शुक्रवार, 3 मार्च 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 68)

🌹 हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलू
🔴 बड़े- बड़े सत्संग, सम्मेलन होते तो, पर अपना जी किसी को देखने- सुनने के लिए न करता। प्रकाश मिला तो अपने भीतर। आत्मा ने ही हिम्मत की और चारों ओर जकड़े पड़े जंजाल को काटने की बहादुरी दिखाई, तो ही काम चला। दूसरों के सहारे बैठे रहते, तो ज्ञानी बनने वाले शायद अपने तरह हमें अज्ञानी बना देते। लगता है किसी को प्रकाश मिलना होगा, तो भीतर से ही मिलेगा। कम- से अपने सम्बन्ध में तो यही तथ्य सिद्ध हुआ है।

🔵 आत्मिक प्रगति में वाह्य अवरोधों के जो पहाड़ खड़े थे- उन्हें लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा रखे बिना, श्रेय पथ पर चलने का दुस्साहस संग्रह किये बिना निरस्त नहीं किया जा सकता था, सो अपनी हिम्मत ही काम आई। अब अड़ गये तो सहायकों की भी कमी नहीं। गुरुदेव से लेकर भगवान् तक सभी अपनी मंजिल को सरल बनाने में सहायता देने के लिए निरन्तर आते रहे और प्रगति पथ पर धीरे- धीरे किन्तु  सुदृढ़ कदम आगे ही बढ़ते चले गये। अब तक की मंजिल इसी क्रम से पूरी हुई है।

🔴 लोग कहते रहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन कठिन है; पर अपनी अनुभूति इससे सर्वथा विपरीत है। वासनाओं और तृष्णाओं से घिरा और भरा जीवन ही वस्तुत: कठिन एवं जटिल है। इस स्तर का क्रिया- कलाप अपनाने वाला व्यक्ति जितना श्रम करता है, जितना चिन्तित रहता है, जितनी व्यर्थ वेदना सहता है, जितना उलझा रहता है, उसे देखते हुए आध्यात्मिक जीवन की असुविधा को तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य ही कहा जा सकता है। इतना श्रम, इतना चिन्तन, इतना उद्वेग फिर भी क्षण भर भी चैन नहीं। कामना पूर्ति के लिए प्रथम प्रयास कर पूर्ति से पहले ही अभिलाषाओं का और सौ गुना हो जाना इतना बड़ा जंजाल है कि बड़ी- से सफलताएँ पाने के बाद भी व्यक्ति अतृप्त और असंतुष्ट ही बना रहता है। 

🔵 छोटी सफलता पाने के लिए कितने थकान वाला श्रम करना पड़ा था, यह जानते हुए भी उससे बड़ी सफलता पाने के लिए चौगुने, दस गुने उत्तरदायित्व और ओढ़ लेता है। गति जितनी तीव्र होती जाती है उतनी ही समस्याएँ उठती और उलझती हैं। उन्हें सुलझाने में देह, मन और आत्मा का कचूमर निकलता है। सामान्य शारीरिक और मानसिक श्रम सुरसा जैसी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ नहीं होता, अस्तु अनीति और अनाचार का मार्ग अपनाना पड़ता है। जघन्य पाप कर्म करते रहने पर अभिलाषाएँ पूर्ण नहीं होती हैं। निरन्तर की उव्दिग्नता और भविष्य की अंध तमिस्रा दोनों को मिलाकर जितनी क्षति है उसे देखते हुए उपलब्धियों को अति तुच्छ ही कहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books/sunsaan_ke_shachar/hamari_jivan_saadhna.2

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