रविवार, 29 जुलाई 2018

👉 छोटा और तुच्छ काम

🔶 काम वे छोटे गिने जाते है जो फूहड़पन और बेसलीके से किये जाते हैं। यदि सावधानी, सतर्कता और खूबसूरती के साथ, व्यवस्था पूर्वक कोई काम किया जाय तो वही अच्छा, बढ़ा और प्रशंसनीय बन जाता है। चरखा कातना कुछ समय पूर्व विधवाओं और बुढ़ियाओं का काम समझा जाता था, उसे करने में सधवायें और युवतियाँ सकुचाती थी। पर गाँधी जी ने जब चरखा कातना एक आदर्शवाद के रूप में उपस्थित किया और वे उसे स्वयं कातने लगे तो वही छोटा समझा जाने वाला काम प्रतिष्ठित बन गया। चरखा कातने वाले स्त्री पुरुषों को देश भक्त और आदर्शवादी माना जाने लगा।

🔷 संसार में कोई काम छोटा नहीं। हर काम का अपना महत्व है। पर उसे ही जब लापरवाही और फूहड़पन के साथ किया जाता है तो छोटा माना जाता है और उसके करने वाला भी छोटा गिना जाता है।

👉 कड़वी बहु

🔶 जानकी के बहु बेटे शहर में बस चुके थे लेकिन उसका गाँव छोड़ने का मन नहीं हुआ इसलिए अकेले ही रहती थी। वह रोजाना की तरह मंदिर जा कर आ रही थी। रास्ते मे उसका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़ी।

🔷 गाँव के लोगों ने उठाया, पानी पिलाया और समझाया 'अब इस अवस्था में अकेले रहना उचित नहीं। किसी भी बेटे के पास चली जाओ।' जानकी ने भी परिस्थिति को स्वीकार कर बेटे बहुओं को ले जाने के लिए कहने हेतु फोन करने का मन बना लिया।

🔶 जानकी की तीन बहुएँ थी। एक बड़ी अति आज्ञाकारी मंझली मध्यम आज्ञाकारी और छोटी कड़वी। जानकी अति धार्मिक थी। कोई व्रत त्यौहार आता पहले से ही तीनों बहुओं को सावचेत कर देती। 'अति' खुशी खुशी व्रत करती। माध्यम भी मान जाती थी लेकिन कड़वी विरोध पर उतर जाती।

🔷 "आप हर त्योहार पर व्रत रखवा कर उसके आनंद को कष्ट में परिवर्तित कर देती हैं।" "तेरी तो जुबान लड़ाने की आदत है। कुछ व्रत तप कर ले। आगे तक साथ जाएँगे।"
दोनों की किसी न किसी बात पर बहस हो जाती। गुस्से में एक दिन जानकी ने कह दिया था।

🔶 "तू क्या समझती है! बुढापे में मुझे तेरी जरूरत पड़ने वाली है। तो अच्छी तरह समझ ले। सड़ जाऊँगी लेकिन तेरे पास नहीं आऊँगी।" सबसे पहले उसने अति को फोन किया "गिर गई हूँ। आजकल कई बार ऐसा हो गया है। सोचती हूँ तुम्हारे पाया ही आजाउँ।"

🔷 "नवरात्र में? अभी नहीं माँ जी। नंगे पाँव रह रही हूं आजकल। किसी का छुआ भी नहीं खाती।" मध्यम को भी फोन किया लेकिन उसने भी बहाना कर टाल दिया।

🔶 जब अति और मध्यम ही टाल चुकी तो कड़वी को फोन करने का कोई फायदा नहीं था और अहम अभी टूटा था लेकिन खत्म नहीं हुआ था। फोन पर हाथ रख आने वाले कठिन समय की कल्पना करने लगी थी। तभी फोन की घण्टी बजी। आवाज़ से ही समझ गई थी कड़वी है।

🔷 "गिर गये ना? आपने तो बताया नहीं लेकिन मैंने भी जासूस छोड़ रखे हैं। पोते को भेज रही हूँ लेने।"

🔶 "क्या तुझे मेरे शब्द याद नहीं?"

🔷 "जिंदगी भर नहीं भूलूँगी। आपने कहा था सड़ जाऊँगी तो भी तेरे पास नहीँ आऊँगी। तभी मैंने व्रत ले लिया था इस बुढ़िया अम्मा को सड़ने नहीं देना है। मेरा तप अब शुरू होगा।"

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 14)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत

🔶 प्रतिभावानों के होठों पर मंद-मुस्कान देखी जाती है। इसी आधार पर यह जाना जाता है कि वे अपने आप में संतुष्ट और प्रसन्न हैं। दूसरे भी ऐसे ही लोगों का सहारा ताकते और साथ देते हैं। खीजते और खिजाते रहने वालों को दूर से ही नमस्कार करने को जी करता है, जिन्हें अपना सही मूल्यांकन करना है, वे इस प्रकार की भूलें नहीं करते। यदि वे आदत में सम्मिलित होने लगें तो उन्हें बुहार फेंकने की मुस्तैदी दिखाते हैं।
  
🔷 तीसरा चरण है- सुव्यवस्था अस्त-व्यस्त स्थिति में ही, प्रचुर साधन रहते हुए भी लोग असफल रहते और उपहासास्पद बनते हैं। प्रतिभाएँ क्षण-क्षण में अपने कार्यों और नियोजनों की समीक्षा करती रहती हैं तथा उन्हें सही बनाने के लिए जो हेर-फेर करना आवश्यक होता है, उसे बिना हिचक तत्परतापूर्वक करती हैं। जड़ता हठवादिता के शिकंजे में जकड़ने का उन्हें तनिक भी आग्रह नहीं होता। वे जानते हैं कि प्रगतिशीलों को सदा परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी और चलते ढर्रे में आवश्यक सुधार लाने की चेष्टा करनी पड़ती है। व्यवस्था इसी प्रकार बन पड़ती है। जो अपने समय का, श्रम का, साधनों का, विचारों का ,परिवार परिकर का सुनियोजन कर सकता है और उन्हें सही दिशा दे सकने में समर्थ हो सकता है, उसे ही इस योग्य समझा जाता है कि वह कोई बड़ी या अतिरिक्त जिम्मेदारी को वहन कर सके। किन्हीं बढ़ी-चढ़ी महत्त्वाकांक्षाओं को सँजोने से पूर्व यह प्रमाण देना पड़ता है कि व्यक्तित्व, परिकर एवं क्रियाकलापों में किस सीमा तक व्यवस्था बुद्धि का उपयोग किया गया और उन्हें कितना सफल-समुन्नत बनाकर दिखाया गया।
  
🔶 चौथा व अंतिम सूत्र है- अग्रगमन-नेतृत्व यह उत्साह, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। साधारण जन आत्महीनता से ग्रसित, झिझक, संकोच, अनिश्चय एवं साहसहीनता की मन:स्थिति में पड़े पाए जाते हैं। वे उचित कार्यों के लिए भी कदम बढ़ाने का साहस नहीं कर पाते। अधिक-से-अधिक इतना ही सोचते हैं कि कोई बढ़े तो उसके पीछे चलने लगें। ऐसे लोग उचित निष्कर्ष निकाल लेने पर भी उस मार्ग का अवलंबन नहीं कर पाते। अपनी स्थिति को अनुपयुक्त मानते हुए भी उस परिधि से एक कदम भी आगे नहीं रख पाते। ऐसों के बीच उन्हीं को मनस्वी माना जाता है, जो उचित के प्रति अटूट आस्था रखें और जो करना चाहिए उसे अन्यों का समर्थन-सहमति न मिलने पर भी एकाकी कर दिखाएँ। इसे दूध गरम करते ही मलाई के तैरकर ऊपर आ जाने के समकक्ष समझा जा सकता है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 18

👉 The Significance of Satsang

🔶 Satsanga means being in the company of good people, inspiring discourses and discussions. You should always try to be in the company of such people who protect you from evils and wrongs; who can induce hope even in the moments of despair and offer you encouraging support in adverse circumstances.

🔷 It is easy to get the sycophants or selfish friends around, who would just be ‘friends’ when they need something from you: they need not be your well wishers, and might even pull you in the rut of addictions, ego and avarice; they won’t hesitate in stepping you on your back if it suits their vested interests. You may find it difficult to find wise men who would be your guides; who would be your critiques on your face to correct your flaws and advice you righteously; who would warn you of the dangers or risks well n time. People often prefer the company of elite; we should know that the best company is that of the enlightened personalities, the elevated souls.

🔶 Having true friends, though few in numbers, is a sign of wisdom. Noble friendship is quite significant in the ascent of life in many respects. It is foolish to make enemies, but worse is to leave the friendship of good people.

🔷 Pure intellect and faith in sincere efforts with assiduity are the two key elements essential for transmutation of personality. Adoption of virtues transforms the bad, debased ones into great personalities; on the contrary, vices could decline and debouch the great ones into mean, inferior, scornful levels. So your friends should be those who inspire the virtues and uproot the vices. You may also begin on your own by cultivating food qualities, like constructive use of time, alertness, sincerity and perseverance… Small steps in the prudent direction lead to brighter goals.

📖 Akhand Jyoti, Apr. 1942

👉 पवित्र, श्रद्धालु और धार्मिक बनें

🔷 इस संसार को माया इसलिए कहा गया है कि यहाँ भ्रान्तियों की भरमार है। जो जैसा है, वैसा नहीं दीखता। यहाँ हर प्रसंग में कबीर को उलटबांसियों की भरमार हैं। पहेली बुझाने की तरह हर बात पर सोचना पड़ता है। प्रस्तुत गोरख धन्धा बिना बुद्धि पर असाधारण जोर लगाए समझ में ही नहीं आता। तिलस्म की इस इमारत में भूल-भुलैया ही भरी पड़ी हे। आँख मिचौनी का बेल यहाँ कोई जादूगर खेलता खिलाता रहता है।

🔶 प्रस्तुत परिस्थितियों को विधि की विडम्बना नियति की प्रवंचना भी कहा जा सकता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर प्रतीत होता हैं कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता परखने के लिये उस चतुर चित ने पग-पग पर कसौटियाँ बिछा रखी हैं, जिनके माध्यम से गुजरने वाले के स्तर का पता लगता रहे। लगता है नियन्ता ने अपने युवराज को क्रमशः अधिकाधिक अनुदान देने की व्यवस्था बनाई है और उपयुक्त अधिकारी को उपयुक्त जिम्मेदारियाँ-विभूतियाँ सौंपते चलने की योजना विनिर्मित की है।      

🔷 दूरदर्शी और अदूरदर्शी का पता इस गुत्थी को सुलझा सकने, न सुलझा सकने से लग जाता है कि सच्चा स्वार्थ साधन किसमें है, किसमें नहीं। बाधक मात्र एक ही प्रवंचना होती है कि तात्कालिक आकर्षणों में यह चंचल मन इतना मचल जाता है कि बुद्धि को उसकी ललक पूरी करने तक का अवसर नहीं मिलता। तरकस से तीर निकल जाने पर पता चलता है कि निशाना जहाँ लगाना चाहिए था, वहाँ न लगकर कहीं से कहीं चला गया। सफलता और असफलता का निर्धारण यहीं हो जाता है। व्यवहार बुद्धि का आश्रय लेने वाले दूरदर्शी इसी कसौटी पर खरे उतरते एवं माया-प्रपंच से बचकर सफलता के साथ आत्मिक प्रगति के पथ पर प्रशस्त होते देखे जा सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति फ़रवरी 1973 पृष्ठ 1
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/February/v1

👉 अपनों के साथ दुर्व्यवहार

🔷 ‘आप लोग मुझे क्षमा करें। आपको आज मैं “महिलाओं”, शब्द से संबोधन कर रहा हूँ। सचमुच हम लोग शताब्दियों से गुलामी करते-करते स्त्री जैसे हो गये हैं। आप लोग इस देश या दूसरे किसी देश में जाइए। आप देखेंगे कि यदि एक स्थान पर तीन स्त्रियाँ 5 मिनट के लिए भी इकट्ठी होंगी तो झगड़ा कर बैठेंगी। पाश्चात्य देशों में बड़ी-बड़ी सभाएं करके स्त्रियों की क्षमता और अधिकारों की घोषणा से आकाश को गूंजा देती हैं पर उसके दो दिन बीतते न बीतते आपस में झगड़ा कर बैठती हैं तब कोई पुरुष आकर प्रभुत्व जमा लेता है।

🔶 सभी जातियों में आप ऐसा ही देखेंगे। स्त्रियों को शासन में रखने के लिये अब भी पुरुषों की आवश्यकता है। हम लोग भी इसी तरह स्त्रियों के समान हो गये हैं। अगर कोई स्त्री आकर उनका नेतृत्व करने लगती है तो सब मिलकर उसकी बड़ी आलोचना करने लगती है। उसे बोलने नहीं देतीं जबरदस्ती बिठा देती हैं। लेकिन यदि कोई पुरुष आकर उन के प्रति कुछ कठोर व्यवहार करें बीच-बीच में बुरा भला भी कहता जाय तो उन्हें अच्छा लगेगा क्योंकि वे लोग इस प्रकार के व्यवहारों की अभ्यस्त हो गई हैं।      

🔷 संसार की जादूगरों और वशीकरण मंत्र जानने वालों से भरा हुआ है। शक्तिशाली पुरुष सदा इस प्रकार दूसरों को वश में करते हैं। हम लोगों के संबंध भी यही हुआ है। अगर आपके देश का कोई मनुष्यता बढ़ना चाहता है तो आप सब लोग मिलकर उसे दबाते हैं लेकिन एक विदेशी आकर अगर लाठी भी मारे उसे अनायास ही सहने को प्रस्तुत होते हैं। आप लोग इसी के अभ्यस्त हो गये हैं इसीलिये दासता बन्धनों में पड़े हुए हैं। अपनों के साथ दुर्व्यवहार करना दासता की एक अचूक निशानी है?

✍🏻 स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1943 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/August/v1.6