शनिवार, 30 जून 2018

👉 काश ! दुर्गा जग सके ...

🔷 आज सबको दुर्गा शक्ति के तत्वदर्शन को समझना चाहिए! विश्व को अब दुर्गाशक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता है! दुर्गा संघशक्ति का प्रतीक है!

🔶 पुराणों में जो वर्णन आता है उसके अनुसार एक समय शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि असुरों के अत्याचारों से पृथ्वी पर धर्म की जड़ें हिलने लगी थीं! ये मांसाहारी, मदिरा पीने वाले, व्यभिचारी, लुटेरे और हत्यारे असुर जब देव पुरुषों को नाना प्रकार के दुःख देने लगे तो देवताओं ने ब्रह्मा जी की सलाह पर अपनी बिखरी हुई शक्तियों को संचित किया! दैवीय शक्तियों की वह संगठित शक्ति दुर्गा, काली, चंडी अथवा अंबिका नामों से प्रसिद्ध हुई! उसने असुरों को मारा और दैवीय तत्वों की रक्षा की तभी से देवी की पूजा होने लगी!

🔷 परमात्मा की शक्तियों ने संगठित होकर दुर्गा के रूप में अवतरित होकर संसार को यह शिक्षा दी कि हम देव स्वाभाव के व्यक्ति यदि अधर्मी असुरों के मुकाबले में अपनी सज्जनता और धर्म धारणा के कारण कमजोर पड़ते हैं तो संगठित होकर अपनी संगठन की शक्ति का उपयोग करें! इससे वे निश्चय ही बड़े से बड़े असुरों को भूमिसात कर सकते हैं! आज इसी दुर्गा शक्ति के जागरण की आवश्यकता है!

🔶 सारे देश में घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले में दुर्गा जागरण संपन्न कराये जा रहे हैं! काश!! इनसे दुर्गा शक्ति का जागरण हो सका होता! दुर्गा माता ने अवतरित होकर महिषासुर, मधुकैटभ, शुंभ-निशुंभ आदि असुरों का संहार किया था! महिषासुर अर्थात् आलस्य! मधुकैटभ अर्थात् असंयम! शुंभ-निशुंभ अर्थात् लोभ-मोह!

🔷 दुर्गा का अर्थ है अनीति अनाचार के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करना! यदि दुर्गा माता के भक्तों ने अपने अंदर दुर्गा माता को अर्थात् आत्म-शक्ति को जगाकर व्यक्तिगत जीवन में इन असुर कुत्साओं का दमन किया होता, लौकिक जगत में अज्ञान, अन्याय और अभाव के रूप में व्याप्त इन तीन असुरों को परास्त किया होता तो भक्तों की दुर्गा पूजा और दुर्गा जागरण सार्थक हो जाता!!

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Mahamana Mohan Malviya

🔷 It happened in the initial days of the Banaras Hindu University. Some students went to meet the founder vice-chancellor, Mahamana Mohan Malviya. They had many complaints against some of their teachers  and classmates. Malviyaji was an eminent scholar and patriot, who genuinely cared for the younger generation of the nation.

🔶 He patiently listened to the complaints then replied affectionately- “My young friends! There may be some thorns of angularities in those people, but these thorns would bother us only when we are not able to see the beauty of the flowers of their positive qualities. You should endeavor seeing the flowers of goodness indwelling  their lives; then the thorns will lose their prominence  and your life will also begin to get fragrant with the sweet scent of those flowers”.

📖 From Pragya Puran

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (अन्तिम भाग)

🔷 क्रोध के प्रेरक दो प्रकार के दुःख हो सकते है - अपना दुःख और पराया दुःख। जिस क्रोध के त्याग का उपदेश दिया जाता है वह पहले प्रकार का क्रोध है।”

🔶 क्रोध के द्वारा हम दूसरे व्यक्ति में भय का संचार करना चाहते है। यदि हम दूसरे को डराने में सफल हो जाते हैं और वह विनम्र होकर आत्मसमर्पण कर देता है, तब हमें विशेष प्रसन्नता होती है। यदि दूसरे व्यक्ति में भय उत्पन्न नहीं हो पाता, तो हमें अन्दर ही अन्दर एक प्रकार की गुप्त पीड़ा होती है। कभी-2 क्रोध दूसरे का गर्व चूर्ण करने के हेतु किया जाता है।

🔷 क्रोध असुरों की सम्पदा है। यदि हम क्रोध को काबू में न करेंगे तो तामसी, निराशापूर्ण और दुःखित दशा में पड़े रहेंगे। हमारे स्वभाव का राक्षसत्व ही प्रकट होगा। हम ईश्वर के राज्य में प्रवेश न पा सकेंगे। क्रोध के अधम विचारों से हमारी नैतिक, आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक अवनति होती है, अन्तःकरण के क्लेश बढ़ते हैं। क्रोध को मन में छिपाये रखने से प्रतिशोध, अतृप्ति, उद्वेग, शत्रु भाव, ईर्ष्या, असूया आदि विकार मन में उद्दीप्त होते हैं। छिपा हुआ क्रोध अनेक बार जटिल मानसिक रोगों का कारण बनता है। अनेक भावना ग्रन्थियाँ इसी शत्रुभाव की वजह से हमारे अन्तःप्रदेश में निर्मित होती है।

🔶 “क्रोधान्द्रवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रण्श्यति॥
-गीता
“अर्थात् क्रोध से अविवेक होता है, अविवेक से स्मरण में भ्रम हो जाता है, स्मृति के भ्रमित हो जाने से बुद्धिनाश होता है, बुद्धि के नष्ट होने से प्राणी नष्ट हो जाता है।”

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.18

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 June 2018

शुक्रवार, 29 जून 2018

👉 संतोषी बनो

🔶 आप किसी के लिये कितना भी कुछ कर दीजिये पर यदि सामने वाले के मन मे आत्मसंतुष्टी नही है तो वो कभी सुखी नही रह सकता है वो हमेशा दुःखी का दुःखी ही रहेगा क्योंकि बिना आत्मसंतुष्टी के आत्मशान्ति की प्राप्ति कभी नही हो सकती है!

🔷 एक नगर मे श्री मन नाम के एक सेठजी रहा करते थे बहुत बड़ा व्यापार था उनका और बहुत बड़ी सम्पदा भी थी पर उनके आगे पिछे कोई न था! सन्तों की संगत मिल जाने से धीरे धीरे वो भगवत प्रेम की तरफ बढ़ने लगे निरंतर साधनात्मक जीवन से धीरे धीरे उन्हे संसार से वैराग्य होने लगा!

🔶 और एक दिन उन्होंने अपनी सारी सम्पति परमार्थ के निमित्त दान कर दी और स्वयं गंगा माँ की शरण-स्थली मे जाकर वही साधूओ की सेवा करने लगे और हरी भजन मे डूब गये!

🔷 उनका एक बहुत ही दुर का रिश्तेदार दुर्भागी लाल था उन्होंने उसके लिये अपने एक सेवक के हाथों दस लाख रुपये भिजवायें सेवक वहाँ तक पहुँचा और दुर्भागी को दस लाख रुपये दिये दुर्भागी ने बहुत आदरसत्कार किया और सेठजी के गुणगान करता हुआ नही रुका भोजन के दौरान बातो ही बातो मे सेवक ने सेठजी का सारा वृतान्त सुनाया और जैसै ही दुर्भागी को पता चला की सेठजी ने करोड़ों अरबों की सम्पति दान कर दी और मुझे दस लाख रुपये दिये वो वही पर सेठजी को गाली देने लगा की अरे खुद के आगे पिछे तो कोई न था और मुझे केवल दस लाख रुपये दिये मूरखों की तरह सारी सम्पति लुटाने की क्या जरूरत थी पागल की बुद्धि सटिया गई!

🔶 और इस तरह से उसने धन्यवाद देना तो दुर रहा गालियाँ देने लगा!

🔷 ईश्वर ने हमें जितना दिया क्या वास्तव मे हम उसके उतने लायक है? जब हम ईमानदारी से अपना अवलोकन करे तो हमें हमारे भीतर बहुत गन्दगी दिखेगी और हमारे पापों के विशाल पर्वत है हमें जो उसने दिया वो तो उसने दया करके दिया है हम उसके लायक नही है फिर भी दिया है उस करूणानिधि का आभार प्रकट करना तो दुर और उसे कोसते है!

🔶 ये जितने भी कोसने वाले है वो सब दुर्भागी लाल है उन्हे संतुष्टी नही है और ऐसे असंतुष्टों के लिये आप कितना भी कुछ कर दो वो कभी सुखी नही रह सकते है! जिसने दिल से आभार प्रकट किया उसके दुःख स्वतः ही समाप्त हो गये और जिसने केवल शिकायत की उसके सुख स्वतः ही समाप्त हो गये है!

🔷 सन्तोष से बड़ा कोई सुख नही है और ये कभी न भुलना की संतोषी हर पल सुखी और आनन्द मे जीता है तो असंतोषी हर पल दुःखी ही रहता है!

👉 आज का सद्चिंतन 29 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 June 2018


👉 Influence of Bioelectricity on Food Products – Last Part

🔶 1. Manifestation Against the Backdrop of a Dark Curtain:

This simple experiment would demonstrate the presence of the invisible bioelectric field of the body. Keep one of the chairs facing the least illuminated wall of the room and cover its back with the thick black cloth. Place a dimly lighted wick lamp on the chair. The light should not be visible on the cloth from behind the chair. Be seated on the second chair facing the back of the first chair at a distance of about a foot from the cloth. Resting elbows on the arms of chair, keep arms in an upright position with the palms and fingers pressed together (as in traditional Indian salutation `Namastey').  Now start rubbing both palms together vertically, slowly in the beginning, then gradually accelerate.

🔷 A close observation will show a fog-like hazy luminous emission emanating from the palms. The palms may also appear to glow with a couple of sparks flying out of them. Edges of nails would particularly appear luminous.

🔶 2. Sensory Perception of Bioelectric Magnetism: This experiment shows the bioelectric magnetism present in the body. Be seated on a non-conducting chair placed on the insulated floor. Keep body-parts away from any conducting surface (walls, floor or any other conducting body likely to leak the bioelectric charges from the body). Tightly press fingers of both hands together, leaving a little space between the palms. For about a minute keep the hands pressed together in this position. Now keeping the palms together, try to pull the fingers apart. The bioelectric magnetism of the body would resist the effort to separate them. A vibration will be felt in the fingers.

📖 Akhand Jyoti – April 2004 

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)

🔶 सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।

🔷 मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।

🔶 मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 6)

🔶 विचार प्रायः दो प्रकार के होते हैं (1) शान्त और दृढ़ तथा (2) संशयात्मक और डाँवाडोल। दूसरे प्रकार की स्थिति उद्वेग और शंकाशील है। इसी में क्रोध भी सम्मिलित है। उस उद्विग्न मनः स्थिति में मनुष्य कुछ भी उत्कृष्ट बात नहीं सोच सकता, उन्नति की भावना में संलग्न नहीं हो सकता। उसकी शारीरिक मशीनरी यकायक झंकृत हो उठती है। वह समूचा काँप उठता है।

🔷 धर्म नीति और शिष्टाचार-तीनों ही दृष्टिकोणों से क्रोध निकृष्ट है। क्रोधी मनुष्य धर्म कार्य किस प्रकार कर सकता है? उसमें धर्म निष्ठा, पूजन, मनन कीर्तन, अध्ययन, चिंतन, इत्यादि कैसे आ सकते है? जिसका शरीर और मन वश में नहीं वह नीति के अनुसार सत्-असत् का विवेक किस प्रकार कर सकता है? जिसे क्रोध आता है वह दूसरे के मान अपमान का विचार क्या करेगा।

🔶 एक विद्वान् का विचार है- “एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता हैं। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अभाव का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी त्यौरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है, वह उचित है या अनुचित। इसी से धर्म और नीति में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने जितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं तो, क्रोध के चिन्ह दिखाये दबाये जाते हैं। इस प्रकार का प्रतिबन्ध समाज की सुख−शांति के लिए बहुत आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.18

👉 संयमशील जीवन

🔶 जिह्वा और कामेन्द्रिय की उत्तेजना को यदि साध लें तो स्वास्थ्य रक्षा की प्रक्रिया बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है। भोजन भूख मिटाने या शक्ति प्राप्त करने के लिए करते हैं, जीभ के स्वाद के लिए नहीं। भोगी व्यक्तियों की रुचि स्वादयुक्त व्यंजनों में बनी रहती है, किंतु संयमशील व्यक्ति का आहार केवल जीवन धारण किये रहने के लिए होता है, जिसमें स्वाद, चटपटे मसालों, विविध व्यंजनों की राई-रत्तीभर भी गुँजाइश नहीं होती। शराब, माँस और दूसरे मादक द्रव्यों का सेवन हानिकारक होता है। ये पदार्थ व्यक्ति की विवेक बुद्धि को समाप्त कर देते है।

🔷 जो सदैव ईर्ष्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण के विचारों में डूबे रहते है, वे अकारण ही अपनी मानसिक शक्तियों का अपव्यय करते रहते हैं। उन्हें न तो किसी प्रकार का भौतिक सुख मिलता है, न आध्यात्मिक लाभ। सामाजिक-कलह अव्यवस्था का कारण भी ऐसे ही लोग होते है, जिनके विचार संयमित नहीं होते।

🔶 शारीरिक और मानसिक शक्तियों का नियन्त्रण कर लें तो सामाजिक नियन्त्रणों की बात अपने आप पूरी हो जाती है। इन दोनों का मिश्रित रूप ही समाज की व्यवस्था का कारण बनता है। व्यक्ति से ही समाज बनता है। जिस समाज के व्यक्तियों में भले विचार होंगे, वहाँ शांति व सुव्यवस्था अवश्य होगी। अनियंत्रित स्वेच्छाचारी मनुष्य ही स्थान-स्थान पर कलह व कटुता उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियन्त्रण की आवश्यकता है, इसी से शक्ति सन्तुलन व सुव्यवस्था बनी रह सकती है। इस पुण्य प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म संयम से ही करना होगा। पीछे इसके लाभों को देखते हुए दूसरे भी चल पड़ेंगे, पर पहले हमें यह पग स्वयं बढ़ाना पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.17

गुरुवार, 28 जून 2018

👉 रैन बसेरा

🔷 राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव को छः दिन बीत गये और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा क्षुब्ध हो रहा था।

🔶 शुकदेव जी ने राजा को एक कथा सुनाई- राजन् बहुत समय पहले की बात है। एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई। वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूर पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गन्दे बीमार बहेलिये की झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिये जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गन्दी, छोटी, अन्धेर और दुर्गन्ध युक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठके पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर विवशता वश उस बहेलिये से अपनी कोठरी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

🔷 बहेलिये ने कहा- आश्रय हेतु कुछ राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ। लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गन्ध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते। इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की- कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है। सिर्फ एक रात ही काटनी है।

🔶 बहेलिये न अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपड़ी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रातःकाल ही बिना झंझट किये झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त की फिर दुहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ा रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गन्ध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राज-काज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।

🔶 प्रातःकाल जब राजा और ठहरने के लिये आग्रह करने लगा तो बहेलिये ने लाल पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।”

🔷 शुकदेव जी ने पूछा-परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था? परीक्षित ने कहा- भगवान वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गन्दी कोठरी में अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राज-काज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है।”

🔶 शुकदेव जी ने कहा-परीक्षित वह और कोई नहीं तुम स्वयं हो। इस मल मूत्र की कोठरी देह में जितने समय तुम्हारी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आप आये थे। इस पर भी आप झंझट फैला रहे हैं। मरना नहीं चाहते एवं मरने का शोक कर रहे हों। क्या यह उचित है?”

🔷 राजा ने कथा के मर्म को स्वयं पर आरोपित किया एवं मृत्यु भय को भुलाते हुए मानसिक रूप से निर्वाण की अपनी तैयारी कर ली। अन्तिम दिन का कथा श्रवण उन्होंने पूरे मन से किया।

🔶 वस्तुतः मरने के लिये हर मानव हो हर घड़ी तैयार रहना चाहिये। यह शरीर तो कभी न कभी विनष्ट होना ही है। लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उसी को ऊँचा उठाने के प्रयास जीवन पर्यन्त किये जाते रहें तो भागी जन्म सार्थक किया जा सकता है।

👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2018


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 5)

🔷 उत्कृष्ट व्यक्तित्व का एक ही पक्ष है-भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन, न्यूनतम निर्वाह की अपरिग्रह परम्परा का वरण। जिनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएँ अभिलाषाएँ, तृष्णा, लिप्साएँ असाधारण रूप से उभरी होती है, उनके लिए यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता कि वे नीति-नियमों का व्यतिरेक न करें। इसी प्रकार यह भी नहीं बन पड़ता कि समय, श्रम या साधनों का उपार्जन से कम उपयोग अपने लिए करें और उस बचत को उच्च स्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित करें। लिप्सा में भौतिक दोष यह है कि उसकी तृप्ति की कोई मर्यादा नियत नहीं रहती। कमी कभी दूर नहीं होती और अधिक कमाने, जोड़ने, उड़ाने की व्याकुलता उसी अनुपात से बढ़ती चली जाती है। फल यह होता है कि आदर्शवादिता की मात्र उथली चर्चा या खोखली विडम्बना ही बन पाती है। वैसा कोई ठोस प्रयत्न नहीं बन पड़ता जैसा कि उत्कृष्ट जीवन के लिए अपेक्षित है। अतएव निस्पृह जीवन के लिए यह अनिवार्य है कि भौतिक आकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को उतना नियन्त्रित किया जाय कि वे लगभग औसत नागरिक स्तर की जा पहुँचे। आत्म-निर्माण का, आत्म-परिष्कार का सुनियोजन इससे कम में नहीं बन पड़ता।

🔶 अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Influence of Bioelectricity on Food Products – Part 2

🔷 Research tells us that maximum discharge of human bioelectricity takes place through the tips of fingers. Foodstuff repeatedly touched by bare hands and fingers cannot remain unaffected by the good or bad traits of the cook. It is true, that that while heating, many such internal impurities are removed. Nevertheless heating does not purify the food in totality.

🔶 Physical contact is not the only factor responsible for the internal impurity of food. Thoughts are waves of bioelectric current. As such, these are also propagated through sight while looking at things. (Hypnotists and mesmerists utilize this property of transmission of thoughts. The famous saying Love at first sight too illustrates this phenomenon.)

🔷 When one casts a glance on the edibles kept on the plate of a neighbor, the thoughts of the onlooker are also transmitted to these edibles. Food served reluctantly or by a person in an unhappy state of mind would certainly have negative effect on the eater. The same is true of the foodstuff forcibly snatched from somebody, or consumed alone in the company of several onlookers, and of the food earned by unfair means.

📖 Akhand Jyoti – April 2004 

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 5)

🔷 क्रोध एक प्रकार का भूत है जिसके संचार होते ही मनुष्य आपे में नहीं रहता। उस पर किसी दूसरी सत्ता का प्रभाव हो जाता है। मन की निष्ठ वृत्तियाँ उस पर अपनी राक्षसी माया चढ़ा देती हैं, वह बेचारा इतना हत बुद्धि हो जाता है कि उसे यह ज्ञान ही नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है।

🔶 आधुनिक मनुष्य का आन्तरिक जीवन और मानसिक अवस्था अत्यन्त विक्षुब्ध है, दूसरों में वह अनिष्ट देखता है, उनसे हानि होने की कुकल्पना में डूबा रहता है, जीवन पर्यन्त इधर उधर लुढ़कता, ठुकराया जाता रहता है, शोक दुःख, चिंता, अविश्वास, उद्वेग, व्याकुलता आदि विकारों के वशीभूत होता रहता है। ये क्रोध जन्य मनोविकार अपना विष फैलाकर मनुष्य का जीवन विषैला बना रहे हैं। उसकी आध्यात्मिक शक्तियों का शोषण कर रहे हैं। साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का महाराक्षस ही है।

🔷 क्रोध शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। एक बार क्रोध आते ही मन को अवस्था विचलित हो उठती है, श्वासोच्छवास तीव्र हो उठता है, हृदय विक्षुब्ध हो उठता है। यह अवस्था आत्मिक विकास के विपरीत है। आत्मिक उन्नति के लिए शान्ति, प्रसन्नता, प्रेम और सद्भाव चाहिए।

🔶 जो व्यक्ति क्रोध के वश में है, वह एक ऐसे दैत्य के वश में है, जो न जाने कब मनुष्य को पतन के मार्ग में धकेल दे। क्रोध तथा आवेश के विचार आत्म बल का ह्रास करते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.17

👉 हम संयमी बनें

🔷 नियन्त्रित जीवन का आधार संयम है। इससे समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत होती हैं, इन्हें जिधर ही लगा दो, उधर ही चमत्कारिक परिणाम उपलब्ध किये जा सकते हैं। संयम से शक्ति, स्वास्थ्य, मन की पवित्रता, बुद्धि की सूक्ष्मता और भावना की सुन्दरता जागृत होती है। इसके लिए अपने जीवन में दृढ़ इच्छा, शील व जीवनचर्या पर पर्याप्त ध्यान देना पड़ता है। आइये अब यह विचार करें कि हमें यह सावधानी कहाँ-कहाँ रखनी है, किन-किन अवस्थाओं में किस प्रकार संयम की उपयोगिता है।

🔶 आत्म-निर्माण के तीन क्षेत्र हैं- शरीर, मन और समाज। सुव्यवस्थित जीवन जीने के लिए स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना अनिवार्य है। शरीर दुर्बल और रोग ग्रस्त है तो कोई सुखी न रहेगा। मन अपवित्र है तो द्वेष, दुर्भावना व कलह का ही वातावरण बना रहेगा। हमारे समाज में कुरीतियाँ और अनाचार फैल रहे हैं तो हम उनसे अछूते बचे रहेंगे, ऐसी कोई सुविधा इस संसार में नहीं है। इन तीनों अवस्थाओं के नियन्त्रण को ही ऋषियों ने मन, वचन और कर्म का संयम कहा है।

🔷 यह सत्य है कि संसार के सभी पदार्थ भोग के लिए हैं, किंतु इसकी भी एक सीमा और मर्यादा होती है। आहार शरीर को शक्ति प्रदान करता है किंतु चाहे भूख न हो, जो मिले खाते जाइए तो अपच का होना स्वाभाविक है। पेट की शक्ति के अनुरूप आहार की एक सीमा निर्धारित कर दी गई है, उतने में रहे तो यह आहार अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। इससे स्वास्थ्य आरोग्य स्थिर रहेगा, किंतु जहाँ मर्यादा का उल्लंघन हुआ कि रोग-शोक के लक्षण दिखाई देने लगेंगे। इसलिए स्वास्थ्य विद्या के आचार्यों ने आहार ग्रहण करने के तरीकों पर अधिक संयम व सावधानी रखने को कहा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 16


http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.16

बुधवार, 27 जून 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 June 2018


👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 4)

🔷 स्वर्ग में देवता रहते हैं। उनके पास दैत्यों की तुलना में वैभव की कमी होती है। आक्रमण के क्षेत्र में भी पहल उन्हीं की होती है। फिर भी गौरव देवत्व के हिस्से में ही रहा है। वन्दन, अभिनन्दन और अनुकरण भी उन्हीं का होता रहा है। इस क्षेत्र में प्रवेश करने में किसी को कठिनाई नहीं, अड़चन इतनी भर है कि कुसंस्कारिता के चक्रव्यूह से निकलने का प्रयत्न सच्चे मन से किया जाय। इसके लिए आदर्शों की गरिमा समझने की आवश्यकता है। यदि हनुमानों और अर्जुनों का उदाहरण सामने न रहा, कठिनाइयों की कीमत पर गौरव खरीदने का साहस न उभरा तो क्षणिक आवेश की बबूले जैसी दुर्गति होती फिरेगी।

🔶 संतुलित मस्तिष्क का प्रधान गुण है दूरदर्शी विवेकशीलता। इसके प्रकट होते ही मनुष्य तत्काल की सीमा को तोड़कर भविष्य पर दृष्टि डालता है। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी की तरह पूँजी लगाकर समयानुसार अधिक लाभ उपार्जन का लाभ दीख सकता है। बीज गलता तो है पर इसमें वह कुछ खोता नहीं। भूमि के साथ आत्मसात् होकर उसे देखते-देखते अंकुरित पल्लवित और फलित होने वाले विशाल वृक्ष का सुयोग मिलता है। दूरदर्शिता इससे कम में सन्तुष्ट नहीं होती। उसका अनादिकाल से एक ही परामर्श रहा है, महान के लिए तुच्छ को त्यागा जाय। कामना का भावना पर उत्सर्ग किया जाय। क्षुद्रता का महानता के पक्ष में विसर्जन किया जाय। भक्त को भगवान की प्राप्ति के लिए यही करना पड़ता है। महानता इससे कम में सधती नहीं।

🔷 जीवन का एक रूप है जिसमें ललक लिप्सा के लिए आदर्शों को गँवाना पड़ता है और महानता की ओर से मुँह मोड़ना पड़ता है। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वाँछित कामनाओं की पूर्ति भी हो सकेगी या नहीं जीवन का दूसरा रूप है महानता का, जिसमें महामानवों ने श्रद्धापूर्वक प्रवेश किया है और देवोपम गौरव और स्वर्ग जैसा सन्तोष सौजन्य का भरपूर रसास्वादन किया है। दोनों में से किसे चयन किया जाय। इसी के निर्धारण में उस सूझ-बूझ का परिचय मिलता है, जिसे मनोजयी, धीर-वीर अपनाते और असंख्यों के लिए अनुगमन की पथ रेखा विनिर्मित करते है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Influence of Bioelectricity on Food Products - Part 1

🔷 Common man is hardly aware of the effect of “internal purity” of food on mind. In one of his books, Prof. Leadbeater, the founder member of Theosophical Society, speaks about the influence of subtle ingredients of food on human body. According to him, apart from the digestive matter, the food matter also carries with it certain subtle contents and our bodies absorb these as well.

🔶 We meticulously take care of the external, physical cleanliness of food, overlooking the fact, that its internal purity is much more necessary than its physical purity. Food products subtly absorb thoughts/traits of persons handling these for long periods. (Repeated right or wrong thinking becomes a part of habit, ultimately developing into a trait of the person.)

🔷 The imprints of these thoughts/traits on the edibles created by the bioelectric transmissions of associated persons are carried over to the mind of its consumer. The “internal purity” of food is maximally affected by the morality and mental state (at the time of cooking) of its cook.

📖 Akhand Jyoti – April 2004

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 4)

🔷 चिड़चिड़ाहट प्रायः वृद्धों में अधिक देखने में आती है। रोगी अपनी दुर्बलता के कारण जरा-2 सी बात पर तिनक उठते हैं, औरतें काम से परेशान होकर इतनी उद्विग्न रहती हैं कि मामूली सी बात पर चिड़चिड़ा जातीं हैं। अध्यापक विद्यार्थियों की काँव-कांव सुनते-2 इतने दुःखी से हो उठते हैं कि तिनक उठते हैं। दुकानदार प्रायः ग्राहकों से जलभुन कर इस मानसिक दुर्बलता के शिकार बनते हैं। धार्मिक वृत्ति वाले रूढ़िवादी दुनिया की प्रगति देख-देखकर जीवन भर बड़बड़ाया करते हैं।

🔶 क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई स्थिति में रख देता है जिसके परिणामस्वरूप मन दूषित विकारों से भर जाता है। क्रोध से प्रथम तो उद्वेग उत्पन्न होता है। मन एक गुप्त किन्तु तीव्र पीड़ा से दुग्ध होने लगता है। रक्त में गमफल आ जाती है, और उसका प्रवाह बड़ा तेज हो जाता है। इस गमफल में मनुष्य के शुभ भाव, दया, प्रेम, सत्य, न्याय, विवेक, बुद्धि जल जाते हैं।

🔷 जिस पर क्रोध किया गया है यदि वह क्षमावान् और शान्त प्रकृति का हो और क्रोध से विचलित न हो, तो क्रोध करने वाले को बहुत दुःख होता है। वह जलभुन कर राख हो जाता है। मन में एक प्रकार का तूफान सा उठता है जिसका वेग इतना प्रबल होता है कि मनुष्य अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाता। विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है, शिष्टता एवं शान्ति से वह हाथ धो बैठता है। कई बार क्रोध से उत्तेजित होकर क्रोधी व्यक्ति दूसरे की हिंसा और आत्मघात तक कर बैठते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.17

👉 आत्म विश्लेषण और आत्मनिरीक्षण

🔷 आत्म विश्लेषण का अर्थ है प्रवृत्तियों के मूल कारण की तलाश करना। अर्थात् द्वेषपूर्ण भावनायें जिस आधार पर उठीं, उस आधार को ढूँढ़ना और उसे नष्ट करना। आत्म निरीक्षण का अर्थ है अपने विचारों और कार्यों की न्यायपूर्ण समीक्षा करना। बुराइयाँ पक्षपातपूर्ण विचार पद्धति के कारण ही उठती हैं। मनुष्य की यह सबसे बड़ी भूल है कि वह जिस वस्तु को चाहता है उसे किसी न किसी भूमिका के साथ टिका देता है। इसी को विचार और कार्यों का पक्षपात कहते हैं। जैसे बीड़ी, सिगरेट, या अन्य कोई मादक पदार्थ सेवन करने वालों की हमेशा यह दलील रहती है कि उससे उन्हें शान्ति मिलती है या मानसिक तनाव दूर होता है। कई तो यहाँ तक कहते हैं बीड़ी सिगरेट न पियें तो पाचन क्रिया ठीक प्रकार काम नहीं करती। पर यदि कठोरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि शराब, सिगरेट के पक्ष में जो दलीलें देते रहते हैं वे सर्वथा निस्सार हैं। यह तो मन बहलाव के लिए गढ़ी बातें हैं। वस्तुतः उनसे मानसिक परेशानियाँ तथा स्वास्थ्य और पाचन प्रणाली में शिथिलता ही आती है।

🔶 अपने गुण और दोष देखने में जब तक ईमानदारी और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है जब तक वह आत्म विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। झूठे प्रदर्शनों और स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण ही जीवन में परेशानियाँ आती हैं। सच्चाई की मस्ती ही अनुपम है। उसकी एक बार जो क्षणिक अनुभूति कर लेता है वह उसे जीवनपर्यन्त छोड़ता नहीं। सत्य मनुष्य को ऊँचा उठाता है, साधारण स्थिति से उठाकर परमात्मा के समीप पहुँचा देता है। सत् संस्कारों का बल, कुसंस्कारों की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक होता है किन्तु कुसंस्कारों में जो क्षणिक सुख और तृप्ति दिखाई देती है उसी के कारण लोग दुष्कर्मों की ओर बड़ी जल्दी खिंच जाते हैं। अतएव जब कभी ऐसे अनिष्टकारी विचार मस्तिष्क में उठें तब उनसे भागने या शीघ्र निर्णय का प्रयत्न करना चाहिए। किसी बुराई से डरने या भागने से वह जीवन का अंग बन जाती हैं किन्तु जब विचारों में मौलिक परिवर्तन करते हैं और बुराई की गहराई तक छान-बीन करते हैं तो अन्तःकरण की दिव्य ज्योति के समक्ष सच और झूठ की स्वतः अभिव्यक्ति हो जाती है। लोग बुराइयों से सावधान हो जाते हैं। आत्मनिरीक्षण के साथ विचार पद्धति शुभ संस्कार बढ़ाने का दूसरा उपाय है। इसके लिये यह आवश्यक है कि जो भी व्यवसाय करें पहले उस पर अथ से इति तक विचार कर लें और यदि वह वस्तु उपयोगी दिखाई दे तो उसे प्रयत्नपूर्वक अपने जीवन में धारण करें, अन्यथा उसे त्याग दें।

🔷 आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।

🔶 जब तक गम्भीरता से आत्म विवेचन का कार्यक्रम नहीं बनाते तब तक गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन लाना आसान नहीं रहता। उदाहरण के लिये इस प्रकार विचार कीजिये- “मान लीजिये आप तम्बाकू पीते हैं। दिन भर में चार आने की तम्बाकू पी लेते हैं। एक माह में साढ़े सात रुपये के हिसाब से प्रति वर्ष आप 90 रुपये की तम्बाकू पी जाते है और लाभ क्या होता है? आपके शरीर में निकोटीन विष भरता चला जाता है जो कभी-कभी कैन्सर का कारण बन सकता है। सरदर्द, अपच, आँखों की शक्ति का कमजोर होना, वीर्य रोग, दन्त रोग, आदि कितनी व्याधियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। इससे अपना और अपने बाल-बच्चों और समाज का कितना बड़ा अहित होता है”। आप जब इस प्रकार गहराई से विचार करने का अभ्यास प्रारम्भ करेंगे तो विश्वास कीजिये आपके जीवन में कितनी ही बुराइयाँ, क्यों न जड़ जमा चुकी हों, उन्हें आज नहीं तो कल अपना बोरिया बिस्तर बाँधना ही पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.13

मंगलवार, 26 जून 2018

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 3)

🔶 सन्तुलित मस्तिष्क की पहचान यह नहीं है कि वह शिथिलता, निष्क्रियता अपनाये और संसार को माया मिथ्या बताकर बे सिर-पैर उड़ाने उड़ने लगें। विवेकवान उद्विग्नता छोड़ने पर पलायन नहीं करते। वे कर्तव्य क्षेत्र में अंगद की तरह अपना पैर इतनी मजबूती से जमाते हैं कि असुर समुदाय पूरी शक्ति लगाकर भी उखाड़ने में सफल न हो सके। प्रलोभनों और दबावों से जो उबर सकता है, उसी के लिये यह सम्भव है कि उत्कृष्टता को वरण करे और आँधी तूफानों के बीच भी अपने निश्चय पर चट्टान की तरह अडिग रहे। इसके लिए उदाहरण, प्रमाण ढ़ूँढ़ने हों, साथी, सहचर, समर्थक ढ़ूँढ़ने हों तो इर्द-गिर्द नजर न डालकर महामानवों के इतिहास तलाशने पड़ेंगे। अपने समय में या क्षेत्र में यदि वे दीख न पड़ते हो तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। इतिहास में उनके अस्तित्व और वर्चस्व को देखकर अभीष्ट प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है और विश्वास किया जा सकता है कि महानता का मार्ग ऐसा नहीं है, जिस पर चलने से यदि लालची सहमत न हो तो छोड़ देने की बात सोची जाने लगे।

🔷 वैभववानों की एक अपनी दुनिया हैं। किन्तु सोचना यह नहीं चाहिए कि संसार इतना ही छोटा है। इसमें एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसे स्वर्ग कहते हैं। उसमें सत्प्रवृत्तियों का वर्चस्व है और अपनाने वाले जो भी उसमें बसते है, देवोपम स्तर का वरण करते हैं। दैत्यों के संसार में सोने की लंका बनाने और दस सिर जितनी चतुरता और बीस भुजाओं जैसी बलिष्ठता हो सकती है, किन्तु उतना ही सब कुछ नहीं हैं। भागीरथों, हरिश्चन्द्रों, प्रह्लादों और दधीचियों जैसी भी एक बिरादरी है। बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर, रैदास, गाँधी, विनोबा जैसे अनेकों ने उसमें प्रवेश पाया है।

🔶 दयानन्दों और विवेकानन्दों का भी अस्तित्व रहा है। संख्या की दृष्टि से कमी पड़ते देखकर किसी को भी मन छोटा नहीं करना चाहिए। समूचे आकाश में सूर्य और चन्द्र जैसी प्रतिभाएँ अपने पराक्रम से संव्याप्त अन्धकार से निरन्तर लड़ती रहती हैं। हार मानने का नाम नहीं लेती। समुद्र में मणि मुक्तक तो जहाँ तहाँ ही होते हैं, सीपों और घोंघों से ही उसके तट पटे पड़े रहते हैं। बहुसंख्यकों को बुद्धिमान अथवा अनुकरणीय मानना हो तो फिर उद्भिजों की बिरादरी को वरिष्ठता देनी पड़ेगी। यह बहुमत वाला सिद्धान्त मनुष्य समाज पर लागू नहीं हो सकता। श्रेष्ठता ही सदैव जीतती रही है, श्रेय पाती रही है। हमें अपनी दृष्टि नाव के मस्तूल पर, प्रकाश स्तम्भ पर रखनी चाहिए। इस संसार में निकृष्टता है तो श्रेष्ठता भी अनुपलब्ध नहीं है। मात्र दृष्टिकोण ही है, जो हमें उसके दर्शन नहीं करा पाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

Maa Tum Nahi Dikhti Par ho Sari Jagati ka Aadhar



Title

👉 स्वभाव और संस्कार

🔶 जैसा मनुष्य का स्वभाव होता है उसी के अनुरूप उसकी मनोदशा बनती रहती है और जब वही आदत अपने जीवन का अंग बन जाती है तो उसे संस्कार मान लेते हैं। शराब पीना प्रारम्भ में एक छोटी सी आदत दीखती है किन्तु जब वही आदत गहराई तक जक जाती है, तो शराब के सम्बन्ध में अनेकों प्रकार की विचार रेखायें मस्तिष्क में बनती चली जाती हैं जो एक स्थिति समाप्त हो जाने पर भी प्रेरणा के रूप में मस्तिष्क में उठा करती हैं। जैसे कोई कामुक प्रवृत्ति का मनुष्य स्वास्थ्य सुधार या किसी अन्य कारण से प्रभावित होकर ब्रह्मचर्य रहना चाहता है। इसके लिये वह तरह-तरह की योजनायें और कार्यक्रम भी बनाता है तो भी उसके पूर्व जीवन के कामुक विचार उठने से रुकते नहीं और वह न चाहते हुये भी उस प्रकार के विचारों और प्रभाव से टकराता रहता है।

🔷 यह संस्कार जैसे भी बन जाते है वैसा ही मनुष्य का व्यवहार होगा। यहाँ यह न समझना चाहिये कि यदि पुराने संस्कार बुरे पड़ गये हैं, विचारों में केवल हीनता भरी है, तो मनुष्य सद्व्यवहार नहीं कर सकता। यदि पूर्व जीवन के कुसंस्कार जीवन सुधार में किसी प्रकार का रोड़ा अटकाते है तो भी हार नहीं माननी है। चूँकि अब तक अच्छे कर्म नहीं किये थे इसलिये यह पुराने कुविचार परेशान करते हैं किन्तु यदि अब विचार और व्यवहार में अच्छाइयों का समावेश करते हैं तो यही एक दिन हमारे लिए शुभ संस्कार बन जायगा। तब यदि कुकर्मों की ओर बढ़ना चाहेंगे तो एक जबर्दस्त प्रेरणा अन्तःकरण में उठेगी और हमें बुरे रास्ते में भटकने से बचा लेगी।

🔶 महर्षि वाल्मीकि, सन्त तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका, अजामिल आदि अनेकों कुसंस्कारों में ग्रसित व्यक्ति भी जब सन्मार्ग पर चलने लगे तो उनका जीवन पुण्यमय, प्रकाशमय बन गया। मनुष्य संस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह असम्भव नहीं है। मनुष्य के विचार गीली मिट्टी और संस्कार उस मिट्टी से बने बर्तन के समान होते है। पिछले कुसंस्कारों का बड़ा तोड़कर नये विचारों की मिट्टी से नव-जीवन घट का निर्माण कर सकते हैं। इसमें राई-रत्ती भर भी सन्देह न करना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.12

👉 आज का सद्चिंतन 26 June 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 June 2018


👉 संत की चिन्ता

🔶 एक नगर मे एक संत चिन्ता मे खोये हुये थे! संसारी का रोना स्वार्थ का होता है उसकी चिन्ता अपने स्वार्थ के लिये होती है पर सच्चे संत का रोना और उनकी चिन्ता परमार्थ के लिये होती है !

🔷 एक नगर के बाहर एक सन्त रहते थे कई व्यक्ति वहाँ आया जाया करते थे और वहाँ सच्चे जिज्ञासु भी अक्सर वहाँ आया जाया करते थे! अनेक लोग आते और केवल अपने दुखों का रोना रोते और चले जाते! एक दिन सन्त श्री नगर भ्रमण गये और वापस आकर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गये और बड़ी चिन्ता मे डुबे हुये गहरे चिन्तन मे खोये हुये थे इतनी चिन्ता मे खोये हुये थे की उनके सामने अनेक व्यक्ति और जिज्ञासु का दल आकर बैठ गया पर उन्हे पता न चला! फिर सहसा उनकी द्रष्टि उनपर पड़ी!

🔶 जिज्ञासु दल - क्या हुआ नाथ आप ऐसी कौनसी चिन्ता मे खोये हुये थे?

🔷 सन्त श्री - हॆ वत्स जब महानगर को देखा तो उसकी हालत देखकर बड़ा दुःख हो रहा है! चारों तरफ आग लगी हुई है!

🔶 जिज्ञासु - कैसी आग हॆ नाथ?

🔷 सन्त श्री - आग लगी है चारो तरफ़ कुसंस्कारों की , अंधी दौड़ की, अश्लीलता की, मूर्खतापूर्ण देखादेखी की, कामवासना की और आसूरी शक्तियां छाई हुई है चारो तरफ समझदार समझ जायेगा आग से बच जायेगा पर मुर्ख और कुतर्की आग मे जलकर राख हो जायेंगे मिट्टी मे मिलकर खाक हो जायेंगे!

🔶 साधक - तो हम क्या करें देव?

🔷 संत श्री - अपना कर्तव्य निभाओ और आपका पहला कर्तव्य है की आप अधिक से अधिक को इस आग से बचाओ दूसरा कर्तव्य है की आसपास के लोगों को बचाओ और कोई न सुने तो कम से कम अपने आपको तो इस आग से बचाओ!

🔶 जिज्ञासु - कैसे बचाये हॆ नाथ इस भयंकर ज्वाला से?

🔷 संत श्री - भक्तिरूपी नियमित साधना की चादर ओढ़ लो वत्स और साधना की चादर अधिक से अधिक लोगों को ओढाओ और और मुर्ख और कुतर्की न ओढ़े तो कम से कम तुम तो अपने आप को नियमित-साधना की चादर से अपने आपको बचाओ! और एक बात याद रखना वत्स ये आग बड़ी भयंकर है जो दिख रही है समझ भी रहे है पर अपनो कुतर्कों की वजह से और धर्म व संत की अवहेलना करने की वजह वो इस आग मे जल रहे है!

🔶 सभ्यता और मर्यादाओं का उल्लंघन पे उल्लंघन किये जा रहे है बार बार समझा रहे है की सच्ची शान्ति चाहते हो तो धर्म वृक्ष की छाँव मे मर्यादा से बैठ जाओ! अब जो मान लेगा तो कल्याण हो जायेगा और जो नही मानेगा उन्हे फिर भयंकर दूरगामी परिणाम भोगने पडेंगे!

🔷 इसलिये ईश्वर से यही प्रार्थना करना की हॆ नाथ ऐसी बुद्धि देना की मैं आपको भूलु नही और यदि एक को याद रख लिया और बाकी को भुल भी गये तो कोई दिक्कत नही और यदि सब को याद रख के उस एक को भुला दिया तो कोई मतलब नही !

सोमवार, 25 जून 2018

👉 आज का सद्चिंतन 25 June 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 June 2018


👉 साधना

🔷 जो तपेगा वो गलेगा, जो गलेगा वो ढलेगा, जो ढलेगा वो बनेगा, जो बनेगा वो मिटेगा और जो मिटेगा बस वही रहेगा! अर्थात जो परमार्थ के लिये अपने आपको निजी स्वार्थ को मिटा देगा बस वही अमर रहेगा

🔶 एक नगर से दो योजन की दुरी पर एक आश्रम बना हुआ था एक महात्मा जी और उनके कुछ शिष्य वहाँ रहते थे! महात्मा जी रोज तप हवन और सत्संग किया करते थे और शिष्य नगर से भिक्षा लेकर आते थे कुछ शिष्य तप करते पर कुछ नही करते थे महात्मा जी बार बार समझाते थे की शिष्यों बिना तप के कुछ नही मिलेगा इसलिये जीवन मे तप जरूरी है!

🔷 एक दिन कुछ शिष्यों ने कहा की हॆ देव आखिर तप से होगा क्या और आप हमें सिद्ध कर के बताये तो महात्मा जी ने कहा ठीक है आज से आप सात दिन तक बिल्कुल निराहार रहोगे केवल जल ग्रहण करोगे फिर सात दिन बाद आप को अपने आप पता चल जायेगा की साधना क्यों जरूरी है!

🔶 सात दिन बाद सभी की हालत मरे हुये बैल की तरह हो गई अब महात्मा जी ने कहा जाओ नगर से भोजन लेकर आओ तो सभी ने कहा की देव हमारे शरीर मे इतना सामर्थ्य नही है की हम वहाँ तक जाकर आ सके! तो महात्मा जी ने कहा अब पता चला की साधना क्यों जरूरी है अरे वत्स शक्तिहीन को यहाँ कोई नही पूछता है इस सत्य को स्वीकार करो वत्स और समझो जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी समझो की शक्ति है तो कोई मूल्य है शक्ति न होगी तो हर कोई गली बाड की तरह कुचल कर चला जायेगा!

🔷 गली बाड की तरह मत रहना अपने आप को मजबुत बाड की तरह बनाना ताकी हर कोई तुम्हे कुचल कर न जायें!  जैसै रोटी जरूरी है तन की समर्थता के लिये वैसे ही साधना बहुत जरूरी है मन की समर्थता के लिये! और जो साधना करेगा वही आगे की यात्रा आनंदपूर्ण कर पायेगा तो उठो और साधो इस जीवन को क्योंकि बिना साधना के कुछ भी नही है तो लो सद्गुरु का आशीर्वाद और चलिए साधना के मार्ग पर और साधो इस जीवन को क्योंकि जो साधेगा वही जगेगा और जो जागेगा वही कुछ पायेगा नही तो जैसै आया है वैसे ही चला जायेगा!

🔶 जीवन में बिना तपे कुछ भी नही मिलता है और बिना त्याग और समर्पण के कुछ भी नही है! धरती बिना तपे अनाज नही देती है दुध भी तभी घी देता है जब वो अग्नि में अपने आपको तपाता है।

🔷 किसी पदधारी से पुछना की उसने कितनी मेहनत की होगी तब जाकर उसे कॊई पद मिला होगा! जो अपने जीवन का तनिक भी मूल्य समझेगा वो इस जीवन में अपना कॊई न कॊई लक्ष्य जरूर बनायेगा और यदि उसने कॊई लक्ष्य बना लिया तो फिर वो साधना जरूर करेगा।

जो साधना करेगा वो जीवन को साधेगा
जो जीवन को साधेगा वो तपेगा
जो तपेगा वो गलेगा
जो गलेगा वो ढलेगा
जो ढलेगा वो बनेगा
जो बनेगा वो मिटेगा
और जो मिटेगा
बस वही रहेगा !!

🔶 सब की अपनी अपनी रणभूमि है वत्स और सब का अपना अपना लक्ष्य और जो अपने लक्ष्य के प्रति जितना ईमानदारी से चलेगा वो उतना ही लाभ में रहेगा!

🔷 इसलिये ये याद रखना की साधना जरूरी ही नही बहुत जरूरी है! और परमार्थ के लिये अपने निहित-स्वार्थ को त्यागना!

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 2)

🔷 यह मान्यता अनगढ़ों की है कि वैभव के आधार पर ही समुन्नत बना जा सकता है, इसलिए उसे हर काम छोड़कर हर कीमत पर अर्जित करने में अहर्निश संलग्न रहना चाहिए। सम्पन्नता से मात्र सुविधाएँ खरीदी जा सकती है और वे मात्र मनुष्य के विलास, अहंकार का ही राई रत्ती समाधान कर पाती है। राई रत्ती का तात्पर्य है, क्षणिक तुष्टि। उतना जितना कि आग पर ईंधन डालते समय प्रतीत होता है कि वह बुझ चली। किन्तु वह स्थिति कुछ ही समय में बदल जाती है और पहले से भी अधिक ऊँची ज्वालाएँ लहराने लगती हैं। दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने में वैभव काम आ सकता है। दर्प दिखाने, विक्षोभ उभारने के अतिरिक्त उससे और कोई बड़ा प्रयोजन सधता नहीं है। अनावश्यक संचय के ईर्ष्या द्वेष से लेकर दुर्व्यसनों तक के अनेकानेक ऐसे विग्रह खड़े होते है, जिन्हें देखते हुए कई बार तो निर्धनों की तुलना में सम्पन्नों को अपनी हीनता अनुभव करते देखा गया है।

🔶 उत्कृष्टता के आलोक की आभा यदि अन्तराल तक पहुँचे तो व्यक्ति को नए सिरे से सोचना पड़ता है और अपनी दिशाधारा का निर्धारण स्वतन्त्र चिन्तन एवं एकाकी विवेक के आधार पर करना पड़ता है। प्रस्तुत जन समुदाय द्वारा अपनायी गयी मान्यताओं और गतिविधियों से इस प्रयोजन के लिए तनिक भी सहायता नहीं मिलती। वासना, तृष्णा के लिए मरने खपने वाले नर पामरों की तुलना में अपना स्तर ऊँचा होने की अनुभूति होते ही परमार्थ के लिए मात्र दो ही मनीषियों का आश्रय लेना पड़ता है, इनमें से एक को आत्मा दूसरे को परमात्मा कहते हैं। इन्हीं को ईमान और भावना भी कहा जा सकता है। उच्चस्तरीय निर्धारणों में इन्हीं का परामर्श प्राप्त होता है।

🔷 व्यामोह ग्रस्त तो ‘कोढ़ी और संघाती चाहे’ वाली बात ही कर सकते हैं। नरक में रहने वालों को भी साथी चाहिए। अस्तु वे संकीर्ण स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में उन्हीं की तरह बुलबुलाते रहने में ही सरलता, स्वाभाविकता देखते हैं। तदनुसार परामर्श भी वैसा ही देते हैं, आग्रह भी वैसा ही करते हैं। इस रस्साकशी में विवेक का कर्तव्य है कि औचित्य का समर्थन करें। अनुचित के लिए मचलने वालों की बालबुद्धि को हँसकर टाल दें। गुड़ दे सकना सम्भव न हो तो, गुड़ जैसी बात कहकर भी सामयिक संकट को टाला जा सकता है। लेकिन बहुधा ऐसा होता नहीं। निकृष्टता का अभाव सहज ही मानव को अपनी ओर खींचता है। इसका निर्धारण स्वयं औचित्य, विवेक के आधार पर करना होता है।

🔶 निषेधात्मक परामर्शों को इस कान सुनकर दूसरे कान से निकाल देना अथवा ऐसा परामर्श देने वाले व्यक्ति के चिन्तन का परिष्कार करना भी एक ऐसा प्रबल पुरुषार्थ है, जो बिरलों से ही बन पड़ता है। लेकिन यह संभव है क्योंकि मानवी गरिमा उसे सदा ऊँचा उठने, ऊँचा ही सोचने का संकेत करती है। कौन, कितना इस पुकार को सुन पाता है, यह उस पर, उसकी मन की संरचना, अन्तश्चेतना पर निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 True knowledge

🔷 Once upon a time, there lived an erudite man in a town. He has studied a vast range of scholarly works. He used to feel proud of his scholastic and intellectual attainments. Whether it was day time or night, he used to walk with a lighted lamp in his hand. If asked about this peculiar habit, he would arrogantly reply- “There is darkness everywhere in the world. I walk with this lamp so that there could be some light”.

🔶 Once this arrogant scholar came across a saint. The saint started laughing when he saw the scholar with the lighted lamp and said-“My friend, if your eyes are not blind of the ever shining sun then don’t tell that there is darkness around the wourld. What will this tiny lamp of yours add to the limitless glow of the sunlight? Where does the light of your knowledge stand before the the infinite knowledge of the Omniscient? If possible, try to know this simple fact that true knowledge can’t be attained just by reading and cramming tonnes of books and treatises. True knowledge comes through the realization of the indwelling light of everywhere present Divinity.

📖 From Pragya Puran

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 3)

🔷 वैर पुरानी जीर्ण मानसिक बीमारी है, क्रोध तत्कालीन और क्षणिक प्रमाद है। क्रोध में पागल होकर हम सोचने का समय नहीं देखते, वैर उसके लिए बहुत समय लेता है। क्रोध में अस्थिरता, क्षणिकता, तत्कालीनता, बुद्धि का कुँठित हो जाना, उद्विग्नता, आत्म रक्षा, अहं की पुष्टि असहिष्णुता, दूसरे को दंडित करने की भावनाएं संयुक्त हैं। वैर में सोचने समझने प्रतिशोध लेने का समय होता है। हम अच्छी तरह सोचते हैं, कुछ समय लेते है और तब बदला लेते हैं। पं. रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “दुःख पहुँचने के साथ ही दुःखदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा करने वाला मनोविचार क्रोध और कुछ काल बीत जाने पर प्रेरणा करने वाला भाव वैर है, किसी ने आपको गाली दी यदि आपने उसी समय उसे मार दिया तो आपने क्रोध किया। मान लीजिए कि वह गाली देकर भाग गया और दो महीने बाद आपको मिला। अब यदि आपने उससे बिना फिर गाली सुने, मिलने के साथ ही उसे मार दिया तो यह आपका वैर निकालना हुआ।”

🔶 वैर में धारणा शक्ति अर्थात् भावों को संचित कर मन में रोक रखने की शक्ति की आवश्यकता होती है। जिन प्राणियों में पुराने क्रोध का संचित रखने की शक्ति विद्यमान हैं, वे ही वैर कर सकते हैं। क्रोध तो पशु, पक्षी, मनुष्य, अर्थात् सभी प्राणियों को अस्थिर और पागल करने में पूर्ण समर्थ है किन्तु वैर यह कार्य नहीं कर सकता। वैर में स्थायित्व है।
क्रोध की मात्रा कम या अधिक, तेज या हलकी हो सकती है। चिड़चिड़ाहट क्रोध का हलका रूप है। साधारण भूलों या मामूली खराबियों, कमजोरियों या भद्दी बातों पर हम उद्विग्न तो होते हैं पर यह उग्रता उतनी तेज नहीं होती। थोड़ी देर रह कर शान्त हो जाती है। कभी हम अन्य किन्हीं कारणों से परेशान रहते हैं, कुछ अप्रिय हो जाने से दुःखी होते हैं, ऐसी मनोदशा में साधारण सी बात होते ही हम चिड़चिड़ा उठते हैं।

🔷 चिड़चिड़ाहट में सामान्य कारण ही उद्विग्नता उत्पन्न करने में समर्थ हैं। वह एक मानसिक दुर्बलता है जो अनेक कारणों से उत्पन्न हो सकती हैं। जिस व्यक्ति को पुनः पुनः डराया, धमकाया, या अधिक कार्य लिया जाय, क्रोध के अधिक अवसर प्राप्त हों और मन शान्त दशा में न आ सके, तो क्रोध स्वभाव का एक अंग बन जाता हैं। यह फिर जरा जरा सी असुविधा या कठिनाई में हलके रूप में प्रकाशित हुआ करता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 16

👉 संयम की शक्ति

🔷 संयमित जीवन चर्या के अभाव में योग दुष्प्राप्य है, स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुषों को ही इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। सुख और विषय वासना के प्रलोभन में फँस कर ही प्रायः पथ भ्रष्ट होते है।

🔶 संयम से जो शक्ति पैदा होती है वह चरित्र का आधार है। वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि तत्वों का सीधा सम्बन्ध मनोभावों से है। विचार अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित हों तो कर्म भी असंयत ही होंगे। अगर हमारा मन सुमार्गगामी रहकर इन्द्रियों को संयम में रखें तो समस्त साँसारिक कार्यों को करते हुए भी हम सद्गति के अधिकारी बन सकते है।

🔷 महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है। इस संसार में हजारों लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपनी स्थिति से भी गई-गुजरी हालत में जीवनयापन करते हैं। उनके उत्थान के लिये कुछ कर गुजरने वाले व्यक्ति ही महान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

🔶 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 9

रविवार, 24 जून 2018

👉 मुगलों के छक्के छुड़ाने वाली ऐसी थी यह रानी

आज ही के दिन यानी 24 जून, 1564 को रानी दुर्गावती का निधन हुआ था। 5 अक्टूबर, 1524 को प्रसिद्ध चंदेल राजा कीर्ति सिंह चंदेल के घर जन्मीं रानी दुर्गावती ने मुगलों से जमकर लोहा लिया लेकिन मुगलों की विशाल सेना के सामने ज्यादा दिनों तक उनका प्रतिरोध नहीं चला और 24 जून, 1564 को जब उनको हार करीब महसूस हुई तो आत्म बलिदान दे दिया।

🔷 परिचय
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर,1524 को महोबा में हुआ था। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईस्वी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुंदरता के कारण उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गई। दुर्गावती के पिता महोबा के राजा थे। रानी दुर्गावती सुंदर, सुशील, विनम्र, योग्य एवं साहसी लड़की थी। बचपन में ही उनको वीरतापूर्ण एवं साहस भरी कहानियां सुनना व पढ़ना अच्छा लगता था। पढ़ाई के साथ-साथ दुर्गावती ने घोड़े पर चढ़ना, तीर तलवार चलाना, अच्छी तरह सीख लिया था। शिकार खेलना उसका शौक था। वह अपने पिता के साथ शिकार खेलने जाया करती थीं। पिता के साथ वह शासन का कार्य भी देखती थीं।

​🔶 विवाह
1542 में दुर्गावती का विवाह गोंड साम्राज्य के संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह के साथ कराया गया। शादी के कुछ वर्षों बाद दुर्गावती को एक बेटा हुआ जिसका नाम वीर नारायण रखा। बेटे के जन्म के कुछ समय बाद ही राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई।

​🔷 जब शेर को मार गिराया

गढ़मंडल के जंगलो में उन दिनों एक शेर ने आतंक मचा रखा था। शेर के आतंक का शिकार कई जानवर बन चुके थे। जब रानी तक यह खबर पहुंची तो वह शेर को मारने निकल पड़ीं। दिन भर की खोज के बाद शाम में एक झाड़ी में शेर दिखाई दिया। रानी ने एक ही वार में शेर को मार दिया। उनके अचूक निशाने को देखकर सैनिक हैरान रह गए।

​🔶 पति की मौत के बाद संघर्ष
पति की मौत के बाद गोंड साम्राज्य पर आधिपत्य को लेकर चल रही राजनीति की आहट पाकर रानी ने स्वयं को गोंडवाना की महारानी घोषित कर दिया। 1550 में वह गोंडवाना की रानी बनीं और 1564 तक रानी रहीं। एक महिला ने जब राज्य की सत्ता का संचालन अपने हाथों में लिया तो आसपास के राज्यों के पुरुषवादी शासक काफी प्रसन्न हो गए। उनको आशा थी कि महिला होने के नाते गोंड साम्राज्य पर कब्जा करने के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

🔷 बाज बहादुर को हरायामालवा गणराज्य के शासक बाज बहादुर ने इसी सोच के साथ गोंडवाना पर हमला किया लेकिन बाज बहादुर की सोच गलत साबित हुई और उसे रानी दुर्गावती ने करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही रानी दुर्गावती का यश चारों ओर फैल गया।

​🔶 मुगलों का डटकर मुकाबला किया
मुगल सूबेदार ने रानी दुर्गावती से अकबर की अधीनता स्वीकार करने को कहा। आसफ खां ने समझा कि दुर्गावती महिला है, अकबर के प्रताप से भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर देगी. परन्तु रानी दुर्गावती को अपनी योग्यता, साधन और सैन्य शक्ति पर इतना विश्वास था कि उसे अकबर की सेना के प्रति भी कोई भय नहीं था। रानी दुर्गावती के मंत्री ने आसफ खान की सेना और सज्जा को देखकर युद्ध न करने की सलाह दी।

रानी दुर्गावती ने उसे जवाब भिजवाते हुए कहा, 'कलंकित जीवन जीने की अपेक्षा शान से मर जाना अच्छा है। आसफ खान जैसे साधारण सूबेदार के सामने झुकना लज्जा की बात है। रानी सैनिक के वेश में घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ी। रानी को सैनिक के वेश में देखकर आसफ खान के होश उड़ गये। रणक्षेत्र में रानी के सैनिक उत्साहित होकर शत्रुओ को काटने लगे। रानी भी शत्रुओ पर टूट पड़ी। देखते ही देखते दुश्मनो की सेना मैदान छोड़कर भाग निकली। आसफ खान बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचाने में सफल हुआ।

आसफ खान की बुरी तरह हार सुनकर अकबर बहुत लज्जित हुआ। डेढ़ वर्ष बाद उसने पुनः आसफ खान को गढ़मंडल पर आक्रमण करने भेजा। रानी तथा आसफ खान के बीच घमासान युद्ध हुआ। तोपों का वार होने पर भी रानी ने हिम्मत नहीं हारी। रानी हाथी पर सवार सेना का संचालन कर रही थी। उन्होंने मुग़ल तोपचियों का सिर काट डाला। यह देखकर आसफ खान की सेना फिर भाग खड़ी हुई। दो बार हारकर आसफ खान लज्जा और ग्लानी से भर गया।

🔷 अंत समय
24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। रानी ने अपने पुत्र के नेतृत्व में सेना भेजकर स्वयं एक टुकड़ी का नेतृत्व संभाला। दुश्मनों के छक्के छूटने लगे। उसी बीच रानी ने देखा कि उसका 15 का वर्ष का पुत्र घायल होकर घोड़े से गिर गया है। रानी विचलित न हुई।

उसी सेना के कई वीर पुरुषो ने वीर नारायण को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया और रानी से प्रार्थना की कि वे अपने पुत्र का अंतिम दर्शन कर ले। रानी ने उत्तर दिया- यह समय पुत्र से मिलने का नहीं है। मुझे ख़ुशी है कि मेरे वीर पुत्र ने युद्ध भूमि में वीर गति पाई है. अतः मैं उससे देवलोक में ही मिलूंगी।

रानी दुर्गावती ने लगभग 16 वर्षो तक संरक्षिका के रूप में शासन किया। भारत के इतिहास में रानी दुर्गावती और चाँदबीबी ही ऐसी वीर महिलाएं थी जिन्होंने अकबर की शक्तिशाली सेना का सामना किया तथा मुगलों के राज्य विस्तार को रोका। अकबर ने अपने शासन काल में बहुत सी लड़ाईयां लड़ी किन्तु गढ़मंडल के युद्ध ने मुग़ल सम्राट के दांत खट्टे कर दिए।

रानी दुर्गावती में अनेक गुण थे। वीर और साहसी होने के साथ ही वे त्याग और ममता की मूर्ति थी। राजघराने में रहते हुए भी उन्होंने बहुत सादा जीवन व्यतीत किया। राज्य के कार्य देखने के बाद वे अपना समय पूजा – पाठ और धार्मिक कार्यो में व्यतीत करती थी।

भारतीय नारी की वीरता तथा बलिदान की यह घटना अमर रहेगी।

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग 1)

🔶 समुद्र में जब तक बड़े ज्वार-भाटे उठते रहते हैं तब तक उस पर जलयानों का ठीक तरह चल सकना सम्भव नहीं होता। रास्ता चलने में खाइयाँ भी बाधक होती हैं और टीले भी। समतल भूमि पर ही यात्रा ठीक प्रकार चल पाती है। शरीर न आलसी, अवसाद ग्रस्त होना चाहिए और न उस पर चंचलता, उत्तेजना चढ़ी रहनी चाहिए। मनःक्षेत्र के सम्बन्ध में भी यही बात है, न उसे निराशा में डूबा रहना चाहिए और न उन्मत्त, विक्षिप्तों की तरह उद्वेग से ग्रसित होना चाहिये। सौम्य सन्तुलन ही श्रेयस्कर है। दूरदर्शी विवेकशीलता के पैर उसी स्थिति में टिकते हैं।

🔷 उच्चस्तरीय निर्धारण इसी स्तर की मनोभूमि में उगते-बढ़ते और फलते फूलते है। पटरी औंधी तिरछी हो तो रेलगाड़ी गिर पड़ेगी। वह गति तभी पकड़ती है, जब पटरी की चौड़ाई-ऊँचाई का नाप सही रहे। जीवन-क्रम में सन्तुलन भी आवश्यक है। उसकी महत्ता पुरुषार्थ, अनुभव, कौशल आदि से किसी भी प्रकार कम नहीं है। आतुर, अस्त-व्यस्त, चंचल, उद्धत प्रकृति के लोग सामर्थ्य गँवाते रहते हैं। वे उस लाभ से लाभान्वित नहीं हो पाते जो स्थिर चित्त, संकल्पवान्, परिश्रमी, दूरदर्शी और सही दिशाधारा अपना कर उपलब्ध करते हैं। स्थिरता एक बड़ी विभूति है। दृढ़ निश्चयी धीर-वीर कहलाते हैं। वे हर अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में अपना संतुलन बनाये रहते है। महत्त्वपूर्ण निर्धारणों के कार्यान्वित करने और सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए मनःक्षेत्र को ऐसा ही सुसन्तुलित होना चाहिए।

🔶 निराशा स्तर के अवसाद और क्रोध जैसे उन्माद आवेशों से यदि बचा जा सके तो उस बुद्धिमानी का उदय हो सकता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्रज्ञा कहते और जिसे भाग्योदय का सुनिश्चित आधार माना जाता है। ऐसे लोगों का प्रिय विषय होता है उत्कृष्ट आदर्शवादिता। उन्हें ऐसे कामों में रस आता है, जिनमें मानवी गरिमा को चरितार्थ एवं गौरवान्वित होने का अवसर मिलता हो। भविष्य उज्ज्वल होता हो और महामानवों की पंक्ति में बैठने का सुयोग बनता हो। इस स्तर के विभूतिवान बनने का एक ही उपाय है कि चिन्तन को उत्कृष्ट और चरित्र, कर्तृत्व से आदर्श बनाया जाय। इसके लिए दो प्रयास करने होते है, एक संचित कुसंस्कारिता का परिशोधन उन्मूलन। दूसरा अनुकरणीय अभिनन्दनीय दिशाधारा का वरण, चयन। व्यक्तित्वों में उन सत्प्रवृत्तियों का समावेश करना होता हैं जिनके आधार पर ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। कहना न होगा कि गुण, कर्म, स्वभाव की विशिष्टता ही किसी को सामान्य परिस्थितियों के बीच रहने पर भी असामान्य स्तर का वरिष्ठ अभिनन्दनीय बनाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 महानता की प्राप्ति और उसके साधन

🔶 महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

🔷 ईश्वर महान् है, इसलिए उसकी उपासना भी हमारी महानता को बढ़ाने में सहायक होती है। आवश्यक है कि जिसे महान बनने की आकाँक्षा हो, वह ईश्वर का प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

🔶 ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। भावनाओं में प्रेम का स्थान सर्वोपरि है। प्रेम को ही भक्ति कहते हैं। भक्ति से भगवान प्राप्त किया जाता है ऐसा शास्त्रकारों का मत है। भक्ति भावना बढ़ाने का अभ्यास किसी न किसी माध्यम से किया जाता है। माता, पिता, पत्नी, पुत्र या मित्र को माध्यम बनाने में एक कठिनाई यह होती है कि इनके साथ अपना व्यावहारिक सम्बन्ध होने से कभी-कभी प्रतिकूल भावनायें भी उठ पड़ती हैं। इनमें ज्ञान, विद्या, सदाचार, दिव्य दृष्टि सात्विकता तथा निःस्वार्थता की भावनायें भी अल्प मात्रा में होने से वैसे आदर्श अपने जीवन में भी उपस्थित नहीं हो पाते अतएव गुरु-भक्ति या ईश्वर भक्ति के माध्यम से अपनी महानता के विकास का प्रारम्भ करते हैं। इस भक्ति रूपिणी साधना से आध्यात्मिक भावनाओं का तेजी से विकास होने लगता है इसलिए हमारे धर्म और संस्कृति में उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।

🔷 उन्नति और उत्थान के लिये दूसरे साधनों में “स्वाध्याय और सत्संग” को अधिक फलदायक और सुविधाजनक मानते हैं। स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 8

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.8

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 June 2018

👉 आज का सद्चिंतन 24 June 2018


👉 ध्यान

🔶 “गम्भीर ध्यान में बाह्यज्ञान शून्य होता है। एक व्याध ने चिड़िया मारने के लिए ऐसी टकटकी बाँध रक्खी थी कि कोई बारात कहीं से जा रही थी, साथ ही कितने लोग, कितने बाजे गाजे, कितनी सवारियाँ और कितने ही घोड़े भी थे, कितनी देर तक उसके ही पास होकर वे चले गये, किन्तु व्याध को कोई होश नहीं, वह नहीं जान सका कि- उसके पास होकर एक बारात चली गई।”

🔷 एक व्यक्ति अकेले एक पोखर से मछली पकड़ रहा था। (उसके हाथ में बन्शी थी।) बहुत देर बाद (उसकी बन्शी की, पानी के ऊपर रहने वाली, छोटी) लकड़ी हिलने लगी और जरा-जरा डूबने लगी। वह तब बन्शी को हाथ से भली-भाँति पकड़ (मछली को) मारने के लिये तैयार हुआ। इतने में एक पथिक (राहगीर) ने पास आकर पूछा- ‘महाशय, अमुक बनार्जी का मुकाम कहाँ पर है, आप कह सकते हैं?’ (प्रश्न का) कोई जवाब नहीं मिला। यह व्यक्ति उस समय बन्शी को हाथ में लेकर उसे खींचने को तैयार हो रहा था।

🔶 पथिक बार-बार जोर से कहने लगे- ‘महाशय, आप कह सकते हैं, अमुक बनार्जी साहब का घर कहाँ पर है?’ उस (मछली पकड़ने वाले) व्यक्ति को होश नहीं था। उसका हाथ काँप रहा था नजर केवल ‘फतना’ (वंशी की लकड़ी) पर थी। तब पथिक विमुख होकर चला गया। पथिक चला गया कि इतने में (बन्शी की) लकड़ी भी डूब गई। उस व्यक्ति ने खींचकर मछली को जमीन पर उठाया। बाद को अंगोछे से मुँह पोंछ कर वह पुकार कर पथिक को बुलाने लगा कि- अहे! सुनो, सुनो। पथिक लौटने को राजी नहीं थे, किन्तु बहुत (बढ़ बढ़ कर) पुकारने से वे लौट आये। आकर उन्होंने पूछा- ‘क्या महाशय, फिर क्यों बुलाते हो?’ तब उस व्यक्ति ने कहा- ‘तुम हमसे क्या कह रहे थे?’ पथिक ने कहा- ‘उस समय कितनी बार पूछा, और अब कह रहे हो कि क्या पूछा था!’ उस व्यक्ति ने कहा- ‘उस समय तो लकड़ी डूब रही थी (और मछली बन्शी में पकड़ाई जा रही थी, इसी कारण मुझे उस समय कुछ भी सुनने में नहीं आया।”

🔷 “ध्यान में इस भाँति की एकाग्रता हुआ करती है और कुछ देखा भी नहीं जाता है और सुना भी नहीं जाता। स्पर्श का (छूने का) बोध तक भी नहीं होता है। सर्प शरीर के ऊपर होकर चला जाता है, उसे भी मालूम नहीं होता। जो ध्यान करता हो वह भी नहीं जानता है (कि- एक सर्प अपने शरीर पर से चला गया) और सर्प भी जान नहीं सकता है (कि वह एक मनुष्य के शरीर के ऊपर होकर चला गया)”

🔶 रामकृष्ण परमहंस

शनिवार, 23 जून 2018

👉 "आओ करें गुरु को हृदयंगम"

🔷 स्वयं में आपको समहित हम कर सकें.......
गुरुवर ज्यादा नहीं आपके चरणों के धूल भी हम बन सकें......
कुछ ऐसा प्रयास करने की प्रेरणा मिल सके........
आपको हृदयंगम करने की जागृति यदि मिले......
हम कुरीतियों से लड़ सके..........

🔶 न मधुमास चाहिए......
न ही प्रसिद्धि अगाध चाहिए......
कठिन से कठिन परिस्थिति में बस आपका साथ चाहिए........
करते हैं आज ,आपको स्वयं को अर्पण...........
शायद इसे ही कहते हैं समर्पण......

🔷 चरणों में सफलता का आभाष हो न हो...........
आपके आंखों में खुशी देख सकें,
वो छोटे छोटे कृत्यों को करने का
अनुराग हमें हो.......
नभ को छूने की चाह नहीं......
पर धरती पर ही नभ को उतारने का विश्वास हमें हो.......

🔶 हम क्या थे.........
यह मात्र आप जानते हैं......
हमें पारश बनने का आप आश्वासन देते हैं..........
अपने प्रज्ञा पुत्र पुत्रियों को आराधक कहते हो......
हम आपके हैं और आप हमारे.....
यह विश्वास हमें चाहिए......
गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें
 वह अनुशासन हम बांध सकें.....
आपके बलिदानों का मान हम रख सकें.......
वह आस हमें चाहिए.......
आपको दुबारा सशरीर पाने के लिए.......
हम गुरुवर आपको हृदयंगम कर सकें.......
वो निष्ठा हमें दे दीजिए......

👉 आज का सद्चिंतन 23 June 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 June 2018