गुरुवार, 31 अगस्त 2017

👉 दोष तो अपने ही ढूँढ़ें

🔵 दोष दृष्टि रखने से हमें हर वस्तु दोषयुक्त दीख पड़ती है। उससे डर लगता है, घृणा होती है। जिससे घृणा होती है, उसके प्रति मन सदा शंकाशील रहता है, साथ ही अनुदारता के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति या वस्तु से न तो प्रेम रह सकता है और न उसके गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना ही सम्भव रहता है।
दोष दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे हर वस्तु बुरी, हानिकारक और त्रासदायक दीखने लगती है। उसकी दुनियाँ में सभी विराने, सभी शत्रु और सभी दुष्ट होते है। ऐसे व्यक्ति को कहीं शान्ति नहीं मिलती।

🔴 दूसरों की बुराइयों को ढूँढ़ने में, चर्चा करने में जिन्हें प्रसन्नता होती है वे वही लोग होते हैं जिन्हें अपने दोषों का पता नहीं है। अपनी ओर दृष्टिपात किया जाय तो हम स्वयं उनसे अधिक बुरे सिद्ध होंगे, जिनकी बुराइयों की चर्चा करते हुये हमें प्रसन्नता होती है। दूसरों के दोषों को जिस पैनी दृष्टि से देखा जाता है। यदि अपने दोषों का उसी बारीकी से पता लगाया जाय तो लज्जा से अपना सिर झुके बिना न रहेगा और किसी दूसरे का छिद्रान्वेषण करने की हिम्मत न पड़ेगी

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (अंतिम भाग)

🔵 यदि सचमुच ही विचारशीलता का युग आ रहा है तो नर और नारी दोनों को ही सीधे सादे सौम्य और लगभग एक जैसे कपड़े पहनने चाहिए। इससे दोनों ही वर्गों में समानता का भाव पैदा होगा। नारी सजधज कर जब गुड़िया बनकर निकलती है, अपनी शील अंगों को रंगों से, आकर्षक वस्त्रों तथा उपकरणों से सजाकर निकलती है तो इसका अर्थ यह होता है कि उसने अपने को रमणी-कामिनी के रूप में प्रस्तुत किया। यह नारी का हेय एवं लगभग अश्लील स्वरूप है। प्रगतिशीलता के इस युग में नारी को लगभग नर जैसी सज्जा पर सन्तोष करना होगा। अश्लीलता के विरुद्ध आवाज बुलन्द करते हुए हमें आकर्षक एवं कामुकता भड़काने वाले वस्त्र शृंगार का समापन ही करना चाहिए ताकि नारी के प्रति सहज श्रद्धाभाव बढ़े।

🔴 इरेशम नाइलोन की ऐसी साड़ियां या वस्त्र जिनमें नग्नता ढकने के लिए नीचे दुहरा वस्त्र पहनना पड़े, शालीनता के विपरीत है। वर्षा होने लगे और कपड़े भीग जायें अथवा नदी तालाब आदि में खुला स्नान करना पड़े तो ऐसे वस्त्र लज्जा जनक स्थिति पैदा कर देते हैं, सारा शरीर नंगा दिखने लगता है। कई बार तो वर्षा न होने पर भी महीन वस्त्र पहनने वाले की बेइज्जती करते हैं। वक्षस्थल और कमर भी ऐसे स्थान हैं जिन्हें शील परम्परा के अनुसार ढका रहना चाहिए। जिन वस्त्रों के पहनते ही कटि प्रदेश खुला दीखे उन्हें अश्लीलता की श्रेणी में गिना जा सकता है। वक्षस्थल और उभार ढके रहने के लिए चुनरी ओढ़ने का रिवाज रहा है अब उसके स्थान पर कृत्रिम उभार प्रदर्शित करने वाले झीनी चुनरी पहनना ऐसा है जिन पर दर्शकों की अनायास दृष्टि जाती है और उन अंगों को गोपनीय रखने की परम्परा का उल्लंघन होता है।

🔵 आभूषणों में सभी ऐसे हैं जिन्हें नारी को गुड़िया बनाने की लज्जित स्थिति में ले जाने वाला कहा जा सकता है। विशेषतया नाक कान के बड़े आकार के आभूषण चेहरे को घूर-घूर कर देखने का निमंत्रण देते हैं। होठों का रंगना भी ऐसा ही निमंत्रण है जो मनचले दर्शकों को कामुक दृष्टि से देखने का निमंत्रण देते हैं।

🔵 सादगी सबसे बड़ी शोभा है। विशेषतया जबकि कामुकता की धूम है, लोगों की कुदृष्टि बढ़ रही है। ऐसी सज्जा वाली महिलाओं के सम्बन्ध में अनुपयुक्त मान्यता बनाई जाती है और छेड़खानी की जाती है। शालीनता की माँग यही है कि सादे वस्त्र पहने जाएँ। इसके पहनने वाले का पैसा बचता है। आदर्शवादी पहनाव को देखकर यह अनुमान लगता है कि यहाँ ऐसा मानस तथा निर्धारण है जिसे सौम्य कहा जाय। नर और नारी एक समान का सिद्धान्त जब भी जहाँ भी प्रकट करना होगा तो सजावट वाले कपड़ों और आभूषणों का मोह छोड़ना ही होगा। सौम्य शालीनता एवं आदर्शवादिता के विस्तार के अतिरिक्त यौन संपर्क सम्बन्धी भ्रान्ति निवारण हेतु भी यह अनिवार्य है कि परिधान-मुद्रादि की पवित्रता पर अधिक ध्यान दिया जाए। यह प्रयोजन अनावश्यक प्रतिबन्धों से सम्भव नहीं। इसके लिए तो नर एवं नारी दोनों को स्वेच्छा से सद्भाव की महत्ता समझनी होगी, ताकि वे सौजन्य से साथ रह जीवन शकट चलाते रह सकें एवं प्रगति की दिशा में एक दूसरे के पूरक बन सकें।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 46

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.46

👉 आज का सद्चिंतन 31 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 31 Aug 2017


👉 दूसरे का अहित


🔵 एक मुर्गा और एक कुत्ता एक दूसरे के बहुत अच्छे मित्र थे। एक दिन वे दोनों किसी जंगल से होकर यात्रा कर रहे थे। चलते-चलते अंधेरा छाने लगा। एक बड़ा सा पेड़ देखकर दोनों मित्रों ने आराम से रात काटने की सोची।

🔴 मुर्गे ने कहा- ”भाई कुत्ते! अब मुनासिब सी जगह देखकर आराम करें। ऐसा करते हैं, मैं इस पेड़ पर चढ़कर किसी डाल पर जम जाता हूं। तुम आस-पास ही कहीं मुनासिब जगह देखकर आराम करो।“

🔵 ”ठीक है भाई! तुम पहुंचो अपने ठिकाने पर, मैं तो यहीं कहीं डेरा जमा लेता हूं।“

🔴 मुर्गे ने अपने पंख फड़फड़ाए और पेड़ की एक ऊंची डाल पर जा बैठा और कुत्ता पेड़ के नीचे आराम करने लगा।

🔵 दोनों मित्र रात भर खर्राटे भर कर सोते रहे। जब भोर हो गई तो मुर्गे ने उठकर बांग दी।

🔴 एक लोमड़ी वहीं आस-पास कहीं रहती थी। मुर्गे की बांग की आवाज सुनकर उसकी नींद भी खुल गई। कुछ ही देर बाद लोमड़ी उस ओर चली गई। उसने अपनी नजरें घुमाकर चारों तरफ देखा। तभी उसे पेड़ पर बैठा मुर्गा दिखाई दिया। मुर्गे को देखकर उसके मुंह में पानी भर आया।

🔵 मुर्गा उसकी पहुंच से बाहर था, इसलिए वह बहुत होशियारी से पेड़ के चारों और चक्कर काटने लगी। वह सोच रही थी कि अपने शिकार को पाने के लिए वह कौन सा उपाय करे।

🔴 उसने मुर्गे से कहा- ”मित्र, मैंने भोर में तुम्हारी मीठी बांग सुनी। मैं तुम्हारी मधुर वाणी से इतनी प्रभावित हूं कि मेरे जी चाहता है कि तुम्हारी पीठ ठोकूं।“

🔵 ”क्यों नही!“ मुर्गे ने चालाकी से काम लेते हुए कहा- ”नीचे जो चौकीदारी सो रहा है, उसे जगा कर कहो सीढ़ी लगाए ताकि मैं नीचे आ सकूं।“

🔴 लोमड़ी ने मुर्गे को खाने की जल्दी में पेड़ के नीचे लेटे कुत्ते का जगा दिया। कुत्ते ने अपने सामने एक लोमड़ी को देखा तो उस पर झपट पड़ा और उसे मार डाला।

🔵 निष्कर्ष- दूसरे को अहित करने वाले का पहले अहित होता है।

बुधवार, 30 अगस्त 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Aug 2017


👉 आज का सद्चिंतन 30 Aug 2017


👉 अतृप्ति

🔵 अतृप्ति की पीड़ा से परेशान एक मनुष्य एक फकीर के पास गया और उसने उससे पूछा कि मेरी यह अतृप्ति कैेेसे मिट सकती है? मैं तृप्ति का अनुभव कैेेसे कर सकता हूँ? उस फकीर ने कहा- अरे ! इसमें क्या? तुम चलो मेरे साथ। मैं कुएँ पर जा रहा हूँ पानी भरने, लगे हाथ तुम्हें अपने सवाल का जवाब भी मिल जाएगा, कहने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम देख कर ही समझ जाओगे।

🔴 अचरज तो उसे तब भारी हुआ जब फकीर ने एक बाल्टी कुएं में डाली जिसमें पेन्दी थी ही नहीं। फकीर ने खूब बाल्टी को डुबोया कुएं के भीतर, खूब अावाज अाइ, बाल्टी पानी में डूबी भी। उस बाल्टी को डूबने में देर भी न लगी क्योंकि उसमें पेन्दा तो था ही नहीं, जितनी बार भी उसे खीचा,, बाल्टी खाली ही ऊपर अाई। एक बार, दो बार, दस बार यह खेल चलता रहा। अन्त में उस व्यक्ति से रहा न गया। वह बोल पड़ा- तुम यह क्या कर रहे हो? यह तो कभी भी नहीं भरेगी।

🔵 फकीर हंस पड़ा और कहने लगा- यह बाल्टी मैं तुम्हारे लिए कुएं में डाल रहा हूँ। यह वासना भी बाल्टी है, कभी भी नहीं भरेगी। अाज तक किसी की नहीं भरी है। वासना से तृप्ति पाने के फेर में विषाद ही होता है। तुमने जितनी बार वासनाओं से तृप्त होने की कोशिश की, अतृप्ति ही मिली। कितनी बार लगा कि खूब बाल्टी भरी है कुएं के भीतर लेकिन जब तक हाथ में अाई, खाली हो गई। बार बार एेसा हुआ फिर भी तुम जागे नहीं,, फिर भी तुम चौंके नहीं। चलो अाज तुम चौंके तो सही। तुम्हें होश तो अाया कि वासनाओं की अतृप्ति कभी मिटती ही नहीं। तृप्ति तो सम्वेदनाओं की डगर पर चलने औेर सेवा करने पर मिलती है। जो इस पर चल सका उसे तृप्ति, तुष्टि औेर शान्ति तीनों अनायास ही मिल जाती है।

🍣 अखन्ड ज्योति नवम्बर 2006 पेज-3

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 3)

🔵 प्रसंग यहाँ नारी मात्र की सुरुचिपूर्ण सज्जा का है। कुछ समय से प्रचलन ऐसा चला है जिसमें हम अपने घरों की नारियों को ऐसे वस्त्रों से सजाते हैं जो आम पहनावे में नहीं आते। जो स्वाभाविक नहीं हैं। जो अपनी विचित्रता के कारण दर्शकों की आंखें अपनी ओर खींचती हैं। नवयौवन की आयु में तो ऐसी वेष-भूषा विशेष रूप से आँखें अपनी ओर खींचती हैं और वह खिंचाव उत्तेजक होता है। इस आकर्षण को मात्र उनके पति ही देखें ऐसा अनुबन्ध नहीं है। रास्ता चलते लोग भी देखते हैं और उस प्रदर्शन में कामुक-ललचायेपन का आकर्षण भी होता है। यह विशुद्धतः अश्लीलता हुई। नग्न अथवा अर्द्धनग्न चित्रों को इसलिए अश्लील कहा गया है कि इससे कामुकता की दृष्टि उत्पन्न होती है। इस कसौटी पर ऐसे वस्त्र, शृंगार, उपकरण भी आते हैं जिससे किसी नारी के सम्बन्ध में कुत्सित कल्पना उठती हो।

🔴 इन दिनों फैशन के नाम पर ऐसे वस्त्र, उपकरण एवं शृंगार साधनों का प्रचलन चल पड़ा है जो हमारे घरों की बहू-बेटियों का ऐसा स्वरूप सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करता है जिसे अर्ध अश्लील कहा जा सके। इससे घटिया दृष्टिकोण वाले पुरुषों की कामुक दृष्टि उभरती है और वे कभी-कभी उस उत्तेजना में ऐसे प्रदर्शन या व्यवहार करने लगते हैं जिन्हें अवाँछनीय कहा जाय। इसमें पूरा दोष लफंगे पुरुषों का नहीं उन महिलाओं का या उनके घर वालों का भी है जो अपने घरों की बहू-बेटियों को गुड़िया की तरह सजाकर निकालते हैं। उत्तेजक वेश-भूषा पहनाने में अपना बड़प्पन मानते हैं।

🔵 इन दिनों प्रगतिशीलता का समय बताया जाता है। नर और नारी की समानता का नारा लगाया जाता है। यदि यह सही है तो महिलाओं को वैसे ही सादे वस्त्र पहनने और उपकरण सजाने चाहिए जैसे कि पुरुष पहनते हैं। लफंगों या छिछोरों की बदमाशी का विरोध करने के लिए अन्यान्य उपायों में एक यह भी अपनाया जाना चाहिए कि सयानी बहू-बेटियों के वस्त्र सादगी वाले हों। नर और नारी की समानता का नारा यदि सच्चे मन से लगाया गया है तो पुरुषों के नाक, कान छेदकर उनमें आभूषण पहनाये जायें। अथवा नारियों को भी उनसे मुक्त किया जाए।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 46

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Aug 2017

🔵 धर्म की आवश्यकता मनुष्य जीवन की शुद्धता के लिये है। अशुद्ध आचरण मनुष्य तब करता है जब वह अपने आप को मनुष्य की दृष्टि से देखता है। पर वस्तुतः मनुष्य का यथार्थ रूप उसकी सूक्ष्मतम आत्म-सत्ता है। अतः उसके जीवन के विविध अंगों का निर्माण भी इसी दृष्टि से होना चाहिये। धर्म यह बताता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को न भूलें उसे प्राप्त करें और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हमारा जन्म हुआ है उसे सदैव अपने सामने बनाये रहें। यह दार्शनिक विशेषता किसी अन्य संस्कृति में नहीं है। लोग यह भूल जाते हैं कि वे मनुष्य से भी कुछ अधिक हैं इसी से वे लक्ष्य से भटकते हैं। शुद्ध रूप में भारतीय संस्कृति में यह भूल कहीं भी नहीं है।

🔴 आन्तरिक जीवन में सत्य, प्रेम, न्याय, तप, त्याग, सहिष्णुता, आत्मीयता, क्रियाशीलता, शक्ति, सामर्थ्य, विवेक और विज्ञान ओत-प्रोत रहता है जिसके कारण अज्ञान, अशक्ति और अभाव से उत्पन्न होने वाले दुःखों का अन्त हो जाता है और यहाँ के जीवन में सुख, संतोष, शाँति, उल्लास, सरसता और आनन्द छाया रहता है।

🔴 मनुष्यों के स्वभाव को मलिन करने वाले राग, ईर्ष्या, अत्याचार, चिकीर्षा, द्वेष और असूया ये छः प्रबल बुराइयाँ शास्त्रों में बताई गई हैं, इनको शुद्ध किये बिना आन्तरिक सौंदर्य के दर्शन नहीं होते। बाह्य पवित्रता के लिये भी उसी तरह स्नान, शौच, वस्त्र, आहार, आवास आदि की शुद्धता चाहियें। पहली आवश्यकतायें आत्मा के लिये हैं दूसरी शरीर के लिये। आत्मा और शरीर दोनों जब स्वच्छ, पवित्र और रसयुक्त बनते हैं तभी वास्तविक शृंगार के दर्शन होते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 58)

🌹  सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने और नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रुचि लेंगे।

🔴 कोमल और सौम्य तत्त्वों को इशारे में समझाकर विवेक एवं तर्क द्वारा औचित्य सुझाकर सन्मार्गगामी बनाया जा सकता है, पर कठोर और दुष्ट तत्त्वों को बदलने के लिए, लोहे को आग में तपाकर पिटाई करने वाली लुहार की नीति ही अपनानी पड़ती है। दुर्योधन को समझाने-बुझाने में जब श्रीकृष्ण सफल न हो सके, तब उसे अर्जुन के बाणों द्वारा सीधे रास्ते पर लाने का प्रबंध करना पड़ा। हिंसक पशु नम्रता और औचित्य की भाषा नहीं समझते, उन्हें तो शस्त्र ही काबू में ला सकते हैं। भगवान् को बार-बार धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेना पड़ता है, साथ ही वे असुरता के उन्मूलन का रुद्र कृत्य भी करते हैं।

🔵 व्यक्तिगत जीवन में देव शक्ति का अवतरण निस्संदेह एक सृजनात्मक कृत्य है। उसके लिए सद्गुणों के अभिवर्द्धन की साधना निरंतर करनी पड़ती है, पर साथ ही अंतरंग में छिपे हुए दोष-दुर्गुणों से जूझना भी पड़ता है। यदि कुसंस्कारों का उन्मूलन न किया जाए, तो सद्गुण पनप ही न सकेंगे और सारी शक्ति इन कषाय-कल्मषों में ही नष्ट होती रहेगी। आलस्य, प्रमाद, आवेश, असंयम आदि दुर्गुणों के विरुद्ध कड़ा मोर्चा खड़ा करना पड़ता है और पग-पग पर उनसे जूझने के लिए तत्पर रहना पड़ता है। गीता का रहस्यवाद अंतरंग के इन्हीं शत्रुओं को कौरव मानकर अर्जुन रूपी जीव को इनसे लड़ मरने के लिए प्रोत्साहित करता है। जिसने अपने से लड़कर विजय पाई, वस्तुतः उसे ही सच्चा विजेता कहा जाएगा।
 
🔴 सामूहिक जीवन में समय-समय पर अनेक अनाचार उत्पन्न होते रहते हैं और उन्हें रोकने के लिए सरकारी तथा गैर सरकारी स्तर पर प्रबल प्रयत्न करने पड़ते हैं। पुलिस, जेल, अदालत, कानून, सेना आदि के माध्यम से सरकारी दंड संहिता अनाचार को रोकने का यथासंभव प्रयत्न करती है। जन स्तर पर भी अवांछनीय और असामाजिक तत्त्वों का प्रतिरोध अवश्य होता है। यदि वह रोकथाम न हो, उद्दंडता और दुष्टता का प्रतिरोध न किया जाए तो वह देखते-देखते आकाश-पाताल तक चढ़ दौड़े और अपने सर्वभक्षी मुख में शालीनता और शांति को देखते-देखते निगल जाए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 7)

🔵 युग परिवर्तन की इस ऐतिहासिक बेला, में ऐसी देवआत्माओं की विशिष्ट आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिनमें मौलिक प्रतिभा विद्यमान है। सामान्य स्तर की श्रेष्ठता हर मनुष्य में मौजूद है। उसे सीमित समय में सीमित मात्रा में उभार सकना ही सम्भव हो सकता है। कम समय में, कम परिश्रम से जिन्हें महान उत्तरदायित्वों का वहन कर सकने के लिए उपयुक्त बनाया जा सके ऐसी प्रतिभाएँ सर्वत्र उपलब्धि नहीं हो सकती और न उनसे उतने बड़े पुरुषार्थ की आशा की जा सकती है जैसी कि इस विषम वेला में आवश्यकता पड़ रही है। इसके लिए विशेष रुप से खोज’बीन करने की आवश्यकता पड़ेगी।

🔴 मोती पाये तो समुद्र में ही जाते हैं पर उन्हें निकालने के लिए पनडुब्बी को गहरी डुबकी लगाने की और सुविस्तृत क्षेत्र की खोज बीन करनी होती है। मोती न तो इकट्ठे मिलते और न तो किसी किनारे पर जमा रहते हैं। बहुमूल्य वस्तुएँ सदा से इसी प्रकार खोजी जाती रही हैं। प्रकृति के अन्तराल में बिजली, ईथर आदि तत्व अनादि काल से भरे पड़े थे, पर उनसे लाभान्वित हो सकना तभी सम्भव हुआ जब उन्हें खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने असाधारण श्रम किया। जंगलों में बहुमूल्य जड़ी बूटियाँ पुरातन काल में भी उगती थीं और अब भी उनकी संजीवनी क्षमता यथावत् मौजूद है। पर उन्हें हर कोई, हर जगह नहीं पा सकता चरक ने दुर्गम स्थानों की यात्रा की और उस परिभ्रमण में वनस्पतियों के गुण धर्म खोजे। इस शोध का परिणाम ही चिकित्सा विज्ञान के रुप में सामने आया और उसका लाभ समूची मानव जाति से उठाया। चरक यदि वह प्रयास न करते तो बूटियाँ अपने स्थानों पर बनी रहतीं, और रोगी अपनी जगह। उनका आपस में संबंध ही न बनता तो दोनों ही घाटे में रहते। न जड़ी बूटियाँ यश पातीं और मनुष्यों को रोग निवृत्त का अवसर मिलता।
 
🔵 भूगर्भ में खनिज सम्पदा के अजस्र भंडार अनादि काल से भरे पड़े हैं।पर उनका उत्खलन और दोहन जिस लगन के आधार पर सम्भव हो सका उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती रहेगी। धातुएँ गैंसे, तेल, जैसी अनेकों बहुमूल्य वस्तुएँ भूगर्म की गहरी खोज बीन करने से ही सम्भव हुई। पौराणिक गाथा के अनुसार समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकाले गये और उन से देवताओं तथा मनुष्यों ने सौभाग्यशाली बनने का अवसर पाया। यदि मंथन प्रयास न किया जाता तो समुद्र की सम्पदा उसके गहन अन्तराल में ही धँसी रहती। लाभ उठाना तो दूर उनका किसी को पता तक नहीं चलता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.49

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 136)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 युग परिवर्तन की यह एक ऐतिहासिक वेला है। इन बीस वर्षों में हमें जमकर काम करने की ड्यूटी सौंपी गई थी। सन् १९८० से लेकर अब तक के पाँच वर्षों में जो काम हुआ है, पिछले तीस वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है। समय की आवश्यकता के अनुरूप तत्परता बरती गई और खपत को ध्यान में रखते हुए तदनुरूप शक्ति अर्जित की गई। यह वर्ष कितनी जागरूकता, तन्मयता, एकाग्रता और पुरुषार्थ की चरम सीमा तक पहुँच कर व्यतीत करने पड़े हैं, उनका उल्लेख उचित न होगा। क्योंकि इस तत्परता का प्रतिफल २४०० प्रज्ञा पीठों और १५००० प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के अतिरिक्त और कुछ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। एक कड़ी हर दिन एक फोल्डर लिखने की इसमें और जोड़ी जा सकती है, शेष सब कुछ परोक्ष है। परोक्ष का प्रत्यक्ष लेखा-जोखा किस प्रकार सम्भव हो?

🔴 युग संधि की वेला में अभी पंद्रह वर्ष और रह जाते है। इस अवधि में गतिचक्र और भी तेजी से भ्रमण करेगा। एक ओर उसकी गति बढ़ानी होगी, दूसरी ओर रोकनी। विनाश को रोकने और विकास को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। दोनों ही गतियाँ इन दिनों मंथर हैं। इस हिसाब से सन् २००० तक उस लक्ष्य की उपलब्धि न हो सकेगी जो अभीष्ट है। इसलिए सृष्टि के प्रयास चक्र निश्चित रूप से तीव्र होंगे। उसमें हमारी भी गीध-गिलहरी जैसी भूमिका है। काम कौन, कब-कब, किस प्रकार करें, यह बात आगे की है। प्रश्न जिम्मेदारी का है। युद्ध काल में जो जिम्मेदारी सेनापति की होती है, वही खाना पकाने वाले की भी है। आपत्तिकाल में उपेक्षा कोई नहीं बरत सकता।

🔵 इस अवधि में एक साथ कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी होगी। समय ऐसे भी आते हैं, जब खेत की फसल काटना, जानवरों को चारा लाना, बीमार लड़के का इलाज कराना, मुकदमें की तारीख पर हाजिर होना, घर आए मेहमान का स्वागत करना जैसे कई काम एक ही आदमी को एक ही समय पर करने होते हैं। युद्ध काल में तो बहुमुखी चिंतन और उत्तरदायित्व और भी अधिक सघन तथा विरल हो जाता है। किस मोर्चे पर कितने सैनिक भेजना हैं, जो लड़ रहे हैं, उनके लिए गोला-बारूद कम न पड़ने देना, रसद का प्रबंध रखना, अस्पताल का दुरुस्त होना, मरे हुए सैनिकों को ठिकाने लगाना, अगले मोर्चे के लिए खाइयाँ खोदना जैसे काम बहुमुखी होते हैं। सभी पर समान ध्यान देना होता है। एक में भी चूक होने पर बात बिगड़ जाती है। करा-धरा चौपट हो जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.153

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.20

👉 Be like a Swan. (Part 2)

🔵 Have you listened about BHAGWAN BUDDH? What peculiarity he had, what did he get from BHAGWAN, which special thing did he get from BHAGWAN? You must read his life. Beneath a tree called BODHI-VRIKSH, where he completed his austerity, he got a very special thing. The name of that thing was-‘Discrimination’, after spending some time beneath that tree in solitude, where he would have performed mental-exercise like CHINTAN, MANAN, DHYAN (Auto-Suggestion), he attained (capacity to discriminate) discriminative thinking leading him to see repercussions of his any action and then he came to know that there was no need to be influenced by the whole world rather he had to influence the whole world and he did that.

🔴 He opined that ‘‘only proper sayings of others must be listened and adopted as most of the ways regarding life and life-style as also values of life defined by people happen to be usually unjustified and improper’’. What then BHAGWAN BUDDH did firstly was to stand out of mob and shut his eyes towards the world, because only then he could see what was going on inside him. Inside him, he saw the real nature/structure of duties and his future leading him to take such decisions that transformed an ordinary prince into AVTAR of BHAGWAN.

🔵 He did not care even a bit about what was going on in that age, rather he emphasized on what was suitable and proper. He told people only what was proper. Violence that time was part of YAGYAs. He said to remove that part. When he was told that there was written about it in ‘VED’, he opined to reject VED. When he was told that VED was written by BHAGWAN, he favored that such BHAGWAN must be dislodged, in whose writings moral values had been ignored.

🔴 So he dared to reject even BHAGWAN. All that means he preferred ‘VIVEK’ (every action must be discriminative one). ‘VIVEK’ also means Reality before and Reality after. An ordinary prince incorporated this specification in his personality to become BUDDHA & decided to do only what the reality was, what the truth was. Very this is also known as-‘ATMGYAN’ (self-knowledge). Very this is also called- ‘BRAMHVIDYA’; Very this is also called-‘PRAGYA’; Very this also called-RITAMBHARA.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 Mahatma Gandhi and Harishchandra Play

🔴 Mohandas saw the play of the truthful king Harishchandra, and truth sunk deep into his inner self. Many people would have seen it for entertainment and the players also would have performed it so many times but when these teachings seep into the heart then only they guide a person in the right direction. It’s well known how Mohandas took the shelter of truth and became Mahatma Gandhi.

🌹 From Pragya Puran

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

👉 हमारी अपनी जिम्मेदारी

🔴 दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। 
 
🔵 अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।

👉 साधना उपासना

🔴 स्वामी विवेकानंद ने अपनी साधना उपासना छोड़ दी और कलकत्ता में फैले प्लेग के प्रकोप से लोगों को बचाने में जुए गए। एक भाई ने पूछा-महाराज आपकी उपासना साधना का क्या हुआ? स्वामीजी ने कहा- भगवान् के पुत्र दुःखी हों और मैं उनका नाम जप रहा होऊँ, क्या तुम इसे ही उपासना समझते हो?

🔵 पैसे की कमी के कारण जब वे रामकृष्ण आश्रम की जमीन बेचने को तैयार हो गए तो एक शिष्य ने पूछा-महाराज आप गुरु स्मारक बेचेंगे क्या? विवेकानंद ने उत्तर दिया-मठ-मंदिरों की स्थापना संसार की भलाई के लिए होती है। यदि उसका उपयोग भले काम में होता है, तो इसमें हानि क्या है?

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Aug 2017

🔵 श्रद्धा, क्षणिक भावुकता या आवेश का नाम नहीं है वरन् यह साधना की कठिनाइयों को झेलने की कसौटी है। आवेशपूर्ण श्रद्धा से जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं होता किन्तु जो लोग दृढ़तापूर्वक साधन की कठिनाइयों को सहन करते रहते हैं उनकी श्रद्धा और भी तेजस्वी बनती है और मन पर तथा इन्द्रियों पर संयम करना आसान हो जाता है।

🔴 भोगवादी व्यक्ति जिस तरह भोग की लालसा में अनुचित-उचित का विचार नहीं करता और उसी में सुख का अनुभव करता है उस तरह सदाचारी व्यक्ति भी अपने चारों ओर प्रसन्नता देखना चाहता है। अपनी प्रसन्नता का निश्चय श्रद्धा द्वारा ही होता है, क्योंकि अपनी यथार्थ शक्ति और सामर्थ्य का बोध श्रद्धा द्वारा ही होता है। भले ही उन अभूतपूर्व परिणामों की तत्काल उपलब्धि न हो किंतु श्रद्धा के साथ जो आशा का अविचल सम्बन्ध है, उससे मनोभूमि की निराशा तथा दुःखों का अन्त हो जाता है। ऊपर से देखने में दूसरे लोग भले ही यह अनुमान करें कि उसका जीवन शुष्क, रसहीन है किंतु उसके अन्तर में जो आनन्द का स्रोत उमड़ता रहता है उसे दूसरा समझ नहीं पाता, पर वह व्यक्ति अपनी आन्तरिक आनन्द की स्थिति से ही अपने चारों ओर प्रसन्नता का अनुभव कर लेता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

🔴 मनुष्य को परमात्मा ने एक स्वतंत्र बुद्धि वाला चेतन प्राणी बनाया है। उसे हाथ-पाँव काम करने के लिए और विवेक काम के औचित्य-अनौचित्य समझने के लिए दिया है। उसकी इच्छा है कि मनुष्य अधिक से अधिक परिश्रमी, कर्मठ और धैर्यवान बनें, इसीलिए उसके सभी काम निर्विघ्नतापूर्वक नहीं होते चलते। यदि सारे काम बिना बाधा के सहज रूप में होते चलें तो कर्म-कौशल का महत्व ही समाप्त हो जाये। मेरा विश्वास है कि जिस काम को करने में मनुष्य को बाधायें नहीं आतीं, उसे अपनी कार्य-कुशलता का परिचय देने का अवसर नहीं रहता, वह काम मनुष्य के करने योग्य नहीं होता।

🌹 महामना मदनमोहन मालवीय

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 6)

🔵 ऐसे जागरुकों को युग प्रयोजनों के सही रुप में कर सकने की क्षमता एवं कुशलता विकसित करने की आवश्यकता अनुभव की गई। इसके लिए प्रशिक्षण आवश्यकता थी। बिना ट्रेनिंग पाये कोई महत्वपूर्ण कार्य किसी से भी नहीं बन पड़ता। रेल, मोटर आदि वाहन कल कारखाने के संयंत्र यहाँ तक कि टाइप राइटर जैसे छोटे उपकरणों को चलाने के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। अध्यापक, सैनिक, शिल्पी, कलाकार बिना प्रशिक्षण पाये शक्ति सामर्थ्य होते हुए भी अपना कार्य सफलता पूर्वक नहीं कर सकते। फिर युग सृजन जैसा काम ही हर कोई कैसे कर लेता? युग शिक्षण के लिए आवश्यकता तंत्र खड़ा किया गया है। गायत्री तपोभूमि से युग साहित्य का सृजन हो रहा है और शान्ति कुँज में युगान्तरीय चेतना को क्रियात्मिक करने का समग्र शिक्षण विधिवत् चल रहा है। रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम सन्तोषजनक ढंग से चल रहे हैं और उनका गति चक्र निरन्तर दु्रतगामी बन रहा है।

🔴 इतने पर भी एक आवश्यकता यथावत् बनी हुई है देव आत्माओं में पायी जाने वाली विशिष्टता का अवतरण विशिष्ट समय पर ऐसी ही विशिष्ट आत्माओं का अवतरण होता है। वे जन्म जात रुप से ऐसी धातु से बने होते हैं कि उनका उपयोग विशेष प्रयोजनों के लिए संभव हो सके। अणु शक्ति उत्पन्न करने के लिए यूरेनियम जैसे रासायनिक पदाथों की जरुरत पड़ती है। सोने की अपनी मौलिक विशेषता है। र्स्वणकार उसे आभूषणों में गढ़ तो सकता है पर कृत्रिम सोना अभी तक बनाया नहीं जा सका। यों नकली नग ही जेवरों में प्रयुक्त होते हैं, पर उनका निर्माण भी बहुत होता है फिर भी असली मणि-मणिक अभी भी विशेषता के कारण अपना मूल्य और महत्व यथा स्थान बनाये हुए हैं। महामानवों की ढलाई, गढ़ाई के लिए शान्ति कुँज की फैक्टरी अनवरत तत्परता के साथ लगी हुई है। उसके उत्पादन का स्तर भी बढ़ रहा है और परिमाण भी। इस प्रगति को सन्तोषजनक रहते हुए भी उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता। उस विशिष्टता की मात्रा अभी भी कम ही दृष्टिगोचर हो रही है जिसे देव स्तर की प्रतिभा कहा जाय। जो महामानवों की भूमिका निभा सकने के लिए अभीष्ट सुसंस्कारिता की पूँजी अपने साथ लेकर जन्मी हो।
 
🔵 कृषि कार्य में किसान का पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं है, उपयुक्त भूमि और सही बीज का भी उसकी सफलता में कम योगदान नहीं होता। शिल्पियों की कुशलता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हों उन्हें भी उपयुक्त उपकरण चाहिए। कच्चा माल सही न हो तो कारखाने में बढ़िया चीज कैसे बनायें ? बालू से कोई कुम्हार टिकाउ बर्तन नहीं बना सकता। चिकित्सकों के उपचार रोगी की जीवनी शक्ति के आधार पर सफल होते हैं। कच्चे लोहे की तलवार से मोर्चा जीतना बलिष्ठ योद्धा के लिए सम्भव नहीं होता। मौलिक विशिष्टता की अपनी आवश्यकता है। खरादा तो उसी को जा सकता है जिसमें अपनी कड़क हो। तेल तिली में से निकलता है, आग ईंधन के सहारे जलती है। तिली का प्रबन्ध न हो तो बालू से तेल निकालने में कोल्हू कैसे सफल हो ? पानी मथने के लिए कितना ही श्रम क्यों न किया जाय मक्खन निकालने में सफलता न मिलेगी। ईंधन के बिना आग की लपटों का दर्शन होने और अभीष्ट गर्मी उत्पन्न करने का प्रयोजन नहीं ही सध सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 49
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.49

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 57)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 सीधी- सादी विचारधारा को अपनाकर मनुष्य अपनी सर्वतोमुखी सुख- शांति को सुरक्षित रख सकता था और इस पृथ्वी पर स्वर्ग का आनंद प्राप्त कर सकता था, पर आँधी, टेढ़ी, अनुचित, अनुपयुक्त इच्छा, आकांक्षाएँ वह तो रखता ही है, उसके समीपवर्ती लोग भी चंदन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपने को क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेक का अंतःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे और कुविचारों के हटते ही अपना पशु जीवन, देव जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जाएगा?

🔵 कुछ मूढ़ताएँ, अंध परम्पराएँ, अनैतिकताएँ, संकीर्णताएँ हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन, बड़ी दुष्कर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी होते हुए भी भीतर से खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है, पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस- पास घिरे लोगों की भावुकता को डरकर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी सी है। कुछ ही थोड़े से विवेकशील लोग यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें, तो इन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया, वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करेगी, जो इन अंध- परम्पराओं को तोड़- मरोड़ कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।
 
🔴 हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स, नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर ही भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़ मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दास- प्रथा देव- दासी प्रथा, बहु- विवाह जन्मते ही कन्या- वध भूत- पूजा पशु बलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते ही कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ एवं संकीर्णताएँ मजबूती से जड़ जमाए दीखती हैं, विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभराकर गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रांति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नए समाज की रचना आज स्वप्न सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही यह मूर्तिमान होकर सामने खड़ी दीखेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.79

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 134)

🌹  तपश्चर्या आत्म-शक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य

🔵 रामकृष्ण परमहंस के सामने यही स्थिति आई थी। उन्हें व्यापक काम करने के लिए बुलाया गया। योजना के अनुसार उनने अपनी क्षमता विवेकानन्द को सौंप दी थी तथा उनने कार्यक्षेत्र को सरल और सफल बनाने के लिए आवश्यक ताना-बाना बुन देने का कार्य संभाला। इतना बड़ा काम वे मात्र स्थूल शरीर के सहारे नहीं कर पा रहे थे। सो उनने उसे निःसंकोच छोड़ भी दिया। बैलेंस से अधिक वरदान देने के कारण उन पर ऋण भी चढ़ गया था। उनकी पूर्ति के बिना गाड़ी रुकती। इसलिए स्वेच्छापूर्वक कैंसर का रोग भी ओढ़ लिया। इस प्रकार ऋण मुक्त होकर विवेकानन्द के माध्यम से उस कार्य में जुट गए जिसे करने के लिए उनकी निर्देशक सत्ता ने उन्हें संकेत किया था।

🔴 प्रत्यक्षतः रामकृष्ण तिरोहित हो गए। उनका अभाव खटका, शोक भी बना, पर हुआ वह जो श्रेयस्कर था। दिवंगत होने के उपरांत उनकी सामर्थ्य हजार गुनी अधिक बढ़ गई। इसके सहारे उनने देश एवं विश्व में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन किया। जीवन काल में वे भक्तजनों को थोड़ा बहुत आशीर्वाद देते रहे और एक विवेकानन्द को अपना संग्रह सौंपने में समर्थ हुए, पर जब उन्हें सूक्ष्म और कारण शरीर से काम करने का अवसर मिल गया, तो उनसे पूरे विश्व में इतना काम किया जा सका जिसका लेखा-जोखा ले सकना, सामान्य स्तर की जाँच पड़ताल से समझ सकना सम्भव नहीं।

🔵 ईसा की जीवनचर्या भी ऐसी ही थी। वे जीवन भर में बहुत दौड़-धूप के उपरांत मात्र १३ शिष्य बना सके। देखा कि स्थूल शरीर की क्षमता से उतना बड़ा काम न हो सकेगा, जितना कि वे चाहते हैं, ऐसी दशा में यही उपयुक्त समझा कि सूक्ष्म शरीर का अवलंबन ले कर संसार भर में ईसाई मिशन फैला दिया जाए। ऐसे परिवर्तनों के समय महापुरुष पिछला हिसाब-किताब साफ करने के लिए कष्ट साध्य मृत्यु का वरण करते हैं। ईसा का क्रूस पर चढ़ना, सुकरात का विष पीना, कृष्ण को तीर लगना, पाण्डवों का हिमालय में गलना, गाँधी का गोली खाना, आद्य शंकराचार्य को भगंदर होना यह बताता है कि अगले महान प्रयोजनों के लिए उन्हें स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करना होता है, वे उपलब्ध शरीर का इस प्रकार अंत करते हैं, जिसे बलिदान स्तर का प्रेरणा प्रदान करने वाला और अपने चलते समय का पवित्रता, प्रखरता प्रदान करने वाला कहा जा सके। हमारे साथ भी यही हुआ है व आगे होना है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.151

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 Dacoit changes after hearing story

🔴 A saint was explaining with intense feelings, the results of taking the shelter of God and consequences of performing bad karma. Among the audience was a decoit who had planned to rob the saint and other prosperous listeners after the lecture was over. But he got shaken from inside when he heard the life transforming stories of Ajamil, Ganika, Tulsidas and Bilva mangal.

🔵 The way the stories were narrated forced him to think over his own deeds and do self-introspection. After the lecture ended, the decoit fell into the feet of the saint and told him all his previous sins and asked how to correct his behavior and follow the right path. Those instructions changed his life. From then he started living a life centered on God, and the hole he had dug up with his sins, he started covering it with selfless social service.

🌹 From Pragya Puran

👉 Be like a Swan. (Part 1)

🔵 Here is given, different kinds of training associated with GAYATRI MATA. We are also engaged in intercession with GAYATRI. But you just forget on whose shoulder, GAYATRI rides and who makes GAYATRI dances to his tunes. You daily concentrate on photo of GAYATRI MATA. Have you seen her conveyance in the photo? The name of her conveyance is swan. GAYATRI MATA rides over swan. You may not get this point. Because a lady equal to the weight of a man, can sit on an animal but not on a bird. You can ride over a horse, donkey, elephant and camel and buffalo, but just tell me how a man will sit on a bird whose weight is also negligible?

🔴 Actually GAYATRI MATA, the supreme power has been metaphorically designed to make it easy for anyone to understand what GAYATRI basically means.  The metaphorically designed photo suggests that swan is the name of that person who knows how to distinguish between justified and unjustified. You too must differentiate between proper and improper. In spite of following blindly people’s path, you must stand by a side to observe what the proper way is, people may commit mistake, will you too? Today is the world of mistakes.  Is it any way that, you go along the water-flow like a straw? Is it any intelligence? You go on flying in the air like a weightless straw, is it any intelligence? You must be a man of gravity. You must take decisions on your life yourself. Your braveness must be your companion in deciding your own way.

🔵 Integrity and BHAGWAN both are such things, which help you can take even big decisions. Usually in the world, undesirable things are being done. People usually treat themselves as bodies and this leads them to go to any extent even committing wrongs to make their bodies happy. People are so senseless that they can see only today’s benefits but not tomorrow’s problems and in so hurry that they cannot wait for good results. What is there in social evils, you just tell me, today’s benefit, tomorrow’s loss? Will you do the same? No, then get out of the way of people’s path and with this, begin thinking in a new style as what is proper and what is not. I will call you a knowledgeable person once you begin to decide on your own what makes up your future and what does not.  You must have studied the chronicle of knowledgeable persons.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 2)

🔵 यौनाचार की पृष्ठभूमि उन अंगों के नग्न प्रदर्शन से बनती है। जिन्हें देखने या छूने का अधिकार परस्पर पति-पत्नि को ही है। छूने के साथ ही देखने की भी गणना होती है। यह आधार चित्रों तक चला गया है। निर्वस्त्र चित्र, जिनमें कामुकता भड़काने वाले अवयव दिखते हैं अश्लीलता की परिधि में आते हैं और उनका देखना, दिखाना, बेचना, खरीदना दण्डनीय अपराध माना जाता है। यह इसलिए कि इससे ऐसी कामुकता भड़कती है जो नर-नारी के पवित्र एवं वैध सम्बन्धों का उल्लंघन करने के लिए उत्तेजित करती है। यह उत्तेजन दृश्य साधनों से भी हो सकता है एवं श्रव्य साधनों से भी। इन दिनों दोनों ही समाज में खूब प्रचलित हैं। इनका खुला विरोध तो बहुत कम देखा जाता है, किन्तु मौन रूप में उन्हें सुनते-देखते अपनी कामुकता की वृत्ति को पोषण देते अनेकों देखे जा सकते हैं। पतनोन्मुख प्रवाह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बढ़ता है और इस झोंके में बहुसंख्य व्यक्ति आ जाते हैं। सच्चे साहसी वे होते हैं जो इनसे अप्रभावित हो इनका खुला विरोध करते हैं। औरों को भी आदर्शों के प्रति सहमत करते व स्वयं आगे बढ़ते देखे जाते हैं।

🔴 सामान्यतया फिल्मी गीतों, शादी-ब्याह में गाये जाने वाले गानों, लोक गीतों में प्रयुक्त शब्दों की अनदेखी कर दी जाती है। इसी प्रकार कैलेंडरों में देवी-देवताओं के चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्र परिधान आदि भी उत्तेजक बनाये जाते हैं। यह भी अनुचित है। यही कारण है कि अश्लीलता की व्यापक परिभाषा में उत्तेजना प्रदान करने वाले दृश्य एवं श्रव्य उपकरणों की भी गणना होती है।

🔵 इस संदर्भ में कई कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसी साज सज्जा अथवा आकृति मुद्रा को क्या कहा जाय जो कामुकता की दृष्टि उत्पन्न करती है। इसका निरूपण करना हो तो किसी ऐसी सज्जा या मुद्रा में करनी चाहिए जो हमारी बहिन या पुत्री की हो। स्वभावतः हम चाहते हैं कि वे सौम्य हों। उनके वस्त्र अथवा अंगशील मर्यादा का पालन करते हों। उन पर अश्लीलता की उँगली न उठती हो। इस मर्यादा के टूटने पर हमारी आँखें नीची हो जाती हैं। जिसने वह चित्र मुद्रा अथवा सज्जा बनाई हो, उस पर क्रोध आता है। ऐसे निर्माण में यदि अपनी बहिन या पुत्री ने सहयोग दिया हो, उत्साह दिखाया हो, आग्रह किया हो तो उस पर भी क्रोध आता है। निकटवर्ती सगे सम्बन्ध होते हुए भी इसे चरित्रहीन कहने की मान्यता पनपती है और इच्छा होती है कि वह दृश्य जल्दी ही आँखों के सामने से हटा दिया जाये।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 45
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.45

👉 आज का सद्चिंतन 29 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Aug 2017


सोमवार, 28 अगस्त 2017

👉 सज्जनता का सौन्दर्य

🔴 चेहरे के सौन्दर्य को देखकर अनेक लोग प्रभावित होते हैं। पर नम्रता भी सौन्दर्य से किसी प्रकार कम आकर्षक और प्रभावोत्पादक नहीं है। नम्रता और सज्जनता के गुण जिसमें हैं, जो सदा मुस्कराता रहता है वह जहाँ कहीं जायेगा अपने लिए स्थान बना लेगा। इस चिन्ता और परेशानी से भरी हुई दुनियाँ में ऐसे लोगों की हर जगह माँग है जो अपने उत्तम स्वभाव के कारण दूसरों की व्यथा में थोड़ी कमी कर सकें, उन्हें अपनी प्रसन्नता और सज्जनता से कुछ मानसिक शान्ति प्रदान कर सकें।

🔵 कुरूपता कोई दोष नहीं है। नम्र और हँसमुख रहने से कुरूपता का दोष दूर किया जा सकता है। घमंडी चिड़चिड़ा स्वार्थी और कटुवादी कोई स्त्री या पुरुष चाहे कितना ही सुन्दर क्यों न हो कुछ ही देर में घृणास्पद बन जायेगा-चाहे वह कितना ही सुन्दर क्यों न दिखता हो। इसके विपरीत कुरूप व्यक्ति में भी यदि सौजन्य की समुचित मात्रा मौजूद है तो वह अपने लिए आदर और बड़प्पन प्राप्त करके रहेगा। कहते हैं कि द्रौपदी स्याह काली थी। इसी से उसे ‘कृष्ण’ भी कहते थे जिसका अर्थ है-कलूटी फिर भी उसके गुणों पर मुग्ध होकर पाण्डव उसका भारी आदर करते थे और राजमहल की बहुत सी व्यवस्था वही संभालती थी।


🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Heard the Bhagwat four times

🔴 Parikshit Maharaj heard Bhagwat Puran from Shukdeo and attained salvation. A rich man on hearing this, developed great respect for the Bhagwat, and got eager to listen to it from a Brahmin to get liberated.

🔵 He searched and found a profound priest of Bhagwat. He told him his intention of hearing the Bhagwat. The priest told him that this is Kaliyug, all the pious activities in this age is reduced four times, thus he had to listen to it for four times. The reason behind the priest’s proposition was to get enough money out of the deal. He gave the fees to the priest and heard four Bhagwat lectures but it was of no use. The man then met a higher level of saint. He asked him, how Parikshit could get and he didn’t after listening to the Bhagwat.

🔴 The saint told him, that Parikshit Maharaj had known the death to be imminent and was completely detached from the world while hearing and Shukdeo Muni was narrating without the feeling of any kind of greed.

🔵 Whoever has got the knowledge in the form of an advice, free of any kind of self vested interests, that has produced desired results.

🌹 From Pragya Puran

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 56)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 सामाजिक कुरीतियों से हिंदू समाज इतना जर्जर हो रहा है कि इन विकृतियों के कारण जीवनयापन कर सकना भी मध्यम वर्ग के लोगों के लिए कठिन होता चला जा रहा है। बच्चों का विवाह एक नरभक्षी पिशाच की तरह हर अभिभावक के सिर पर नंगी तलवार लिए नाचता रहता है। विवाह के दिन जीवन भर के गाढ़ी कमाई के पैसों को होली की तरह फूँक देने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। हत्यारा दहेज छुरी लेकर हमारी बच्चियों का खून पी जाने के लिए निर्भय होकर विचरण करता रहता है।

🔵 मृत्युभोज, औसर- मोसर, नेगचार, मुंडन, दस्टौन, जनेऊ और भी न जाने क्या- क्या ऊट- पटांग काम करने के लिए लोग विवश होते रहते हैं और जो कुछ कमाते हैं, उसका अधिकांश भाग इन्हीं फिजूलखर्चियों में स्वाहा करते रहते हैं। जेवर बनवाने में रुपए में से आठ आने हाथ रहते हैं, जान- जोखिम ईर्ष्या, अहंकार, सुरक्षा की चिंता, ब्याज की हानि आदि अनेक आपत्तियाँ उत्पन्न होती रहती हैं, फिर भी परम्परा जो है। सब लोग जैसा करते हैं, वैसा ही हम क्यों न करें? विवेक का परम्पराओं की तुलना में परास्त हो जाना, वैसा ही आश्चर्यजनक है जैसा कि बकरे का शेर की गरदन मरोड़ देना। आश्चर्य की बात तो अवश्य है, पर हो यही रहा है।
 
🔴 शरीर के रोगी, मन के मलीन और समाज के कुसंस्कारी होने का एक ही कारण है- अविवेक यों हम स्कूली शिक्षा ऊँचे दर्जे तक प्राप्त किए रहते हैं और अपने ढंग की चतुरता भी खूब होती है, पर जीवन की मूलभूत समस्याओं को गहराई तक समझने में प्रायः असमर्थ ही रहते हैं। बाहरी बातों पर खूब बहस करते और सोचते- समझते हैं, पर जिस आधार पर हमारा जीवनोद्देश्य निर्भर है, उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते। इसी का नाम है- अविवेक विचारशीलता का यदि अभाव न हो और गुण- दोष की दृष्टि से अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं पर सोचना समझना आरंभ करें, तो प्रतीत होगा कि बुद्धिमत्ता का दावा करते हुए भी हम कितनी अधिक मूर्खता से ग्रसित हो रहे हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.77

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.14

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 5)

🔵 युग संधि में जागृत आत्माओं को यही करना पड़ता है। समस्या 700 करोड़ मनुष्यों की है। वे एक स्थान पर नहीं समस्त भूमंडल पर बिखरे हुए बसे हैं। अनेक भाषा बोलते हैं। अनेक धर्म सम्प्रदायों का अनुसरण करते हैं। शासन पद्धतियों और सामाजिक परम्पराओं में भिन्नता है। मनःस्थिति और परिस्थिति में भी भारी अन्तर है। इतना होते हुए भी उन सबसे सर्म्पक साधना है। युग चेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं सर्म्पकै प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है जिसके दबाव में लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए हिम्मत ही नहीं तत्पर भर हो सकें। यह कार्य कहने सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है। पर वस्तुतः उतना कठिन और जटिल है। ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती-घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का-उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझा उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए।

🔴 आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को समाज की संरचना के लिए आन्दोलन परक कार्य ही करना पड़े। वह क्षेत्र छोटा होता है और उसमें थोड़े से व्यक्ति ही खप सकते हैं।सृजन प्रोजन बहुत बड़ा है। उसके असंख्यों पक्ष है। उनमें से जो जिसे कर सके वह उसे सँभाले। कला, साहित्य, विज्ञान, उत्पादन, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य जैने अनेकों क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें बिना अधिक जन-सर्म्पक साधे भी अभीष्ट प्रयोजनों में निरत रहा जा सकता है और आन्दोलनकारियों से भी अधिक महत्व का ऐसा कार्य किया जा सकता है जो नवयुग की आवश्यकता में अपने ढंग से पूरा करने में असाधारण योगदान कर सके। युद्ध जीतने में सभी को तलवार नहीं चलानी पड़ती। वे लोग भी द्वितीय पंक्ति के सैनिक ही हैं जो युद्ध सामग्री बनाते अथवा सैनिकों पर पड़ने वाले खर्च को अपने परिश्रम से जुटाते हैं।

🔵 आन्दोलकारियों-प्रचारकों की तरह ही वे लोग भी उपयोगी हैं जो उनके लिए साधन सामग्री जुटाने अथवा कार्य क्षेत्र बनाने में तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों का घर रह कर काम करना भी परिव्राजको की ही तरह महत्वपूर्ण कार्य है। हर व्यक्ति की मानसिक संरचना एवं परिस्थिति परिव्राजकों की भूमिका निभाने की नहीं होती। होती भी हो तो उस कार्य के लिए सीमित संख्या में ही सुयोग्य व्यक्ति चाहिए। अधिक सृजन शिल्पी तो अपने-अपने ढंगों के उत्तरदायित्व सँभालते हुए अपने निर्वाह की व्यवस्था चलाते हुए समन्वित प्रक्रिया अपनायेंगे और लक्ष्य की प्राप्ति में अपने ढंग का ऐसा योगदान करेंगे जिसकी महत्ता को किसी प्रकार कम सराहनीय नहीं कहा जा सकता। जन्म समय के आधार पर यह निर्धारण भी किया जाता हैं कि कौन प्रतिभा किस प्रयोजन में लगे, जिससे उसका साँसारिक निर्वाह भी चलता रहे। और युग सृजन में भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता रहे।


🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.48

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Aug 2017

🔴 मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

🔵 मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

🔴 हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कुत्सा भड़काने वाली अश्लीलता को मिटाया जाय (भाग 1)

🔵 अश्लीलता को अनैतिक माना गया है। शरीर के वे अंग जो कामाचार से सम्बन्धित हैं उन्हें निर्वस्त्र न रखने की मर्यादा है। उन पर दृष्टिपात करने से कामुकता भड़कती और उन मर्यादाओं को तोड़ने के लिए मन चलता है जो नर और नारी के बीच शील मर्यादाओं का पुल बाँधें हुए है।

🔴 मनुष्यता के साथ कितने ही ऐसे शील जुड़े हुए हैं जो पशु-पक्षियों में कीट पतंगों में नहीं है। उनमें अस्तेय नहीं है। किस वस्तु पर किसका अधिकार है यह ज्ञान उन्हें नहीं होता इसलिए खानपान की वस्तुएँ जिसे जहाँ मिलती है वह वहाँ से हथियाने लगता है। दया, क्षमा, उदारता, कृतज्ञता जैसे गुण भी उनमें नहीं होते। स्वार्थ को तनिक सा आघात लगते ही वे क्रुद्ध होते और लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं। इसी प्रकार यौनाचार के सम्बन्ध में कोई मर्यादा उनमें नहीं है। भिन्न लिंग के साथ यौनाचार करने में उन्हें कोई लज्जा, भय, संकोच नहीं होता। किन्तु मनुष्य को वैसी छूट नहीं है। मनुष्य वस्त्र पहनते हैं। विशेषकर कामुकता से संबंधित अवयवों को ढ़ककर रहते हैं। यह मानवोचितशील है। इसकी मर्यादाओं का उल्लंघन करना अश्लीलता कहलाती है, जो हेय मानी गई है।

🔵 जननेन्द्रिय, जंघाए, वक्ष, कमर जैसे अवयव देखने से कामोत्तेजना उभरती है और यौनाचार के लिए मन चलता है। इसलिए स्त्रियाँ भी और पुरुष भी इन अंगों को ढक कर रखते हैं। इनके नग्न प्रदर्शन से मनोविकार भड़कते हैं, जो यौनाचार शील पर आघात पहुँचाते हैं।

🔴 मानवीय शील के अंतर्गत अपनी वैध धर्मपत्नी या धर्म पति के साथ ही यौनाचार की छूट है। अन्यों के साथ विभिन्न सम्बन्धों की विधा है। स्त्रियाँ अन्य पुरुषों के साथ पिता, भाई या पुत्र के सम्बन्ध रखें इसी प्रकार पुरुषों को नारियों के प्रति माता, बहिन या पुत्री के भाव रखने चाहिए। कामुकता की दृष्टि इन मर्यादाओं को तोड़ती और मानवशील को आघात पहुँचाती है। इसीलिए चोरी जैसे अपराधों में उसे गिना गया है।

🌹 क्रमश जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1984 पृष्ठ 45

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/October/v1.45

👉 आज का सद्चिंतन 28 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Aug 2017


👉 देखा जब उस वृद्ध को तो जिन्दगी बदल गई

🔵 एक सेठ के एक इकलौता पुत्र था पर छोटी सी उम्र मे ही गलत संगत के कारण राह भटक गया! परेशान सेठ को कुछ नही सूझ रहा था तो वो ईश्वर के मन्दिर मे गया और ईश दर्शन के बाद पुजारी को अपनी समस्या बताई !

🔴 पुजारी जी ने कहा की आप कुछ दिन मन्दिर मे भेजना कोशिश पुरी करेंगे की आपकी समस्या का समाधान हो आगे जैसी सद्गुरु देव और श्री हरि की ईच्छा !

🔵 सेठ ने पुत्र से कहा की तुम्हे कुछ दिनो तक मन्दिर जाना है नही तो तुम्हे सम्पति से बेदखल कर दिया जायेगा, घर से मन्दिर की दूरी ज्यादा थी और सेठ उसे किराये के गिनती के पैसे देते थे! अब वो एक तरह से बंदिश मे आ गया!

🔴 मंदिर के वहाँ एक वृद्ध बैठा रहता था और एक अजीब सा दर्द उसके चेहरे पर था और रोज वो बालक उस वृद्ध को देखता और एक दिन मन्दिर के वहाँ बैठे उस वृद्ध को देखा तो उसे मस्ती सूझी और वो वृद्ध के पास जाकर हँसने लगा और उसने वृद्ध से पुछा हॆ वृद्ध पुरुष तुम यहाँ ऐसे क्यों बैठे रहते हो लगता है बहुत दर्द भरी दास्तान है तुम्हारी और व्यंग्यात्मक तरीके से कहा शायद बड़ी भूलें की है जिंदगी मे?

🔵 उस वृद्ध ने जो कहा उसके बाद उस बालक का पूरा जीवन बदल गया! उस वृद्ध ने कहा हाँ बेटा हँस लो आज तुम्हारा समय है पर याद रखना की जब समय बदलेगा तो एक दिन कोई ऐसे ही तुम पर हँसेगा! सुनो बेटा मैं भी खुब दौड़ा मेरे चार चार बेटे है और उन्हे जिंदगी मे इस लायक बनाया की आज वो बहुत ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर है वो की आज मैं उन्हे दिखाई नही देता हुं! और मेरी सबसे बड़ी भुल ये रही की मैंने अपने बारे मे कुछ भी न सोचा! अपने इन अंतिम दिनो के लिये कुछ धन अपने लिये बचाकर न रखा इसलिये आज मैं एक पराधीनता का जीवन जी रहा हुं! पर मुझे तो अब इस मुरलीधर ने सम्भाल लिया की यहाँ तो पराधीन हुआ हुं कही आगे जाकर पराधीन न हो जाऊँ!

🔴 बालक को उन शब्दो ने झकझोर कर रख दिया! बालक - मैंने जो अपराध किया है उसके लिये मुझे क्षमा करना हॆ देव! पर हॆ देव आपने कहा की आगे जाकर पराधीन न रहूँ ये मेरी कुछ समझ मे न आया?

🔵 वृद्ध - हॆ वत्स यदि तुम्हारी जानने की ईच्छा है तो बिल्कुल सावधान होकर सुनना अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है ये मानवदेह और पराधीनता से बड़ा कोई अभिशाप नही है और आत्मनिर्भरता से बड़ा कोई वरदान नही है! अभिशाप की जिन्दगी से मुप्ति पाने के लिये कुछ न कुछ जरूर कुछ करते रहना! धन शरीर के लिये तो तपोधन आत्मा के लिये बहुत जरूरी है!

🔴 नियमित साधना से तपोधन जोडिये आगे की यात्रा मे बड़ा काम आयेगा! क्योंकि जब तुम्हारा अंतिम समय आयेगा यदि देह का अंतिम समय है तो धन बड़ा सहायक होगा और देह समाप्त हो जायेगी तो फिर आगे की यात्रा शुरू हो जायेगी और वहाँ तपोधन बड़ा काम आयेगा!

🔵 और हाँ एक बात अच्छी तरह से याद रखना की धन तो केवल यहाँ काम आयेगा पर तपोधन यहाँ भी काम आयेगा और वहाँ भी काम आयेगा! और यदि तुम पराधीन हो गये तो तुम्हारा साथ देने वाला कोई न होगा!

🔴 उसके बाद उस बालक का पुरा जीवन बदल गया!

🔵 इसलिये नियमित साधना से तपोधन इकठ्ठा करो!

रविवार, 27 अगस्त 2017

👉 आत्मोपदेश सरल है

🔴 दूसरों को उपदेश देने के लिए बहुत ज्ञान की, विद्या की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु आत्मोपदेश के लिए थोड़े से ज्ञान से भी काम चल सकता है। दूसरों के मारने के लिए तीर तलवारों को जमा करने और उनका चलाना सीखने की आवश्यकता होती है, पर आत्महत्या के लिए एक छोटी सी रस्सी से गले में फाँसी लग सकती है जरा से चाकू से नस काटकर प्राण गँवाया जा सकता है। आत्म-कल्याण का मार्ग इतना सीधा और सरल है कि उस पर चलने के लिए साधारण बुद्धि भी पर्याप्त है। यहाँ तक कि अशिक्षित व्यक्ति भी उस पर उसी तरह चल सकते हैं जैसे राजकीय सड़क पर हर कोई बिना किसी योग्यता या प्रमाण-पत्र के भी प्रसन्नता पूर्वक चल सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 55)

🌹  परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व देंगे

🔴 उचित- अनुचित का, लाभ- हानि का निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के लिए उपयुक्त बुद्धि भगवान् ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं, पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है, वही महत्त्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है। परम्पराओं की तुलना में तो किसी विरले का ही विवेक जाग्रत रहता है, अन्यथा आंतरिक विरोध रहते हुए भी लोग पानी में बहुत हुए तिनके की तरह अनिच्छित दिशा में बहने लगते हैं। भेड़ों को झुण्ड जिधर भी चल पड़े, उसी ओर सब भेड़ें बढ़ती जाती हैं। एक भेड़ कुँए में गिर पड़े तो पीछे की सब भेड़ें उसी कुँए में गिरती हुई अपने प्राण गँवाने लगती हैं। देखा- देखी की, नकल करने की प्रवृत्ति बंदर में पाई जाती है। वह दूसरों को जैसा करते देखता है, वैसा ही खुद भी करने लगता है। इस अंधानुकरण की आदत को जब मनुष्य का मन भी, इसी तरह मान लेने के लिए करता है, तो वह यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि आदमी बंदर की औलाद है।
 
🔵 समाज में प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ ऐसी हैं, जिनमें लाभ रत्ती भर भी नहीं, हानि अनेक प्रकार से हैं, पर एक की देखा- देखी दूसरा उसे करने लगता है। बीड़ी और चाय का प्रचार दिन- दिन बढ़ रहा है। छोटे- छोटे बच्चे बड़े शौक से इन्हें पीते हैं। सोचा यह जाता है कि यह चीजें बड़प्पन अथवा सभ्यता की निशानी हैं। इन्हीं पीना एक फैशन की पूर्ति करना है और अपने को अमीर, धनवान साबित करना है। ऐसी ही कुछ भ्रांतियों से प्रेरित होकर शौक, मजे, फैशन जैसी दिखावे की भावना से एक की देखा- देखी दूसरा इन नशीली वस्तुओं को अपनाता है और अंत में एक कुटेब के रूप में वह लत ऐसी बुरी तरह लग जाती है कि छुड़ाए नहीं छूटती।
 
🔴 चाय, बीड़ी, भाँग, गाँजा, शराब, अफीम आदि सभी नशीली चीजें भयंकर दुर्व्यसन हैं, इनके द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर नशेबाज स्वभाव की दृष्टि से दिन- दिन घटिया आदमी बनता जाता है। क्रोध, आवेश, चिंता, निराशा, आलस्य, निर्दयता, अविश्वास आदि कितने ही मानसिक दुर्गुण उपज पड़ते हैं। समझाने पर या स्वयं विचार करने पर हर नशेबाज इस लत की बुराई को स्वीकार करता है, पर विवेक की प्रखरता और साहस की सजीवता न होने से कुछ कर नहीं पाता। एक अंध परम्परा में भेड़ की तरह चलता चला जाता है। क्या यही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.76

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.14

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (अंतिम भाग)

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा। संगठन का उद्देश्य और कार्यक्रम समझ लेने पर ही तो कोई उससे प्रभावित होगा और उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करेगा।

🔴 कहने पर से तो इन संस्थाओं के सदस्य सब लोग बन नहीं जायेंगे और यदि बन भी गये तो उनमें वह साहस कहाँ से आवेगा, जिसके बल बूते पर वह बहती नदी के प्रवाह को चीर कर उलटी चलने वाली मछली की तरह नवीन परम्परा स्थापित करने का आदर्श उपस्थित कर सकें निश्चय ही इसके लिए व्यापक प्रचार और प्रयास की जरूरत होगी। जन-संपर्क बनाने के लिए दौरे करने पड़ेंगे, उद्देश्य को समझा सकने वाला साहित्य-जनता तक पहुँचना पड़ेगा और उनके मस्तिष्क में वह भावना भरनी पड़ेगी जिससे वे युगधर्म को पहचान सकें और प्रतिगामिता की हानियों और प्रगतिशीलता के लाभों से परिचित हो सकें।

🔵 जातियों के क्षेत्र छोटे-छोटे हैं बिखरे हुए पड़े हैं, उन बिखरे हुए मन को को एक सूत्र में पिरोने में कितने मनोयोग की आवश्यकता है उसे कार्यक्षेत्र में उतरने वाले ही जानते हैं। कितना विरोध, कितना उपहास, कितना व्यंग सहना पड़ता है, कितना समय नष्ट करना पड़ता है उसे वही सहन कर सकेगा जिसमें त्यागी तपस्वी जैसी भावना विद्यमान हो। घर बैठे मुफ्त में यश को लूट भागने वाले बातूनी लोग इस प्रयोजन को पूरा कहाँ कर सकेंगे? इसलिए सबसे पहली आवश्यकता ऐसे भावनाशील लोगों की ही पड़ेगी, जो युग की सब से बड़ी आवश्यकता-सामाजिक क्रान्ति के लिए अपनी सच्ची श्रद्धा को अञ्जलि में लेकर संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ा सकें।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 52
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/March/v1.52

👉 आज का सद्चिंतन 27 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Aug 2017


👉 पहले अपने अंदर झांको

 🔴 पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।

🔵 शिष्य उस दिव्य दर्पण को पाकर बहुत खुश हुआ। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण का मुँह सबसे पहले गुरुजी के सामने ही कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था।

🔴 दर्पण लेकर वह गुरुकुल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया। और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा लेने से नहीं चूका। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुँचा।

🔵 उसने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा- “गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह तरह के दोष और दुर्गुण हैं।“

🔴 तब गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य दंग रह गया। क्योंकि उसके मन के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण थे।

🔵 तब गुरुजी बोले- “वत्स यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था। दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया, उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।“

🔴 दोस्तों ये हम पर भी लागु होती है। हममें से भी ज़्यादातर लोग अपने अंदर छिपी बड़ी बड़ी बुराइयों को, दुर्गुणों को, गलत आदतों को भी सुधारना नहीं चाहते। लेकिन दूसरों की छोटी छोटी बुराइयों को भी उसके प्रति द्वेष भावना रखते हैं या उसे बुरा भला कहते हैं या फिर दूसरो को सुधरने के लिए उपदेश देने लग जाते हैं। तो सबसे पहले अपने अंदर झांको और अपनी बुराइयों को दूर करो।

शनिवार, 26 अगस्त 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 53)

🌹  संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य-प्रसार के लिए, अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

🔴 इस संसार में अनेक परमार्थ और उपकार के कार्य हैं, वे सब आवरण मात्र हैं, उनकी आत्मा में, सद्भावनाएँ सन्निहित हैं। सद्भावना सहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बनकर रह जाते हैं। अनेक संस्थाएँ आज परमार्थ का आडम्बर करके सिंह की खाल ओढ़े फिरने वाले शृंगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। उनसे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और पुरुषार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुंदर वस्त्र धारण किए हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा के प्रयास किए जाएँगे, वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे।

🔵 बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल-फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले पक्के प्रचारक, पूरी तरह मन, कर्म, वचन से बुराई फैलाने वाले लोग बहुसंख्या में मौजूद हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान् नहीं, बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के वचनों की तरह केवल कहने-सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा-वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने-सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य लाभ की संभावना मान लेते हैं।

🔴 सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़कर और कोई महत्त्वपूर्ण सेवा कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है, पर उसका स्थाई महत्त्व नहीं है। आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति के अतिरिक्त अन्य लोग ऐसी सेवा कर भी नहीं सकते। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या, अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल हे और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं, उनका एकमात्र कारण कुबुद्धि है।

🔵 यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को सही बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीनकाल में कुछ लोग अपने जीवन के उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपना संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान भी मिलना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.73

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.13

👉 विशिष्ट प्रयोजन के लिये, विशिष्ट आत्माओं की विशिष्ट खोज (भाग 4)

🔵 इन विषम परिस्थितियों में बहुमुखी समस्याओं की जड़े लोक मानस में अत्यन्त गहराई में घुसी हुई होने के कारण, युग परिवर्तन अतीव कठिन है। गुण, कर्म, स्वभाव लोक धारा को उलटना-समुद्र के खारी जल को हिमालय की सम्पदा बना देना कितना कठिन है उसे हर कोई नहीं समझ सकता। उसे भुक्तभोगी बादल ही जानते हैं कि उसमें कितना साहस करने कितना भार ढोने कितना उड़ना, और कितना त्याग करना पड़ता है। युग परिवर्तन के भावी प्रयासों को लगभग इसी स्तर का माना जाना चाहिए।

🔴 युग सन्धि की अत्यन्त महत्वपूर्ण वेला है। इन वर्षो में महान परिवर्तन होंगे और विकट समस्याओं को समाधान करना होगा। बुझते दीपक की लौ, प्रभाव से पूर्व की सघन तमिस्रा मरणासन्न की साँस, चींटी के उगते पंख, हारे जुआरी के दाव को देख कर, मरता सो क्या न करता की उक्ति को चरितार्थ होते प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। असुरता अपनी अन्तिम घड़ियों में जीवन-मरण की लड़ाई लड़ेगी और संकट, विक्रह अपेक्षाकृत अधिक बढ़ेंगे। इसी प्रकार देवत्व की प्रतिष्ठापना के लिए भी बीजारोपण के साथ प्रचंड उत्साह के साथ काम करने वाले किसान जैसी भूमिका की दर्शनीय होगी।

🔵 दोनों पक्ष एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी परम साहसकिता का परिचय देंगे। एक दूसरे के साथ टकराने से भी पीछे न हटेंगे। साँड़ लड़ते हैं तो खेत खलिहानों को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। युग परिवर्तन प्रसव पीड़ा जैसे कष्ट कारक होते हैं उसमें डाक्टरों, नर्सो की पूर्णतया जागरुक रहना पड़ता है। प्रसूता की तो जान पर ही बीतती है। उसकी सुरक्षा सान्त्वना में अतिरिक्त इन लोगों को नव जात शिशुओं के लिए आवश्यक सुविधाएँ भी पहले से ही जुटानी होती है।

🔴 युग संधि में दुहरे उत्तरदायित्व जागृत आत्माओं को सँभालने पड़ते हैं। विनाशकारी परिस्थितियों से जूझना और विकास के सृजन प्रयोजनों को सोचना। किसान और माली को भी यही करना पड़ता है। खर पतवार उखाड़ना-बेतुकी डालियों को काटना- पशु पक्षियों से फसल को रखाना जैसी प्रतिरोध सुरक्षा की जागरुकता दिखाने पर ही उनके पल्ले कुछ पड़ेगा अन्यथा परिश्रम निरर्थक चले जाने की आशंका बनी रहेगी। उन्हें एक मोर्चा सृजन का भी सँभालना पड़ता है। बीज-बोना, खाद देना, सिंचाई का प्रबन्ध करना, रचनात्मक काम है। इसकी उपेक्षा की जाय तो उत्पादन की आशा समाप्त होकर ही रहेगी। इसे दो मोर्चो पर दुधारी तलवार से लड़ने के समतुल्य माना जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1980 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1980/February/v1.47

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 Aug 2017

🔴 साधारणतया मनुष्य दुख-सुख का कारण बाहरी वस्तुओं का संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारण के कारण अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में एवं प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही वह लगा रहता है। पर विचारकों ने यह देखा कि एक ही वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु या बात एक समय में सुखकर प्रतीत होती हैं और अन्य समय में वही दुःखकर अनुभूत होती है इससे वस्तुओं का संयोग वियोग ही सुख-दुःख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसंधान में बाहरी दुखों एवं सुखों का समभाव रखने को महत्व दिया गया है।

🔵 आत्मोन्नति एकाँगी नहीं होती, केवल एक से ही वह पूरी नहीं हो सकती वरन् तत्संबन्धी सभी उपकरण जुटाने पड़ते हैं। पहलवान का इच्छुक व्यक्ति केवल मात्र व्यायाम पर जुटा रहे और पौष्टिक भोजन, तेल, मालिश, ब्रह्मचर्य, विश्राम आदि की उपेक्षा करे तो उसका सफल होना कठिन है। आत्मोन्नति के सुव्यवस्थित साधनों के संबंध में आध्यात्म विद्या के तत्वदर्शी आचार्य सदा से सावधान रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्यों की सर्वांगीण उन्नति पर सदा से ही पूरा पूरा ध्यान रखा है और इस संबंध में बड़े नियमों प्रतिबंधों एवं उत्तरदायित्वों का शास्त्रों में अनेक प्रकार का वर्णन किया है। व्यवहारिक जीवन उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, लोक सेवा एवं स्वार्थ त्याग से ओत-प्रोत आचरणों का अधिकाधिक अवसर आना उन अवसरों पर अपना उत्तरदायित्व सफलतापूर्वक पूरा किया जाना प्रत्येक साधके के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

🔴 दूसरों के दुःख का असर होना इसको दया कहते हैं। अथवा दुःखी जीवों के प्रति जो प्रीति-भाव रखा जाता है, उसको दया कहते हैं। इस दयावृत्ति से संवेदना-शक्ति की उन्नति होती है। दयावृत्ति का भक्ति और प्रीति के साथ अतिघनिष्ठ सम्बन्ध है। जो मनुष्य प्राणीमात्र के अंतःकरण में ईश्वर का निवास मानकर भक्ति करता है वही सबसे प्रेम भाव रख सकता है, और उसी से दूसरों का दुःख नहीं देखा जाता। दूसरों के दुःख को देखकर उसको अपने अंतर में दुःख का असर होता है, जिससे तत्काल हृदय द्रवीभूत होकर अपने अंतर के दुःख की निवृत्ति के लिये दुःखी प्राणी की सहायता करने के लिये तत्पर होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मनस्वी लोक सेवक चाहिए (भाग 3)

🔵 बुद्ध धर्म के शून्यवाद ने जब वैदिक परम्पराओं को ग्रस लिया था तब साँस्कृतिक दुर्दशा पर महल के झरोखे में बैठी आँसू बहाती हुई राजकुमारी की आँखों का पानी सड़क पर चलते हुए कुमारिल भट्ट के ऊपर पड़ा। उसने ऊपर आँख उठा कर देखा और कारण पूछा तो राजकुमारी ने कहा-को वेदान् उद्धरस्यसि? अर्थात् वेदों का उद्धार कौन करेगा? कुमारिल का पौरुष इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा कि मैं करूंगा? और सचमुच उस कर्मठ युवक ने वैदिक सभ्यता की रक्षा के लिए वह सब कुछ कर दिखाया जो कोई निष्ठावान व्यक्ति कर सकता है। आज विवाहों के अपव्यय ने भारतीय संस्कृति को उस घृणित एवं मरणोन्मुख परिस्थितियों में ला पटका है जिसमें कुछ दिन वह और पड़ी रही तो उसे अपनी मौत आप मर जाने के लिए ही विवश होना पड़ेगा। कुमारिल भट्ट की इस कुसमय की घड़ी में जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।

🔴 यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा के नाम पर चारों ओर व्याप्त नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए गौतम बुद्ध की आत्मा विद्रोह कर उठी थी, उनने तप करके जो शक्ति प्राप्त की, उसे समाज की तत्कालीन प्रवृत्तियों को बदलने में लगा दिया। आज यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा से बढ़ कर विवाहों के नाम पर होने वाले अपव्यय की क्रूर बलिवेदी लाखों कन्याओं के रक्त स्नान से अभिषिक्त होती रहती है। इस नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए सहस्रों युद्धों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है पर सब ओर सन्नाटा देख कर ‘वीर विहीन मही’ होने की आशंका दिखाई पड़ने लगती है और भारतीय गौरव का मस्तक लज्जा से नीचा झुक जाता है।

🔵 युग-निर्माण के उपयुक्त अभिनव समाज रचना का महान अभियान आरम्भ करते हुए सबसे प्रथम यही आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि प्रत्येक जाति में ऐसे तेजस्वी युवक निकलें जो संगठन की प्रारम्भिक भूमिका का ढाँचा खड़ा करने में अपना समय लगावें और साहसपूर्वक कुछ काम कर गुजरने की लगन लेकर आगे बढ़ें। इसके लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आजीविका कमाते हुए, बच्चों का पालन करते हुए भी कोई व्यक्ति थोड़ा समय पारमार्थिक कामों में लगाता रहे तो उतने में भी सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो सकता है। पूरा समय दे सकने वाले प्रतिभाशाली लोग वानप्रस्थों की तरह देश धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए मिल सकें तब तो कहना ही क्या है?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च1964 पृष्ठ 51-52

👉 आज का सद्चिंतन 26 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 Aug 2017


👉 दुःख और सुख


🔴 पाप से मन को बचाये रहना और उसे पुण्य में प्रवृत्त रखना यही मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

🔵 एक बहुत अमीर सेठ थे। एक दिन वे बैठे थे कि भागती-भागती नौकरानी उनके पास आई और कहने लगीः

🔴 "सेठ जी! वह नौ लाख रूपयेवाला हार गुम हो गया।"

🔵 सेठ जी बोलेः "अच्छा हुआ..... भला हुआ।" उस समय सेठ जी के पास उनका रिश्तेदार बैठा था। उसने सोचाः बड़ा बेपरवाह है! आधा घंटा बीता होगा कि नौकरानी फिर आईः "सेठ जी! सेठ जी! वह हार मिल गया।" सेठ जी कहते हैं- "अच्छा हुआ.... भला हुआ।"

🔴 वह रिश्तेदार प्रश्न करता हैः "सेठजी! जब नौ लाख का हार चला गया तब भी आपने कहा कि 'अच्छा हुआ.... भला हुआ' और जब मिल गया तब भी आप कह रहे हैं 'अच्छा हुआ.... भला हुआ।' ऐसा क्यों?"

🔵 सेठ जीः "एक तो हार चला गया और ऊपर से क्या अपनी शांति भी चली जानी चाहिए? नहीं। जो हुआ अच्छा हुआ, भला हुआ। एक दिन सब कुछ तो छोड़ना पड़ेगा इसलिए अभी से थोड़ा-थोड़ा छूट रहा है तो आखिर में आसानी रहेगी।"

🔴 अंत समय में एकदम में छोड़ना पड़ेगा तो बड़ी मुसीबत होगी इसलिए दान-पुण्य करो ताकि छोड़ने की आदत पड़े तो मरने के बाद इन चीजों का आकर्षण न रहे और भगवान की प्रीति मिल जाय।

🔵 दान से अनेकों लाभ होते हैं। धन तो शुद्ध होता ही है। पुण्यवृद्धि भी होती है और छोड़ने की भी आदत बन जाती है। छोड़ते-छोड़ते ऐसी आदत हो जाती है कि एक दिन जब सब कुछ छोड़ना है तो उसमें अधिक परेशानी न हो ऐसा ज्ञान मिल जाता है जो दुःखों से रक्षा करता है।

🔴 रिश्तेदार फिर पूछता हैः "लेकिन जब हार मिल गया तब आपने 'अच्छा हुआ.... भला हुआ' क्यों कहा?"

🔵 सेठ जीः "नौकरानी खुश थी, सेठानी खुश थी, उसकी सहेलियाँ खुश थीं, इतने सारे लोग खुश हो रहे थे तो अच्छा है,..... भला है..... मैं क्यों दुःखी होऊँ? वस्तुएँ आ जाएँ या चली जाएँ लेकिन मैं अपने दिल को क्यों दुःखी करूँ ? मैं तो यह जानता हूँ कि जो भी होता है अच्छे के लिए, भले के लिए होता है।

🔴 जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा अच्छा ही है। होगा जो अच्छा ही होगा, यह नियम सच्चा ही है। मेरे पास मेरे सदगुरू का ऐसा ज्ञान है, इसलिए मैं बाहर का सेठ नहीं, हृदय का भी सेठ हूँ।"

🔵 हृदय का सेठ वह आदमी माना जाता है, जो दुःख न दुःखी न हो तथा सुख में अहंकारी और लम्पट न हो। मौत आ जाए तब भी उसको अनुभव होता है कि मेरी मृत्यु नहीं। जो मरता है वह मैं नहीं और जो मैं हूँ उसकी कभी मौत नहीं होती।

🔴 मान-अपमान आ जाए तो भी वह समझता है कि ये आने जाने वाली चीजें हैं, माया की हैं, दिखावटी हैं, अस्थाई हैं। स्थाई तो केवल परमात्मा है, जो एकमात्र सत्य है, और वही मेरा आत्मा है। जिसकी समझ ऐसी है वह बड़ा सेठ है, महात्मा है, योगी है। वही बड़ा बुद्धिमान है क्योंकि उसमें ज्ञान का दीपक जगमगा रहा है।

🔵 संसार में जितने भी दुःख और जितनी परेशानियाँ हैं उन सबके मूल में बेवकूफी भरी हुई है। सत्संग से वह बेवकूफी कटती एवं हटती जाती है। एक दिन वह आदमी पूरा ज्ञानी हो जाता है। अर्जुन को जब पूर्ण ज्ञान मिला तब ही वह पूर्ण संतुष्ट हुआ। अपने जीवन में भी वही लक्ष्य होना चाहिए।

👉 बूढ़ा पिता

🔷 किसी गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति अपने बेटे और बहु के साथ रहता था। परिवार सुखी संपन्न था किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी । बूढ़ा बाप ज...