सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 14 Feb 2017


👉 मृत महिला को मिला नया जीवन

🔴 घटना दिसम्बर सन् 1969 की है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य यज्ञ कराने प्रथमतः पटना पहुँचे। इस यज्ञ में शामिल होने के लिए मेरे पिताजी श्री विजय कुमार शर्मा अपनी माता जी- मेरी दादी- के साथ जमालपुर से आकर यज्ञ में शामिल हुए। विशाल जन- समूह के बीच हर्षोल्लास के साथ वैदिक रीति से यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। यज्ञ की समाप्ति पर सभी अपने- अपने घर की ओर चल पड़े। पिताजी भी दादी जी के साथ मुंगेर की वापसी की ट्रेन पकड़ने पटना रेलवे स्टेशन पर आए। वहाँ पहुँचते ही दादी के पेट में अचानक बहुत तेज दर्द शुरू हुआ। लम्बी यात्रा और दिन भर की थकान से पेट में गैस बन जाने की आशंका को लेकर पिताजी ने दादी को नींबू- पानी पिलाया। दादी की तबीयत बजाय सुधरने के और भी बिगड़ती चली गई। दादी के मुँह से झाग निकलना शुरू हुआ और कुछ ही देर बाद दादी ने दम तोड़ दिया

🔵 दादी को मरे हुए चार घण्टे गुजर चुके थे। चेहरे पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगी थीं। लाश के चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गई थी। स्टेशन मास्टर रेलवे स्टेशन के अन्य कर्मचारियों के साथ लाश को जमालपुर भेजने की तैयारी में व्यस्त थे

🔴 तभी प्लेटफार्म नं.४ के जन- समुदाय ने नारा लगाया- गुरुजी की जय...... गायत्री माता की जय.....। पिताजी प्लेटफार्म नम्बर- १ पर थे। नारे की ऊँची आवाज से उनका ध्यान प्लेटफार्म नं.४ पर गया। उन्होंने दूर से गुरुजी को देखा। दौड़कर रेल की पटरियों को फलाँगते हुए प्लेटफार्म नं.४ पर पहुँचे। पिताजी की आँखों के आँसू रुक नहीं रहे थे। उन्होंने कँपकँपाती हुई आवाज में गुरुजी से कहा- गुरुजी! मेरी माँ मर गई। उन्हें ......। आगे के शब्द पिताजी के गले में ही अटके रह गए। वे फूट- फूटकर रोने लगे। गुरुदेव ने पिताजी के कंधे पर हाथ रखा और साथ लेकर दो नं. प्लेटफार्म पर जाने के लिए पुल की ओर बढ़े। भीड़ पीछे- पीछे चल पड़ी। क्षण भर के लिए गुरुजी ने दादी की लाश को देखा और मुस्कुराते हुए बोल पड़े- उठा..उठा..माँ को उठा। पिता जी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे।  
    
🔵 गुरुदेव के दुबारा कहने पर उन्होंने यंत्रवत माँ को उठाने की चेष्टा की। ...और आश्चर्य! दादी माँ सचमुच उठकर बैठ गईं। उस वक्त दादी की उम्र प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी थी। गुरुदेव ने पिताजी से कहा- माता जी को घर ले जा, अब इनकी उम्र दो गुनी हो चुकी है। पिताजी, दादी जी को लेकर खुशी- खुशी वापस जमालपुर पहुँचे। तभी से पूरा परिवार गुरुदेव को भगवान मानकर उनके युग परिवर्तन के अनुपम अभियान में जुट गया। युगऋषि का कथन अक्षरशः सत्य हुआ। दादी माँ गुरु- कृपा से उनकी दी हुई दोगुनी उम्र (80 वर्षों) तक आनन्दपूर्वक लोकसेवा करती रहीं और अन्ततः ऋषि सत्ता में विलीन हो गईं।
    
🌹 सुदर्शन कुमार देव संस्कृति विश्वविद्यालय
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 37)

🌹 साप्ताहिक और अर्द्ध वार्षिक साधनाएँ    

🔴 तीसरा साप्ताहिक अभ्यास है-प्राण संचय। एकान्त में नेत्र बन्द करके अन्तर्मुखी होना चाहिये और ध्यान करना चाहिये कि समस्त विश्व में प्रचण्ड प्राण चेतना भरी हुई है। आमन्त्रित आकर्षित करने पर वह किसी को भी प्रचुर परिमाण में कभी भी उपलब्ध हो सकती है। इसकी विधि प्राणायाम है। प्राणायाम के अनेक विधि-विधान हैं। पर उनमें से सर्वसुलभ यह है कि मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठा जाये। आँखें बन्द रहें। दोनों हाथ घुटनों पर। शरीर को स्थिर और मन को शान्त रखा जाय।     

🔵 साँस खींचते समय भावना की जाये कि विश्वव्यापी प्राण चेतना खिंचती हुई नासिका मार्ग से सम्पूर्ण शरीर में प्रवेश कर रही है। उसे जीवकोष पूरी तरह अपने शरीर में धारण कर रहे हैं। प्राण प्रखरता से अपना शरीर, मन और अन्त:करण ओतप्रोत हो रहा है। साँस खींचने के समय इन्हीं भावनाओं को परिपक्व करते रहा जाये। साँस छोड़ते समय यह विचार किया जाये कि शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में घुसे हुये विकार साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं और उनके वापस लौटने का द्वार बन्द हो रहा है। इस बहिष्करण के साथ अनुभव होना चाहिये कि भरे हुए अवांछनीय तत्त्व हट रहे हैं और समूचा व्यक्तित्व हलकापन अनुभव कर रहा है। प्रखरता और प्रामाणिकता की स्थिति बन रही है।    
                        
🔴 चौथा साप्ताहिक अभ्यास मौन वाणी की साधना है। मौन दो घण्टे से कम का नहीं होना चाहिये। मौनकाल में प्राण संचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिये उतना करने का प्रयास करना चाहिये। सेवा कार्यों के लिये प्रत्यक्ष अवसर सामने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्द्धन के ज्ञान यज्ञ के निमित्त लगनी चाहिये। पीड़ितों की सहायता के लिये हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिये। ज्ञानयज्ञ तो उच्चस्तरीय ब्रह्मयज्ञ है, जिसके साथ प्राणिमात्र का कल्याण जुड़ा हुआ है। साप्ताहिक साधना का दिन ऐसे ही श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाना चाहिये।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सहनशीलता में महानता सन्निहित है

🔴 बात सन् १९६५ की है। उन दिनों भारत-पाकिस्तान का संघर्ष चल रहा था। चाहे जब हवाई हमले की घंटी बज सकती थी सुरक्षा के लिये प्रधान मंत्री भवन मे भी खाई बनवाई गई थी। प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री को कहा गया कि ''आज हमले की आशंका अधिक है आप घंटी बजते ही तुरंत खाई में चले जायें।''

🔵 किंतु दैवयोग से हमला नहीं हुआ। प्रातः देखा गया कि बिना बमबारी के खाई गिरकर पट गई है। खाई बनाने वालों तथा उसे पास करने वालों की यह अक्षम्य लापरवाही थी। यदि वे उस रात खाई के अंदर होते तो क्या होता सोचकर राँगेटे खडे हो जाते हैं। देश के प्रधानमंत्री का जीवन कितना मूल्यवान् होता है? वह भी युद्धकाल में?

🔴 अन्य व्यवस्था अधिकारियों ने भले ही इस प्रसंग पर कोई कार्यवाही की हो, किन्तु शास्त्रीजी ने संबंधित व्यक्तियों के प्रति कोई कठोरता नहीं बरती अपितु बालकों की भाँति क्षमा कर दिया।

🔵 दूसरी घटना भी सन् १९६५ ही है। युद्धकाल था ही, चौबीस घंटों में कभी भी कैबिनेट की इमरजैंसी मीटिंग हो जाती थी। उस दिन भी संध्या समय मीटिग थी। कडाके की ठंड थी, किन्तु उत्तरदायिवों के प्रति सजग तथा समय के पाबंद हमारे तत्कालीन प्रधान मंत्री नियत समय पर मीटिग के लिये चल दिए। जाकर कार मे बैठ गए। पर जब बडी़ देर हो गई और कार खडी ही रही तो उन्होंने इस संबंध में पूछताछ की और देर होने की बात भी कही।

🔴 तब कही संयोजक महोदय ने बताया कि मीटिग तो आज उन्हीं के घर पर है। कोई दूसरा प्रधान मंत्री होता तो यों अपना समय नष्ट करने पर संबधित अधिकारी को अवश्य ही प्रताडित करता, किन्तु वे दूसरों की त्रुटियों को माँ जैसी ममतापूर्वक ही सहन कर जाते थे।

🔵 आमतौर पर ऐसा होता है कि लोग घर में तो अधिकार-आशा तथा डांट-फटकार से काम लेते हैं और बाहर सज्जनता तथा उदारता के प्रतीक बने रहते हैं, किन्तु शास्त्रीजी इसके अपवाद थे। वे स्वभाव से ही उदार तथा सहिष्णु थे।

🔴 ताशकंद जाने के एक दिन पूर्व वे भोजन कर रहे थे। उस दिन उनकी पसंद का भोजन था। खिचडी तथा आलू का भरता। ये दोनों वस्तुएँ उन्हें सर्वाधिक प्रिय थीं। बडे़ प्रेम से खाते रहे। जब खा चुके उसके थोडी़ देर बाद उन्होंने वही प्रसंग आने पर बडे़ ही सहज भाव से श्रीमती ललिता जी से पूछा-क्या आज आपने खिचडी़ में नमक नहीं डाला था ? ललिता जी को बडा खेद हुआ अपनी गलती पर किन्तु वहाँ न कोई शिकायत थी न क्रोध मुस्कराते ही रहे वे फीकी खिचडी़ खाकर।

🔵 दूसरों की गलतियों को भी क्षमा कर देना तथा बजाय डांट-फटकार या चिल्ल-पुकार मचाने के प्रेमपूर्वक बता देना निश्चय ही एक महान् गुण हैं। शास्त्रीजी सहनशीलता के प्रतीक थे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 27, 28

👉 शिवाजी को बुढिया की सीख

🔵 शिवाजी उन दिनों मुगलों के विरुद्ध छापा मार युद्ध लड़ रहे थे। रात को थके-माँदे वे एक वनवासी बुढ़िया की झोपड़ी में जा पहुँचे और कुछ खाने-पीने की याचना करने लगे। बुढ़िया के घर में कोदों थी सो उसने प्रेमपूर्वक भात पकाया और पत्तल पर उसने सामने परस दिया। शिवाजी बहुत भूखे थे। सो सपाटे से भात खाने की आतुरता में उँगलियाँ जला बैठे, मुँह से फूँककर जलन शान्त करनी पड़ी। बुढ़िया ने आँखें फाड़कर देखा और बोली-सिपाही तेरी शक्ल शिवाजी जैसी लगती है और साथ ही यह भी लगता है कि तू उसी की तरह मूर्ख भी है। '

🔴 शिवाजी स्तब्ध रह गये। उनने बुढ़िया से पूछा-'भला शिवाजी की मूर्खता तो बताओ और साथ ही मेरी भी। ' बुढ़िया ने कहा-'तू ने किनारे-किनारे से थोड़ी-थोड़ी ठण्डी कोदों खाने की अपेक्षा बीच के सारे भात में हाथ मारा और उँगलियाँ जला लीं। यही बेअकली शिवाजी करता है। वह दूर किनारों पर बसे छोटे-छोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की अपेक्षा बड़े किलों पर धावा बोलता है और मार खाता है।

🔵 शिवाजी को अपनी रणनीति की विफलता का कारण विदित हो गया। उन्होंने बुढ़िया की सीख मानी और पहले छोटे लक्ष्य बनाये और उन्हें पूरी करने की रीति-नीति अपनाई। छोटी सफलताएँ पाने से उनकी शक्ति बढ़ी और अन्तत: बड़ी विजय पाने में समर्थ हुए।

🔴 शुभारम्भ हमेशा छोटे-छोटे कदमों से होता है, पर यथार्थता की प्रकाश किरणें इतने मात्र से एक व्यक्ति की जीवन धारा बदल देती है।

👉 गहना कर्मणो गतिः

🔵 वेद में ऋषि कहते हैं- ‘‘उत्थानं ते पुरुष नावयानम्’’ अर्थात् हे जीव! तुझे उठना है, नीचे नहीं गिरना है। मानव योनि में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा को पहचान व स्वयं को ऊँचा उठा। ‘‘कितने हैं जो इस मर्म को समझ पाते हैं कि मनुष्य जीवन हमें अपने पशुत्व को उभारने के लिए नहीं, देवत्व को विकसित करने के लिए मिला है। कर्मों की श्रेष्ठता द्वारा मनुष्य निश्चित ही उस पुल को पार कर सकता है जो देवत्व एवं पशुत्व के बीच बना सेतु अनन्तकाल से हम सबकी प्रगति की यात्रा का राज मार्ग बना हुआ है। इस पुल तक पहुँचना, देवत्व को पहचानना व फिर उस यात्रा पर चल पड़ना जिनसे भी सम्भव हो पाता है, वे सभी विवेकशील, दूरदर्शी देवमानव कहे जाते हैं।’’

🔴 गीताकार के अनुसार किसी भी काल में क्षणमात्र भी कोई कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भगवान् स्वयं कहते हैं कि यदि वे भी एक क्षण कर्म करना बन्द कर दें तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। सारा लोक व्यवहार नष्ट हो जाए। कर्म करते रहना, कर्त्तव्यपरायण बने रह कर मनुष्य जीवन को सतत् प्रगति की ओर, देवत्व की ओर बढ़ाते चलना ही मनुष्य की सहज नियति है। यह बात अलग है कि कर्म का स्वरूप जाने बिना जब मनुष्य अशुभ कर्मों में, अकर्मों, विकर्मों में निरत हो जाता है तो वह जीवन यात्रा को चलाते हुए भी पतन की ओर ही जाता देखा जाता है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं ‘‘कर्म क्या है, अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं, इसीलिए सभी को कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, अकर्म का भी, विकर्म का भी, क्योंकि कर्म की गति गहन है।’’ (गहना कर्मणो गतिः)

🔵 अकर्म उन्हें कहा जाता है जिन्हें न करने से पुण्य तो नहीं होता, किन्तु किये जाने पर पाप लगता है। विकर्म उन्हें कहते हैं जो परिस्थिति विशेष के अनुसार वास्तविक रूप से कुछ अलग स्वरूप ले चुके हैं तथा निषिद्ध कर्म बन गए हैं, यथा कुपात्र को दान देना। कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखने का नीर-क्षीर विवेक पैदा करने के लिए गीताकार मार्गदर्शन करता हुआ कहता है कि मनुष्य को यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों को बिना किसी आसक्ति के करते रहना चाहिए तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है। यज्ञ के निमित्त अर्थात् परमार्थ प्रयोजनों के लिए। जो भी कर्म इस भाव से किये जायेंगे वे सत्कर्म कहलायेंगे व बन्धनों से परे व्यक्ति को जीवन्मुक्ति की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया के माया-जंजाल से, भवबन्धनों से मुक्ति सहज ही मिल सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या 
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 14

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 Feb 2017

🔵 प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने। 

🔴 यदि किसी को अधिक भौतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि दूसरों का उत्पीड़न किया जाए। आपका स्वास्थ्य उत्तम है तो दुर्बलों को सताइये नहीं। अपनी योग्यताओं का लाभ प्राप्त करिये पर दूसरों के अधिकार तो न छीनिए। संसार में सभी प्राणी स्वतन्त्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आये हैं, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के कष्ट पहुँचाना अन्याय है। सभी आपकी तरह सुख और सुविधायें प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आपकी तरह वे भी अपने प्रयत्नों में लगे हैं, यदि किसी तरह उनकी सहायता नहीं कर सकते तो इतना कीजिये कि आपकी तरफ से उनके प्रयत्नों में किसी तरह की रुकावट न पैदा की जाय।

🔵 महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 9)

🌹 विचारों का महत्व और प्रभुत्व

🔴 कुंए में मुंह करके आवाज देने पर वैसी ही प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। संसार भी एक कुंए की आवाज की तरह ही है। मनुष्य जैसा सोचता है, विचारता है वैसी की प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही उसके आसपास का वातावरण बन जाता है। मनुष्य के विचार शक्तिशाली चुम्बक की तरह हैं जो अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक ही तरह के विचारों के घनीभूत होने पर वैसी ही क्रिया होती है और वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त होते हैं।

🔵 विचार की प्रचण्ड शक्ति असीम, अमर्यादित, अणुशक्ति से भी प्रबल विचार जब घनीभूत होकर संकल्प का रूप धारण कर लेता है तो स्वयं प्रकृति अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी उसको मार्ग देती है। इतना ही नहीं उसके अनुकूल बन जाती है। मनुष्य जिस तरह के विचारों को प्रश्रय देता है, उसके वैसे ही आदर्श, हाव-भाव, रहन-सहन ही नहीं, शरीर में तेज, मुद्रा आदि भी वैसे ही बन जाते हैं। जहां सद्विचारों  की प्रचुरता होगी वहां वैसा ही वातावरण बन जायेगा। ऋषियों के अहिंसा, सत्य, प्रेम, न्याय के विचारों से प्रभावित क्षेत्र में हिंसक पशु भी अपनी हिंसा छोड़कर अहिंसक पशुओं के साथ विचरण करते थे।

🔴 जहां घृणा, द्वेष, क्रोध आदि से सम्बन्धित विचारों का निवास होगा वहां नारकीय परिस्थितियों का निर्माण होना स्वाभाविक है। मनुष्य में यदि इस तरह के विचार कर जांय कि मैं अभागा हूं, दुःखी हूं, दीन-हीन हूं तो उसका अपकर्ष कोई भी शक्ति रोक नहीं सकेगी। वह सदैव दीन हीन परिस्थितियों में ही पड़ा रहेगा। इसके विपरीत मनुष्य में सामर्थ्य, उत्साह, आत्मविश्वास, गौरवयुक्त विचार होंगे तो प्रगति-उन्नति स्वयं ही अपना द्वार खोल देगी। सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति का उपयोग ही व्यक्ति को सर्वतोमुखी सफलता का प्रदान करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 17)

🌹 साधनों से भी अधिक सद्गुणों की आवश्यकता 

🔵 कहने को तो यों भी कहा जाता है कि अभावग्रस्त परिस्थितियों के कारण मनुष्य को त्रास सहने पड़ते हैं, पर गम्भीरता के साथ निरीक्षण-परीक्षण करने पर तो दूसरी ही बात सामने आती है। व्यक्तित्व की गहराई में घुसी हुई अवाञ्छनीयताओं के कारण ही मनुष्य गई गुजरी परिस्थितियों में पड़ा रहता है। श्रमिकों में कितनी ही अच्छी कमाई करते हुये भी देखें जाते हैं, पर उनकी आदत में नशेबाजी, जुआ, आवारागर्दी जैसी कितनी ही बुरी आदतें जुड़ जाती हैं। 

🔴 जो कमाते हैं, उसे गँवा देते हैं और अभावों की शिकायत करते हुए ही जिन्दगी गुजारते हैं। उनका परिवार भी इसी अनौचित्य की चक्की में पिसता और बरबाद होता रहता है। बात श्रमिकों तक ही सीमित नहीं हैं, वह धनिकों के ऊपर और भी अधिक स्पष्ट रूप से लागू होती है। दुरुपयोग उन्हें भी दुर्गुणी, दुर्व्यसनी बनाता ही है। अपव्यय के रहते किसी के पास खुशहाली रह सकेगी या उसके माध्यम से उपयोगी प्रगति सम्भव हो सकेगी, इसकी आशा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।    

🔵 धनिकों की विद्वानों की, समर्थों की, कलाकारों की अपने देश में कमी नहीं। देश में गरीब और अशिक्षितों का बाहुल्य होते हुए भी, प्रतिभावानों का इतना बड़ा वर्ग मौजूद है, जो अपने साधनों को सर्वतोमुखी प्रगतिशीलता के लिए नियोजित कर सके, तो उतने भर से ही उत्थान उत्कर्ष और अभ्युदय का वातावरण देखते देखते बन सकता है। महापुरुषों का आँकलन दो ही आधारों पर होता है, एक तो उनने समर्थता अर्जन के लिए कठोर प्रयत्न किया है, दूसरा उन उपलब्धियों को उदारतापूर्वक प्रगतिशीलता के पक्षधर सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया होता है। यह दो कदम उठाने पर कोई महामानवों की पंक्ति में बैठ सकने की स्थिति में पहुँच जाता है। ऐसे लोगों का बाहुल्य जिस भी समुदाय में, क्षेत्र में होगा, वहाँ न सौहार्द्र की कमी रहेगी, न समर्थता की, न प्रगतिशीलता की। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जीवन कैसे जीयें? (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 संसार में हम हैं। संसार में रह करके हम अपने कर्तव्य पूरे करें। हँसी-खुशी से रहें, अच्छे तरीके से रहें, लेकिन इसमें इस कदर हम व्यस्त न हो जायें, इस कदर फँस न जायें कि हमको अपने जीवन के उद्देश्यों का ध्यान ही न रहे। अगर हम फँसेंगे तो मरेंगे।

🔵 आपने उस बन्दर का किस्सा सुना होगा जो अफ्रीका में पाया जाता है-सिम्बून और जिसके बारे में ये कहा जाता है कि शिकारी लोग उसको चने, मुट्ठी भर चने का लालच देकर के उसकी जान ले लेते हैं। लोहे के घड़े में चने भर दिये जाते हैं और सिम्बून उन चनों को खाने के लिये आता है, मुट्ठी बाँध लेता है, मुट्ठी को निकालना चाहता है तो मुट्ठी निकलती नहीं है। जोर लगाता है तो भी नहीं निकलती, इतनी हिम्मत नहीं होती कि मुट्ठी को खाली कर दे, छोड़ दे और हाथ को खींचे। लेकिन वो मुट्ठी को छोड़ना नहीं चाहता है। छोड़ने के न चाहने का परिणाम ये होता है कि हाथ बाहर निकलता नहीं और शिकारी आता है, उसको मार-काट के खतम कर देता है, फिर उसकी चमड़ी को उखाड़ लेता है। हम और आपकी स्थिति ऐसी है, जैसे अफ्रीका के सिम्बून बन्दरों जैसी।

🔴 हम लिप्साओं के लिये, लालसाओं के लिये, वासनाओं के लिये, तृष्णा के लिये, अहंकार की पूर्ति के तरीके से मुट्ठी पकड़ करके बन्दरों के तरीके से फँसे रहते हैं और अपनी जीवन सम्पदा का विनाश कर देते हैं, जिससे हमको बाज आना चाहिए और हमें अपने आपको इससे बचाने के लिये कोशिश करनी चाहिए। हमको अपनी क्षुद्रता का त्याग करना है। क्षुद्रता का अगर हम त्याग कर देते हैं, तो हम कुछ खोते नहीं हैं, हम कमाते ही कमाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 103)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 8. विवाह योग्य लड़की लड़कों की जानकारी:-- संगठन बन जाने पर उसका प्रथम कार्य प्रगतिशील लोगों के लड़के लड़कियों की जानकारी क्षेत्रीय दफ्तर में एकत्रित करना है। प्रत्येक ग्राम सभा अपने यहां से इस प्रकार की सूचना संग्रह करके क्षेत्रीय कार्यालयों में भेजा करेगी। जो लोग आदर्श विवाह करने के लिए सहमत हों, उन्हीं की जानकारियां संग्रह की जांय। क्योंकि यह सारा प्रयत्न ही आदर्श विवाहों के प्रचलन के लिये किया गया है। जिन्हें पुराने ढर्रे के देन-दहेज और ठाट-बाट के विवाह करने हैं वे अपने आप, अपने ढंग से लड़की-लड़के ढूंढ़ते रहते हैं। हमें तो उन लोगों की सुविधा की दृष्टि से इतना बड़ा यह ढांचा खड़ा करना पड़ रहा है जो आदर्श विवाहों के इच्छुक हों, उनको अपने ही विचारों एवं आदर्श वाले सम्बन्धी मिल सकें यही हमारा उद्देश्य रहना चाहिये।

🔵 ऐसी सूचनाऐं एक क्षेत्र के एक ही दफ्तर में रह सकती हैं। उस क्षेत्र की सभी उपजातियों या जातियों की सूचनाएं अलग-अलग फाइलों में एक ही दफ्तर में एकत्रित रह सकती हैं। सभी जातियों का एक ही दफ्तर रह सकता है। इसी प्रकार संगठनकर्त्ता भी एक ही सब जातियों के लिए काम दे सकता है। क्षेत्रीय प्रगतिशील जातीय सभा कार्यालय आरम्भ में एक ही रखना होगा। पीछे जब काम का बहुत विस्तार हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि चार वर्णों के अलग-अलग कार्यालय बांटे जा सकते हैं और यदि काम बहुत बढ़ जाय तो उपजातियों के लिये भी अलग दफ्तर की आवश्यकता पूरी की जा सकती है, पर आरम्भ में एक ही संगठन-कर्त्ता की नियुक्ति करना उचित होगा।

🔴 9. प्रचार साधन और सुविधाएं:-- आदर्श विवाहों की आवश्यकता, उपयोगिता एवं रूपरेखा समझने के लिये व्यापक प्रचार की आवश्यकता होगी। इन विचारों से जब तक लोगों को प्रभावित न किया जायगा, तब तक वे उससे सहमत न होंगे और वैसा करने के लिए साहस न कर सकेंगे। इसलिये छोटी-मोटी पुस्तिकाएं पढ़ना, भजन, गायन, चित्र प्रदर्शिनी, कवि-सम्मेलन, सभा-सम्मेलन, गोष्ठियां आदि के छोटे-छोटे आयोजन आदि माध्यमों से लोगों में आदर्श विवाहों की भावना आकांक्षा एवं हिम्मत पैदा करनी चाहिए। 

🔵 वैसे जोड़े ढूंढ़ने में अधिक व्यक्तियों की सहायता की जानी चाहिये। उत्सव का रूप प्रभावशाली एवं आकर्षक कैसे बने, इसकी व्यवस्था बनाने में सहयोग होना चाहिये, तथा जहां भी ऐसे विवाह हों, उनका प्रचार दूर-दूर तक करने के लिये प्रयत्न होना चाहिये। यह सुविधाएं प्रस्तुत करना क्षेत्रीय संगठन का काम हैं। इन प्रयत्नों से ही उत्साह उत्पन्न होगा और उत्साह सामूहिक कार्यक्रमों की प्रगति का मूलभूत आधार होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 50)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴  तुम्हारा समर्पण यदि सच्चा है, तो शेष जीवन की कार्य पद्धति बनाए देते हैं। इसे परिपूर्ण निष्ठा के साथ पूरी करना। प्रथम कार्यक्रम तो यही है कि 24 लक्ष्य गायत्री महामंत्र के 24 महापुरश्चरण चौबीस वर्ष में पूरे करो। इससे मजबूती में जो कमी रही होगी, सो पूरी जो जाएगी। बड़े और भारी काम करने के लिए बड़ी समर्थता चाहिए। इसी के निमित्त यह प्रथम कार्यक्रम सौंपा गया है। इसी के साथ-साथ दो कार्य और भी चलते रहेंगे। एक यह कि अपना अध्ययन जारी रखो। तुम्हें कलम उठानी है। आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद प्रकाशन की व्यवस्था करके उसे सर्व-साधारण तक पहुँचाना है। इससे देव संस्कृति की लुप्तप्राय कड़ियाँ जुड़ेंगी और भविष्य में विश्व संस्कृति का ढाँचा खड़ा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही जब तक स्थूल शरीर विद्यमान है, तब तक मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला सर्वसुलभ साहित्य विश्व वसुधा की सभी सम्भव भाषाओं में लिखा जाना है। यह कार्य तुम्हारी प्रथम साधना शक्ति से सम्बद्ध है। इसमें समय आने पर तुम्हारी सहायता के लिए सुपात्र मनीषी आ जुटेंगे, जो तुम्हारा छोड़ा काम पूरा करेंगे।

🔵 तीसरा कार्य स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहने का है। यह सन् 1947 तक चलेगा। तब तक तुम्हारा पुरश्चरण भी बहुत कुछ पूरा हो लेगा। यह प्रथम चरण है। इसकी सिद्धियाँ जन साधारण के सम्मुख प्रकट होंगी। इस समय के लक्षण ऐसे नहीं है, जिनसे यह प्रतीत हो कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देकर सहज ही चले जाएँगे किन्तु यह सफलता तुम्हारा अनुष्ठान पूरा होने के पूर्व ही मिलकर रहेगी। तब तक तुम्हारा ज्ञान इतना हो जाएगा जितना कि युग परिवर्तन और नव-निर्माण के लिए किसी तत्त्ववेत्ता के पास होना चाहिए। 

🔴 पुरश्चरणों की समग्र सम्पन्नता तब होती है, जब उसका पूर्णाहुति यज्ञ भी किया जाए। चौबीस लाख पुरश्चरण का गायत्री महायज्ञ इतना बड़ा होना चाहिए कि जिससे 24 लाख मंत्रों की आहुतियाँ हो सकें एवं तुम्हारा संगठन इस माध्यम से खड़ा हो जाए। यह भी तुम्हें ही करना है। इसमें लाखों रुपए की राशि और लाखों की सहायक जनसंख्या चाहिए। तुम यह मत सोचना कि हम अकेले हैं, पास में धन नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं। साथ ही तुम्हारी उपासना का प्रतिफल भी, इसलिए संदेह करने की गुंजायश नहीं है। समय आने पर सब हो जाएगा। साथ ही सर्वसाधारण को यह भी विदित हो जाएगा कि सच्चे साधक की सच्ची साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 51)

🔵 छोटे-छोटे लता-गुल्म नन्हे मुन्ने बच्चे-बच्चियों की तरह पंक्ति बना कर बैठे थे। पुष्पों में उनके अपने सिर सुशोभित थे। वायु के झोंकों के साथ हिलते हुए ऐसे लगते थे मानों प्रारम्भिक पाठशाला के छोटे छात्र सिर हिला हिला कर पहाड़े याद कर रहे हों। पल्लवों पर बैठे हुए पक्षी मधुर स्वर में ऐसे चहक रहे थे, मानों यक्ष गन्धर्वों की आत्माएं खिलौने जैसे सुन्दर आकार धारण करके इस वन श्री का गुणगान और अभिनन्दन करने के लिए ही स्वर्ग से उतरी हों। किशोर बालकों की तरह हिरन उछल कूद मचा रहे थे। जंगली भेड़ें (बरड़) ऐसी निश्चिन्त होकर घूम रही थी मानों इस प्रदेश की गृह लक्ष्मी यही हो। मन बहलाने के लिए चाबीदार कीमती खिलौनों की तरह छोटे-छोटे कीड़े पृथ्वी पर चल रहे थे। उनका रंग, रूप, चाल, ढाल सभी कुछ देखने योग्य था। उड़ते हुए पतंग, फूलों से अपने सौन्दर्य को प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। हममें से कौन अधिक सुन्दर और कौन अधिक असुन्दर है इसकी होड़ उनमें लगी हुई थी।

🔴 नव यौवन का भार जिससे सम्भलने में न आ रहा हो ऐसी इतराती हुई पर्वतीय नदी बगल में ही बह रही थी। उसकी चंचलता और उच्छृंखलता, दर्प देखते ही बनता था। गंगा में और भी नदी आकर मिलती हैं। मिलन के संगम पर ऐसा लगता था मानों दो सहोदर बहिनें ससुराल जाते समय गले मिल रही हों, लिपट रही हों। पर्वत राज हिमालय ने अपनी सहस्र पुत्रियों (नदियों) का विवाह समुद्र के साथ किया है। ससुराल जाते समय में बहिनें कैसी आत्मीयता से मिलती हैं, संगम पर खड़े-खड़े इस दृश्य को देखते-देखते जी नहीं अघाता। लगता है हर घड़ी इसे देखते ही रहें।

🔵 वयोवृद्ध राज पुरुषों और लोक नायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर तक ऐसे बैठे थे मानो किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्त-चित्त होकर संलग्न हों। हिमाच्छादित चोटियां उनके श्वेत केशों की झांकी करा रही थीं। उन पर उड़ते हुए छोटे बादल ऐसे लगते थे मानो ठण्ड से बचाने के लिए नई रुई का बढ़िया टोपा उन्हें पहनाया जा रहा है। कीमती शाल-दुशालों में उनके नग्न शरीर को लपेटा जा रहा हो।

🔴 जिधर भी दृष्टि उठती उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था। उनके जवान न थी, वे बोलते न थे पर उनकी आत्मा में रहने वाला चेतन बिना शब्दों के ही बहुत कुछ कहता था। जो कहता था हृदय से कहता था और करके दिखाता था। ऐसी बिना शब्दों की किन्तु अत्यन्त मार्मिक वाणी इससे पहले सुनने को नहीं मिली थी। उनके शब्द सीधे आत्मा तक प्रवेश करते और रोम-रोम को झंकृत किये देते थे। अब सूनापन कहां? अब भय किसका? सब ओर सहचर ही सहचर जो बैठे थे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य