Rishi Dattatreya. As long as he continued to compare the bright and dark aspects of life he remained troubled and unhappy. When he concentrated only on the positive aspects of creation, he found that in this world all living creatures were sacred and adorable. He realized that he could learn something from each of them. It is said that he acquired his spiritual insights from twenty-four beings (teachers). Amongst these were insignificant creatures like dog, cat, jackal, spider, fly, vulture, crow etc. He felt that no animate being was despicable, that each one had within it, the soul, which is a spark of that Super-Being, that each was a link in the spiraling chain of evolution. When we make ourselves receptive to virtues, the field of vision changes. Shortcomings are overlapped by excellence, wickedness by goodness and prevalence of unhappiness by abundance of things of joy. The world that we earlier thought to be full of wicked people now appears rich with decent, well-mannered, altruistic and aspiring persons.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 46