सोमवार, 25 जून 2018

👉 संयम की शक्ति

🔷 संयमित जीवन चर्या के अभाव में योग दुष्प्राप्य है, स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुषों को ही इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। सुख और विषय वासना के प्रलोभन में फँस कर ही प्रायः पथ भ्रष्ट होते है।

🔶 संयम से जो शक्ति पैदा होती है वह चरित्र का आधार है। वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि तत्वों का सीधा सम्बन्ध मनोभावों से है। विचार अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित हों तो कर्म भी असंयत ही होंगे। अगर हमारा मन सुमार्गगामी रहकर इन्द्रियों को संयम में रखें तो समस्त साँसारिक कार्यों को करते हुए भी हम सद्गति के अधिकारी बन सकते है।

🔷 महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है। इस संसार में हजारों लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपनी स्थिति से भी गई-गुजरी हालत में जीवनयापन करते हैं। उनके उत्थान के लिये कुछ कर गुजरने वाले व्यक्ति ही महान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

🔶 मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 9

👉 साधना- अपने आपे को साधना (अन्तिम भाग)

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