शुक्रवार, 3 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 04 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 04 March 2017


👉 आसान होता गया शान्तिकुञ्ज का सफर

🔴 जब मैं पहली बार शान्तिकुञ्ज जा रहा था तो पत्नी बहुत रोई थी। उसे किसी ने कह दिया था वहाँ जाने वाले लौटते नहीं, वहीं के हो जाते हैं। उसे संदेह था- कहीं मैं संन्यासी न बन जाऊँ। मैंने समझाया- गुरुदेव स्वयं गृहस्थ हैं। वे हमेशा कहा करते हैं, गृहस्थ एक तपोवन है। सबसे बड़ी तपस्या वहीं होती है, फिर मुझे संन्यास की जरूरत ही क्या है? मैं तो केवल उनके दर्शन करने जा रहा हूँ। इस प्रकार की ढेर सारी बातें करके उसे बड़ी मुश्किल से मना पाया था।

🔵 मैं उन दिनों गायत्री परिवार से पहले- पहल जुड़ा था। गुरुदेव का सत्साहित्य पढ़ता रहा था। सन् १९८६ में जब गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना चल रही थी, उन्हीं दिनों दीवार लेखन तथा अखण्ड ज्योति वितरण का कार्य मुझे मिला। इसी वर्ष ३ फरवरी को गर्दनीबाग, पटना के नौ कुण्डीय यज्ञ में मैंने दीक्षा ली थी। उसी समय श्री चन्द्रशेखर प्रसाद जी (अब स्वर्गवासी) का सान्निध्य प्राप्त हुआ। ये गुरुदेव के समर्पित शिष्यों में से थे। इनके व्यक्तित्व से मैं काफी प्रभावित था।

🔴 एक दिन अचानक प्रसाद जी ने मुझसे कहा- आप हरिद्वार चलें। उन्हीं से मालूम हुआ- गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना के समापन पर सभी नैष्ठिक शिष्यों को पास बुलाया है। उनके पास पत्र आया था, वे चाहते थे मैं भी साथ चलूँ। मैं तो पहले ही अखण्ड ज्योति और युग निर्माण साहित्य से इतना प्रभावित था कि इनके सूत्रधार इस युगपुरुष के दर्शनों के लिए आतुर- सा था। मैं सानन्द चलने को तैयार हो गया।

🔵 होली के बाद पटना से रवाना होना था। होली के अगले दिन घर से चला, खजूरिया चौक पहुँचकर देखा कोई यात्री वाहन नहीं चल रहा है। एक ट्रक वाले से अनुरोध किया तो उसने मुजफ्फरपुर तक पहुँचा देना स्वीकार किया। रास्ते में ड्राइवर को गायत्री मंत्र के विषय में बताया तो उसने उत्साहपूर्वक मुझसे स्टीकर लेकर गाड़ी में चिपका लिया, जबकि वह ड्राइवर मुस्लिम था।

🔴 मुजफ्फरपुर में जहाँ ट्रक से उतरा वहीं तत्काल कार वाले एक साहब ने लिफ्ट दे दी। इस तरह बिना किसी अड़चन के मैं पटना पहुँच गया। अगले दिन सुबह हम चार लोग पटना से रवाना हुए। यहाँ भी अकल्पनीय रूप से हम सभी को खाली बर्थ मिल गई, जबकि हमारा रिजर्वेशन नहीं था। मन आनंद और उमंग से भरा था। विपरीत परिस्थिति रहते हुए भी मार्ग में सर्वत्र अनुकूलता बनती चली गई। ऐसा लग रहा था जैसे गुरुदेव ने मुझे भी बुलाया हो, तभी तो रास्ते के सारे अवरोध सारी प्रतिकूलताएँ अपने आप ही दूर होती जा रही हैं।       

🔵 प्रातःकाल हरिद्वार पहुँचा, और फिर मेरे सामने था बहुप्रतीक्षित अपना वह गुरुद्वारा- गायत्री तीर्थ, शांतिकुंज! कितनी पवित्र शांति! गंगा की गोद में बसा यह तीर्थ- दर्शन कर निहाल हो गया। गंगा स्नान के बाद भोजन प्रसाद लिया। अब, बस इस बात की प्रतीक्षा थी कि कब गुरुदेव के दर्शन हों।

🔴 दोपहर साढ़े बारह बजे गोष्ठी थी। यात्रा से सभी थके हुए थे, वे सोने की तैयारी कर रहे थे। मैं सोना नहीं चाहता था। भय था कहीं गहरी नींद सो जाऊँ, तो अवसर चूक सकता है। सोचा, गोष्ठी के बाद सो लूँगा। लेकिन इतनी विकल प्रतीक्षा के बावजूद रात्रि की थकान ने असर दिखाया और कब सो गया, इसका पता ही नहीं चला। अचानक ऐसा लगा कि किसी ने झकझोरकर जगाया हो- गोष्ठी में नहीं जाना क्या? मेरी नींद खुल गई, देखा आसपास कोई नहीं है, जल्दी- जल्दी हाथ- मुँह धोकर गोष्ठी में पहुँचा।

🔵 गोष्ठी के पहले घोषणा की गई- जिन्हें गुरुदेव का पत्र मिला है, वे अपना नाम दें- गुरुदेव ने माँगा है। मैं निराश हो गया- मुझे तो पत्र नहीं मिला था, द्वार तक पहुँचकर भी दर्शन से वंचित रह गया- सोचकर अंतर तक व्यथित हो उठा, आँखों में आँसू आ गए। परन्तु अगले ही क्षण फिर घोषणा हुई- यदि कोई व्यक्ति स्वयं को क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम समझते हैं, तो वे भी अपना नाम दें। उम्मीद जगी, मैंने अपना नाम दे दिया और इस तरह गुरुदेव के पास जाने की व्यवस्था बन गई।

🔴 गुरुदेव के सम्मुख पहुँचा तो पुरुषार्थ की उस प्रतिमा को देख कर ऐसा लगा कि ये तो स्वयं महाकाल हैं। दर्शन पाकर धन्य हो गया। उन्होंने कहा था- बेटा, मैं व्यक्ति नहीं, एक शक्ति हूँ। यह जो हाड़- मांस का पुतला देख रहे हो, यह मेरा स्थूल रूप है।

🔵 उनका निर्देश था- जीवन में स्वाध्याय और सत्संग कभी मत छोड़ना। दुनिया पेट और प्रजनन में मर खप जाती है। तुम उससे अलग हटकर रहना। गुरुदेव की प्रेरणा मुझे आज भी अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का संबल देती है। 

🌹 मनोजित दासगुप्ता टाटा- जमशेदपुर (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Wonderful/aasan

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 11)

🌹 प्रतिभा से बढ़कर और कोई समर्थता है नहीं   

🔴 नेपोलियन भयंकर युद्ध में फँसा था। साथ में एक साथी था। सामने से गोली चल रही थी। घबराने लगा तो नेपोलियन ने कहा-डरो मत, वह गोली अभी किसी फैक्टरी में ढली नहीं है, जो मेरा सीना चीरे।’ वह उसी संकट में घिरा होने पर भी दनदनाता चला गया और एक ही हुंकार में समूची शत्रुसेना को अपना सहायक एवं अनुयायी बना लिया। प्रतिभा ऐसी ही होती है।            

🔵 अमेरिका का अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन, इटली के गैरीबाल्डी आदि की गाथाएँ भी ऐसी हैं कि वे गई-गुजरी परिस्थितियों का सामना करते हुए जनमानस पर छाए और राष्ट्रपति पद तक पहुँचने में सफल हुए। लेनिन के बारे में जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि साम्यवाद के सूत्रधार के रूप में उसने क्या से क्या करके दिखा दिया।     

🔴 विनोबा का भूदान आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रान्ति सहज ही भुलाई नहीं जा सकती। भामाशाह की उदारता देश के कितने काम आई। बाबा साहब आमटे द्वारा की गई पिछड़ों की सेवा एक जीवन्त आदर्श के रूप में अभी भी विद्यमान है। विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को खड़ा करने वाले वेडेन पावेल की सृजनात्मक प्रतिभा को किस प्रकार कोई विस्मृत कर सकता है। सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द सेना अविस्मरणीय है।     

🔵 भारतीय साहित्यकारों के उत्थान की गाथाओं में कुछ के संस्मरण बड़े प्रेरणाप्रद हैं। पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी, भिक्षान्न से पले बालकृष्ण शर्मा ‘‘नवीन’’ भैंस चराने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी आदि घोर विपन्नताओं से ऊँचे उठकर मूर्धन्य साहित्यकार बने थे। शहर के कूड़ों में से चिथड़े बटोरकर गुजारा करने वाले गोर्की विश्वविख्यात साहित्यकार हो चुके हैं। यह सब प्रतिभा का ही चमत्कार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 एकाग्रचित्त काम-बहुत बड़े परिणाम

🔴 इंग्लैंड के इतिहास में 'एल्फ्रेड' का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। एल्फ्रेड ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक साहसिक कार्य किए जिससे वह महान् एल्फ्रेड (एल्फ्रेड द ग्रेट) के नाम से जाना जाता है।

🔵 प्रारंभ में एल्फ्रेड भी एक साधारण राजा की तरह जो बाप-दादों से होता आया है वह चाहे अच्छा या हो बुरा करने की अंधविश्वासी प्रवत्ति के कारण वह सामान्य व्यक्तियों का सा खाओ पियो और वैभव विलास में डूबे रहो ? जीवन जीने लगा। समुद्र में पडा़ तिनका जिस तरह लहरों के साथ उठता-गिरता है, वैसे ही अस्त व्यस्त जीवन एल्फ्रेड का भी था। एक दिन ऐसा भी आया, जब उसकी यह सुस्ती शत्रुओं के लिये लाभदायक सिद्ध हुई। एल्फ्रेड का राज्य औरों ने हडप लिया और उसे गद्दी से उतारकर मार गिराया।

🔴 इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे एल्फ्रेड को एककिसान के घर नौकरी करनी पडी उसे बर्तन माँजने, पानी भरने और चौके का काम सौंपा गया, उसके काम की देख रेख किसान की स्त्री करती थी। एल्फ्रेड छिपे वेष में जिंदगी काटने लगा।

🔵 एक दिन किसान की स्त्री को किसी आवश्यक काम से बाहर जाना पड़ा। बटलोई पर दाल चढी़ थी, सो उसने एल्फ्रेड से कहा कि जब तक मैं वापिस नही आ जाती तुम बटलोई की दाल का ध्याना रखना यह कहकर स्त्री चली गई।

🔴 वहाँ से काम पूरा कर लौटी तो स्त्री ने देखा, एल्फ्रेड एक ओर बैठा कुछ सोच रहा है ओर बटलोई की सारी दाल जल चुकी है। स्त्री ने कहा-मूर्ख नवयुवक। लगता है तुझ पर एल्फ्रेड की छाया पड़ गई है, जो काम सौंपा जाता है उसे कभी एकाग्र चित्त होकर पूरा नहीं करता। तू भी उसकी तरह मारा-मारा घूमेगा।

🔵 स्त्री बेचारी को क्या पता था कि जिससे वह बात कर रही है वह एल्फ्रेड ही है, पर एल्फ्रेड को अपनी भूल का पता चल गया। उसने बात गाँठ बाँध ली, आज से जो कुछ भी करुँगा दत्तचित्त होकर करुंगा। कल्पना के किले बनाते रहने से कोई लाभ नहीं।

🔴 एल्फ्रेड एक बार फिर सहयोगियों से मिला। धन संग्रह किया, सेना एकत्र की और फिर दुश्मनों पर चढा़ई करके लंदन को फिर से जीत लिया। इस बार उसने सारे इंग्लैण्ड को एक सूत्र में बाँधकर नये उत्साह, सूझ-बूझ और एकाग्रता से काम किया, जिससे देश की उन्नति हुई।

🔵 एक दिन एल्फ्रेड़ फिर उस किसान स्त्री के घर गया और उसे बहुत-सा धन देकर कहा-माँ तूने उस दिन शिक्षा न दी होती तो मैं इस स्थिति पर नही पहुँचता। छोटे की भी अच्छी बात मानने के एल्फ्रेड के इस गुण की प्रशंसा की जाती है। स्त्री तो आश्चर्य में डूब गई कि मैंने उस दिन इतने महान आदमी को अनजान में यह शब्द कह दिये।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 62, 63

👉 वशीकरण विद्या

🔵 संत दादू के पास एक महिला आई। उसका पति रुष्ट रहता था। घर की अनबन से निरन्तर अशाँति बनी रहती थी। महिला ने अपनी दुःखी गाथा संत से कही और कष्ट निवारण के लिए वशीकरण कवच माँगा।

🔴 संत ने उसे समझाया कि पति के दोष दुर्गुणों का विचार न करते हुए तुम सच्चे मन से उसकी सेवा करो। प्रेम से पशु भी वश में हो जाते हैं, मनुष्य की तो बात ही क्या है?

🔵 महिला को इससे संतोष न हुआ। वह वशीकरण कवच की ही माँग करती रही। अन्त में दादू जी ने एक कागज पर दो लाइन उसे लिखकर दे दीं और कहा- यह कवच है इसे पहनना और मेरे कहे अनुसार पति की प्रेमपूर्वक सेवा करना।

🔴 एक वर्ष बाद वह महिला बहुत सी भेंट उपहार लेकर आई। उसका पति वश में हो चुका था ‘घर का नरक स्वर्ग में परिणत हो चुका था। श्रद्धापूर्वक उसने संत के चरणों में मस्तक नवाते हुए भेंट प्रस्तुत की और वशीकरण कवच की बड़ी प्रशंसा करने लगी।

🔵 दादू ने उपस्थित लोगों से कहा-आप लोग भी यह वशीकरण विद्या सीख लें। महिला से उन्होंने कवच वापिस लेकर उसे खोला और सबको दिखाया। उसमें एक दोहा लिखा था-

दोहा-दोष देख मत क्रोध कर, मन से शंका खोय।
प्रेम भरी सेवा लगन से, पति वश में होय॥


🌹 अखण्ड ज्योति जून 1964

👉 न तो हिम्मत हारे ओर न हार स्वीकार करें (अंतिम भाग)

🔵 परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असम्भव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक संताप के आँसू बहाने पड़े यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मन चाही सफलताएँ किसे मिली है। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो संजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दे और एक-एक तिनका बीन कर बनाये गये उस घरौंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनः स्थिति के लोग टूट जाते हैं।

🔴 नियति क्रम से हर वस्तु का-हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाये इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिरअतीत से अपने स्थान पर जमी अड़ी बैठी है। हिलोरों ने अपना टकराना बन्द नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

🔵 न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1973

👉 आत्मचिंतन के क्षण 4 March

🔴 जब क्रोध का आवेग आता है तो उसका एक ही लक्ष्य होता है, जो अपनी कामनाओं में बाधक बना है उसे नुकसान पहुँचाना। मार-पीट कर, सामान को नष्ट कर, काम में रोड़ा अटकाकर जैसे भी बने क्रोध का लक्ष्य दूसरे को हानि पहुँचाना ही होता है। वह भले ही किसी भी रूप में पहुँचाई जाय। कभी-कभी लोग क्रोध से प्रेरित होकर अपना ही सिर फोड़ने लगते हैं। अंग भंग, आत्महत्या तक कर लेने को उद्यत हो जाते हैं, ऐसे लोग। किन्तु इसका आधार भी अपने कुटुम्बियों, स्नेह, सम्बन्धियों को वर्तमान या भविष्य में हानि पहुँचाना ही होता है। स्मरण रहे ऐसी हरकतें बेगानों के साथ कभी नहीं की जातीं। ऐसा मनुष्य तभी करता है जब दूसरों को इस प्रपंच की परवाह होती है वे इस क्रोध प्रदर्शन से प्रभावित होते हैं।

🔵 भय के लिये कारण निर्दिष्ट होना जरूरी नहीं है। मानसिक कमजोरी, दुःख या हानि की काल्पनिक आशंका से ही प्रायः लोग भयभीत रहते हैं। सही कारण तो बहुत थोड़े होते हैं। कोई सह-कर्मचारी इतना कह दे कि आप नौकरी से निकाल दिये जायेंगे, इतने ही से आप डरने लगते हैं। कोई मूर्ख पण्डित कह दे कि अमुक नक्षत्र में अति वृष्टि योग है बस फसल नष्ट होने की आशंका से किसानों का दम फूलने लगता है। नौकरी छूट ही जायेगी या जल गिरेगा ही यह बात यद्यपि निराधार है केवल अपनी कल्पना में ऐसा सत्य मान लिया है, इसी के कारण भयभीत होते हैं। इस अवास्तविक भय का कारण मनुष्य की मानसिक कमजोरी है, इसका निराकरण भी संभव है। मनुष्य इसे मिटा भी सकता है।

🔴 जो मनुष्य सामाजिक जीवन में रहकर मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रखता वन में जीने या घर बार छोड़ देने से उसका मन भी बदल जायगा। वहाँ भी वह अपने पाप के नये-नये तरीके ढूंढ़ लेगा। और नहीं कुविचारों के रहते हुए भला उसे आत्म-शान्ति कैसे मिलेगी ? इधर घर वालों की कलपती हुई आत्माओं से निकली हुई दुर्भावनायें भी क्या उसे चैन से रहने देंगी। सामाजिक जीवन कर्त्तव्य के अनेकों रास्ते होते हैं जिनमें लगा रहकर मनुष्य मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है और आसानी से अपना पारमार्थिक लक्ष्य पूरा कर सकता है। अन्यत्र रह कर पाप के कीचड़ में फिसल जाने का भी खतरा हो सकता है किन्तु उपयुक्त गृहस्थ जीवन में ऐसी तो कोई भी आशंका नहीं होती।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 27)

🌹 विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं

🔴 साधारण मनोरंजन, कार्यों तथा व्यवहारों में इस रहस्य को आये दिन देखा जा सकता है कि जो काम दूसरों को प्रसन्न करने वाले होते हैं अथवा जिन कामों में हम दूसरों को प्रसन्न कर पाते हैं वे ही काम हमें अधिक से अधिक प्रसन्न किया करते हैं। एक खिलाड़ी गेंद खेलता है और विपक्ष पर एक गोल कर देता है तो उसे अपनी सफलता पर प्रसन्नता होती है; किन्तु तभी जब उसके साथी भी प्रसन्न होते हैं। यदि किसी कारण से उसकी यह सफलता दर्शकों अथवा साथियों को प्रसन्न न कर पाये तो उसे स्वयं भी प्रसन्नता न होगी।

🔵 एक शिल्पी भवन अथवा मन्दिर बनाता है। यद्यपि वह उसका नहीं होता तथापि वह इसलिए प्रसन्न होता है कि उसका यह काम दूसरों को प्रसन्न कर सका है। इसी प्रकार कोई चित्रकार, कलाकार अथवा कवि कोई रचना करता है तो उसे प्रसन्नता होती है, उसे अपनी कृति अच्छी लगती है। किन्तु उसकी प्रसन्नता में वास्तविकता तभी आती है जब दूसरे भी प्रसन्न होते हैं। संयोगवश यदि उसका सृजन अन्य किसी की प्रसन्नता का सम्पादन न कर सके तो अपनी होते हुए भी कला में कोई रुचि न रहेगी वह उसे बेकार समझेगा और उसकी प्रसन्नता जाती रहेगी।

🔴 वास्तविक प्रसन्नता का मूल रहस्य दूसरों की प्रसन्नता में निहित है। जो परोपकारी व्यक्ति दूसरों के सुख के लिए जीते हैं उनके कार्य औरों की सेवा रूप होते हैं। वे अपने जीवन में साधन शून्य रहने पर भी प्रसन्न सन्तुष्ट एवं सुखी रहते हैं। जिसकी जीवन में वास्तविक प्रसन्नता की जिज्ञासा हो वह अपने जीवन को यज्ञमय बनाये, नित्य निरन्तर दूसरों का हित साधन करे जिससे कि वह अपनी वांछित वस्तु प्रसन्नता को नित्य निरन्तर पाता रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 5)

🌹 चेतना की सत्ता एवं उसका विस्तार

🔵 चतुरता के बलबूते अपने यहाँ तो अनेक अपराधी दंड पाने से बच जाते हैं, पर सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी न्यायाधीश के न्याय में किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते । इस वास्तविकता से असहमत रहने के कारण ही लोग प्राय: नास्तिक बन जाते हैं— कर्मफल की मान्यता का उपहास उड़ाते हुए स्वेच्छाचार बरतते हैं। विवेक होने की समझ तभी आती है जब समयानुसार क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आ खड़ी होती है।         

🔴 यहाँ तो प्रसंग इस बात का चल रहा है कि ईश्वर और जीव आपस में अविच्छिन्न होकर रह रहे हैं-अत्यंत सघन भाव और अविच्छिन्न साथी-सहचर की तरह। स्थिति को देखते हुए इस बात की पूरी गुंजाइश है कि समर्थ बीज से उपजा समर्थ बालक अभीष्ट सहयोग प्राप्त कर सके और अभावग्रस्तता की दु:खदाई स्थिति से सरलतापूर्वक छूट सके। पर प्रचलित विडंबनाओं में से एक यह भी है कि नितांत निकट रहते हुए भी परिचय ऐसा बना लिया गया है, मानो एक दूसरे से नितांत अपरिचित हैं। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि विशालकाय नगरों में एक ही बड़े भवन की चारदीवारी में रहने वाले किरायेदार एक-दूसरे से परिचित तक नहीं होते।

🔵 हम अपने शरीर के भीतरी अवयवों को भी पूरी तरह कहाँ समझ पाते हैं! शरीर में समाये विषाणुओं का पता नहीं चलता और यह भी नहीं बन पड़ता कि उनके कारण उत्पन्न होने वाले खतरों को समझ सकें और समय रहते कुछ उपाय-उपचार कर सकें। समझदार कहे जाने वाले मनुष्य के इस भुलक्कड़पन को देखते हुए उसे नासमझ कहा जाए तो कुछ भी अनुचित न होगा। स्वस्थ दीखने वाले भी अस्वस्थता से जकड़े हुए हैं-घुन लगी लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर पोले हो रहे हैं; स्थिति इतनी बदतर है कि अणु से लेकर विराट् विभु के कण-कण में एक अत्यंत सुव्यवस्था के संव्याप्त होने पर भी अपनी अकल यही धोखा देती रहती है कि इस खेत का कोई बोने वाला या रखवाला नहीं है-चाहे जो करने और चाहे जो पाने की मनमानी करते रहने में कोई हर्ज नहीं। आम प्रचलन में इन दिनों ऐसे ही सोच की भरमार है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (भाग 9)

🌹 दीक्षा क्या? किससे लें?

🔴 हम अपने अन्तरंग की पुकार को सुनें और संकल्प करें कि अपनी जीवात्मा को जो हमारा वास्तविक स्वरूप है, सुखी व समुन्नत बनाने के लिए अपनी बाह्य और भौतिक शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। हमारे पास शारीरिक शक्ति है, हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए उस शारीरिक शक्ति को खर्च करेंगे। हमारे पास बुद्धि है, हम उस बुद्धि को अपने जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने में खर्च करेंगे। हमारे पास जो धन है, उसे हम अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे। हमारा जो प्रभाव, वर्चस् संसार में है, उससे अपनी जीवात्मा को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए खर्च करेंगे।

🔴 जीवात्मा को सुखी और समुन्नत कैसे बनाया जा सकता है? यह कई बार बताया जा चुका है और हजार बार बताया जाना चाहिए। उसके सिर्फ दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह कि मनुष्य शुद्ध और निर्मल जीवन जिये। निर्मल जीवन जीने से आदमी की अपार शक्ति का उदय होता है। आदमी की सारी शक्ति का जो क्षय हो रहा है, वह नष्ट हो रही है, आदमी जो छोटा बना हुआ है, कमीना बना हुआ है, शक्तिहीन बना हुआ है दुर्बल बना हुआ है, इसका कारण एक ही है कि मनुष्य ने अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को छोटे किस्म का बनाया हुआ है।

🔵 अगर आदमी अपनी गतिविधियों को छोटे किस्म का बना कर न रखे, ऊँचे किस्म का बनाकर रखे, अपने आचरण ऊँचे रखे, अपनी इन्द्रियों के ऊपर संयम रखे, अपनी वाणी पर संयम रखे और अपने विचारों पर संयम रखे ; तब वह आदमी छोटा नहीं हो सकता। तब आदमी के अन्तरंग में दबी हुई शक्तियाँ दबी हुई नहीं रह सकतीं। मामूली- सा आदमी क्यों न हो, लेकिन उसकी भी वाणी इतनी प्रभावशाली हो सकती है कि मैं क्या कह सकता हूँ? उसका सोचने का तरीका कितना उत्कृष्ट हो सकता है कि मैं उससे क्या कहूँ? आदमी का प्रभाव इतना ज्यादा हो सकता है और आदमी के अन्तरंग में इतनी शान्ति हो सकती है कि उस शान्ति को वह चाहे, तो लाखों मनुष्यों पर बिखेर सकता है। उसकी वाणी में वह सामर्थ्य हो सकती है कि अपनी वाणी के प्रभाव से न केवल मनुष्यों को बल्कि दूसरे जीव- जन्तुओं को भी प्रभावित कर सकता है।     

🔴 अगर आदमी अपनी वासना और तृष्णा पर काबू कर ले, तब उसका मस्तिष्क तेज हो जाता है। वह एकान्त में बैठा है, तब भी उसके विचार सारी दुनिया में व्याप्त हो सकते हैं। अगर आदमी अपना जीवन निर्मल जिए। सारी दुनिया के विचारों से टक्कर लेने और उन्हें ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 67)


🌹 प्रवास का दूसरा चरण एवं कार्य क्षेत्र का निर्धारण
 
🔴 चर्चा एक से चल रही थी, पर निमंत्रण पहुँचते ही एक क्षण लगा और वे सभी एक-एक करके एकत्रित हो गए। निराशा गई, आशा बँधी और आगे का कार्यक्रम बना कि जो हम सब करते रहे हैं, उसका बीज एक खेत में बोया जाए और पौधशाला तैयार की जाए उसके पौधे सर्वत्र लगेंगे और उद्यान लहलहाने लगेगा।

🔵 यह शान्तिकुञ्ज बनाने की योजना थी, जो हमें मथुरा के निर्धारित निवास के बाद पूरी करनी थी। गायत्री नगर बसने और ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का ढाँचा खड़ा किए जाने की योजना भी विस्तार से समझाई गई। पूरे ध्यान से उसका एक-एक अक्षर हृदय पटल पर लिख लिया और निश्चय किया कि 24 लक्ष का पुरश्चरण पूरा होते ही इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनेगी और चलेगी। निश्चय ही, अवश्य ही और जिसे गुरुदेव का संरक्षण प्राप्त हो वह असफल रहे ऐसा हो ही नहीं सकता।

🔴 एक दिन और रुका। उसमें गुरुदेव ने पुरश्चरण की पूर्णाहुति का स्वरूप विस्तार से समझाया एवं कहा कि ‘‘पिछले वर्षों की स्थिति और घटनाक्रम को हम बारीकी से देखते रहे हैं और उसमें जहाँ कुछ अनुपयुक्त जँचा है, उसे ठीक करते रहे हैं। अब आगे क्या करना है, उसी का स्वरूप समझाने के लिए इस बार बुलाया गया है। पुरश्चरण पूरा होने में अब बहुत समय नहीं रहा है, जो रहा है उसे मथुरा जाकर पूरा करना चाहिए। अब तुम्हारे जीवन का दूसरा चरण मथुरा से आरम्भ होगा।

🔵 प्रयाग के बाद मथुरा ही देश का मध्य केन्द्र है। आवागमन की दृष्टि से वही सुविधाजनक भी है। स्वराज्य हो जाने के बाद तुम्हारा राजनैतिक उत्तरदायित्व तो पूरा हो जाएगा, पर वह कार्य अभी पूरा नहीं होगा। राजनैतिक क्रान्ति तो होगी, आर्थिक क्रान्ति तथा उससे सम्बन्धित कार्य भी सरकार करेगी, किन्तु इसके बाद तीन क्रान्तियाँ और शेष हैं-जिन्हें धर्म तंत्र के माध्यम से ही पूरा किया जाना है। उनके बिना पूर्णता न हो सकेगी। देश इसलिए पराधीन या जर्जर नहीं हुआ था कि यहाँ शूरवीर नहीं थे। आक्रमणकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे। भीतरी दुर्बलताओं ने पतन पराभव के गर्त में धकेला। दूसरों ने तो उस दुर्बलता का लाभ भर उठाया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/prav.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 68)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
🔴 बड़े- बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, पर अपना जी किसी को देखने- सुनने के लिए न करता। प्रकाश मिला तो अपने भीतर। आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई, तो ही काम चला। दूसरों के सहारे बैठे रहते, तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपने तरह हमें अज्ञानी बना देते। लगता है किसी को प्रकाश मिलना होगा, तो भीतर से ही मिलेगा। कम- से अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है।

🔵 आत्मिक प्रगति में वाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे- उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना, श्रेय पथ पर चलने का दुस्साहस संग्रह किये बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई। अब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं। गुरुदेव से लेकर भगवान् तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति पथ पर धीरे- धीरे किन्तु  सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये। अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

🔴 लोग कहते रहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन कठिन है; पर अपनी अनुभूति इससे सर्वथा विपरीत है। वासनाओं और तृष्णाओं से घिरा और भरा जीवन ही वस्तुत: कठिन एवं जटिल है। इस स्तर का क्रिया- कलाप अपनाने वाला व्यक्ति जितना श्रम करता है, जितना चिन्तित रहता है, जितनी व्यर्थ वेदना सहता है, जितना उलझा रहता है, उसे देखते हुए आध्यात्मिक जीवन की असुविधा को तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य ही कहा जा सकता है। इतना श्रम, इतना चिन्तन, इतना उद्वेग फिर भी क्षण भर भी चैन नहीं। कामना पूर्ति के लिए प्रथम प्रयास कर पूर्ति से पहले ही अभिलाषाओं का और सौ गुना हो जाना इतना बड़ा जंजाल है कि बड़ी- से सफलताएँ पाने के बाद भी व्यक्ति अतृप्त और असंतुष्ट ही बना रहता है। 

🔵 छोटी सफलता पाने के लिए कितने थकान वाला श्रम करना पड़ा था, यह जानते हुए भी उससे बड़ी सफलता पाने के लिए चौगुने, दस गुने उत्तरदायित्व और ओढ़ लेता है। गति जितनी तीव्र होती जाती है उतनी ही समस्याएँ उठती और उलझती हैं। उन्हें सुलझाने में देह, मन और आत्मा का कचूमर निकलता है। सामान्य शारीरिक और मानसिक श्रम सुरसा जैसी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ नहीं होता, अस्तु अनीति और अनाचार का मार्ग अपनाना पड़ता है। जघन्य पाप कर्म करते रहने पर अभिलाषाएँ पूर्ण नहीं होती हैं। निरन्तर की उव्दिग्नता और भविष्य की अंध तमिस्रा दोनों को मिलाकर जितनी क्षति है उसे देखते हुए उपलब्धियों को अति तुच्छ ही कहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

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