सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

👉 सहनशीलता में महानता सन्निहित है

🔴 बात सन् १९६५ की है। उन दिनों भारत-पाकिस्तान का संघर्ष चल रहा था। चाहे जब हवाई हमले की घंटी बज सकती थी सुरक्षा के लिये प्रधान मंत्री भवन मे भी खाई बनवाई गई थी। प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री को कहा गया कि ''आज हमले की आशंका अधिक है आप घंटी बजते ही तुरंत खाई में चले जायें।''

🔵 किंतु दैवयोग से हमला नहीं हुआ। प्रातः देखा गया कि बिना बमबारी के खाई गिरकर पट गई है। खाई बनाने वालों तथा उसे पास करने वालों की यह अक्षम्य लापरवाही थी। यदि वे उस रात खाई के अंदर होते तो क्या होता सोचकर राँगेटे खडे हो जाते हैं। देश के प्रधानमंत्री का जीवन कितना मूल्यवान् होता है? वह भी युद्धकाल में?

🔴 अन्य व्यवस्था अधिकारियों ने भले ही इस प्रसंग पर कोई कार्यवाही की हो, किन्तु शास्त्रीजी ने संबंधित व्यक्तियों के प्रति कोई कठोरता नहीं बरती अपितु बालकों की भाँति क्षमा कर दिया।

🔵 दूसरी घटना भी सन् १९६५ ही है। युद्धकाल था ही, चौबीस घंटों में कभी भी कैबिनेट की इमरजैंसी मीटिंग हो जाती थी। उस दिन भी संध्या समय मीटिग थी। कडाके की ठंड थी, किन्तु उत्तरदायिवों के प्रति सजग तथा समय के पाबंद हमारे तत्कालीन प्रधान मंत्री नियत समय पर मीटिग के लिये चल दिए। जाकर कार मे बैठ गए। पर जब बडी़ देर हो गई और कार खडी ही रही तो उन्होंने इस संबंध में पूछताछ की और देर होने की बात भी कही।

🔴 तब कही संयोजक महोदय ने बताया कि मीटिग तो आज उन्हीं के घर पर है। कोई दूसरा प्रधान मंत्री होता तो यों अपना समय नष्ट करने पर संबधित अधिकारी को अवश्य ही प्रताडित करता, किन्तु वे दूसरों की त्रुटियों को माँ जैसी ममतापूर्वक ही सहन कर जाते थे।

🔵 आमतौर पर ऐसा होता है कि लोग घर में तो अधिकार-आशा तथा डांट-फटकार से काम लेते हैं और बाहर सज्जनता तथा उदारता के प्रतीक बने रहते हैं, किन्तु शास्त्रीजी इसके अपवाद थे। वे स्वभाव से ही उदार तथा सहिष्णु थे।

🔴 ताशकंद जाने के एक दिन पूर्व वे भोजन कर रहे थे। उस दिन उनकी पसंद का भोजन था। खिचडी तथा आलू का भरता। ये दोनों वस्तुएँ उन्हें सर्वाधिक प्रिय थीं। बडे़ प्रेम से खाते रहे। जब खा चुके उसके थोडी़ देर बाद उन्होंने वही प्रसंग आने पर बडे़ ही सहज भाव से श्रीमती ललिता जी से पूछा-क्या आज आपने खिचडी़ में नमक नहीं डाला था ? ललिता जी को बडा खेद हुआ अपनी गलती पर किन्तु वहाँ न कोई शिकायत थी न क्रोध मुस्कराते ही रहे वे फीकी खिचडी़ खाकर।

🔵 दूसरों की गलतियों को भी क्षमा कर देना तथा बजाय डांट-फटकार या चिल्ल-पुकार मचाने के प्रेमपूर्वक बता देना निश्चय ही एक महान् गुण हैं। शास्त्रीजी सहनशीलता के प्रतीक थे।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 27, 28

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