सोमवार, 18 जून 2018

👉 Concentration – an essential pre-requisite for spiritual unfoldment (Part 2)

🔷 The goal of a sadhak is to become more and more introspective. Therefore, closing the eyes, the mind should be fixed on the import of a mantra. The recitation of mantra should be done along with meditation. A japa done in this awakened manner helps in controlling the waywardness of mind and in making it introspective. The acrobats of a circus perform miraculous feats as a result of their concentration and practice. Siddha purushas with concentration of their spiritual and mental energies are able to become the masters of several siddhis.

🔶 The scattered sunrays cannot burn even a thread, but when the same rays are focused with the help of a convex lens, a spark of fire is produced, capable of burning anything. Similarly when five karmendriyas and five gyanendriyas are not attracted towards their objects of desire, the mind becomes stable. In meditation, when the external world of objects and the false ego-self are forgotten, it should be assumed that the mind is getting quietened. Thus regular sadhana of concentration will lead the sadhak to higher dimensions of consciousness beyond the ordinary mind, instinct with paranormal ranges of light, life and bliss.

🔷 There are several unique occult powers lying dormant in the deeper layers of our consciousness. If the gunpowder is scattered on the ground and is lit, it will burn like ordinary things and nothing special will happen. But if the same gunpowder is fired through the barrel of a gun it can even pierce through the hardest steel. In the same way, if our mind remains shallow and scattered, it will be ineffective in attaining anything worthwhile and we will lead a life without purpose.

📖 Akhand Jyoti Mar-2002

👉 बुरे विचारों से दूर रहिए (भाग 2)

🔷 हमें यहाँ ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी भावना व्यक्ति विशेष से सम्बन्धित नहीं रहती। हम किसी समय एक विशेष व्यक्ति से डर रहे हों, संभव है वह व्यक्ति हमारा कुछ बुरा न कर सके वह किसी कारण से हमसे दूर हो जाये। किन्तु इस प्रकार व्यक्ति विशेष से दूर हो जाने पर हम अपनी दुर्भावना से मुक्त नहीं होते। यह भावना अपना एक दूसरा विषय खोज लेगी।

🔶 हमारे जीवन का सुख और दुःख हमारे विचारों पर ही निर्भर रहता है। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि मनुष्य का न सिर्फ आन्तरिक जीवन वरन् उसके समस्त जीवन के व्यवहार तथा शारीरिक स्वास्थ्य भी मन की कृष्ट तथा अकृष्ट गतियों का परिणाम मात्र है। अशुभ विचारों का लाना ही अपने जीवन को दुखी बनाना है, तथा शुभ विचारों का लाना सुखी बनाना है।

🔷 अब प्रश्न यह आता है कि हम अशुभ विचारों को आने से कैसे रोकें जिससे कि उनसे पैदा किये दुखों से हम बच सकें? यह प्रश्न बड़े महत्व का है और संसार के समस्त मनस्वी लोगों ने इस प्रश्न पर गम्भीर विचार किया है। किन्तु इस विषय पर जितना ही विचार किया जाय श्रेयस्कर है। प्रत्येक मनुष्य को इस विषय पर विचार करना चाहिये। दूसरों के विचारों से हमें लाभ अवश्य होता है किन्तु जब तक हम दूसरों के विचारों का मनन नहीं करते, उनसे भली प्रकार लाभ नहीं उठा सकते। लेखक पहले इस विषय पर अपने विचारों का उल्लेख करेगा इस लेख का तात्पर्य यहाँ है कि प्रत्येक पाठक को इस विषय पर विचार करने को प्रस्तुत किया जाय, ताकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्या को अपने आप सुलभ कर सकें।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 14
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.14

👉 सादा जीवन उच्च विचार अन्योन्याश्रित (भाग 1)

🔷 निर्वाह की दृष्टि से जीवन क्रम हलका-फुलका होना चाहिए। लिप्सा लालसाओं से लदी जिन्दगी बहुत भारी पड़ती है। महत्त्वाकांक्षी लोग न चैन से बैठते है न दूसरों को बैठने देते हैं। बड़प्पन का नशा विज्ञात नशों में सबसे बुरा है। कुबेर और इन्द्र बनने की ललक में रावण और हिरण्यकश्यपु जैसा वैभव बटोरने की रट लगाते-लगाते कितने चंगेज खाँ और सिकन्दर इस दुनिया से हाथ मलते उठ गये, फिर अपने जैसे मक्खी मच्छरों की क्या स्थिति, जिनके पास न कौशल है, न पराक्रम, न साधन। वितृष्णा इतना ही कर सकती है कि इस चन्द दिन तक जीने के लिए मिले हुए सुयोग का अपहरण कर ले। मृगतृष्णा में भटकने वाले दिवास्वप्न देखते और निराशा, खीज़, थकान भर पल्ले पड़ने से मूर्खता पर सिर धुनते हैं।

🔶 यदि विलास और वैभव ही सब कुछ रहे और अहंता के प्रदर्शन बिना चैन न पड़े तो एक बात और भी गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि इस प्रयास में उन सभी सम्भावनाओं को समाप्त करना होगा जो हर घड़ी प्रसन्नता बनाये रहती हैं। जिसके कारण चेहरे पर मुस्कान और अन्तराल में संतोष भरे उल्लास को छलकते देखा जाता है। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण और सुविकसित बनाये रहने के लिए बहुत कुछ सोचना और बहुत कुछ करना होता है। इस हेतु जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें पूरी तरह वह व्यामोह अजगर की तरह निगल जाता है, जिसमें दर्प के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं।

🔷 साथियों को नीचा दिखाकर अपनी गरिमा सिद्ध करने वाले ठाट-बाट तो बना लेते हैं, पर जिस लोक सम्मान की आशा से वह सब किया गया था, उसे मिलने की कोई आशा की किरण दीखती नहीं। उलटी ईर्ष्या भड़कती है। भूखों की मण्डली में बैठकर जब एक कोई रबड़ी चाटता है तो सौभाग्यशाली कहलाने का श्रेय कहाँ बटोर पाता है। उलटा आक्रोश बरसता है और निष्ठुरता का लांछन लगता है। लगे हाथों कहने वाले यह भी कहते है कि यह अनीति उपार्जन है, अन्यथा ईमानदार होने पर तो यह हमारे जैसा ही रहता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 आध्यात्मिकता की मुसकान

🔷 इस संसार में सब कुछ हँसने को लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है वह हमारी प्रखरता की चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न पत्रों के देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है? प्रतिकूलता हमारा साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिन्दगी यदि संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी क्योंकि वह जो सरलता पूर्वक दिन गुजारता रहता है उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना सम्भव हुआ है।

🔶 नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका उससे सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता, कुशलता और विनोद को समझता है उसे हँसने मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?
        
✍🏻 ~ महर्षि रमण
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 1

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि...